भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 322 में से

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अन्वेष-कर्ता तब घर लौट कर दो बरस तक अन्वेष-कर्ता रूप से विशुद्ध संन्यासी रहा। वह अन्वेष-कर्ता रूप को तो केवल अभ्यास समझता रहा पर उसके माता पिता को लगा कि यह सन्यास का स्वांग है, जो गृहस्थावस्था को सुधारनेके लिये ही रचा गया है। इस पर भी उन्होंने उस वक्त विवाह का कोई यत्न नहिं किया क्यों कि उन्होंने देखा, कि इस निरंकुश स्वाधीन संन्यासी का चित्त तो उस तपोवन एकांत वन की ओर लगा ही हुआ था, जहां उस को ज्ञान गुरु की संगति में विरति का आनन्द-रस मिल चुका था। कभी न कभी अवसर पाकर वह फिर जा कर तपोवन बसेगा, इस से तो वह कभी इनकार नहीं करता था। सम्बन्धी बालविवाह के षड्यन्त्र की ताक में थे। परिवार वाले अब तक उस ब्रह्मचारी का विवाह रचानेका साहस इसलिए नहीं कि बात ही विवाह की नहीं उठी। बालविवाह का समय गया जानकर अब दूसरा सम्बन्ध हो सकना तो संभव था, लेकिन, सम्बन्धी लोग तो अवसर की ताक में रहकर सम्बन्ध करने की बात को नहिं चला सकते थे, विवाह का अवसर ही कहां था विवाह तो दूर। अन्वेष कर्ता कह चुका था कि विवाह करूंगा तो दो ही दशा में। पहिले तो असाध्य, ना, कभी... ना होने वाली। विद्याध्ययन करके ऐसा विद्वान बनूं जैसा संसार में दूसरा कोई न हो। दूसरे जब साक्षात्कारी होकर संसारके लिये जगदाचार्य बनूं, तो जगत्- गुरु का पद ले कर गृहस्थधर्म का निर्वाह करूं। जब इस बात की चर्चा उठी कि यह कभी नहीं हो सकता, तो उस ने कहा कि अगर दूसरी बात कभी न हो तो विवाह करने का विचार ही न लाया जाए। सच्चे जीवन का पथ-अन्वेषक--यह तो केवल एक ही बात चाहता था कि विद्या का गुरु मिल जाए जो ऐसा विद्वान हो जैसा संसार में अद्वितीय कोई हो, या ऐसा महात्मा मिल जाए जो उस को, उस का साक्षात् करा के--सत्य का साक्षात् करा कर निज रूप का दर्शक बना कर सच्चा संन्यासी बना सके। माता पिता तथा सम्बन्धी तो इस बात को समझ ही न... ॥ सम्बन्धी तो केवल यही कह कर सन्तोष कर रहे थे। 'विवाह होगा तो संसार ही में तो होगा।' संन्यासी भी तो इसी संसार में था। दोनों परस्पर विरोधी बातों का परिणाम यह हुआ कि--अन्वेषक--का घर छूटा और ऐसा छूटा कि घर ही छूटा वह फिर कभी लौट कर न आया। उस संन्यासी की आयु इक्कीस वर्ष की थी, जिस में गृहस्थ में जाने के लिये सम्बन्धी तो क्या उस का अपना ही मन क्या प्रस्तुत नहीं था? इस लिये संन्यासी का भी, 'उसी का यत्न कर रहा हूं' कहना क्या विवाह की तैयारी होने के संशय को पूरी शक्ति प्रदान करने के लिये बहुत नहीं था? परिवार सम्बन्धी लोग उस को विवाह कराने का झांसा दे रहे थे, तो, वह भी विवाह सम्बन्धी झांसा ही दे रहा था। इस का यह अभिप्राय तो नहीं निकाला जा सकता कि विवाह करने की इच्छा उस के मन में कभी थी। वह तो इस से सदा बचता ही रहा। पिता, माता तथा सम्बन्धी उस का विवाह करा कर उसे बन्धन में बांधना चाहते थे, इस से अपने मन की सच्चाई को उस अन्वेषक सत्य ने छिपाया नहीं, उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि 'विवाह करूंगा विद्याध्ययन के समाप्त होने पर या सत्य का साक्षात् होने पर।' उस के इस कथन का जो अर्थ उन्होंने लगाया, वह उन का दोष था। इस प्रकार अन्वेष-कर्ता का घर को छोड़कर संन्यास ग्रहण करने सम्बन्धी जो बात कही गई उस से सत्यार्थ प्रकाश-वाला संन्यासी जीवन सम्बन्धी सच्चा, प्रमाण तो मिलता। संसार कह चुका था कि यह विवाह करेगा। घर में भी कहा जा चुका था। विद्याध्ययन के पश्चात् करेगा, पर सत्य प्राप्ति के पश्चात्--इस का साक्षात् करने के पश्चात् तो वह सन्यासी बन गया, इस लिये संन्यास का सत्य रूप बन गया। इस संन्यास ने संसार को, जो विवाह का झूठा सत्य प्रचारित कर रहा था, उस का यह उत्तर, कि विवाह तो करूंगा, जब मैं साक्षात्कारी बन जाऊं, तब संसार को विवश होकर स्वीकार करना पड़ा। 240