एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्येक विचार का फल कर्ता को भोगना पड़ता रहता प्रत्येक विचार का अच्छा प्रभाव या बुरा प्रभाव कर्ताके सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है। अतः विचार का प्रभाव जो कर्ता पर पड़ता रहता उसकी जो परम्परा है, उसको विचार की गति कहते हैं। सो, इस प्रकार प्रत्येक विचार की गति भी हुआ करती प्रत्येक मनुष्य चाहे वह सब व्यवहार कर रहा हो या शान्त हो बैठा हो, अपने को अपने से भिन्न नहीं कर सकता। वह अपने को जो जानता है सो जानता ही रहता है। ऐसा तो हो नहीं-सकता कि वह अपने आप को कुछ काल केलिये भूल जाय। किसी भी समय कर्ता को इस प्रकार अपने स्वरूप का ज्ञान रहता ही रहता है। ऐसा ज्ञान कर्ता आत्मा का, कर्ता स्वरूपज्ञान है। सो यह ज्ञान तो सदा समान स्वरूप ही रहता है। चाहे कर्ता कुछ भी करे वा, कुछ ज्ञान प्राप्त करे। इस ज्ञान का प्रवाह एकरस ही रहता है। यद्यपि भिन्न २ प्रवृत्तियों के; भिन्न २ प्रकार के ज्ञान होते हैं, तथा विचार का प्रवाह भिन्न २ विषयों सम्बन्धी ज्ञानों द्वारा बनता रहता है। परन्तु कर्ता स्वरूप ज्ञान एकरस रहता है। सो इस-प्रकार से इस ज्ञान को कर्ता ज्ञान का प्रवाह-ज्ञान कह कर पुकार सकते हैं। प्रत्येक विचार अपने पूर्व, तथा पश्चात के सब ज्ञानों द्वारा अनुप्राणित हो रहा होता है। इसलिए मन रूप अन्तःकरण की, परिणितियों का स्वरूप विचार है। सो यह ज्ञान प्रवाह स्वरूप ही बन रहा है। ज्ञान स्वरूप कर्ता, जो जीवात्मा है, ज्ञान रूप, मन का, विचार का, कारण रूप है। कर्ता मन के सब रूप ज्ञान को अपने इस परिमित स्वरूप के कारण जानता है। मन में उत्पन्न होने, वा टिकने वाले सब प्रकार ज्ञान सम्बन्धीय विचारों स्वरूप का कर्ता ज्ञान समवायिकारण होनेके, कर्ताके स्वरूप से सब प्रकार के ज्ञान रूप विचार प्रवाह स्वरूप ही बन रहे हैं। सो इस प्रकार से कर्ता ज्ञान प्रवाह रूप विचार बन रहा है। सो, विचार कर्ता से भिन्न कभी नहीं बन सकता। इस प्रकार अन्तःकरण का प्रत्येक विचार मनुष्य अपने स्वरूप द्वारा अपने ही अन्दर हर एक क्षण में स्वयं ही अनुभव करता रहता है। स्वयं ही उन सब विचारों द्वारा किए जाने वाले सब कर्मों अथवा संस्कारों को भी सदा अपने अन्दर ही अनुभव करता रहता है। स्वयं विचार रूप अन्तःकरण अपने कर्ता के आधीन ही अपने को रख पाता मनुष्य सब कुछ करना चाहता है। यह, जो कुछ भी कर्म कर रहा होता-सदा सुखपूर्वक रहने के लिये सब करता है। परन्तु जो कुछ कर्म यह करता है। उनका फल, जो कर्म परमात्मा द्वारा फल भोग के लिये बनाए जा चुके हैं। उन कर्मों का फल, जो जो यह कर्म करेगा, उस को भुगतना पड़ता ही सब कुछ भोगने के ही कारण कर्ता सब व्यवहार को कर रहा अथवा जो कुछ किया जा रहा अथवा होगा। सो, सब ही कुछ कर्ता के लिये किया जाता है, सब कुछ कर्ता ही भोगता भी है। सब कर्मों के फल को, सब भोग सम्बन्धी सब कुछ सब व्यवहार ही जो कुछ होता रहता है। सो परमात्मा का तो कुछ नहीं बना बना कुछ परमात्मा का बनता ही नहीं है। सो सब व्यवहार मनुष्य का अपने ही लिये होता है। सो यह सब कुछ जो कुछ कर्ता अपने लिये करता है। उस कर्ता को अपने ही सब किये गए कर्मों का तो फल भोगना ही पड़ता है। परमात्मा किसी कर्ता द्वारा किए जाने वाले किसी कर्म अथवा-कर्म फल भोग को अपने ऊपर तो कभी नहीं लेता। कर्ता द्वारा स्वयं कर्म किया जाता है? कर्मों का फल भोगने के लिये ही कर्ता कर्म करता है? परमात्मा को क्या कर्मफल भोग की आवश्यकता है? अथवा परमात्मा को अपने लिये कर्म का कर्ता बनने की क्या आवश्यकता है? स्वयं ही कर्ता अपने कर्मों अनुसार सुख वा दुख भोगने अधिकारी बन रहा है? फल भोगने के ही लिये तो सब कुछ कर रहा होता है। अतः जब कर्ता ही, फल का सब प्रकार भोक्ता बन रहा है। तो उसका फल भोगने में किसी दूसरे का, सम्बंध कैसे हो सकता है? परमात्मा सब कुछ करते हुए भी सब कर्मों के सब प्रकार फल भोगों से सदा पृथक ही रहता है। क्योंकि परमात्मा को किसी प्रकार का कोई फल भोगने की इच्छा नहीं है। जब परमात्मा किसी फल को नहीं चाहता तो कर्म का कर्ता भी परमात्मा को नहीं कहा जा सकता। परमात्मा के लिये किसी फल भोग की आवश्यकता नहीं है। जीव अपने सुख दुःख भोगने के लिये कर्म करता है। 223