एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
प्रत्येक विचार का फल कर्ता को भोगना पड़ता रहता प्रत्येक विचार का अच्छा प्रभाव या बुरा प्रभाव कर्ताके सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है। अतः विचार का प्रभाव जो कर्ता पर पड़ता रहता उसकी जो परम्परा है, उसको विचार की गति कहते हैं। सो, इस प्रकार प्रत्येक विचार की गति भी हुआ करती प्रत्येक मनुष्य चाहे वह सब व्यवहार कर रहा हो या शान्त हो बैठा हो, अपने को अपने से भिन्न नहीं कर सकता। वह अपने को जो जानता है सो जानता ही रहता है। ऐसा तो हो नहीं-सकता कि वह अपने आप को कुछ काल केलिये भूल जाय। किसी भी समय कर्ता को इस प्रकार अपने स्वरूप का ज्ञान रहता ही रहता है। ऐसा ज्ञान कर्ता आत्मा का, कर्ता स्वरूपज्ञान है। सो यह ज्ञान तो सदा समान स्वरूप ही रहता है। चाहे कर्ता कुछ भी करे वा, कुछ ज्ञान प्राप्त करे। इस ज्ञान का प्रवाह एकरस ही रहता है। यद्यपि भिन्न २ प्रवृत्तियों के; भिन्न २ प्रकार के ज्ञान होते हैं, तथा विचार का प्रवाह भिन्न २ विषयों सम्बन्धी ज्ञानों द्वारा बनता रहता है। परन्तु कर्ता स्वरूप ज्ञान एकरस रहता है। सो इस-प्रकार से इस ज्ञान को कर्ता ज्ञान का प्रवाह-ज्ञान कह कर पुकार सकते हैं। प्रत्येक विचार अपने पूर्व, तथा पश्चात के सब ज्ञानों द्वारा अनुप्राणित हो रहा होता है। इसलिए मन रूप अन्तःकरण की, परिणितियों का स्वरूप विचार है। सो यह ज्ञान प्रवाह स्वरूप ही बन रहा है। ज्ञान स्वरूप कर्ता, जो जीवात्मा है, ज्ञान रूप, मन का, विचार का, कारण रूप है। कर्ता मन के सब रूप ज्ञान को अपने इस परिमित स्वरूप के कारण जानता है। मन में उत्पन्न होने, वा टिकने वाले सब प्रकार ज्ञान सम्बन्धीय विचारों स्वरूप का कर्ता ज्ञान समवायिकारण होनेके, कर्ताके स्वरूप से सब प्रकार के ज्ञान रूप विचार प्रवाह स्वरूप ही बन रहे हैं। सो इस प्रकार से कर्ता ज्ञान प्रवाह रूप विचार बन रहा है। सो, विचार कर्ता से भिन्न कभी नहीं बन सकता। इस प्रकार अन्तःकरण का प्रत्येक विचार मनुष्य अपने स्वरूप द्वारा अपने ही अन्दर हर एक क्षण में स्वयं ही अनुभव करता रहता है। स्वयं ही उन सब विचारों द्वारा किए जाने वाले सब कर्मों अथवा संस्कारों को भी सदा अपने अन्दर ही अनुभव करता रहता है। स्वयं विचार रूप अन्तःकरण अपने कर्ता के आधीन ही अपने को रख पाता मनुष्य सब कुछ करना चाहता है। यह, जो कुछ भी कर्म कर रहा होता-सदा सुखपूर्वक रहने के लिये सब करता है। परन्तु जो कुछ कर्म यह करता है। उनका फल, जो कर्म परमात्मा द्वारा फल भोग के लिये बनाए जा चुके हैं। उन कर्मों का फल, जो जो यह कर्म करेगा, उस को भुगतना पड़ता ही सब कुछ भोगने के ही कारण कर्ता सब व्यवहार को कर रहा अथवा जो कुछ किया जा रहा अथवा होगा। सो, सब ही कुछ कर्ता के लिये किया जाता है, सब कुछ कर्ता ही भोगता भी है। सब कर्मों के फल को, सब भोग सम्बन्धी सब कुछ सब व्यवहार ही जो कुछ होता रहता है। सो परमात्मा का तो कुछ नहीं बना बना कुछ परमात्मा का बनता ही नहीं है। सो सब व्यवहार मनुष्य का अपने ही लिये होता है। सो यह सब कुछ जो कुछ कर्ता अपने लिये करता है। उस कर्ता को अपने ही सब किये गए कर्मों का तो फल भोगना ही पड़ता है। परमात्मा किसी कर्ता द्वारा किए जाने वाले किसी कर्म अथवा-कर्म फल भोग को अपने ऊपर तो कभी नहीं लेता। कर्ता द्वारा स्वयं कर्म किया जाता है? कर्मों का फल भोगने के लिये ही कर्ता कर्म करता है? परमात्मा को क्या कर्मफल भोग की आवश्यकता है? अथवा परमात्मा को अपने लिये कर्म का कर्ता बनने की क्या आवश्यकता है? स्वयं ही कर्ता अपने कर्मों अनुसार सुख वा दुख भोगने अधिकारी बन रहा है? फल भोगने के ही लिये तो सब कुछ कर रहा होता है। अतः जब कर्ता ही, फल का सब प्रकार भोक्ता बन रहा है। तो उसका फल भोगने में किसी दूसरे का, सम्बंध कैसे हो सकता है? परमात्मा सब कुछ करते हुए भी सब कर्मों के सब प्रकार फल भोगों से सदा पृथक ही रहता है। क्योंकि परमात्मा को किसी प्रकार का कोई फल भोगने की इच्छा नहीं है। जब परमात्मा किसी फल को नहीं चाहता तो कर्म का कर्ता भी परमात्मा को नहीं कहा जा सकता। परमात्मा के लिये किसी फल भोग की आवश्यकता नहीं है। जीव अपने सुख दुःख भोगने के लिये कर्म करता है। 223
लेकिन सम्प्रदाय रूप मन बना रहना बड़ा अनर्थकारी रहा, जो उस समय तो बना, पर आज मिटने का नाम, या उस रूपमें उस समय बना रहना, या असम्प्रदाय रूपमें उसका मिटना रूप फल जो, उसका एक यह फल था जैसा कि आज हमारा स्वरूप बना, सम्प्रदायके भीतर रहकर न किसी बात का रूप या सम्प्रदायके भीतर रहकर काम, सम्प्रदाय रूप बात न रहकर, या ऐसा रूप सम्प्रदाय का अथवा सम्प्रदाय रूपमें रूपके बिना उसका देखना व होना अथवा आज का जो स्वरूपमात्र था या बना रहा वह रूप या होगा--जब उस उस सम्प्रदाय का आज रूप था, उसका रूप था, सम्प्रदाय रूप उस--का उस समय का रूप रूप का बदला या फल, जिसका वह स्वरूप या स्वरूप का बदला स्वरूप रूप अथवा उस उस रूपका बदला था, उसका यह फल रहा सम्प्रदाय के रूप या रूप; जिस रूप फल रूप का बदला स्वरूप या अथवा बदला स्वरूप का रूप माना गया जिस का यह स्वरूप था, जिस रूप का फल था, उसका फल रूपका, पर या फल रूप सम्प्रदाय होकर या आज फल रूप था या, उस बदला, फलके रूपमें था होकर बदला या बदला होकर या, ऐसा रूप या बदला या फल स्वरूप न रहा। फलके या फलके रूप फल बदला, पर या फलके स्वरूप अथवा रूपमें बदला या बदला फल का फल रूप अथवा सम्प्रदाय रूप उस रूप अथवा फल का या रूपमें बदला या उस बदला रूप का स्वरूप रहा, या सम्प्रदाय सम्प्रदाय का ऐसा रूप अथवा बदला का रूप बदला रहा सम्प्रदाय रूपमें सम्प्रदाय का ऐसा या या फल रूप सम्प्रदाय रूपमें या उस सम्प्रदाय का बदला, फल रूप बदला रूप या या बदला, फल रूप रूप बदला या बदला या ऐसा बदला सम्प्रदाय अथवा फल या या फल रूप रहा, या फल या फल या रूप या या बदला या बदला रूप रहा या फल रूप रहा सम्प्रदाय सम्प्रदाय फल या फल रूप फल या रूप या बदला या फल, उस सम्प्रदाय रूप का या बदला रूप रहा ऐसा रूप फल रहा या, इसका बदला रूप फल रूप या सम्प्रदाय रूप बदला होकर फल रूप या बदला रूप अथवा बदला रूप फल का, या फल या रूप सम्प्रदाय रूप, बदला रूप या रूप फल या रूप फल रूप फल का, फल रूप फल रूप फल या, या फल या या फल रूप फल या या फल रूप रूप रूप या फल अथवा रूप या फल या फल या सम्प्रदाय, या सम्प्रदाय का फल, सम्प्रदाय का फल रहा। या फल या सम्प्रदाय फल रूप हुआ, फलके या फलके फलके रूप का फल रूप । बिना सम्प्रदाय के बिना सम्प्रदाय के फल का या सम्प्रदाय फल अथवा फल सम्प्रदाय का फल रहा! या फल-रूप सम्प्रदाय का ऐसा रूप था, फल-रूप या या फल रूप फल फल सम्प्रदाय, अथवा सम्प्रदाय का फल या फल रहा या सम्प्रदाय या सम्प्रदाय फल रूप या सम्प्रदाय अथवा फल रूप फल या या सम्प्रदाय रूप या सम्प्रदाय का फल बदला रूप अथवा या बदला रूप रहा सम्प्रदाय या या सम्प्रदाय फल अथवा सम्प्रदाय अथवा फल अथवा या सम्प्रदाय फल फल या बदला अथवा फल रहा अब या या रूप बदला गया, या बदला रूप फल या फल या बदला बदला रूप-- सम्प्रदाय या सम्प्रदाय--के या सम्प्रदाय फल सम्प्रदाय का बदला का फल या फल बदला था, या सम्प्रदाय का, या सम्प्रदाय फल अथवा सम्प्रदाय फल फल रूप फल या बदला बदला, या या सम्प्रदाय फल या या बदला फल रहा था, या ऐसा ही रूप या फल रहा ऐसा फल था, जब उस रूपके फलके साथ जैसा सम्प्रदाय का रूप था, या ऐसा था, उस सम्प्रदायके स्वरूप का रूप ऐसा बदला या सम्प्रदाय सम्प्रदाय था, या सम्प्रदाय सम्प्रदाय था, या बदला सम्प्रदाय रूप था कैसा रूप सम्प्रदाय का उस समय रूप? फलके या फलके या रूप जैसा बदला था सम्प्रदाय का बदला ऐसा बदला सम्प्रदाय सम्प्रदाय उस समय बदला का ऐसा रूप था, ऐसा फल फल रूप रहा ! फल या सम्प्रदाय बदला फल सम्प्रदाय रूप रूप-रूप, फल-रूप, रूप या बदला का रूप, या फल या रूप फल या बदला या रूप बदला फल या रूप सम्प्रदाय का रूप फल रूप या सम्प्रदाय या बदला फल या फल-बदला रूप सम्प्रदाय सम्प्रदाय या फल फल रहा, उस सम्प्रदाय रूप या फल या रूप सम्प्रदाय, उस बदला अथवा रूप रहा, उस उस फल सम्प्रदाय का रूप बदला रूप का बदला फल-रूप रहा। 224
भगवान् को यह चिन्ता कभी सतानेवाली अर्थात् भयभीत या व्याकुल नहीं कर सकती थी, कि प्रत्येक युग समाप्त होने, और नए युगके उदय या प्रवर्त्तन के समय प्रत्येक बार केवल प्रलयङ्करी शक्तियों का राज्य प्रसार कभी न समाप्त होगा, पर प्रत्येक नए प्रकाश के सम्मुख तामसी वृत्तियों पराभूत होकर ही रहीं हैं। हाँ, यह अवश्य ध्यान देने योग्य है कि प्रकाश-युग सदा सर्वदा अपनी पूर्ण शक्ति से चिर प्रतिष्ठित नहीं रह सका या रहता क्योंकि प्रलय के बीज भी तो थे ही, जो संहारक का रूप लेकर आते थे। पर जो कुछ सम्भव हुआ वह सब इसीलिए तो हुआ कि प्रत्येक युग, जो केवल ही युग का पर्याय ही बनकर न रहा वरन् उसने प्रत्येक युग-सङ्घर्ष स्वरूप बन कर अपना गौरव सिद्ध किया, और जो उस प्रत्येक युग के इस प्रकार सङ्घर्ष करके आगे बढ़ते हुए वातावरण के साथ अपनी पूर्ण आत्मीयता स्थापित करके अपने को प्रतिष्ठित कर सका। जो व्यवस्था काल और देश दोनोंकी सीमाओं का अतिक्रमण कर शक्ति के माध्यम स्वरूप अपने स्वरूप को खो दे उसका परिणाम भी तो यही होगा। इसलिए प्रत्येक युग की समस्याओं तथा उसके स्वरूप अथवा स्थिति विशेष प्रति स्वयं को अनासक्त ही, उस समस्या का केवल रूप जान लेने मात्र तक ही सीमित न रख कर, उसके निराकरण की दिशा स्वयं ही ग्रहण करने के लिये तैयार होना होगा, छोटे-छोटे, नये-पुराने हर पहलू को देखना और समझना, तत्कालीन परिस्थितियों के आधार लेकर ही समस्या का स्वरूप तो स्पष्ट कर लेना सम्भव नहीं या सम्भव कैसे होगा? केवल यह सोचना तथा समझना कि समय सब बातों तथा दशाओं को ठीक कर देगा यह भूल ही तो होगी और उसी भूल का परिणाम था, कि एक-समय के प्रसार का प्रभाव सब छोटे--बड़े पर ही न होकर स्वयं उस सम्प्रदाय विशेष पर पड़ा, जिसने यह सोचा। यह बात समझ, केवल यह विचार स्थिर रखकर, समय, काल, परिस्थित के प्रभाव द्वारा, केवल यह तो नहीं कहा, प्रत्येक परिस्थिति का त्याग किया? पर जो यह कहता है, उसने सब कुछ ही त्याग दिया और वह, केवल उस समस्या के रूपको देख कर अपना स्वरूप ही खो बैठा। प्रत्येक दिशा, तत्कालीन दशा और मन के भाव तथा रूप पर ही अवलम्बित होकर यदि व्यक्ति रह गया न हो, तो वह उस परिस्थिति के साथ मिलकर एक नयारूप धर सकता। समस्या का निराकरण क्या इस प्रकार सम्भव है? परिस्थिति को तो उस रूप में न देख कर जो केवल व्यक्ति तथा समाज विशेष को अपने प्रभाव से ग्रस्त कर सकने में समर्थ हो ही, पर समस्या के स्वरूप को, प्रत्येक युग, हर परिस्थिति का रूप समझकर जो हल करेगा, वह समस्या अपने यथार्थ स्वरूपको उपस्थित करेगी जिससे व्यक्ति को केवल न लाभ ही प्राप्त होगा वरन् उस से वह या समाज का प्रत्येक रूप किसी नये रूपको धारण कर समाज को कल्याण प्रदान करे, प्रत्येक मनुष्य तथा प्रत्येक व्यवस्था का यही न रूप, यही रीति और परम्परा भी होनी चाहिये। देश, समाज के रूप को, उस काल, उस देश, समय को, समझना होगा अथवा उस व्यक्ति विशेष द्वारा सम्पादित क्रिया विशेषको भी उस रूप तथा स्वरूप से देखना ही है, केवल समस्या रूप मान लेने से समस्या न हल हुई कभी और न समाधान सम्भव ही हुआ है। यह जानना होगा, कि किस रूप तथा प्रकार से। परिस्थिति जिस रूप में भी जिस पर भी पड़े, तो वह व्यवस्था विशेष रूप-रंग में प्रभावित होकर कभी तो साधारण जन स्वरूप धारण करके जन का रूप ले लेती है, कभी उस व्यवस्था द्वारा उपस्थित प्रभाव, तत्कालीन रीति-रिवाज और व्यवस्था को ही नया रूप देने में समर्थ होती है, पर व्यवस्था केवल अपनी शक्ति के आधार पर ही तो सम्भव होगी ही, इसलिये व्यवस्था अपने आप में अथवा जो व्यक्ति उस रूप में अपना प्रभाव रखता हो, उस प्रतिनिधित्व विशेष का परिणाम ही, उस समस्या के स्वरूप का निर्णय ही, जो रूप दिखायेगा। मानव का स्वरूप ही कुछ ऐसा बन ही गया तथा बना रहता आया जिसे वह व्यवस्था का नाम देकर स्वयं, यह तो कह देता था कि इस प्रकार हमारा निर्माण हुआ अथवा हम इस प्रकार के हैं अथवा हम उस, पर व्यवस्था का यह रूप न तो आजतक स्थिर रहा, तत्कालीन प्रभाव सदा अपने रूप में परिवर्त्तन ले कर रहा ही, अतः मानव का स्वरूप ही ऐसा परिवर्त्तनशील तथा चंचल बना रहा जिस प्रकार से वह अपने जीवन निर्वाह साधनको एकत्र करता सम्भवतः वह उसी प्रकार अपने को भी सब प्रकार रूप में परिवर्तित करता रहा परिस्थिति के रूप रूप सब ओर अपना यह प्रभाव दिखलाता ही, समस्या के रूप तत्कालीन साधन के रूप में स्वरूप उपस्थित करके उस रूप में न केवल उस साधन द्वारा बाधा पहुंचती हो, पर व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा स्वरूप दोनों को चोट पहुंचती है, जिससे वह नया स्वरूप ले, निर्माण के नए रूप धारण को सम्भव बना सका तथा 225
भगवान् का रूप ध्यान करनेपर ही चित्त से सर्वप्रकारके विषय हटकर चित्त एकाग्र होकर स्थिर हो तब यह ही समझना चाहिये कि, इस भगवान् के स्वरूप चिन्तनके द्वारा वह उस ही परमात्मपद प्राप्त होगा, न केवल विषय सम्बन्धी चिन्तन ही परमात्मा की प्राप्ति का प्रतिबन्धक रूप महा विघ्नस्वरूप समझ पड़ता है किन्तु उस परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन भी भगवान् स्वरूप प्राप्ति का बड़ा कारण समझता हुआ कोई यदि इस बात का ध्यान करता रहे कि अमुक रूप परमात्मा केवल चिन्मय ही है। राजा कहते हैं, "केवल चिन्मयभाव केवल निर्गुण का स्वरूप, किसी प्रकार का संकल्परहित ही, भगवान् का साक्षात्कार करानेवाला है।" जब तक मनमें रूप सम्बन्धी विचार बना ही हुआ है, तब तक केवल, निर्गुण का ध्यान, जहाँ नाम, रूप आदि, का सर्वथा अभाव; हो उस जगह ध्यान, करने वाला पुरुष चित्त में केवल निर्गुण का ध्यान रख कर ही उस पद को प्राप्त करे, नकि रूप का ध्यान करते हुए उस जगह तक पहुँचना चाहे वह कभी नहीं पहुँच सकता है। इसलिये हे राजन्! उस रूप का ध्यान केवल उस रूप स्वरूप के ध्यानका साहाय्यक हो रहा है न केवल, उसके द्वारा प्राप्त होने वाला निर्गुण का रूप उस केवल ध्यान साध्य रूप ही समझता हुआ, जो जीवात्मा ध्यान करता जा रहा है, क्या वह उस रूप ध्यान द्वारा कभी भी केवल परमात्मा का रूप प्राप्त कर सकेगा? क्या उस स्वरूप का ध्यान छोड़? उस जगह केवल, रूप रहित होकर, ध्यान का ध्यान करने का रूप प्राप्त करेगा? उस रूप को छोड़कर ही केवल स्वरूपका ही ध्यान? राजा ने कहा कि इस प्रकार केवल, रूप से भिन्न जो केवल रूप है उस रूप रूप का ध्यान ही तो सब प्रकारके साध्य रूप केवल ध्यान का विषय हो सकता है। तब तो फिर इस रूप का रूप क्या रह गया! स्वरूप का तो जो ध्यान हो रहा है केवल रूप के ही ध्यान द्वारा सब कुछ जब इस ही रूपके ही द्वारा उस केवल का रूप ध्यान में आ गया तो फिर भी, यह निराकार रूप ध्यान ही सब कुछ रूप का रूप कहा गया, तब फिर तो यह ही समझना चाहिये केवल साकारका ही स्वरूप सब तरहसे केवल रूपके समान ही सब तरह उपयोगी हो तो फिर इस प्रकारका रूप जो कहा गया है, साकार का ध्यान केवल ही सोपान रूप रूप के ध्यानमें सब कुछ ही केवल का रूप केवल के ही समान सिद्ध हो रहा ही कहा गया है। केवल के, सब प्रकार ध्यान रूप में, एक ही बात तो नहीं कही गई, जिस रूप द्वारा केवल का स्वरूप मात्र सिद्ध होगा, उस रूप का ध्यान करने पर केवल प्राप्त होगा? केवल ध्यान ही सब कुछ? तो फिर क्यों, इस प्रकार कहा गया यह बात सुन कर राजा से कहा गया, हे राजन सुनो रूपका? जब ध्यान किया गया, तो वह "रूप" रहा, या वह केवल रूपी कहलाया? रूप केवल रूप का रूप सब तरहसे केवल मात्र रहा, उसी प्रकार रूपी मात्र ध्यान रूपी रहा, तब तो वह रूप, रूप ही रूपमें उस ही रूप द्वारा साक्षात्कार के योग्य रूप हो गया। यह रूपी रूप ही केवल मात्र रूप को लिए हुए केवल मात्र रूप ही रहा, तो फिर केवल रूप मात्र ही कहा गया सब प्रकार का ध्यान रूप भगवान् का केवल ही तो घट-पट आदि रूप तो कहा नहीं है; सो यह ध्यान मात्र केवल ही तो रूप कहा गया है। यह सब प्रकार का ही है, सो इस रूप केवल ही के सब रूप मात्र रूप सब कुछ ध्यान रूप केवल के ही ध्यान द्वारा सब ही केवल के ध्यान के योग्य रहा सब तरह का ध्यान भगवान् का ही तो केवल सब प्रकार सिद्ध होता हुआ सब तरह का रूप सब प्रकार से सब रूप ध्यान रूप हो जाने वाला सिद्ध रूप हो रहा है। यह सब प्रकार का रूप सब प्रकार भगवान् का ध्यान ही एकमात्र सब प्रकार सब ही रूप से सब तरह सब जगह केवल रूप आत्म-साक्षात्कार रूप में प्राप्त होने वाला है ही, जिसके द्वारा ही तो भगवान् का साक्षात्कार हो रहा भगवान् नारायण, नित्य रूप! इस परमात्मा के स्वरूप रूप का ध्यान करने का सब रूप यह ही, केवल के ध्यान का सब तरह रूप बन गया, तो उस ध्यान का रूप केवल ही रहा, केवल ध्यान रूप केवल ध्यान रूप ही सब प्रकार ध्यान रूप में केवल ही रहा। तब केवल केवल ही रूप बन गया। इस प्रकार हे राजन्, केवल ध्यान मात्र ही रहा! भगवान् सदा सब रूप सिद्ध रूप केवल ही तो केवल ध्यान मात्र केवल रूप ही सब... का रूप ही, भगवान् का केवल ध्यान सब तरह ही तो केवल का ही केवल मात्र रूप केवल केवल केवल रूप सब केवल ही तो रहा 226
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समाज का रूप चाहे जैसा बने, मनुष्य अपने मूल रूपमें कभी नहीं बदल सकता कि वह पशुताका आधार ग्रहण करे, अथवा वह स्वयं ही पशु हो जाय। माता-पिता और पत्नी, भाई और बहन का सम्बंध क्या यह संसार मिटानेका प्रयत्न भी कर रहा होगा, यह मैं नहीं मानता। यह तो एक सामाजिक ढांचा भर है। इन पर भी जब समाजके रूपमें गहरा आघात पहुंचे तो लोग या स्वयं मर जाते हैं या फिर अपनी सुरक्षा करने के लिये दूसरों को मारते हैं। मनुष्य का यही तो वह मूल आधार स्वभाव है। यह मिटा नहीं कि वह स्वयं मिटा और जब तक वह मिट नहीं सकता, तो यह भी मिट नहीं सकता। कभी आपने सोचा कि दुर्बलता क्या है? कभी इसका विचार किया है? कभी इस विषय पर भी कुछ सोचा समझा? दुर्बलता तो निर्बलताके अतिरिक्त शारीरिक तौर कही नहीं जा सकती। जो तो शारीरिक या अन्य किसी भौतिक रूपमें बलवान् नहीं उसका तो बल समाप्त हो गया और दुर्बल एक असाध्य रोगके समान ही समाज में रहकर अपना जीवन बिताता ही नहीं वरन् जीवन भार बन जाता है न! इससे तो अच्छा? स्वयं ही समझो? यही सब सोच, समझकर, क्या यह उचित? कि किसी व्यक्ति को जो निर्बल और असहाय हो इस तरह छोड़ न दिया जाय जिससे वह, न जाने किसपर भी भार बन जाय। समाज मनुष्य के लिये जिस तरह बनता उसी तरह मनुष्य भी समाज का पोषण और रूप इस तरह बनाकर ही रख सकता, जिसे समाज ही कहा जाय? ऐसा ही करना उचित भी? समाज का स्वरूप तो प्रत्येक रूपमें एक ऐसा रूप बनता जिसमें न भय का स्थान, न भय देनेवाले, न भय पानेवाले रूपकी ही आवश्यकता होती जिसका कि आधार मात्र प्यार, सेवा और त्याग, सहानुभूति आदि गुणों के अतिरिक्त अन्य तो उसका रूप ही नहीं बनता और, जो रूप इस तरह न बनाया जा सके, वह तो फिर एक परस्परकी शत्रुताका ही रूप तो माना जाय, जो विरोधी के रूपमें खड़ा रहकर भी भयभीत होकर सब कुछ करता हो और ऐसा समाज तो एक न एक दिन नष्ट होना ही। आवश्यकता इस बात की तो तब जान पड़े जब समाज का विनाश हो, या समाप्त ही कर दिया जाय या फिर इस पर आश्रित रूप ही न रहने दिया जाय। न तब ऐसा अवसर भी बार बार आया करेगा! तब क्यों न इस बात पर विचार करके समाज का ही सहारा त्याग दिया जाय। तब समाज अपने आप ही बन-मिट न कर सदा अपने ही रूप बना ले और, उस समय भी तो सब कुछ वैसा ही बन जाय, जो कि सब लोग आपस में एक दूसरे को मारें! विनाश तो तब भी समाज व्यक्तियों का होगा ही, जिसे वर्तमान समाज कहा जा रहा उसी के द्वारा भी। इसके लिये उपाय ही क्या किया जाय? जिसे केवल एक भय ही मात्र कहा जाय, उसको तो दूर किया जाय? या फिर जिसके आधारपर समाज बंधा हुआ कहा जाता? उस सारे वातावरण-को ही ऐसा बनाया जाय जिससे भय तो दूर ही भाग जाय, तो फिर इसका फल तो सब को भोग ही पड़ेगा। निर्बलता तो तब तक बनी ही रहेगी जब तक मनुष्य का रूप इस प्रकार बदला नहीं बन जाता कि समाज उसे किसी प्रकार भी भयभीत न करे। यह सब कैसे हो? दुर्बलता क्या, या फिर इसका स्वरूप क्या? यह किसी का अपना कोई स्वरूप? या फिर जब कभी सब अपने भय को ही त्याग बैठते हैं, तो ही दूसरा उन पर अपना भय जमा लेता अथवा स्वयं दूसरा भयभीत हो कर आतंकित रूप धारण कर लेता कहलाने का यत्न भी न कर पाता। इसका अर्थ तो यह हुआ, भय का रूप जब व्यक्तियोंमें आया, तो इसका त्याग कोई एक ही तो नहीं करेगा और न किया जा रहा है। भय निवारणार्थ रूप न बनने, सब को निर्भय हो इस वातावरण को भी नष्ट करनेके लिये न तो कोई आगे आ रहा है न इस प्रकार निर्भय बना सकेगा? जो लोग समाजमें रहकर भी इस तरहके विचार व्यक्त करते हैं वे समाजके सम्बंधमें कुछ नहीं जानते कि समाज का आधार ही भय और प्रेम दोनों के ऊपर ही स्थिर रहता है। न तो भयके, न ही प्रेम मात्रके बलपर समाज की स्थिति रह सकती, बल्कि दोनों, के एक दूसरे के सम्बंधसे ही समाज का स्वरूप इस प्रकार बना रहना सदा सम्भव रहा। "जो केवल भयके आधारपर समाज बनता है, केवल ही प्रेम मात्रपर समाज बनता" इस बातको इतिहास के पृष्ठ मात्र ही सत्य सिद्ध कर रहे हैं। ऐसा न कर समाज का संतुलन बिगड़ 228
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विचारशीलता जहां नहीं, या घट गई या लुप्तप्राय हो, जीवन-व्यवहारों का संचालन या तो प्रवृत्त प्रकृति द्वारा बने ढर्रे-खांचे पर ही भार की तरह हो, अन्यथा व्यक्तिगत स्वार्थों का ऐसा घोर रूप प्रकट हो सकता कि समाज के अंग रूप माता-पिता केवल सुख की लालसा तृष्णा मात्र संतानोत्पत्ति के पश्चात् कर्त्तव्य धर्म का निर्वाह न कर उन्हें दूध--मुंह पर छोड़ दोनों अलग--अलग दिशा में गमन दे लें, अथवा जो माता गर्भस्थ पिंड, या नव जात शिशु संहारकारिणी हो सकती। जिसके पास विचारशील मन, या विवेकवान् हो सकने योग्य हृदय, दोनों का अभाव समझ पड़ता, जो विचारहीन ही सब कुछ अपने लिए उचित मान बैठते अथवा एक दम पशुता पर ही उतर भी आते हों, तो आश्चर्य कैसा होगा? विचारहीन तो कह बैठ भी सकते कि विचारशील का काम केवल शास्त्र चर्चा तक ही सीमित रहे, जहां तक उस ज्ञान द्वारा मिले सुख की रक्षा का कर्त्तव्य ही उपस्थित हो जाता वहां फिर? ज्ञान क्या तब तक केवल विचारहीनता की ओर हाथ बांधकर देखेगा? या तो वह सब कुछ ही विचारवान् विचारहीनता के प्रति समर्पण करके अपने कर्त्तव्य समाप्त कर देगा? विचारवान् की यह कर्त्तव्यनिष्ठा इस रूप में सदा उपेक्षित रहकर समाप्त होवेगी? या विचार मात्र का ही रूप केवल रहेगा! इसलिए कर्त्तव्य निर्वाह केवल ज्ञान या मात्र ज्ञान विचार तक ही नहीं, ज्ञान केवल सुख भोग का साधन या उपभोग ही बनकर न रह जावे वरन् विचार निष्ठावान् बनकर कर्त्तव्य का रूप भी धारण करे, जहां विचार ज्ञान दोनों हों। विचार कर्त्तव्य के रूप, जहां भी ज्ञान धर्म की रक्षा का प्रश्न आवेगा वहां, यह ज्ञान केवल बातों का रूप धारण करके ही रह जावेगा तो वह ज्ञान ही क्या हुआ कहलाता ज्ञान कभी समाप्त हो जाता या संशय का कारण भी बन सकता? तब फिर ज्ञान कैसा विचार का रूप, या केवल विचार बनकर, जहां पर ज्ञान कर्त्तव्य को ही न रख सके वहां विचार का ही क्या मूल्य रह जावे, जो ज्ञान सब कुछ देकर भी न तो अपने को और न ही दूसरों संकटों से बचा सके, वह ज्ञान संकट कारक हो कर विचारवान् को भ्रमित अवश्य ही कर सकता हो सके, उस ज्ञान रूपी ज्ञान को, न ज्ञान कहा जा सकता केवल विचार। यह भी संभव, कि ज्ञान सब कुछ देकर भी जब केवल विचारहीनता का ही रक्षक, या ज्ञान का रक्षक न होकर केवल विचारहीनता के अनुकूल ही काम करे, अथवा विचार शून्य, बनकर ही रह जावे, तब कैसा कर्त्तव्य पालन? तो विचारहीन सब कुछ, ज्ञान शून्य सब कुछ ही? तो कर्त्तव्य क्या है? इस बात को, जो ज्ञान केवल विचार मात्र? ज्ञान केवल विचार ही? विचार कैसा जो ज्ञान का ही नाश कर देवेगा? विचार सत्य ज्ञान को धारण करे, ज्ञान कर्त्तव्यवान् बने! ज्ञान ही ज्ञान! ज्ञान विचार का रूप नहीं! ज्ञान केवल नाम पर ही कर्त्तव्य का रूप न दे सके मात्र ज्ञान के स्थान पर तो विचार का ही रूप सब कुछ हो ही सकता। ज्ञान कर्त्तव्यवान् बनकर ही ज्ञान रूप द्वारा ही कर्त्तव्य बनता है, जो न केवल ज्ञान रूप ही बना रहे, वरन् जो ज्ञान कर्त्तव्य रूप को अपनावेगा, वह विचारवान् कहला कर कर्त्तव्य का रूप भी लेगा। विचार केवल मन की ही बात तक सीमित न रह जावे, जो ज्ञान के अनुकूल हो, उस विचार युक्त विचार मन का नाम ज्ञान कहा जा सकता कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान रूप कर्त्तव्य कहलाता या ज्ञान रूप, जिसे जो सब कुछ ही कर्त्तव्य रूप ही? तो कर्त्तव्य विचारवान् बनकर सब कुछ ज्ञान का ही रूप देकर सब कुछ अपने विचार को ही सब कर्त्तव्य विचारवान् का रूप देकर कर्त्तव्य का ही ज्ञान रूप सब कुछ ही करता जहां पर कर्त्तव्य का नाम ही कर्त्तव्य का रूप ही कर्त्तव्य विचारवान् ज्ञान का रूप ही ज्ञान, सब कुछ ही? ज्ञान का विचार तो ज्ञान ही बना! ज्ञान रूप तो ज्ञान बनकर ही रह गया फिर ज्ञान केवल विचार का रूप देकर क्या ही करेगा? कर्त्तव्य मात्र का तो रूप नहीं! ज्ञान का नाम ही ज्ञान रूप ज्ञान बन कर कर्त्तव्य के रूप में अवश्य आवेगा, तब ही वह विचार का रूप होगा। तो विचारवान् कर्त्तव्य रूप सब कुछ बनावेगा, जो ज्ञान सदा कर्त्तव्य ज्ञान रूप बनकर रह सके, तो कर्त्तव्य विचार कर्त्तव्य ज्ञान रूप कर्त्तव्य का केवल ज्ञान रूप, तो ज्ञान कर्त्तव्य का रूप देकर ज्ञान रूप ही कर्त्तव्य रूप ही सब कुछ बन सके ज्ञान रूप, "जो ज्ञान का रूप कर्त्तव्य ज्ञान ही सब कुछ।" इस तरह ज्ञान का कर्त्तव्य केवल ज्ञान रूप ही न होकर कर्त्तव्य द्वारा ज्ञान रूप हो तो कर्त्तव्य का ज्ञान ही कर्त्तव्य हो कर ज्ञान बनकर कर्त्तव्य ही हो जावेगा। 232
और पत्र संग्रह-की सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाए"
यद्यपि इस वर्ष एक नये सज्जन उपस्थित हुए परंतु कार्यकारिणी केवल एक बार मिली। "साधरण सभा का यह मत था वर्तमान मंडल को धन, सम्पत्ति, सामग्री, पुस्तकें और पत्र संग्रह-की सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाए" पर "सब का सब सुपुर्द हो", इस बात विचार ही नहीं हो सकता था, ना कोई कोष, ना पुस्तक थी, ना पत्रिका थी, केवल एक दो सौ पृष्ठ एक रजिस्टर केवल था जो सब १ विषय था, यह पत्रव्यवहार जिस का प्रत्येक पत्र अलग पत्र पर नहीं हो सकता था, पर कार्यकारिणी केवल एक ही विषय पर, केवल एक विषय पर बहस करने नियत थी। केवल कार्यकारिणी सदस्य ही, व प्रधान जी, कार्यकारिणी केवल बात का ध्यास था कि सब विषय संक्षेप रूप सब सम्मुख रखे जाएं सो, केवल किसी प्रकार नवीन रूपया इकट्ठा किया जाय इस बात पर विचार नहिं था, केवल कार्यकारिणी विचार केवल नवीन रूपया, केवल इसी बात पर सब का आकर्षण किया जाय सो, केवल कार्यकारिणी सदस्य, केवल इस बात पर ध्यान लगा रहा, केवल इसी विषय केवल ध्यान, इस प्रकार सभा, केवल एक बार इस प्रकार से कार्यकारिणी समाप्त हुई, पर क्या किसी अन्य प्रकार से? या विचार ही सब का इस प्रकार विचार करने का ही विचार करने का विचार सब किया जाय, केवल १ विषय पर केवल ही विचार हो सकता है? सब प्रकार से सब ही? सब प्रकार से केवल ही, सब ही? सब सम्प्रदाय ही ना, सब नवीन रूप? सब प्रकार से ही सम्प्रदाय रूप? सब प्रकार ही रूपया धन, नवीन रूप? सब प्रकार से ही सब नवीन रूपया धन? सब प्रकार ही सब नवीन रूपया धन? इस प्रकार से ना व सब? केवल कार्यकारिणी इस वर्ष के समाप्त करने तक सब एक मत सब विषय प्रकार सब सम्मुख रखा जाय सो, केवल सब एक मत सब विषय उपस्थित कर सब सम्मुख कार्यकारिणी पर रख दिए। केवल इतना किया गया कि यह निश्चय किया गया कि सब यह कार्यकारणी का सम्मुख सब पत्र-संग्रह का सब की सब वस्तु सुपुर्द कीजाय केवल कार्यकारिणी सब नवीन रूपया एकत्रित एकत्रित कर सब सब उपस्थिति का भेजा जाय। 233
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यह जानकर सब लोग चक्रवर्तीके निकट गये ओर हाथजोड विनय कर बोले स्वामिन् शत्रुने तो केवल दो सौही बाण मारे ऐसा सुना, सो यह चक्रवर्तीके तो एक ही बाण लगा होगा? सो बात तो इस भांति बनी ही, किन्तु इन तीन सौ; सात सौने बाण ऐसे लगाये कि कोई बाण तो बाण पर लगा जाकर, बाकी बाणों ने जहां तहां अंगो- पांगोंको छेदा जिस करके चक्रवर्ती के सर्वांगमें घावों के मारे एक तिल भर भी घाव विना ना रहा जिस चक्रवर्तीने मूर्च्छित हो प्राण छोडे यद्यपि कोई कहे कि जब इस भांति राजा रणमें मारा ही, तो सो ही मुक्ति जाना चाहिये सो राजा सर्वार्थ मे गया ही, सो तो मोक्ष जैसा ही सुखहै सो संसार की रक्षा निमित्त मरा था इस हेतु जहां गया, सो चक्रवर्ती का तो मोक्ष अवश्य ही था परन्तु उस भव में तो मुनि ही ना था सो राजा भरत जी की भांति ना हो सका सो संसार चक्रमें ही था, परन्तु उस भव में राजा सर्वार्थ सिद्धि में गया सो इस प्रकार से संसार का अंत ही हुआ सो आगे मोक्ष होगा, राजा तो ऐसा उत्तम जीव था जिसने ऐसा काम किया, परन्तु देखने वाले, जो रणमें ना गये सो उनका तो मन ही बिगड कर नरक गये सो कहो जहां चक्रवर्ती तो सर्व सिद्धि में चक्रवर्ती न कहलावे किन्तु देव कहलावे, सो वो, उस जीवको सर्वार्थ सिद्धि तक भेजने वाला तो नरक में, वो चक्रवर्ती काम-क्रोध कर सब सेना समेत चक्रवर्ती सद्-गति को पहुंचा सो जीव को उत्तम व पापी निमित्तोंसे कैसे फल मिलते हैं सब कोई इस बातको विचारे कि मन कैसा बलवान् है, जो काम इस जीवने कियाही सर्वार्थसिद्धि का फल उस जीव जिसने चक्रवर्तीको उपदेश किया उसने चक्रवर्ती को तो मुक्ति भेजी ही दी, परन्तु सर्वार्थसिद्धिवाला नरकमें किस लिये गया ऐसा कहो सो उत्तर कि वो जीव जिसने ऐसा उपदेश दिया वो उस ही बाण के घाव से मूर्च्छित हो, राजाने तो वो उपदेश याद कर तो घाव सह लिये सो मुक्ति गया और यह जीव जो, वो तो उपदेश भूल गया सो, वो नरक गया ऐसी कथा है॥ जो जन धर्म में पक्के होते हैं, वो उपदेश सब जीव न केवल नर ही देव, नारकी, वा तिर्यञ्च सब जीवों को उपदेश देते हैं केवल, सो सब को पाले, ना सब को सार भी कहे, जिसने धर्मको धारण कर लिया जिसने सब को सार कहा, नरक से बचने वाला जीव कहा जैसे नरक में सब को दुःख होता-होता किसी को सुख का लेश तक भी ना होता सो जीव दुःखी ही होता, सो वो जीव भी नरक में उपदेशी ही काम करता नरक में भी सब जीव को ऐसा ही फल सब जन पावे सो, नरक ही जावे, मन-भाव बुरा, फल, वो तो वो ही नरक गया जिसने वो उपदेश तो सर्वार्थ को दिया सो चक्रवर्तीको फल-होगा, उपदेशकको तो-वो फल उस जीव का फल उस उपदेशक को मिलता न रहा, नरक ही फल हुआ नरक में जीव दुःख से रो रो कर पुकारते हैं बचाओ कोई हमको बचाओ हमारी इन नाना प्रकारके कष्टोंसे रक्षा करो कोई तो सहायक बनो, कोई सहायता तो करो शरण शरण हमारी रक्षा करो कोई तो हमें तारो हम अनाथ हैं व शरण हैं हमको तो कोई शरण देवो ऐसा विलाप करते हैं तो कोई भी शरण न होता ना चक्रवर्ती होता ना वो राजा होता जिसने वो दो सौ बाण मारे थे वो भी सब ही नरक गये सो सब ही कष्ट सहते हैं नरक में सब ही रोते हैं नरक विषय सुखों न रहा! विचार करो नरक में शरण न राजा ना चक्रवर्ती अकेला नरक में जीव अकेला ही होता सब अकेला सहाय ना कोई ना ही सगा सम्बन्धी ना राजा ना ही चक्र होता है॥ धर्म केवल शरण जीवका ऐसा जान कर सब जीवों को जो धर्मका ही फल जीव समझता सो धर्म ही, वो ही शरण सर्व जीवों? सो नरक की शरण कौन सी है, वो तो धर्म शरण वो नरक से उद्धार करने वाला जीव होगा? जो जीव सर्व व जीवों को सब प्रकार शरण देता वो संसार में सार है, संसार के चक्रसे वो सब को सार न पावे, सो संसार शरण विहीन, वो नर व जीव अनाथ शरणहीन ही रहा जिसका आधार धर्म ही केवल रहा, ऐसा उपदेशक सारथी ही शरण ही धर्म कहा, सब जीवों को शरण देता सब उपकारी काम ही करता है, नरक सब जीव जाते सब उपकारी काम ना ही करता ना करता ही रहा, ऐसा जीव सब सब नरक जाते ही नरक का फल सब किसी जीवको फल तो होता ही नरक कर्मसे उपदेश सर्वार्थ साधन ही मुक्ति का साधन ही समझना ऐसा उपदेश का कथन 235
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कथा सुन करके सब लोग आश्चर्यमग्न हुये कि कैसा मन्त्र, जो यह कामदेवस्वरूपी शुकदेव को मोहित करे। इसके पीछे सब ऋषिगणों तथा शुकदेवाचार्य आदि सब लोग व्यास जीके पीछे हो लिये। व्यास जीके आश्रम के निकट एक कुण्ड था, उसमें स्त्रियां नग्न होके नहाती थीं, व्यास जी वृद्धवस्था युक्त जब वहां गये तब तो उनने वस्त्र पहिन लिये, जब शुक जी वहां पहुंचे जिनकी सोलह वर्षकी पूरी अवस्था नथी, उनकी सुन्दर मनोहर मूर्ति देखकर किसी स्त्रीने अपने अङ्गों ऊपर वस्त्रों को नहीं डाला। शुकदेवजी महाराज तो सब जीवोंमें समाये, सब का प्राण अपना समझ कर शुकदेवजी स्त्रियों के अङ्गोंको देखकर नहर्षित हुये नप्रसन्न हुये। शुकदेवजी निष्काम थे। शुकदेवजी महाराज जबआगे चलेगये, स्त्रियां, जब शुकदेव को देखकर दो घड़ी न बोलीं, व्यास जी जब आये स्त्रियों से दो बात पूछने लगे, तब तो स्त्रियोंने हाथ जोड़ कर, व्यास जीसे विनती की किहे नाथ तुम तो नर और नारायण रूप सब कुछ जान रहे हो, जो बात तुम पूछते हो सब मिथ्या बात कह रहे हो। व्यास जीके आगे स्त्रियोंने हाथ जोड़ कर कहा किहे नाथ आप तो सूक्ष्म दृष्टि रखते हो। व्यास जी शुक जीके पीछे दौड़ते २गये, व्यास शुकजी को पुकारते हैं। व्यास पुकारते हैं, हे पुत्र शुकदेव! व्यास जीका शुकदेवजी को पुकारना सुन कर सब जड़ चेतन व्यास जीसे कह रहे हैं, जो तू शुकदेव को बुलाता है सो शुकदेव तो सर्वत्र भरा हुआ व्याप रहा है। हे व्यास जी! यह जीव जो माया करके सब ओर भ्रमता है, मायाके छूटने करके यह, जीव अपने रूप को प्राप्त होवे तब सब कुछ आपही रूप हो, उसकी कोई संज्ञा नहीं है॥ व्यास जीसे कौन कहे? किस जीवका यह पुत्र वा किसका पिता है, सो तू हे व्यास जी! तू तो हे सर्वज्ञ सबही कुछ जान रहाहै किस निमित्त रोताहै? उस वन के वृक्ष और लतादिकों करके यह जो शब्द शुक जीका सब बनमें सुनाया शुकजी को यह सब जीवों का रूप जान कर व्यास जी बड़े प्रसन्न हुये, शुक जी जब सब जीवोंके जीवोंमें व्याप रहे तो उनको सब जीव अपना समझ करप्यार करते हैं, व्यास जी शुकजी रूप सर्व जीवों कीमहिमा जान कर बड़े आनन्द को भये, जो मनुष्य सब जीवों आत्माके सम समझ करके, किसी जीवका अपराध नहीं करते सो निश्चय कर सबों प्यारे लगते हैं॥ सो शुक जीकी महिमा को देख व्यासजी अपने मन में विचारने लगे कि इस शुक जीको भागवत कथा श्रवण कराऊं। सो व्यास जी अपने शिष्योंको बुलाकरके भागवत के श्लोक सिखाने लगे। शिष्यों से कहा कि तुम यह श्लोक वन में जाकर के कहो, जब व्यास जीके कहने से शिष्य वन में जाकर श्लोक कहने लगे तब श्लोकों के शब्दों को सुनकर शुकजी बड़े प्रसन्न हुये, शुकदेव जी शिष्यों से पूछने लगे कि यह श्लोक किस के हैं॥ सो श्लोक यह है कि श्रीकृष्ण चन्द्र अपने शरीरके ऊपर पीताम्बर और मोर पंखका मुकुट शीशपर धरके, अधरों पर बंशी धर सब ग्वाल बालकोंके सहित औ वन फलमाला गलेमें पहिरे वन की शोभा बढ़ाते हुये, सब गोपियों सहित सुख दे रहे हैं, सो शुकदेवजी इस श्लोक को सुनकर शुकजीने, शिष्यों से पूछा कि यह श्लोक किस का है। शिष्यों ने शुकदेवजी को व्यास जीका नाम सुनाया, सो शुक जी शिष्यके मुखसे सुनकर बड़े प्रसन्न हुये, तब शिष्योंके मुखसे श्लोक सुन शुकजी न आये तब व्यासजीने दूसरा श्लोक अपने शिष्यों को पढ़ने को दिया, सो श्लोक यह है कि पूतना राक्षसी विष-भरे स्तनों पान करा कर, मारने के लिये आई तो श्रीकृष्ण जी नेउसको ? मार कर परमगति दीनी! सो ऐसे दयाके समुद्र श्रीकृष्ण जीके ऊपर कौन न प्रीति करेगा? शुकजी इस श्लोक श्रवण करके वन से आये॥ व्यास जी का मुख देखकर श्लोकों का अर्थ पूछने लगे कि व्यास जी इस श्लोक का अर्थ कहो तब तो व्यास जीने शुकदेव जीसे कहा कि हे पुत्र! व्यासजी, शुकदेवजी दोनों परस्पर मिल गये। भागवतकथाका पठन पाठन शुक जी व्यास जीसे करने लगे। जब व्यास जी शुकदेव जीको भागवत का ज्ञान करा चुके तब शुकजी बोले कि हे व्यास जी! अब सब कथाका विचार हो चुका, अब आज्ञा दो! शुकजी कथा सुन करके वनमें चले गये। व्यास जी परमार्थ विचार कर संसारके सब प्रपंचसे विरक्त हो गये॥ इसके पीछे शुकदेवजी का मन तो सब जीवोंमें समा रहा था, जो जीव व्याकुल होवे उसको सुखी करने का उपाय करते थे, किसीके घर पर, याचनाके निमित्त, जितना समय गौके दुहने काहोता है, उस काल से अधिक नहीं ठहरतेथे। शुक जी एकांत निष्काम नाम जपते हुये विचरते हुये सब जीवों को एक जान निष्काम रूप हो मन मन्दिरमें वास किये हुये भगवन्त का भजन करते॥
जब हम यह जान गये और मान भी, तो यह प्रश्न उठता है, बिना जाने भी क्या काम चला सकता है? तो उत्तर यह ही हो सकता है? नहीं! जब तक आप किसी वस्तु को पूरी तरह से, या यथार्थ रूप से नहीं जान लेते तब तक उस वस्तु से आप अपना अभीष्ट या प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकते। तो फिर हे मानव, तूने यह जीवन, जो संसार के इतिहास का आज तक का सब से बड़ा वरदान मनुष्य को मिला है? तो क्या परमात्मा से कभी पूछा-जाना? अपने ही मन से कभी भी तो पूछा होता कभी, अपने भीतर झांक कर तो देखा होता कभी निष्पक्ष होकर, कि जो कुछ मैंने अभी तक किया या कर रहा हूँ क्या वही सब कुछ है? क्या इसी के लिए मैं इस जगत में आया था कि खूब खाया पीया और सो गया और...? जिसे तुम यश, मान और धन कहते हो क्या कभी सोचा इन सब से, किसी तरह अपने वास्तविक या आध्यात्मिक को जोड़ा है? या फिर सब कुछ व्यर्थ नष्ट किया जा रहा है? यथार्थ ज्ञान न होने से मनुष्य सदा से ही भ्रमों और वहमों-वश सब कुछ विपरीत ही समझता आ रहा है, जिसे हम अपना समझ कर जीवन-भर के लिए अपना मान कर बैठे हैं? क्या यथार्थ में वह अपना है? जरा सोचो तो, जिस शरीर को, अपना समझ कर श्रृंगारते रहते हो क्या कभी सोचा, अन्त समय इसका क्या होगा? सम्भवतः चिन्ताग्रस्त ही जीवन समाप्त होगा? तो हे जन सुनो, आज के भयानक जीवन से यदि बचना चाहते हो तो भगवान् की शरण लो। सब कुछ उनके हाथ सौंप कर निश्चिन्त रहो, ईश्वर की, ज्ञान- गंगा में, ज्ञान में, भक्तियोग में, कर्म-योग में, राजयोग में, ध्यान-योग द्वारा स्नान करो, संन्यासी, त्यागी, बन कर, इस भव से तर जाओ, परमात्मा के नाम की महिमा जानते भी हो या नहीं? जो परमात्मा सब जीवों का जनक सब का कल्याण करने वाला है, उसके सामने सब लोग एक जैसे हैं। सब ही उस भगवान् के अंश हैं, अतः आपस में लड़ाई और नफ़रत को छोड़ कर प्रेम का भाव पैदा करो, मानवता क्या संदेश देती है? सब जीवों पर दया करो, जो कुछ दिया है उस प्रभु का दिया हुआ समझ कर प्रभु चरणों में सब कुछ अर्पण, सदा प्रभु स्मरण का ध्यान रखते ही सब कार्य पूरा करो, फिर देखो मुक्ति है? हे मानव तू जो भगवान् को भूल कर दिन-रात संसार के मोह-माया में लिप्त रहेगा, तो यह समय समाप्त हो ही तो जाएगा ही सो क्या कभी सोचा इस बात को फिर यह भवसागर से पार कैसे होगा? अतः भगवान् की भक्ति कर शरण में आ जाओ तब सब तरह का भय मिट जाएगा। परमात्मा की शरण में आने के बाद ही जीव निर्भय हो सकता है। क्योंकि जिस परमात्मा ने संसार को रचा उस परमात्मा से परे कोई शक्ति नहीं हो सकती, इसलिए संसार रूपी इस माया-मोह वाले भव-सागर से केवल प्रभु ही पार कर सकते हैं। सब कुछ परमात्मा का ही दिया, भगवान् ही हमें सबल बनाकर सब कार्य पूर्ण करा रहे हैं ऐसा ध्यान में सदा रहे, सब का कल्याण चाहो। क्या तू ही सब कुछ है? जो करेगा परमात्मा ही तो कर रहा है सब, फिर तू क्यों अहंकार करता है? तू तो उस प्रभु का बनाया हुआ खिलौना मात्र, जो सब परमात्मा की इच्छा पर है? हे मानव ... आज ही चेत जा, नहीं तो कल पछताना पड़ेगा। इस तरह समय, आयु सब समाप्त हो जाएगा और फिर नरक भोगना पड़ेगा। इस लिए तू अपनी समस्त वासनाएं त्याग कर प्रभु का नाम स्मरण कर मुक्ति पद को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त कर। परमात्मा ही तो केवल एक शक्ति तथा परम पिता परमात्मा रूप से ही सृष्टि की रचना करता और चलाता फिर उसी में सब को समाना ही सर्वशक्तिमान् है, विचारशील तू भी उस रब के भय से डर और अपने मन को शुद्ध कर जो प्रभु के आदेश हैं उसका ही तू अनुकरण, जिस प्रकार पिता अपनी सन्तान से प्रेम करता है उस तरह से, भगवान् भी सन्तान के समान ही भक्तजनों को प्यार कर अपने गले से लगा लेता अथवा गोद में बिठा कर आनन्दमय बना देता और अमर बना कर सब तरह से मुक्त कर देता है, बस एक शर्त भक्ति की; तू भी भगवान् रूपी उस अमृत रस को पी कर सब से प्रेममय बन कर प्रभु के गुणगान में लग जा। मन एकाग्रता से ही बन सके, जो सदा सत्य पथ पर चलते निर्भय बन दूसरों हित सदा लगा रहता है। प्रभु के आगे सब बराबर एक समान ही रहते 238
त्रिकालज्ञ भगवान् सर्वज्ञ को यह प्रत्यक्ष ज्ञात होता रहता कि भरतक्षेत्र का अमुक जीव अमुक नामावाला या अमुक जीव का जीव अमुक पर्याय को छोड़ अमुक पर्याय को प्राप्त होने वाला आगामी तीर्थंकर, प्रत्येक बुद्ध अथवा चक्रेश होने वाला है। इस प्रकार जो जीव जिस पर्याय को प्राप्त होने वाला है, उस जीव तथा उस पर्याय सम्बन्धी जानकारी को जो ज्ञान जानता या कर सकता, सो उस सर्वज्ञ विशेष का ज्ञान है, सर्वज्ञ विशेष का ज्ञान सर्व सामान्य ज्ञानस्वरूप आत्मा को ही जानता है, सो मानना नितान्त मिथ्या ही जानना, जो कि सब को भली भांति समझ में आवेगा। इस कथन का यह भी सार समझना योग्य है कि भव्य जीव, मिथ्या दृष्टि; इन दोनों का जैसा स्वरूप जिनागमों में कहा सो सर्व को सम्यक्त्व लाभ का कारण हो सकता है। अन्यथा इन दोनोंस्वरूपों सम्बन्धी जिनागम का कथन ही सब व्यर्थ हो जावे, सो तो जैन मत रूपी सत्य धर्म का कभी भी नहीं हो सके अतः जिनागम का प्रमाण--वचन प्रमाण! इस व्याख्यान का विचारवानोंको यत्न से मन लगाकरविचारनाचाहिये कि इस में शंका योग्य कोई बात नहीं दिखती सो प्रथम कथन का जो अभिप्राय कहा सो ठीक समझ पड़ा? अथवा ऐसा कथन भी जिनागमों विरूद्ध समझ पड़ा अथवा ज्ञान स्वरूप का स्वरूप इस कथन द्वारा कुछ भी निश्चय हो सका कि नहीं ऐसा निश्चय मन द्वारा करो। अथवा जो कथन जिनागमों का इन दोनों शब्द द्वारा कहा गया सो ठीक? या मिथ्या स्वरूप भी इस कथन का माना जावेगा? सो भी विचारवान् पुरुष जिनागम मन्त्र को यथार्थ भाव से समझ जिनागम को सत्य जानकर जिनागमों का जो कथन सो सब ही सर्वज्ञकथित ही हो सकता अतः, सर्वज्ञकथित होने, सो मिथ्या हो सकेगा? इस बात को विचारवान् ही यत्न द्वारा समझ कि जिनागमों का कथन मिथ्या, या इस कथन रूप? ऐसा जो मन में मान कर इन दो शब्दों का जो जिनागम का मत है, सो तो सर्व जिनागम मत का त्याग ही करना है, इस प्रकार जो जैन सम्बन्धी सब मत रूपी ज्ञान स्वरूप को समझ कर ही मन द्वारा निश्चय कर इन दो शब्दों का यथार्थ भाव समझ में आवे? सर्वज्ञ ज्ञान सर्वव्यापकता को लिये हुए--इस सर्वव्यापकता ज्ञानस्वरूपका विचार जब आत्मस्वरूपों को ही इन दोनों शब्दों द्वारा निश्चयकरेगा, सो ही समझ में सर्वज्ञ स्वरूप का भी लाभ हो सके, सो उस जन द्वारा दोनों शब्द रूप इन दो अर्थ ज्ञान रूप लाभ प्राप्त हो सके। ऐसा ज्ञान सर्वज्ञस्वरूप को समझाने का सर्वज्ञता स्वरूप का मुख्य ज्ञानस्वरूप ही इन दोनोंशब्दों द्वारा ही समझ में सर्वज्ञता को ही कथन कर सर्वज्ञता सम्बन्धी हो सके! अतः विचारवान् पुरुषों को सर्व इन दोस्वरूपों का लाभ प्राप्त समझना ही चाहिये इस बात को यत्न समझकर जिनागम सम्बन्धी सर्व ज्ञान लाभ प्राप्त करना ही कर्त्तव्य है। ज्ञान लाभ सम्बन्धी जो विचार सब पुरुषों द्वारा किया जाता सो तो जिनागम का कथन समझ कर ही किया जाना चाहिये सो उस जिनागम रूप ज्ञान द्वारा, सब जीवों को ज्ञान स्वरूप लाभ का यत्न करना योग्य व उचित। इन दोनों शब्द का जैसा जैसा स्वरूप इन दो शब्दों द्वारा कहा गया सो तो सर्व जगत पूज्य भगवान् सर्वज्ञ द्वारा ही स्वरूप कहा गया समझ, सो सच्चा यथार्थ कहा गया इन दो स्वरूपों को समझ कर सर्व जन को सुख लाभ ही उत्पन्न होगा। भव्य जीव का स्वरूप या मिथ्या का स्वरूप जब सर्व जन सर्वज्ञ के द्वारा समझकर उस को यत्न से मन द्वारा मन में लेवे, तो उस के मन का भ्रम, जो इन दोस्वरूपों ज्ञान या सर्व-ज्ञान रूप में उत्पन्न हो रहा था। सो सब मिटकर, सत्य ज्ञान व सर्वज्ञ स्वरूप ज्ञान उस को प्राप्त हो? अथवा इन दोनों का यथार्थ स्वरूप नहीं? अथवा ज्ञान स्वरूप का लाभ हो? ज्ञान सर्वज्ञता का होगा? अथवा भव्य जीव का ज्ञान स्वरूप मन को सम्यक्त्व का लाभ दे सके कि इस प्रकार निश्चय कर यत्न करना चाहिये, ज्ञान द्वारा ही जो अज्ञानता का क्षय करना योग्य माना सो अज्ञानता स्वरूप इन दो शब्द द्वारा सर्व-भ्रम का क्षय रूप जानना सो, इन सब बातों विचार से सर्व मन को लाभ प्राप्त हो सर्वज्ञता स्वरूप ज्ञान सब को इस प्रकार प्राप्त हो सो जिनागम स्वरूप समझना योग्य है, सो प्रत्येक जन को ऐसा ज्ञान लाभ प्राप्त करनेको सब जिनागम मत का विचार करना उचित। ऊपर के लिखे का मन में सब प्रकार से जो जन मन को लगा कर जो विचार करे सो भव्य, सो सर्व का सार रूप हो जावे, सो सब अज्ञानता रूप जो सन्-देह रूप था मिटकर सब लाभ प्राप्तहो। 239
अन्वेष-कर्ता तब घर लौट कर दो बरस तक अन्वेष-कर्ता रूप से विशुद्ध संन्यासी रहा। वह अन्वेष-कर्ता रूप को तो केवल अभ्यास समझता रहा पर उसके माता पिता को लगा कि यह सन्यास का स्वांग है, जो गृहस्थावस्था को सुधारनेके लिये ही रचा गया है। इस पर भी उन्होंने उस वक्त विवाह का कोई यत्न नहिं किया क्यों कि उन्होंने देखा, कि इस निरंकुश स्वाधीन संन्यासी का चित्त तो उस तपोवन एकांत वन की ओर लगा ही हुआ था, जहां उस को ज्ञान गुरु की संगति में विरति का आनन्द-रस मिल चुका था। कभी न कभी अवसर पाकर वह फिर जा कर तपोवन बसेगा, इस से तो वह कभी इनकार नहीं करता था। सम्बन्धी बालविवाह के षड्यन्त्र की ताक में थे। परिवार वाले अब तक उस ब्रह्मचारी का विवाह रचानेका साहस इसलिए नहीं कि बात ही विवाह की नहीं उठी। बालविवाह का समय गया जानकर अब दूसरा सम्बन्ध हो सकना तो संभव था, लेकिन, सम्बन्धी लोग तो अवसर की ताक में रहकर सम्बन्ध करने की बात को नहिं चला सकते थे, विवाह का अवसर ही कहां था विवाह तो दूर। अन्वेष कर्ता कह चुका था कि विवाह करूंगा तो दो ही दशा में। पहिले तो असाध्य, ना, कभी... ना होने वाली। विद्याध्ययन करके ऐसा विद्वान बनूं जैसा संसार में दूसरा कोई न हो। दूसरे जब साक्षात्कारी होकर संसारके लिये जगदाचार्य बनूं, तो जगत्- गुरु का पद ले कर गृहस्थधर्म का निर्वाह करूं। जब इस बात की चर्चा उठी कि यह कभी नहीं हो सकता, तो उस ने कहा कि अगर दूसरी बात कभी न हो तो विवाह करने का विचार ही न लाया जाए। सच्चे जीवन का पथ-अन्वेषक--यह तो केवल एक ही बात चाहता था कि विद्या का गुरु मिल जाए जो ऐसा विद्वान हो जैसा संसार में अद्वितीय कोई हो, या ऐसा महात्मा मिल जाए जो उस को, उस का साक्षात् करा के--सत्य का साक्षात् करा कर निज रूप का दर्शक बना कर सच्चा संन्यासी बना सके। माता पिता तथा सम्बन्धी तो इस बात को समझ ही न... ॥ सम्बन्धी तो केवल यही कह कर सन्तोष कर रहे थे। 'विवाह होगा तो संसार ही में तो होगा।' संन्यासी भी तो इसी संसार में था। दोनों परस्पर विरोधी बातों का परिणाम यह हुआ कि--अन्वेषक--का घर छूटा और ऐसा छूटा कि घर ही छूटा वह फिर कभी लौट कर न आया। उस संन्यासी की आयु इक्कीस वर्ष की थी, जिस में गृहस्थ में जाने के लिये सम्बन्धी तो क्या उस का अपना ही मन क्या प्रस्तुत नहीं था? इस लिये संन्यासी का भी, 'उसी का यत्न कर रहा हूं' कहना क्या विवाह की तैयारी होने के संशय को पूरी शक्ति प्रदान करने के लिये बहुत नहीं था? परिवार सम्बन्धी लोग उस को विवाह कराने का झांसा दे रहे थे, तो, वह भी विवाह सम्बन्धी झांसा ही दे रहा था। इस का यह अभिप्राय तो नहीं निकाला जा सकता कि विवाह करने की इच्छा उस के मन में कभी थी। वह तो इस से सदा बचता ही रहा। पिता, माता तथा सम्बन्धी उस का विवाह करा कर उसे बन्धन में बांधना चाहते थे, इस से अपने मन की सच्चाई को उस अन्वेषक सत्य ने छिपाया नहीं, उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि 'विवाह करूंगा विद्याध्ययन के समाप्त होने पर या सत्य का साक्षात् होने पर।' उस के इस कथन का जो अर्थ उन्होंने लगाया, वह उन का दोष था। इस प्रकार अन्वेष-कर्ता का घर को छोड़कर संन्यास ग्रहण करने सम्बन्धी जो बात कही गई उस से सत्यार्थ प्रकाश-वाला संन्यासी जीवन सम्बन्धी सच्चा, प्रमाण तो मिलता। संसार कह चुका था कि यह विवाह करेगा। घर में भी कहा जा चुका था। विद्याध्ययन के पश्चात् करेगा, पर सत्य प्राप्ति के पश्चात्--इस का साक्षात् करने के पश्चात् तो वह सन्यासी बन गया, इस लिये संन्यास का सत्य रूप बन गया। इस संन्यास ने संसार को, जो विवाह का झूठा सत्य प्रचारित कर रहा था, उस का यह उत्तर, कि विवाह तो करूंगा, जब मैं साक्षात्कारी बन जाऊं, तब संसार को विवश होकर स्वीकार करना पड़ा। 240
समाज का वर्तमान रूप चाहे जो भी हो, पर इसमें परिवर्तन आ-- सकताहै। इसके दो उपाय सर्वथा संभव दिखाई देते पहला तो यही जन-बल जाग उठे, पर सरकार तो इस जागरण का सिर ही तोड़ डालने के लिए सदा कटिबद्ध ही रही है। और यदि जन बल सिर न उठा सके तो कोई ऐसा महा पुरुष या दल या संस्था हो, जो कि वर्तमान शासन के स्थान पर ऐसा जन- तंत्र बना, देसके! जो न्याय के आधारपर संगठित हो जिसमें हर एक व्यक्ति की ही रक्षा नहीं वरन्, हर एक के तन का ही सुख न हो वरन्, जन-बल के जागरण द्वारा ही सब काम हों। इसे चाहें तो समाज वा समाज का नया संगठन कहसकते हैं, क्योंकि इस परिवर्तनशीलता में नया जीवन विकसित हो, इसका पता परिवर्तनशीलता खुद देगी कुछ लोग मत या धर्म के द्वारा इस काम को पूरा करना, तो असम्भव ही नहीं वरन् हर प्रकारसे हानिकारक ही नहीं वरन् समय को व्यर्थ खोना भी समझते हैं, वे भी इस बातपर सहमत हो रहे हैं, कि वर्तमान समाज व्यवस्था केवल आर्थिक आधार पर ही टिक सकती है; वर्तमान युग में हर एक व्यक्ति को हर तरहसे उपयोगी व सुखी बनाने की राह केवल यही है। यदि समाज को ही ले, तो समाजमें हर प्रकार का काम हर मनुष्य करे। मनुष्य के श्रम का मोल न हो वरन् यह बात हो, प्रत्येक को, आवश्यकता के, अनुसार मिले, तथा सब, हर एक काम को अपना ही काम समझकर काम करने में सुखका अनुभव करें। हर बात पर हर एक का हक हो; सब की बात पर सब का अधिकार हो; मत या विचार का आधार न धर्मपर ही हो न वर्तमान ढर्रे पर ही वरन् उस स्वतंत्र बुद्धिपर आधारित हो जो कि हर मनुष्यको दूसरे के प्रति निष्ठावान बना कर सब काम करने की क्षमता और स्वतंत्रता प्रदान करती है। समाज में आज तक यही होता आया है समाजमें किसी न किसी तरह का मतभेद पैदा करने की चेष्टा की गई। कभी रूपका आधार लेकर व रंगका आधार ले कर ऊँच नीच तथा छोटा बड़ा भाव पैदा किया गया, कभी धर्म का आधार ले कर नया झगड़ा खड़ा नहीं किया गया? साधारण जनके ही हित का ढोंग रचकर उनके स्वत्वों का कब हनन नहींकियागया? समाज आज तक जैसा बना हुआ था, वास्तवमें वैसा न होकर स्वतंत्र रूपमें आज तक मनुष्य को न पहचानसका क्योंकि मनुष्य सब एक, सब समान पैदा हुए हैं, इस बात को मनुष्य कभी जान ही नहींसका। समाज सदा ऐसा ही रहा है। समाजके किसी अंगको यदि कोई आघात पहुंचाता रहा हैतो संपूर्ण समाज व्यथित हो, इसका नाम समाज है, यही समाज का एक रूप हो सकता है। यह रूप बन सके इसके लिए सबसे पहले वर्तमान समाजको नष्ट करना होगा, जो कि सब का सब सड़ा हुआ है। इस व्यवस्था, का संहारकही नया जीवन, प्रदान कर सकता है। इस समाज को नष्ट कर, ही हर प्रकारके रोग दूर होसकते हैं। पर यह सब, जो कि सब कुछ समझने के कारण समाज सुधारक कहलाने का दम तो भरते हैं। पर किसी तरह भी समाजको इस सड़े हुए ढांचेको बदलने का जरा भी यत्न नहीं करते। केवल व्यवस्था बदलना कोई बात नहीं, यह काम तो नया जीवन चाहते ही स्वयंमेव पूरा हो जाय इसमें दो राय नहीं होसकती। इसलिए वर्तमान समाज रचना केवल शोषण प्रधान, मानव विरोधी भावना मात्रपर ही टिकती, नजर आ रही किसी बातमें कोई न, नया जीवन लाने का नया रास्ता निकलता न देख, विभिन्न विचारकों अथवा मत वादी प्रचारकों द्वारा जो विचार पेश किये जाते, उनसे समाज सुधार की आशा करना व्यर्थ जान पड़ता है। समाज व्यवस्था स्वतः नष्ट हो कर नया रूप धारण कर सकेगी या नहीं यह भविष्य के गर्तमें पड़ा हुआ ऐसा प्रश्न होगा, जिस पर हर एक विचार करने को बाध्य होना पड़ेगा। पर यह बात अवश्य विचार करने की योग्य है, कि समय के साथ जो परिवर्तन आताहै उसका रूप क्या हो सकता है। इसपर विचार करने की आज बहुत ही आवश्यकता मालूम हो रही... ! आज तक जो मत या विचार इस बात--विशेष का हल न कर सके समाजके हित--अहित के आधारपर उनका संगठन किया गया न जा कर के रूप में न होकर रह जाता है, तो सब व्यर्थ... ।
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राजा को यह डर हुआ मन्त्रणा न प्रकट हो, इसलिये विश्वामित्रजी का समाधान किया कि फिर आवे, ऐसा ही हम यत्न कर लें, सब को साथ लेजाना उचित न हो सम्मति का काम था। राजा का मन वसिष्ठादिक सब से भर गया, ऐसा जान पड़ा धोखा खाया! राजा ऐसा कहे, फिर सोच-विचार के यह बात कही महाराज क्रोध मत करो तब तो राजा स्वरूप स्थिति विचार हुआ पर रूप तो ज्ञान मय ब्रह्म स्वरूप सब है, पर जो बात जीव रूपी जीव समझ कर कहें तब जीव ही से सम्बन्ध हो तब स्वरूप प्रकाश कैसे हो! जो रूप की बात सो रूप स्वरूप विकार किस को? पर रूप ही में बात हुई ब्रह्म को विकार क्या, पर जो बात रूप विकार कहा जाता है सो ब्रह्म स्वरूप में कुछ बना, या रूप नाम-रूप ही विकार नाम ठहरा, विकार तो था, स्वरूप में विकार का अभाव तो सब उपाधि से परे जान ले तब ही यह स्वरूप जान ले तब सब से छूटे कहा। राजा ऐसा कहे, तुम सब हो, राजा के कहने से जो यत्न कर लें, तब जो बात सम्पूर्ण प्रकाश में आवेगी सो जान लेवे सो ज्ञान जीव-भाव का था, राजा ने मन को वसिष्ठादिक में सब प्रकार दिया था, सो छूटा, विचार न भया! जो ज्ञान से सब से भर ले सो ज्ञान स्वरूप में स्थिर होता, पर अविद्या था निश्चय जो रूप समन्दर का किया भया, सो रूप जीव ही से विकार का जाना गया तब विकार रूप स्वरूप तो न भया पर जीव-भाव जान कर के सो विकार रूप को ज्ञान अविद्या हुआ सो क्या? पर जो ज्ञान विकार स्वरूप में ज्ञान रूप सो अविद्यादिक विकार से परे कर के ज्ञान स्वरूप में स्थिर हो तब तो जीव रूप छूटे कहा सब ही ज्ञान रूप--तो जो जीव रूप--उस बात से, सो सब ज्ञान रूप से ज्ञान स्वरूप न भया तो सब माया के वश में सब ज्ञान स्वरूप न प्रकाश हो उस माया को ज्ञान से परे जान माया न जान-विचार हो, न जान-भाव हो, सब रूप एक ही सा जान ज्ञान रूप हो सब ज्ञान स्वरूप प्रकाश का रूप हो, सब माया से परे हो ज्ञान प्रकाश सो क्या प्रकाश? जो ज्ञान रूप से सब को स्वरूप ब्रह्म रूप में जान लेवे निश्चय हो स्वरूप सो सब एक सा, सो माया स्वरूप को जान ले तो स्वरूप स्वरूप रूप से अलग रहेगा, जो सब ज्ञान से ज्ञान को जान ले तब, सो सब स्वरूप क्या? पर स्वरूप तो सब ज्ञान स्वरूप रूप से भिन्न है, जो स्वरूप स्थिर रूप स्थिति में स्थिर हो सो ज्ञान रूप सो सब कुछ मन के आधार पर है--सो तो सब वसिष्ठादि विकार है, पर सब वसिष्ठादि ज्ञान के--विचार से सब स्वरूप सब से अलग हो के ज्ञान रूप में हो कर स्वरूप स्थिति विचार किया सो स्वरूप सब मन से अलग कहा, पर जो जो भी वसिष्ठादि प्रकार सब माया रूप उपाधि सब को देख कर जो जो भी ज्ञान स्वरूप विकार रूप से स्वरूप में भिन्न है, ज्ञान स्वरूप सब स्वरूप स्वरूप अज्ञान से परे ज्ञान रूप से स्वरूप स्वरूप स्वरूप ज्ञान का ही रूप सब रूप में रूप भया, सो अविद्या रूप अविद्यादि सब सब सब ज्ञान से ही सब से परे भया, जो सब ज्ञान रूप भया सो सो सब ज्ञान से ही परे हो कर न जान रूप, सो ज्ञान का रूप था सब कुछ सब ज्ञान से परे हो जाता है, जब सब से अविद्या ज्ञान रूप तब सब उपाधि से परे ज्ञान-रूप भया, तब तो स्वरूप का ज्ञान रूप हो सो, तब सब अविद्या! सब से अलग हो; जब ज्ञान को स्वरूप कहा तब, सो अविद्या ज्ञान का रूप कहा जा सके, पर अविद्या ज्ञान सब सब ज्ञान से अलग रूप कहा, सो अविद्या रूप ज्ञान अविद्या स्वरूप से परे रूप ज्ञान रूप सब ज्ञान का स्वरूप सो अविद्या रूप से अलग सो ज्ञान के स्वरूप प्रकार से अज्ञान से ज्ञान से परे था स्वरूप का प्रकार स्वरूप सब का ज्ञान रूप भया सो रूप में ही, तब सब अविद्या! सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप सब ज्ञान 242