एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
अन्वेष-कर्ता तब घर लौट कर दो बरस तक अन्वेष-कर्ता रूप से विशुद्ध संन्यासी रहा। वह अन्वेष-कर्ता रूप को तो केवल अभ्यास समझता रहा पर उसके माता पिता को लगा कि यह सन्यास का स्वांग है, जो गृहस्थावस्था को सुधारनेके लिये ही रचा गया है। इस पर भी उन्होंने उस वक्त विवाह का कोई यत्न नहिं किया क्यों कि उन्होंने देखा, कि इस निरंकुश स्वाधीन संन्यासी का चित्त तो उस तपोवन एकांत वन की ओर लगा ही हुआ था, जहां उस को ज्ञान गुरु की संगति में विरति का आनन्द-रस मिल चुका था। कभी न कभी अवसर पाकर वह फिर जा कर तपोवन बसेगा, इस से तो वह कभी इनकार नहीं करता था। सम्बन्धी बालविवाह के षड्यन्त्र की ताक में थे। परिवार वाले अब तक उस ब्रह्मचारी का विवाह रचानेका साहस इसलिए नहीं कि बात ही विवाह की नहीं उठी। बालविवाह का समय गया जानकर अब दूसरा सम्बन्ध हो सकना तो संभव था, लेकिन, सम्बन्धी लोग तो अवसर की ताक में रहकर सम्बन्ध करने की बात को नहिं चला सकते थे, विवाह का अवसर ही कहां था विवाह तो दूर। अन्वेष कर्ता कह चुका था कि विवाह करूंगा तो दो ही दशा में। पहिले तो असाध्य, ना, कभी... ना होने वाली। विद्याध्ययन करके ऐसा विद्वान बनूं जैसा संसार में दूसरा कोई न हो। दूसरे जब साक्षात्कारी होकर संसारके लिये जगदाचार्य बनूं, तो जगत्- गुरु का पद ले कर गृहस्थधर्म का निर्वाह करूं। जब इस बात की चर्चा उठी कि यह कभी नहीं हो सकता, तो उस ने कहा कि अगर दूसरी बात कभी न हो तो विवाह करने का विचार ही न लाया जाए। सच्चे जीवन का पथ-अन्वेषक--यह तो केवल एक ही बात चाहता था कि विद्या का गुरु मिल जाए जो ऐसा विद्वान हो जैसा संसार में अद्वितीय कोई हो, या ऐसा महात्मा मिल जाए जो उस को, उस का साक्षात् करा के--सत्य का साक्षात् करा कर निज रूप का दर्शक बना कर सच्चा संन्यासी बना सके। माता पिता तथा सम्बन्धी तो इस बात को समझ ही न... ॥ सम्बन्धी तो केवल यही कह कर सन्तोष कर रहे थे। 'विवाह होगा तो संसार ही में तो होगा।' संन्यासी भी तो इसी संसार में था। दोनों परस्पर विरोधी बातों का परिणाम यह हुआ कि--अन्वेषक--का घर छूटा और ऐसा छूटा कि घर ही छूटा वह फिर कभी लौट कर न आया। उस संन्यासी की आयु इक्कीस वर्ष की थी, जिस में गृहस्थ में जाने के लिये सम्बन्धी तो क्या उस का अपना ही मन क्या प्रस्तुत नहीं था? इस लिये संन्यासी का भी, 'उसी का यत्न कर रहा हूं' कहना क्या विवाह की तैयारी होने के संशय को पूरी शक्ति प्रदान करने के लिये बहुत नहीं था? परिवार सम्बन्धी लोग उस को विवाह कराने का झांसा दे रहे थे, तो, वह भी विवाह सम्बन्धी झांसा ही दे रहा था। इस का यह अभिप्राय तो नहीं निकाला जा सकता कि विवाह करने की इच्छा उस के मन में कभी थी। वह तो इस से सदा बचता ही रहा। पिता, माता तथा सम्बन्धी उस का विवाह करा कर उसे बन्धन में बांधना चाहते थे, इस से अपने मन की सच्चाई को उस अन्वेषक सत्य ने छिपाया नहीं, उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि 'विवाह करूंगा विद्याध्ययन के समाप्त होने पर या सत्य का साक्षात् होने पर।' उस के इस कथन का जो अर्थ उन्होंने लगाया, वह उन का दोष था। इस प्रकार अन्वेष-कर्ता का घर को छोड़कर संन्यास ग्रहण करने सम्बन्धी जो बात कही गई उस से सत्यार्थ प्रकाश-वाला संन्यासी जीवन सम्बन्धी सच्चा, प्रमाण तो मिलता। संसार कह चुका था कि यह विवाह करेगा। घर में भी कहा जा चुका था। विद्याध्ययन के पश्चात् करेगा, पर सत्य प्राप्ति के पश्चात्--इस का साक्षात् करने के पश्चात् तो वह सन्यासी बन गया, इस लिये संन्यास का सत्य रूप बन गया। इस संन्यास ने संसार को, जो विवाह का झूठा सत्य प्रचारित कर रहा था, उस का यह उत्तर, कि विवाह तो करूंगा, जब मैं साक्षात्कारी बन जाऊं, तब संसार को विवश होकर स्वीकार करना पड़ा। 240
समाज का वर्तमान रूप चाहे जो भी हो, पर इसमें परिवर्तन आ-- सकताहै। इसके दो उपाय सर्वथा संभव दिखाई देते पहला तो यही जन-बल जाग उठे, पर सरकार तो इस जागरण का सिर ही तोड़ डालने के लिए सदा कटिबद्ध ही रही है। और यदि जन बल सिर न उठा सके तो कोई ऐसा महा पुरुष या दल या संस्था हो, जो कि वर्तमान शासन के स्थान पर ऐसा जन- तंत्र बना, देसके! जो न्याय के आधारपर संगठित हो जिसमें हर एक व्यक्ति की ही रक्षा नहीं वरन्, हर एक के तन का ही सुख न हो वरन्, जन-बल के जागरण द्वारा ही सब काम हों। इसे चाहें तो समाज वा समाज का नया संगठन कहसकते हैं, क्योंकि इस परिवर्तनशीलता में नया जीवन विकसित हो, इसका पता परिवर्तनशीलता खुद देगी कुछ लोग मत या धर्म के द्वारा इस काम को पूरा करना, तो असम्भव ही नहीं वरन् हर प्रकारसे हानिकारक ही नहीं वरन् समय को व्यर्थ खोना भी समझते हैं, वे भी इस बातपर सहमत हो रहे हैं, कि वर्तमान समाज व्यवस्था केवल आर्थिक आधार पर ही टिक सकती है; वर्तमान युग में हर एक व्यक्ति को हर तरहसे उपयोगी व सुखी बनाने की राह केवल यही है। यदि समाज को ही ले, तो समाजमें हर प्रकार का काम हर मनुष्य करे। मनुष्य के श्रम का मोल न हो वरन् यह बात हो, प्रत्येक को, आवश्यकता के, अनुसार मिले, तथा सब, हर एक काम को अपना ही काम समझकर काम करने में सुखका अनुभव करें। हर बात पर हर एक का हक हो; सब की बात पर सब का अधिकार हो; मत या विचार का आधार न धर्मपर ही हो न वर्तमान ढर्रे पर ही वरन् उस स्वतंत्र बुद्धिपर आधारित हो जो कि हर मनुष्यको दूसरे के प्रति निष्ठावान बना कर सब काम करने की क्षमता और स्वतंत्रता प्रदान करती है। समाज में आज तक यही होता आया है समाजमें किसी न किसी तरह का मतभेद पैदा करने की चेष्टा की गई। कभी रूपका आधार लेकर व रंगका आधार ले कर ऊँच नीच तथा छोटा बड़ा भाव पैदा किया गया, कभी धर्म का आधार ले कर नया झगड़ा खड़ा नहीं किया गया? साधारण जनके ही हित का ढोंग रचकर उनके स्वत्वों का कब हनन नहींकियागया? समाज आज तक जैसा बना हुआ था, वास्तवमें वैसा न होकर स्वतंत्र रूपमें आज तक मनुष्य को न पहचानसका क्योंकि मनुष्य सब एक, सब समान पैदा हुए हैं, इस बात को मनुष्य कभी जान ही नहींसका। समाज सदा ऐसा ही रहा है। समाजके किसी अंगको यदि कोई आघात पहुंचाता रहा हैतो संपूर्ण समाज व्यथित हो, इसका नाम समाज है, यही समाज का एक रूप हो सकता है। यह रूप बन सके इसके लिए सबसे पहले वर्तमान समाजको नष्ट करना होगा, जो कि सब का सब सड़ा हुआ है। इस व्यवस्था, का संहारकही नया जीवन, प्रदान कर सकता है। इस समाज को नष्ट कर, ही हर प्रकारके रोग दूर होसकते हैं। पर यह सब, जो कि सब कुछ समझने के कारण समाज सुधारक कहलाने का दम तो भरते हैं। पर किसी तरह भी समाजको इस सड़े हुए ढांचेको बदलने का जरा भी यत्न नहीं करते। केवल व्यवस्था बदलना कोई बात नहीं, यह काम तो नया जीवन चाहते ही स्वयंमेव पूरा हो जाय इसमें दो राय नहीं होसकती। इसलिए वर्तमान समाज रचना केवल शोषण प्रधान, मानव विरोधी भावना मात्रपर ही टिकती, नजर आ रही किसी बातमें कोई न, नया जीवन लाने का नया रास्ता निकलता न देख, विभिन्न विचारकों अथवा मत वादी प्रचारकों द्वारा जो विचार पेश किये जाते, उनसे समाज सुधार की आशा करना व्यर्थ जान पड़ता है। समाज व्यवस्था स्वतः नष्ट हो कर नया रूप धारण कर सकेगी या नहीं यह भविष्य के गर्तमें पड़ा हुआ ऐसा प्रश्न होगा, जिस पर हर एक विचार करने को बाध्य होना पड़ेगा। पर यह बात अवश्य विचार करने की योग्य है, कि समय के साथ जो परिवर्तन आताहै उसका रूप क्या हो सकता है। इसपर विचार करने की आज बहुत ही आवश्यकता मालूम हो रही... ! आज तक जो मत या विचार इस बात--विशेष का हल न कर सके समाजके हित--अहित के आधारपर उनका संगठन किया गया न जा कर के रूप में न होकर रह जाता है, तो सब व्यर्थ... ।
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राजा को यह डर हुआ मन्त्रणा न प्रकट हो, इसलिये विश्वामित्रजी का समाधान किया कि फिर आवे, ऐसा ही हम यत्न कर लें, सब को साथ लेजाना उचित न हो सम्मति का काम था। राजा का मन वसिष्ठादिक सब से भर गया, ऐसा जान पड़ा धोखा खाया! राजा ऐसा कहे, फिर सोच-विचार के यह बात कही महाराज क्रोध मत करो तब तो राजा स्वरूप स्थिति विचार हुआ पर रूप तो ज्ञान मय ब्रह्म स्वरूप सब है, पर जो बात जीव रूपी जीव समझ कर कहें तब जीव ही से सम्बन्ध हो तब स्वरूप प्रकाश कैसे हो! जो रूप की बात सो रूप स्वरूप विकार किस को? पर रूप ही में बात हुई ब्रह्म को विकार क्या, पर जो बात रूप विकार कहा जाता है सो ब्रह्म स्वरूप में कुछ बना, या रूप नाम-रूप ही विकार नाम ठहरा, विकार तो था, स्वरूप में विकार का अभाव तो सब उपाधि से परे जान ले तब ही यह स्वरूप जान ले तब सब से छूटे कहा। राजा ऐसा कहे, तुम सब हो, राजा के कहने से जो यत्न कर लें, तब जो बात सम्पूर्ण प्रकाश में आवेगी सो जान लेवे सो ज्ञान जीव-भाव का था, राजा ने मन को वसिष्ठादिक में सब प्रकार दिया था, सो छूटा, विचार न भया! जो ज्ञान से सब से भर ले सो ज्ञान स्वरूप में स्थिर होता, पर अविद्या था निश्चय जो रूप समन्दर का किया भया, सो रूप जीव ही से विकार का जाना गया तब विकार रूप स्वरूप तो न भया पर जीव-भाव जान कर के सो विकार रूप को ज्ञान अविद्या हुआ सो क्या? पर जो ज्ञान विकार स्वरूप में ज्ञान रूप सो अविद्यादिक विकार से परे कर के ज्ञान स्वरूप में स्थिर हो तब तो जीव रूप छूटे कहा सब ही ज्ञान रूप--तो जो जीव रूप--उस बात से, सो सब ज्ञान रूप से ज्ञान स्वरूप न भया तो सब माया के वश में सब ज्ञान स्वरूप न प्रकाश हो उस माया को ज्ञान से परे जान माया न जान-विचार हो, न जान-भाव हो, सब रूप एक ही सा जान ज्ञान रूप हो सब ज्ञान स्वरूप प्रकाश का रूप हो, सब माया से परे हो ज्ञान प्रकाश सो क्या प्रकाश? जो ज्ञान रूप से सब को स्वरूप ब्रह्म रूप में जान लेवे निश्चय हो स्वरूप सो सब एक सा, सो माया स्वरूप को जान ले तो स्वरूप स्वरूप रूप से अलग रहेगा, जो सब ज्ञान से ज्ञान को जान ले तब, सो सब स्वरूप क्या? पर स्वरूप तो सब ज्ञान स्वरूप रूप से भिन्न है, जो स्वरूप स्थिर रूप स्थिति में स्थिर हो सो ज्ञान रूप सो सब कुछ मन के आधार पर है--सो तो सब वसिष्ठादि विकार है, पर सब वसिष्ठादि ज्ञान के--विचार से सब स्वरूप सब से अलग हो के ज्ञान रूप में हो कर स्वरूप स्थिति विचार किया सो स्वरूप सब मन से अलग कहा, पर जो जो भी वसिष्ठादि प्रकार सब माया रूप उपाधि सब को देख कर जो जो भी ज्ञान स्वरूप विकार रूप से स्वरूप में भिन्न है, ज्ञान स्वरूप सब स्वरूप स्वरूप अज्ञान से परे ज्ञान रूप से स्वरूप स्वरूप स्वरूप ज्ञान का ही रूप सब रूप में रूप भया, सो अविद्या रूप अविद्यादि सब सब सब ज्ञान से ही सब से परे भया, जो सब ज्ञान रूप भया सो सो सब ज्ञान से ही परे हो कर न जान रूप, सो ज्ञान का रूप था सब कुछ सब ज्ञान से परे हो जाता है, जब सब से अविद्या ज्ञान रूप तब सब उपाधि से परे ज्ञान-रूप भया, तब तो स्वरूप का ज्ञान रूप हो सो, तब सब अविद्या! सब से अलग हो; जब ज्ञान को स्वरूप कहा तब, सो अविद्या ज्ञान का रूप कहा जा सके, पर अविद्या ज्ञान सब सब ज्ञान से अलग रूप कहा, सो अविद्या रूप ज्ञान अविद्या स्वरूप से परे रूप ज्ञान रूप सब ज्ञान का स्वरूप सो अविद्या रूप से अलग सो ज्ञान के स्वरूप प्रकार से अज्ञान से ज्ञान से परे था स्वरूप का प्रकार स्वरूप सब का ज्ञान रूप भया सो रूप में ही, तब सब अविद्या! सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप सब ज्ञान 242
विश्लेषण का प्रयास कर रहे समस्त दार्शनिकों की जीवनव्यापी मानसिक या चेतना विषयक चेष्टा का सारभूत निष्कर्ष। पर बात तो तब बिगड़ती दी--जब इस अनिर्वचनीयता को--मन बुद्धि रूप दो चार मात्र तत्त्वों तक ही, या यों कह लें मानव मन या चेतनामात्र सिर्फ तक, ही या यों कहें सिर्फ व्यक्तिगत मानवमात्र के मन चेतना तक ही या यों कहे सिर्फ बुद्धि तक सीमित कर दिया जाता या मन बुद्धि मात्र तक उसे रखकर आत्मवान् पुरुषार्थ चेष्टा चेतना का जो तत्त्वबोध कराया था, उस पर तो पर्दादोष सिर्फ अज्ञानता का आरोपित कर ही अध्यात्मवाद को सिर्फ बुद्धिमात्र पर ही निर्भर अथवा चेतना या मनोभाव मात्र समझ लिया जाता या अध्यात्म विचारधारा को सिर्फ चेष्टा मात्र से जोड़ कर देखा जाता, पर ऐसा कहीं नहीं था, बल्कि उन्होंने चेष्टा का साक्षात्कार चेतना के मूल रूप से किया और चेष्टा के मूल भाव स्वरूप, या मनोभावों रूप मूल भावों से जो चेतना का रूप था या मूल चेतनान्तर्गत जो समस्त चेष्टा, या मूल भाव से चेष्टा, या मूल चेष्टा रूप भाव चेतनान्तर्गत जो समस्त चेतना थी उसकी या विधाता के मूल द्वन्द्व--अद्वन्द्व चेतना रूप भाव, जिस से सर्व सृष्टि का रूप, जिस से समस्त जग का रूप, जिस से समस्त जग की, जिस से समस्त जग के, जिस से जग जीवों मात्र तथा इस जग नियन्ता चेतना का रूप था उस, के ही साथ जोड़ कर इस जीवन चेष्टा को मूल चेतना रूप साक्षात्कार से ही जोड़ा था और उस दैव रूप परम साक्षात्कार चेष्टा चेष्टा स्वरूप दिव्य चेष्टा स्वरूप न हो करके सिर्फ मन चेष्टा, सिर्फ बुद्धिमात्र उस चेष्टा को चेष्टा ही समझ कर उस मन अथवा बुद्धिगत समस्त चेष्टा को चेष्टा ही मान चेष्टा-कर्म में? ऐसी दार्शनिक चेतना द्वारा स्पष्ट कर दिया था, जिससे चेष्टा के मूल का ज्ञान हो सके या, दार्शनिक व्याख्या के अन्तर्गत सिर्फ चेष्टा कर्ममात्र सिर्फ दार्शनिक विचारणा सीमित, व्यक्तिगत विचार, व्यक्तिगत चेष्टा ही सीमित तक होकर रह गई दार्शनिक रूप बन कर न व्यक्तिगत विचारणा तक उस रूप में न केवल सीमित हो जाय या, वो मानव को व्यक्तिगत ही रूप का दर्शन कराकर मानव चेतना को न सिर्फ सीमित करके सीमित कर दे बल्कि चेष्टा रूप को, जिस रूप चेष्टा का विधाता स्वरूप उस चेष्टा रूप जग रूप में सब जगह सब काल में दिखाई दे रहा अथवा हो सकता प्रकृतिगत चेष्टा अथवा चेष्टा के ही साथ सदा सदा एकत्व रूप लिए हुए भाव से चेष्टा का नित्य सम्बन्ध सम्बन्धित हो कर रूप लिए हुए दृश्य रूप में समस्त जगतव्यापी रूप से दृष्टिगोचर स्वरूप हो रहा ऐसी दिव्य चेष्ट, उस चेष्टा का ज्ञान मानव चेतना विचार द्वारा पर जब जग की इस चेष्टा चेष्टा के विराट् रूप चेष्टा को सिर्फ व्यक्तिगत चेष्टा मात्र तक सीमित समझकर या उस रूप में स्वीकार कर ही उस चेष्टा रूप को, उस चेष्टा के मूल विराट् स्वरूप को विस्मृत ही कर दिया गया तो उस रूप को, उस चेष्टा के दिव्य स्वरूप को उस चेष्टा के रूप को, उस परम चेष्टा रूप भाव को विस्मृत कर उस चेष्टा को सिर्फ चेष्टा ही माना गया तो सच, जिस को जग विस्मृत करता हुआ चेतना के रूप को विस्मृत... ही नहीं करता पर वो विस्मृत करता जा रहा था उस मूल को जिसका रूप चेष्टा रूप में सर्वदा साक्षात्कार स्वरूप ही चेष्टा का विस्तार लिए हुए सर्वदा गतिशील रहता हुआ ही तो दृश्यमान है उस विराट् चेतनामय चेष्टा रूप सर्वव्यापी दिव्य चेष्टा स्वरूप के रूप में चेष्टा, जो जग का रूप बना सिर्फ या व्यक्तिगत रूप चेष्टा तक ही चेष्टा व्यक्तिगत के स्वरूप तक सीमित होकर रही, जिसे समझ कर ही तो मानव ने भी चेष्टा रूप, उस चेष्टा को सिर्फ जड़ चेष्टा रूप, चेष्टा के दिव्य भाव चेष्टा रूप से अलग कर के जो रूप बना लिया था या मान लिया था, उस रूप चेष्टा भाव रूप से विलग जो रूप किया गया? जिसने कि आगे चल कर मानवीय चेष्टा सम्बन्धी, व्यक्तिगत ही, चेष्टा ही, व्यक्तिगत रूप चेष्टा चेष्टा रूप होकर रह गई या संकीर्ण बन गई ; जिस से उसका स्वरूप? एक चेष्टा को, उस चेष्ट को जो इस जग, दार्शनिक या चेष्टा रूप दिव्य रूप जग का रूप चेतना स्वरूप था, उस से सम्बन्धित चेष्टा रूप, जग-रूप चेष्टा स्वरूप से अलग, उस दैव चेष्टा साक्षात्कार से अलग ही सिद्ध किया गया, जो चेतना रूप चेष्टा चेतना का रूप था उस चेष्टा से अलग हो? जिस रूप का परिणाम था, वो जग चेतना रूप लिए हुए उस चेतना 243
अभिमान बड़ा था, इतना विशाल वपु था, इन्द्रजीत जैसा सुभट जिसका पुत्र था। किन्तु इस सबके होते हुए जिस प्रकार एक ही क्षण में वह सब नश्वर होकर उस महारथी का विनाश कर सकता था उसी तरह सब कुछ देखकर भी गान्धारी समझती थी, कि दुर्योधन का बड़ा भारी नाश होने वाला है। उसकी समझ, सब व्यर्थ सिद्ध होकर विवश होकर अपने नेत्रों द्वारा पश्चात्तापमय अश्रु ही बहा सकती थी। गान्धारी का शोक उस समय का था जब उसका ज्येष्ठ सुपुत्र दुर्योधन--जिस पर उसे बड़ा ही गर्व था। वह जब रणक्षेत्र में जाने लगा तो उस समय उसने अपने पुत्र को किस प्रकार से क्या कह कर विदा किया संसार रूपी नाटक-रंगमंच पर यह सब जो कुछ कौतूहल प्रदर्शित होता है, वह सब एक मायावी जादूगर के हाथ की कठपुतली रूपी-नाट्य मात्र है। किसी पर कोई गर्व कैसा, क्षणभंगुर संसार, क्षणभंगुर काया, सब कुछ एक क्षण में नष्ट भ्रष्ट हो जाने वाला है। फिर भी यह सब देख कर, मानव इस पर गर्व कर बैठता है। जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं उस पर वह अपना हक समझने लगता है, यह भी उसकी भूल ही है। मोह और अज्ञानता ही इसका मूल कारण है। उसने कहा, वत्स ! यह युद्ध धर्म और अधर्म का संग्राम है। अतएव धर्म की जय होगी तू अधर्म पथ पर चल रहा है, इसलिए तेरी ही पराजय होगी और धर्म की ध्वजा लहराने वालों की ही जय होगी। तूने क्या कभी सोचा है? कि जन्म--मृत्यु किसके वश में है, यह, सब, विधाता का खेल है। हम तो मात्र रंग मंच के पात्र हैं? तू, उस दिन तो भगवान् कृष्ण का बड़ा भारी अपमान कर बैठा था। वत्स, तू तो बड़ा हठी है? उस समय-समय, तू ने उस भगवान्, जो कि न्यायाधीश, न्यायकर्ता देवता, तथा इस समस्त सृष्टि का जो कर्ता-धर्ता एवं स्वामी है--उस का तो मान-मर्दन किया? क्या तू उन्हें अपने जैसा ही समझता? क्या वह एक-साधारण मानव हैं? वे तो त्रिलोकी के स्वामी हैं? उनका नाम ही तो संसार में सबसे बड़ा! उनका तो स्मरण ही भव सागर पार-- उतारने वाला एक मात्र साधन है। जिस पर वे प्रसन्न होकर कृपा कर दें उसके जैसा दूसरा कोई नहीं रहता। संसार के सर्वशक्तिमान् कहे जाने वाले भी, उनके सामने हाथ जोड़े नतमस्तक हो, उनके चरण कमलों को स्पर्श कर, अपने दोनों हाथों को फैलाकर वरदान माँगते हैं। उनका ध्यान करने मात्र से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तो फिर, तूने तो उनका अपमान किया। गांधारी का हृदय इस समय ममता रूपी धारा में बहने लगा था। वह अपने दुर्योधन रूपी पुत्र का ध्यान इस प्रकार से कर रही थी मानो अपने प्राणों से प्यारे पुत्र को कोई संकट न आवे। वह अपने हृदय पर पत्थर रखकर अपने पुत्र के दुर्गुणों को देखकर भी, अनदेखा कर, अपने पातिव्रत धर्म का प्रभाव डालना चाहती थी। वह जानती थी कि दुर्योधन अवश्य पराजित होगा, पर एक माँ का हृदय ममता के वशीभूत होकर अपने पुत्र को बचाने का कोई उपाय तो अवश्य करेगा ही। इसलिए उसने दुर्योधन को आज नग्न होकर आने को कहा था, जिससे कि उसका शरीर वज्र का बन सके। वह अपने इस पातिव्रत प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं थी, पर दुर्योधन ने उसकी आज्ञा का पूर्ण पालन नहीं किया। उसने अपनी जंघाओं पर वस्त्र लपेट रखे थे। जिसके कारण उसका सारा शरीर तो वज्र का बन गया पर जंघाएँ न बन सकीं। जब गान्धारी ने यह देखा, तो वह फूट-फूट कर रो पड़ी और बोली--“वत्स ! तूने यह क्या किया? तूने तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। तूने मेरी बात न मानी, जिसका फल तुझे भोगना ही पड़ेगा। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता। तूने भगवान् श्रीकृष्ण का अपमान किया, संतों का अनादर किया, धर्म का मार्ग छोड़ दिया, अब तू उस भगवान् की शरण में जा। शायद वे ही तेरी रक्षा कर सकें। गान्धारी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और दुर्योधन लज्जित होकर खड़ा था। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।” गांधारी ने, जो न देख
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इस बाल्यकाल के बिना किसी परिश्रम स्वाध्याय के बिना ज्ञान तथा सब प्रकार के भोग अनेक प्रकार सब प्रकार सिद्ध तथा सम्पूर्ण सुख भोगने योग्य जो उत्तम पदार्थ मिले हैं, उनका उपभोग जो करते हैं। जो विचार अथवा विवेक तथा ज्ञान रूपी नेत्रोंको बन्दकर सम्पूर्ण सुखरूप जल पूर्ण के समान विषय भोगों रूपी जल में डूब रहे हैं जिससे न कभी पार पावेगा तथा अनेक जन्म में, सो सो योनियों में जिस प्रकार मनुष्य विषय सुख भोग रहा है, सो तो अन्य सब पशु पक्ष्यादि योनियों में सम्पूर्ण भोग प्राप्त होता ही रहता है। किन्तु, उपकारी ज्ञान प्राप्त होकर जिस ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है सो तो प्राप्त धर्मात्मा विचारवान पुरुष ही पुरुषार्थ के अभ्यास द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त करते हैं। जो विद्या धर्म, ईश्वर रूप जो उपकारी ज्ञान जिससे सब प्रकार का सुख हो, सत्य, सुविचार, विज्ञानादि रूप जो सदा साथ-साथ रहने वाला है सो अविद्यावान् को प्राप्त ही नहीं। इस कारण-कारण ज्ञान रूपी धन को जो मनुष्य नहीं करते वे मूर्ख, विवेक शून्य ही जन्म धारण किये वृथा जन्म खो, काल रूप महा सर्पके मुखमें प्रवेश करते हैं। सो अविद्यावान् मनुष्य पशुके समान ही है, कारण जिस प्रकार पशु खाता पीता विषयको भोगता भोग भोगके कालके वश हो जाता है सो पशुके सदृश ही है। इसी प्रकार मूढ नर जो सो अविद्यावान् को प्राप्त भोगोंके भोगनेमें सदा तत्पर रहता कभी भी उस प्रभु का गुणानुवाद तो कभी भी नहीं करता, उस परम दयालु को जो सब सुख दाता अविद्यावान् को भी सुख, सो सो ज्ञान प्राप्त कर उस प्रभुके उपकारोंको भी याद नहीं करता, सो तो जन्म लेकर विष भक्षण करनेके तुल्य जीवन को धारण किये हुए ही है, सो इस जन्म में भी दुःखी, पर जन्म भी दुःखी सो अविद्यावान् मनुष्य अज्ञानता रूपी जाल में फंसा ही रहता है, जन्म-मरण रूप भवके फन्दे को कभी त्याग नहीं सकता तथा सो अनेक प्रकार के दुःख भोगता ही रहता है, जिस प्रकार बन्धन सहित कुत्ता कसाइयों के हाथमें जाकर अनेक कष्टोंको वा दुःख-दारिद्र भोग को ही भोगता रहता है उसी भाँति, सो नर अज्ञानी मूढ़ ही जन्म धारण कर सब कुछ खोता है। सो अब सो सब भी अज्ञानता नाश हो तथा सुमति प्रकाश हो इसलिए प्रार्थना पूर्वक प्रभु स्तुति की सो कही है, सो अब कृपा कर के, हे प्रभु सब दोषों हरिये? जिससे शुद्ध होकर तुम्हारे पादारविन्दों में मन स्थित होकर सदा आनन्दित रहे तथा सदा सब सुखोंके दाता प्रभुकी शरण में सदा मन स्थिर रहे, सो यह सत्य ज्ञान का प्रकाश सब जीवों द्वारा प्राप्त हो सो प्रभुने कृपा करके वेद रूप ज्ञान प्रकाश, वेद, सो सब का सब सब के कल्याणार्थ सब जीवोंके सुखके हेतु रचा, जिस, सब का उद्धार हो तथा सब अज्ञान रूपी अन्धकार मिटकर सत्यता रूप सब जीवों को कल्याण का प्रकाश वा आनन्द सदा प्राप्त होवे सो प्रभुने सब जीवोंके ऊपर कृपा करके सत्य ज्ञान का प्रकाश जो किया है? सो उसका सब प्रकार नित्य अभ्यास सो जो करेगा, उस अभ्यास की दृढ़तासे मन शुद्ध होकर प्रभुके स्वरूपका ध्यान करके जिससे उस पद मोक्ष पदको प्राप्त कर लेता है, सो जब मनुष्य अज्ञानता को तजकर सब जीवोंको इस उत्तम मार्ग पर चलावे तथा स्वयं सत्य स्वरूप को मन वचन कर्म द्वारा सेवन कर मोक्षपद, पद प्राप्त करे, सो संसार में जो कुछ भी है सो परमात्मा सबको ही समान रूप देकर उपकार है, सो सब मनुष्य, सब का सब, सब प्रकार का कल्याण ही चाहे सो जो सज्जन ऐसा करते हैं सो उत्तम हैं, तथा जो केवल अपना कल्याण ही चाहते तथा दूसरों सदा का अनिष्ट ही, विचार ही मन में, परोपकार ही, अथवा परोपकार शून्य सो नर पशु रूप ही जानिए आज का दिन इस बात का बड़ा भारी आनन्द हुआ जिसका वर्णन वाणी से भी नहीं हो सके तथा चित्त आनन्द स्वरूप परमात्मा के चरणारविन्दों में मग्न हो, प्रार्थना रूप सब सत्य सुखकारी शब्द रूप है? अतः सबको सन्मार्ग पर चलना योग्य इसलिए सब जीवों का यह परम कर्तव्य है कि सो भी, सब प्रकार के भय को त्याग कर सर्वव्यापक ईश्वर के ऊपर, सम्पूर्ण भाव तथा दृढ़ विश्वास करके सब जीवों अपने आत्मा के समान समझ-बूझके परोपकार ही करना यह ही सब का मुख्य काम है। क्या राजा, प्रजा सब कोई, परस्पर सब मिलकर, एक-दूसरे जीवोंके सुखार्थ सब प्रकार से मन धन तन से सहायतार्थ ही प्रवृत्तरहें, सो ही उत्तम मनुष्य सब को कहा गया। 245
तब यह विचार कर और शान्त चित्तके अनुसंधानसे निश्चय करो! इस संसारमें धन और वैभवका सुख विनाशी, क्षणभंगुर, जरा और मृत्युसे संकीर्ण, यह समझ कर इस संसार और सांसारिक भोगोंको तृणवत् समझकर परित्याग कीजिये अथवा सब भोगोंको पर त्यागने न बने, अर्थात् भोगों विषय, जिस पर अपना विशेष विचार वा अनुराग वा आसक्ति न होय उसे भोग कर उसीके द्वारा उस पर पुरुष परमात्माका साक्षात्कार करें? जो ऐसा विचार न कर सके तथा भोग पदार्थोंके विषयमें लोभी न होवे, तो इसका फल क्या? पश्चात्गामी होगा या नहीं? अर्थात् पश्चात्तापको ही प्राप्त होगा तथा अंतमें नरककी यातना भी भोगे पर उस ईश्वर का साक्षात्कार वा मोक्ष पद कदापि न होवेगा और न ही सुख पावेगा! ईश्वर सबमें व्याप्त इस सब जगत् को धारण करने वाला सब का प्रेरक परमात्मा जो सब जगत् में व्यापक होकर स्थित होकर भी! अपने ज्ञानवान् मुमुक्षु भक्त को अविद्या रूपी अंधकार विषयक भोगों से रहित होने की प्रेरणा करता व कहता, सावधान करो उस ईश्वर को जो सब का साक्षी वा सब में व्यापक, सब का धारक सब का पालन कर्ता, यह समझ कर उस ईश्वर सबको व्यापता है उस ईश्वर को सर्व व्यापक जान ईश्वर निमित्त सब कर्मोंको अर्पण कर नित्य अपने आत्माको तृप्त वा परमात्माको तृप्त कीजिये! परमात्मा स्वयंप्रकाशित होने कारण सब पर कृपा करता हुआ सब जगत्के ऊपर व्याप्त हो रहा है सो उस ईश्वर सबसे भिन्न वा पृथक्-पृथक्? विचार करो उस ईश्वरका साक्षात्कार वा ज्ञानके होनेपर कोई संशय वा शोक वा अज्ञान अथवा क्लेश कभी नहीं रहता क्योंकि वह ईश्वर अविद्या, भ्रम नाश का करवाने वाला है उस ईश्वर को सब प्रकार देखना चाहिये? सो परमात्मा सर्वत्र व्याप्त सबको व्यापने वाला सब पर सब का स्वयंप्रकाशित सर्वज्ञ सब शरीरोंके रूप रहित सूक्ष्म वा स्थूल, सूक्ष्म लिंग वा कारण देह के नाश रहित जो सब जीवोंको कर्मोंका फल देने वाला ईश्वर अपने दिव्य तेजसे सब जगत्को तृप्त, आनन्दित करता हुआ सब जगत्में व्यापक होकर दिव्य रूप सर्वव्यापी सर्वेश्वर रूप सर्वज्ञ सब शरीरों रहित वा, सब जीवोंका प्रेरक शुद्ध व्यापक है, सब प्रकार विशुद्धताके दाताभावसे जो निष्काम कर्म रूप परमात्माकी उपासना अथवा ध्यान रूप उत्तम कर्मों द्वारा, ईश्वर सब दिव्य जीवोंका कल्याण सर्वदा करता रहता ईश्वर सबका साक्षी होकर सबको तृप्त वा सब पर दयाल वा पोषक, सबको उस ईश्वर रूप सूर्य वा तेजके सन्मुख वा शरण, जिसमें जीव को सब दुख वा कष्ट नाश हो कर परम शान्ति प्राप्त हो, यही सब उत्तम मनुष्योंका धर्म हे सच्चिद् ब्रह्म परमात्मा भो, हे शिव रूप ईश्वर परमात्मा भो, हे सनातन रूप स्वामी परमात्मा भो, हे सब जगत् कर्ता परमात्मा भो, हे पोषक रूप ईश्वर परमात्मा भो हे सब जगत् प्रेरक परमात्मा रूप हे प्रकाश- स्वरूप भो, हे सूर्य रूप अविद्या-नाशक परमात्मा भो, हे कल्याण रूप, हे व्यापक रूप, हे शुद्ध रूप, हे समस्त इस ब्रह्माण्डके स्वामी वा जगत्के सुख दाता स्वरूप सर्व ऐश्वर्यवान् परमात्मा भो सब ऐश्वर्यवान् परमात्मा भो, सब शरीरोंमें व्यापने वाले वा सब जीवोंके कल्याण कर्ता रूप ईश्वर परमात्मा भो, विद्या व ज्ञान दाता भो, हे केवल सो ईश्वर सत्य प्रकाश रूप-- ॐ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर क्लीबे स्मर कृतँ स्मर ॥ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥ इस प्रकारका विचार करने वाले मनुष्यके लिये ईश्वर कभी दूर वा गुप्त नहीं होता ज्ञान वा उस पुरुष--ईश्वर भाव को जानकर, परमात्मा का साक्षात् वा दर्शन किया, इसके पश्चात् वह जीव ईश्वरकी वा परमात्माकी सत्ता व सामर्थ्य तथा अपनी जीवात्माकी अल्पज्ञताको जान उस परम परमात्माके शरण होकर परमात्माके साक्षात्कार सुख लाभ को प्राप्त हुआ वह अपने सत्य जीवन को, सब जीवों ईश्वर, सबको ईश्वरके ही सब सम्बन्धी जीवात्माका सम्बन्ध समझता हुआ उत्तम गति को प्राप्त करके सब दुख वा अज्ञान कष्ट भोगोंसे छूट, हे सत्य स्वरूप वा ब्रह्म रूप ईश्वर सब पर अपनी कृपासे सब जीवोंको सब प्रकारके भय क्लेशोंसे दूर रखिये, सब प्रकारके भय से ही रक्षा कीजिये जिससे सब ही जीव भय क्लेशोंसे दूर रह कर आनन्दित रहें वा सब जीवोंको ईश्वर कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य कभी किसी प्रकारके क्लेशमें नहीं पड़ता, इस बात को, विचार कीजिये तथा स्मरण रखिये सब ही जीव, विचार करो उस ईश्वरको? ईश्वर कैसा ईश्वर, कैसा वह परमात्मा परम दयाल व सर्वेश्वर सर्वव्यापक, वह कैसा ईश्वर होगा जो जीवोंको सब प्रकार आत्मिक शान्ति प्रदान कर सब प्रकार के कष्ट, सब जीवोंके क्लेशों तथा दुर्गुणोंको छुड़वाता वा भगाता? सदा ईश्वर अपनी सर्वशक्तिके ज्ञानद्वारा... ॥ सो विचार करो ईश्वर कैसा; क्योंकि उस ईश्वरका स्मरण करने वाला सब संशयों तथा दुःखों से? तथा अविद्या के प्रभाव से छूटता? ईश्वर कैसा दयालु? इसका उत्तर आगे 246
□□□□, □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□? □□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□□, □□□ □□□□□ □ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□! □□□□ □□□□ □□□□□? □□□□□□ □□□□□□□□, □□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□, □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□, □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□, □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□.□. □□ □□□ □□ □□□□ □□.□□ □□□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□.□. □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□, □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□? □□ □□.□. □□ □□□, □□□□□□, □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□, □□□□□ □□□□ □□□? □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□, □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□? □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □ □□□□□ □□□ □□□□, □ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □ □□□□□ □□□□ □ □□□□□ □ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□? □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□? □□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□, □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□? □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□, □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□? □□ □□ □□□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□? □□□□ □□□ □□□□? □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □! □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□? □□□□-□□□□□, □□□□□-□□□□ □□ □□□□□, □□□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□? □□□□ □□□□ □□□, □ □□□□□□ □□□ □□□□□, □ □□□ □□□ □□□□□□ □ □□□□ □□□ □□□□□, □ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□-□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ 247
इस काम-काज सम्बन्धी विचार अपने नित्य-कर्म सम्बन्धी विचार पर जोर मारता रहेगा कि साक्षात्कार कहाँ और कहाँ यह सांसारिक काम? लेकिन साक्षात्कार आवश्यकतानुसार प्रत्येक अवस्था का एक धर्म है, जो प्रत्येक साधनावस्था साधक को करना पड़ता ही है। संसार सम्बन्धी कर्त्तव्य साधनावस्था पर्यन्त चलते ही रहते हैं। जब शरीर को वस्त्र की भूख लगी तो वस्त्र देना ही होगा, पर इस काम--काज सम्बन्धी चिन्तन करते हुए यदि हम प्रत्येक क्रिया ईश्वर-स्मरण युक्त कर्त्तव्य-कर्म समझ कर करें तो चित्त का कोई विक्षेप इसमें बाधा नहीं पहुँचा सकता या कर्म ज्ञान-निष्ठा रूप में परिणत होगा। इसमें सन्देह नहीं, हे सच्चिदानन्द रूप ! प्रभु आपको भूलना ही, हे सच्चिदानन्द रूप! सर्वज्ञ होने पर भी अन्य किसी विषय को सत्य, दृढ़ या नित्य मानना ही अविद्या? अविद्या का परिणाम दु:ख? और इस अविद्या के सम्मुख सब प्रकार का संताप, संशय या मानसिक अशान्ति उत्पन्न करेगा, और कभी शान्ति? इसका नाश आत्मतत्त्वज्ञान रूपी प्रकाश से सब प्रकार अज्ञान रूपी अन्धकार मिटने पर पूर्ण आनन्द मिलेगा। हे प्रभु! मुझ स्वरूप को, हे ज्ञान रूप! नित्य व अनित्य वस्तु के विवेक ज्ञान से प्राप्त ज्ञान रूपी दीप जलाकर हे कारण-कार्यमय सब जगत् को, हे पर पर अनादि-अव्यक्त सब संशय युक्त रूप सब को प्रकाश कर, ज्ञान रूप सूर्य स्वरूप प्रकाश से सब का संहारक बनकर अपने आप को व्यापक रूप में स्थिर कर परमेश्वर रूपी समुद्र में लय कर स्थिर रूप करो, हे अ-कार्यमय सब रूप को, हे पर पर अनादि-अव्यक्त सब रूप भ्रम को लय कर चिदानन्दरूप सब जगत् रूप को हे परमात्मा लय, हे व्यापक रूप, हे प्रकाश रूप। ऐसा हे जगत् प्रकाशक परमात्मा। जिसके पास जो धन होगा वही, समय पड़ने पर उस धन द्वारा सहायता करेगा या उस का लाभ उठा सकेगा। जिसके पास ज्ञान होगा, समय पड़ने पर उस ज्ञान द्वारा अज्ञानता को दूर कर, प्रकाश का लाभ कर, संशय को दूर कर, भ्रम को दूर छुटकारा पा सकेगा, जिससे शान्ति प्राप्त होगी? जो अपने को शरीर मान कर केवल शरीर सम्बन्धी धन एकत्र करने में लगा रहा, जिसने न आत्मिक आवश्यकतानुसार अभ्यास किया, चिन्तन करके तत्त्व का अभ्यास किया, संशय का नाश कर ज्ञान प्राप्त कर लिया तो वह किसका अधिकारी है? इस पर विचार कर लो कि यह सब संशय किसलिए या इस संशय का आधार कौन है, सो अज्ञानता है, सो अज्ञानता केवल नाश होने वाली वस्तु मात्र नहीं, जबकि, अपने स्वरूप का ज्ञान न होने तक, केवल भ्रम का रूप बन कर रहेगी। जब अपने ज्ञान का, अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाता तब संशय कहाँ रह सकता? ज्ञान का या इस अविद्या का? जो सब तरह से भ्रम मात्र ही होगा! ज्ञान या इस विद्यावान्? का आधार ही ज्ञान होगा! इस ज्ञान का स्वरूप प्रकाश स्वरूप स्वरूप चिन्मय स्वरूप का प्रकाश सब ओर होगा! इस विचार द्वारा हे जीव तू, अपने संशय को सब प्रकार दूर--कर ले कि, संशय रहित! संशय का स्थान केवल भ्रम रूप सब तरह का होगा ही तब, जब तक तू विचार या इस संशय रूप सब भ्रम को लय कर ज्ञान स्वरूप को न जाने या न जाने का कारण यह होगा, सब केवल सब अज्ञानता रूप संशय, सब पर सब भ्रम मात्र सब को जान कर, इस ज्ञान को, इस ज्ञान को, इस ज्ञान रूप स्वरूप रूप हे जीव तू सब ओर सब तरह ज्ञान स्वरूप को जानकर प्रकाश रूप में व्यापक कर सब को जान ले, कि सब संशय का लय ज्ञान व ज्ञान, ज्ञान मात्र ही या ज्ञान व ज्ञान रूप में ही है, जिससे इस सब भ्रम संशय अभ्यास द्वारा सब ओर सत्य ज्ञान को, जो कि केवल ज्ञान मात्र स्वरूप-- ज्ञान व प्रकाश स्वरूप व्यापक प्रकाश हे प्रकाश रूपी परमात्मा। सब प्रकार के संशय का स्वरूप अविद्या मात्र, विद्यावान् ज्ञान, नित्य ज्ञान, अविकारी ज्ञान, व्यापक ज्ञान, प्रकाश का रूप ज्ञान होगा। अभ्यास स्वरूप या इस अभ्यास के फल रूप में, सो संशय मात्र का नाश निश्चय होगा। चित्त जब ज्ञान रूप द्वारा स्थिर होकर हे प्रभु! रूप सब जग भ्रम अविद्या को लय कर ज्ञान रूप, नित्य स्वरूप सब आधार का रूप, नित्य स्वरूप सब आधार ज्ञान सब ओर, प्रकाश का रूप स्वरूप ही होगा उस स्वरूप को ही सब! उस नित्य स्वरूप रूप से सब ओर व्यापक व्यापक ही हो। 248
यह सब भगवान् का रचा, भगवान् का अंश केवल परोपकार प्रयोजन का बना हुआ ही जगत का स्वरूप या रूप है, तब काम, मद तथा लोभ रूपी विष फल क्यों इस पर फलते या फल गये या फल रहे हैं और इन का फल भोग क्यों हो रहा है और हम या आत्मा का इस रूप जगत अथवा संसार का इन चार फल भोगों रूपी सुख वा दुःख रूपी से क्या भाव तथा कारण सम्बन्ध बना और बन रहा या बना रहेगा। इस शंका का उत्तर पहले कह चुके--जैसे महाराज जनक राजर्षि अथवा और राजा लोग या गृह लोग वा योगी लोग वा गृह आश्रम में वा जगत् के भोग रूप पदार्थों का सेवन करते तथा रचते दृष्टि आते रहे; ऐसा ही काम रूपी भोग केवल या सुख, जो ब्रह्म के अंश संसार सम्बन्ध स्वभाव ? ऐसा ही मद केवल अहंकार रूप? लोभ केवल? आत्मा का केवल? सो ऐसा ही उत्तर काल के प्रमाण, सो इन सब का जो अंश केवल कारण है, सो तो परोपकार स्वरूप परमात्मा का अंश केवल स्वभाव? आत्मा का भोग केवल उस अंश तक; सो अंश तो तीन काल सत्य रहने का फल का नाम था, ऐसा रूप समझना ही तो प्रमाण सो इस प्रकार काम केवल का फल तो काल रूप से फल जो इस पर लगा काल रूप से काल के भोग केवल स्वरूप के प्रमाण रूप फल का? अथवा अविद्या का केवल प्रमाण! ऐसा अज्ञान जो जग के अज्ञान से जो उत्पन्न हुआ था, सो तो सब जग भोग रूप या काम केवल भोग रहा? सो तो काल रूप फल का काल से सम्बन्ध, आत्मा केवल का प्रमाण? ऐसा काम ही तो काल से उत्पन्न स्वरूप के फल का, ऐसा भोग तो सब काल रूप ही का फल भोग रहा? आत्मा केवल आत्मा का? ऐसा मद, जो कि जगत् के आधार स्वरूप से, काल से जग को जग से जो काम केवल रूप भोग लगा सो तो अज्ञान, मद केवल अहंकार, सो केवल अज्ञान सो जो अविद्या केवल स्वरूप सो तो काम केवल अज्ञान भोग रूप फल जो केवल अज्ञान केवल स्वरूप का फल केवल अहंकार रूप फल का फल भोग रहा केवल सो फल अविद्या का भोग तो केवल फल भोग रहा? मद का फल? ऐसा काम फल? मद केवल का फल? जग केवल का भोग फल का! क्योंकि जगत् तो भगवान्, सो काम अविद्या अहंकार रूप फल सब का फल भोग प्रमाण जग रूप से ही केवल स्वरूप, क्योंकि कारण रूप से तो जग केवल ऐसा ही रूप लोभ का, तब केवल जो सत्य केवल रूप से लोभ रूप फल जग रूप में, सो तो जग के स्वरूप व्यवहारिक कारण केवल केवल जग केवल का अंश, न अविद्या केवल का, न आत्मा केवल के केवल स्वरूप रूप जग रूप केवल स्वरूप का फल लोभ, जगत् केवल जगत् रूप, व्यवहारिक काल केवल स्वरूप केवल जगत् का फल, व्यवहारिक स्वरूप जग रूप का, व्यवहारिक स्वरूप का केवल फल, सो जो जग का रूप फल लोभ, केवल व्यवहारिक फल जग रूप में ही प्रमाण, सो तो सब केवल सत्य न सत्य का रूप तो केवल व्यवहारिक ही का स्वरूप, ऐसा जग केवल, सत्य का न फल! केवल तो व्यवहारिक का स्वरूप सब व्यवहार के अंश केवल के व्यवहार रूप में केवल, जग केवल के जग केवल स्वरूप में, जग के रूप का केवल केवल रूप केवल ऐसा ज्ञान रूप, जो केवल ज्ञान, ज्ञान न जग रूप का, न जग केवल काल रूप ज्ञान न केवल केवल जग के स्वरूप के केवल रूप से केवल ज्ञान स्वरूप केवल रूप से व्यवहारिक सत्य स्वरूप केवल, सो व्यवहार केवल ज्ञान स्वरूप, सो व्यवहारिक केवल स्वरूप सब जग के भोग केवल स्वरूप, सो जग केवल ज्ञान स्वरूप, केवल से केवल के स्वरूप केवल स्वरूप स्वरूप, केवल के केवल रूप सब जग-रूप ज्ञान रूप जग जग-रूप से ही सब ज्ञान रूप है, केवल ज्ञान केवल रूप केवल का भोग केवल केवल सत्य केवल के व्यवहार ज्ञान, जग रूप से केवल सब केवल रूप का केवल, जग रूप का स्वरूप ऐसा ही जग के रूप से केवल, सो तो काल; सो तो काल के प्रमाण, सो जग के प्रमाण ही प्रमाण अब जग का केवल रूप सब परोपकार रूप से तो ज्ञान रूप फल रूप से तो जग केवल रूप से ज्ञान रूप ही फल व्यवहारिक रूप से ज्ञान रूप सब ज्ञान का 249
विचार कर लें कि क्या लाभ है, तो ऐसा ही मन को न कहें, वरन् परिस्थिति को समझें जिसका भय लगा है और विवश होकर ही तो ऐसा काम करना पड़ रहा होता है, विवशता को जान लेने पर ही भय कम हो सकता है। 250
द्वादश स्कन्ध कथा (उत्तरार्ध सहित)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवत महापुराण द्वादश स्कन्ध कथा (उत्तरार्ध सहित) अध्याय 34 तस्मात् त्वमद्य मद्वाचं शृणु सत्यं वदाम्यहम्। यद्द्वा मुकुन्दं भजते यावद् वित्तं समाहितः॥ शृण्वन् सुपुण्यं विष्णोस्तु तस्मात् पापान् विमुच्यते। सद्यः करोति तन्मर्त्यं मुच्यते सर्व किल्बिषैः॥ तस्मात् त्वमद्य मे भूयो शृणुष्व वचनं मम। यन्मया कथितं सर्वं "सत्यं" तत् सर्वं शृणु॥ शुकदेव जी कहते हैं- अब व्यास जी परीक्षित को ज्ञान प्रदान करते हुए कहने लगे, हे राजन! इस इस संसार रूपी सागर में, जो जीव अपने कर्मों द्वारा बंधा हुआ रहता है, वासना रूपी रस्सी से, संसार रूपी जाल अत्यंत विशाल और अत्यंत गंभीर है। इस में जो गिर जाता है वह जब तक भगवान् का भजन नहीं करता, तब तक आवागमन रूपी चक्र में घूमता रहता है। इसलिए भगवान् की शरण में जाना, ही सब प्रकार सुख और सब प्रकार का कल्याण है। जिस प्रकार से एक नाव से एक पार से दूसरे पार जाया जाता है, उसी प्रकार से भगवान् की भक्ति से यह जीव भव सागर से, आवागमन रूपी बन्धन से छूट जाता है। परंतु जो इस बात को नहीं जान पाता और संसार में ही लगा रहता है, वह माया के चक्र से कभी भी छूट नहीं पाता। इसलिए अब हे राजन! तुम इस प्रकार के ज्ञान उपदेशों को सुनो। वास्तव में राजा ज्ञान से ज्ञानवान् होता है या वह ज्ञान पाता है, क्योंकि वह तो संसार रूपी राज्य शासन के चक्र में पड़ा ही रहता है। इसलिए ज्ञानवान् बनकर ही वह इस संसार से पार उतर सकता है। राजाओं के लिए तो यह ज्ञान आवश्यक है, जो राजा ज्ञान से युक्त होता है, उसका कैसा? राज्य हो या न हो, उसकी तो हर दशा में मुक्ति तय होती है। इस प्रकार से वह ज्ञानवान्, राजाओं का ही उद्धार करने में समर्थ है। अतः, ज्ञान ही सब कुछ है। इस प्रकार राजा परीक्षित को ज्ञान, उपदेश ज्ञानियों द्वारा दिया गया, जो कि परम आवश्यक था। जब तक ज्ञान न हो जाए, तब तक वह कुछ भी जान न सके। जो इस ज्ञानोपदेश को सुनकर के उस ज्ञान स्वरूप को समझता हुआ मुक्ति को प्राप्त करने लगता है, उसको संसार के सभी सुखों से मुक्ति मिल जाती है, फिर वह सब कुछ छोड़ कर के, परम पद को प्राप्त कर लेता है। इस सब ज्ञान को सुनकर राजा परीक्षित बोले, हे मुने! आपका कथन सत्य है, ज्ञान द्वारा ही भव सागर से पार उतरा जा सकता है। कहा गया, धीरे-धीरे ज्ञान, विवेक जाग उठता है और ज्ञान से, अपने रूप का भान हो जाता है। जो कि भगवान् के ज्ञान का ही एक रूप है। इस प्रकार से इस ज्ञान को पाकर के मनुष्य अपने को जान पाता है। जो अज्ञानी मनुष्य अपने को नहीं पहचान सकता, ज्ञान के अभाव के कारण ही तो, वह संसार में भटकता रहता है। ज्ञान के द्वारा, ही मुक्ति का मार्ग खुल सकता है। अतः, ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा सब प्रकार के संशयों का नाश कर ज्ञान प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए। ज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्य मार्ग पर चलना ही परम धर्म है। ज्ञान स्वरूप परमात्मा को जो जान लेता है, उसका उद्धार हो जाता है। परमात्मा सर्वव्यापी हैं। वह तो सब जगह विद्यमान हैं। मनुष्य अज्ञानवश उन्हें पहचान नहीं पाता। अज्ञान का पर्दा हटते ही परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं। इसलिए हे परीक्षित! अब तुम ज्ञान रूपी नेत्रों से परमात्मा को देखो। 251
विषयाशक्त होकर जो आत्मज्ञान को ना जानकर केवल आ--काश की तरफ देखता, केवल सो जाता रहता, केवल सो कर उठकर शौच मुख प्रक्षालनादिक क्रियाओं निमित्त इधर उधर जाता आता हुआ रहता तथापि उस आत्मा को एक क्षण भी विचारता ना, सो किसका भला करता? अपना भला? कैसा भला कि जब कि वह वृथा खोवेगा? तब किस प्रकार इस नर देह के अवसर को पाकर अपना कल्याण कर ही सकेगा। विषयभोग तो यह केवल अविद्या, कर्म या पुद्गल कर्म जनित सुख जान कर जो इन विषयभोग रूप, महामोहरूपी तम निवारक इस ज्ञान नेत्र को केवल विषय वासना रूप अंध कर खो बैठा सो कैसे भला, क्योंकि जो इस प्रकार खोवे उसको तो सब कोई अंधा ही, पर जो यह नर देह जीवात्मा पुण्यात्मा पाकर उस भव-जल पार कर लेता वह सब इस अवसर को पाकर न केवल अपने को ही तारेगा वरन अन्य जन्म-जन्मांतरों के पापकर्मों को भी भस्म करने समर्थ होगा। सो जीवात्मा केवल इस प्रकार संसार के मिथ्या बंधनों को यदि बांध लेता, पश्चात्ताप की अग्नि हृदय मध्य प्रज्वलित न होने देता, और आत्मा में न रमता, उस पुरुष के इस संसार रूप अंध कूप में गिरे, बिना पश्चात्ताप के कौन निकाले? वह ज्ञान नेत्रहीन, इस संसार महाभयानक कूप में गिरता-पड़ता हुआ सब ही समय इस प्रकार अपने समय को वृथा ही ना खोता वरन सब ही नर देह के अवसर पाकर उस परम पद को प्राप्त करने वाले उत्तम पुरुषार्थ को करता। इस प्रकार ज्ञानीजन विचार कर के अज्ञानांध होकर इस विषय रूप कूप मध्य पड़े हुए जन को जो कि काम-क्रोध, अहंकार-ममकार, राग-द्वेषादिक इस प्रकार इन अज्ञानियों के अज्ञान भावों को देख कर परम ज्ञानी पुरुष भी महादोषी जन जानकर इन मिथ्या ज्ञान को धारण कर स्वयं तो न बंधे पर इस प्रकार सर्व समय ही, जब तक आत्मा अविनाशी परमात्मा को प्राप्त ना होवे तब तक ही, उस पद हेतु निरंतर ध्यान रूप साधन में रत व केवल आत्म-साधना ही कर निज स्वरूप साक्षात जानेगा। इस प्रकार जो ज्ञान ही, परमात्म, परमतत्त्वानुशीलन हेतु साधन रूप जानकर, ज्ञान-चक्षु द्वारा निज स्वरूप को देखते हैं, उन भव्य जन का संसार ही निष्प्रयोजन हो गया, फिर उनको तो ना ही कर्म जनित सुख की ही चाह, ना ही राग, ना द्वेष उन को केवल व केवल परम पद से, सब ओर से उदासीनादि भावों सहित रहते हुए, उस पद को प्राप्त हो जाता। ज्ञान के इस रूप को जानकर परम तत्व का ध्यान करने वाले जन को केवल सब प्रकार राग द्वेष आदि से विरक्त होकर केवल उस परमात्म स्वरूप का ज्ञान करना ही निज आत्मा का मुख्य कर्तव्य जानकर, उस ज्ञान स्वरूप नित्य आत्म पद को प्राप्त करना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ, मद आदि षड् रिपु रूपी काम कौन करता? इन ही रिपु रूपी महा दुर्धर बंधनों को जो जन ज्ञान रूपी तलवार द्वारा काट देता है सो ही उस परमात्मा के यथार्थ रूप को! ना कि सब प्रकार अज्ञान जन समान अन्य, जो ज्ञान के परम रहस्य को न जानते हुए भी अज्ञानी ही रहते हैं? सो जीवात्मा को सब ओर चित्त को स्थिर कर, महाशून्य या परम पद परमात्मा नित्य रूप ध्यान करना चाहिए जो कि इस भव-जल रूप संसार के सर्व पाप कर्मों को नष्ट कर देने वाला व केवल आत्मा को निज ज्ञान रूप में स्थिर कर सब ओर से मुक्ति, सब ओर से परम सुख को दे, सो सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त कर भव-जल से पार निकल कर सर्व प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर निज परमानंद के प्रकाश रूप में ही अवस्थित होना चाहिए व वही, सो अपने को उस रूप में लीन होना अति आवश्यक जानकर केवल निज आत्मा का ही ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार जो अज्ञान के नष्ट हो जाने पर अपने आप में लीन, उस स्वरूप व अखंड परम ज्योति स्वरूप परमात्म को प्राप्त कर, सब से अलग होकर निज स्वरूप पद को प्राप्त कर ही लिया जाता है। अतः जीवात्मा को परमात्मा का ध्यान सब ओर एकाग्र होकर ही करना व योग्य, सो जीवात्मा ऐसा रूप होगा? फिर तो वह परमात्मा रूप ही बनकर सब रूपी माया को निवारक होगा? उस परम शांत स्वरूप होगा? तब ही यह जीव अपने स्वरूप को पावे। 252
गायकवृन्द गाते व बजातेथे कि, महाप्रभुजी परिकरों सहित लीला में पधारे। इसके बाद सब लोग रोने लगे। समस्त ब्रजवासी एकत्र हो दर्शन करने पधारे। नन्दजी रोते हुए कहने लगे कि बेटा कृष्ण तूने कहाँ गमन किया? क्या किसी नेतुझे डाँटा, या कोई कष्ट दिया, या भैया, यह जानकर कि नंदबाबा तो बूढे हैं इसलिये अब मथुरा चलना चाहिये तथा तूने तो विचार किया होगा कि नंद बाबा बूढे हैं, इनसे तो कुछ बनेगा नहीं तथा इसीलिये तूने यह निश्चय किया। नंद रोने लगे, यशोदाजी रोने लगीं तथा रोते रोते रो पड़ीं, उस समय सबलोग भी रोने लगे। इसके अनन्तर श्री महाप्रभुजी ने, अपने निज स्वरूप द्वारा, ब्रजमंडल लीला का रस दान दिया... ॥ जब श्रीकृष्ण बलरामजी को लेकर अक्रूरजी रथ पर बैठाकर चले तो गोपियों ने आकर अक्रूरजी का रथ रोक लिया कि आप कौन हो? यह हमारा लाल तो नंद यशोदा का बालक होकर आया है। तुम कौन होते हो ले जानेवाले। हम तो जाने नहीं देंगी। तब श्री बलरामजी ने गोपियों को समझाया कि तुम जाने दो। हमारे जानेके बाद नन्द यशोदा भी पीछे-पीछे आ ही रहे हैं। तुम सबको हम साथ ले चलेंगे। जब ब्रज मंडल से मथुरा तक का पक्की सड़क मार्ग ही बन गया तब श्रीकृष्ण की ओर देखकर गोपी कहने लगी कि आप अपने पिता नन्दजी से भी बड़े हो गये क्या जो हम सब छोड़कर तुम्हारे साथ चलेंगी? हम तो नन्द बाबा के साथ जायेंगी? तब श्रीकृष्ण ने कहा, ठीक है। तब गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा, हम सब लोग जब तक नन्द यशोदा नहीं आयेंगे तब तक यहाँ पर ही रहेंगी। हम सब लोग आपके साथ मथुरा में कभी न जायेंगी। हमलोग तो नन्द यशोदा के साथ ही रहेंगी। इस प्रकार मथुरा की ओर रथ लेकर अक्रूरजी चले। अक्रूरजी ने जब कृष्ण बलरामजी की ओर देखा तथा इस बात का विचार करने लगे कि मथुरा में कंस तो बहुत बलवान् है। यह बालक क्या लड़ेंगे? इन बालकों का कोमल शरीर देखकर कंस कैसे दया करेगा या मारेगा अथवा जीतेगा? अक्रूरजी को सन्देह हुआ। जब रथ यमुना तट पर पहुँचा, तब अक्रूरजी ने मन में विचार किया कि संध्या वन्दन का समय हुआ है। अतएव यमुना जल में स्नान करके संध्या वन्दन करू तो क्या होगा? इस प्रकार विचार कर अक्रूर जी रथ से उतरकर यमुना जल में गये। स्नान करके जैसे ही ही जल में डुबकी लगाई, वैसेही जल में कृष्ण और बलराम को देखा। अक्रूरजी घबराकर जल से बाहर निकल आये, देखा कि दोनों भाई तो रथपर बैठे हैं। अक्रूरजी को आश्चर्य हुआ कि दोनों जल में हैं या रथ में हैं। जब अक्रूर जी ने मन में सन्देह किया तो तुरन्त अक्रूरजी को जल में भी चतुर्भुज रूप में एवं रथ में भी चतुर्भुज रूप में दर्शन दिया। फिर अक्रूर जी ने जल में शेषशायी रूप का दर्शन किया। दर्शन करके जब अक्रूरजी जल से बाहर निकले, देखा कि दोनों रथ पर सामान्य रूप से बैठे हैं। अक्रूरजी ने मनमें विचार किया कि अवश्य ही यह कोई भगवान् का अवतार है। कोई साधारण मनुष्य नहीं है। अक्रूरजी हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। तब श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से पूछा कि चाचाजी आपने जल में कोई अचरज देखा है क्या? इस पर अक्रूरजी ने कहा कि प्रभु जो कुछ आश्चर्य है वह सब आपमें ही है। आश्चर्य भरा संसार आप में ही है। तब अक्रूरजी ने अक्रूर घाट पर श्रीकृष्ण एवं बलराम की अनेक स्तुति की। अक्रूरजी को मुक्ति हुई। इसके अनन्तर श्रीकृष्ण बलराम मथुरा में पहुँचे। मथुरा पहुँचकर रजक, दर्जी, कुब्जा आदि का उद्धार किया। कंस के कुवलयापीड, चाणूर, मुष्टिक, कंसआदि का वध करके अपने माता-पिता को मुक्त कराया? जब कंस का वध, तब कंस की दो पत्नियां थीं? एक अस्ति और एक प्राप्ति उनका नाम क्या? एक अस्ति का नाम, एक का, प्राप्ति नाम था? इन दोनों का पति मरा कहा कि? हम दोनों विधवा हो गईं! वह अपने पिता के पास, मगध में अपने पिता के पास जाकर कहने लगीं कि हमारे पिता के जीवित रहते हुए हमारा पति मर गया तो क्या फायदा हुआ? जरासन्ध कहने लगा कि कंस मारा गया कंस पक्षी जितने थे सब मारे गये तब हम क्या करेंगे, तब उसने कहा कि हम जरासंध... ने सेना सब को लेकर चढ़ाई किया तो कृष्ण सब सेना मार भगाया फिर वह लौट कर गया, फिर सेना एकत्र कर के ले आया। वह, इस प्रकार सत्रह सेनापति को लेकर आया, वह सत्रह सौ अक्षौहिणी की सेना लेकर गया था सेना मरा, तब सत्रह अक्षौहिणी की सेना को न केवल एकबार समाप्त किया, इस बार सत्रह सौ अक्षौहिणी सेना को सेना सहित जरासंध मरा तब भगवान् द्वारिका चले गये और जरासंध द्वारिका गया सब कुछ द्वारिका में जला कर भस्म कर दिया तब रुक्मणी के साथ विवाह कर के सेना सहित मथुरा वापस आ गये इस प्रकार से जरासंध का नाश करके भगवान् द्वारिकाधीश कहलाये। 253
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जिसे हम सब सम्भालें, वह सब सम्भालेगा और न केवल इस लोक योग्य वरन् अगले लोक योग्य सम्भालने योग्य न रहेगा। सम्भालने योग्य शरीर रहा, सम्भालने का समय-अंग रहा, समय-अंग सम्भाला विचार-विचार सम्झा तो विचार रूपी आधार मिला। तन-का सम्भाल करना रहा सो तन-का सम्भाल सम्झा हो, पर जो ज्ञान रूप रहा, सो सम्भालने रूप न सम्झा गया सो सम्भालने रूप न सम्झा हो, ज्ञान विषय सम्झा गया सो ज्ञान विषय सम्झा सो विचार का साधन न रहा, केवल मन का विषय सम्झा सो साधन सम्भालने सम्झा सो सम्भालने योग्य सम्झा सो जो विषय सम्झा सो साधन सम्झा सम्भालने सो साधन के सम्भालने योग्य विचार-विचार रूप रहा सो साधन न, सो विचार-विचार रहा सो यह, सो विचार- विचार रूप रहा सम्झा, केवल सम्भालने सम्झा सो केवल रूप रहा सोई सम्भालने के सम्भालने सम्झा सो केवल ही सम्भालने योग्य साधन सम्झा हो, सो सम्भालने योग्य सो साधन केवल सम्झा गया, ज्ञान रूप रहा नहीं! और सम्भालने-सम्भालने का विचार रहा सोई सम्झा गया सोई रूप ज्ञान विषय का ज्ञान रहा सो न सो रूप सम्भालने-सम्भालने का साधन रहा, सो साधन न सम्झा सो केवल साधन सम्झा हो, विचार हो, साधन का साधन रूप ज्ञान सम्झा सो केवल रूप ज्ञान का ज्ञान न ज्ञान का ज्ञान रहा, ज्ञान के ज्ञान रूप केवल सम्झा सो साधन का ज्ञान सम्झा सो केवल साधन रूप ज्ञान ज्ञान का सो रहा, सो ज्ञान का सम्झा रूप सो सम्भाल के ज्ञान का ज्ञान रहा ज्ञान सम्झा सो ज्ञान न रहा, ज्ञान सो तन-का सम्भाला, सो सम्भालने योग्य रहा सो साधन सम्भाल सम्झा केवल ज्ञान सम्झा सो ज्ञान रहा सो ज्ञान के ज्ञान सम्भाल रूप सम्झा सो सम्भालने सम्भाल का ज्ञान के ज्ञान सम्झा रूप सम्भालने रूप सम्भाला सम्झा सो ज्ञान के सम्भालने योग्य सम्झा सो सम्भाल का हो, केवल सो रूप हो, ज्ञान सो रूप का हो सम्झा, ज्ञान रूप केवल तन के ही सम्भालने के सम्भालने रूप ज्ञान रूप रहा। सो जो ज्ञान हो, उस रूप का रूप रहा न रहा, सो उस का ज्ञान केवल रहा सम्झा सो रूप केवल ज्ञान का रहा सो केवल रूप का ज्ञान सो रूप ज्ञान का ज्ञान रहा, सो यह ज्ञान के ज्ञान रूप सो सो तन-सम्भाल सम्झा गया रूप सो सम्झा सो ज्ञान का केवल रूप ज्ञान रूप सम्झा गया सो ज्ञान रूप रहा न? सम्झा गया सो सो ज्ञान रूप केवल ज्ञान सम्झा केवल ज्ञान रूप सम्झा। ज्ञान रूप सो तन--मन रूप का रूप हो सम्झा सो ज्ञान रूप तन--मन ज्ञान रूप सो ज्ञान का ज्ञान सम्भाल सम्झा रूप रहा सो ज्ञान केवल हो केवल सम्भाल रूप तन-का रूप हो ज्ञान रूप सो ज्ञान रूप रूप सम्भाल रूप सो ज्ञान रूप ज्ञान सम्भाल सो ज्ञान केवल रूप का ज्ञान रूप सम्झा रूप सो रहा, सो जो ज्ञान केवल सम्झा न रहा केवल रूप ज्ञान सम्भालने सो न रूप सम्झा गया सो सम्भाल सम्भाल रूप रूप सम्झा सो ज्ञान सो रूप ज्ञान सम्भाल सम्झा सो ज्ञान रूप सम्झा रूप ज्ञान केवल सम्झा हो, सो सो सम्झा न रहा। सम्झा सो रूप केवल रूप का रूप सो सो ज्ञान रूप रूप ज्ञान रूप ज्ञान केवल सम्झा, केवल सो ज्ञान सम्झा रूप सो ज्ञान रूप ज्ञान रूप सो ज्ञान केवल रूप ज्ञान सो सो ज्ञान सो ज्ञान केवल ज्ञान केवल सो ज्ञान केवल केवल रूप रूप रूप केवल रूप सो सो ज्ञान रूप सो केवल सो केवल रूप सो रूप रूप सो केवल केवल केवल केवल केवल केवल सम्भाल सो केवल रूप तन--सम्भाल तन--का सम्झा सो ज्ञान सो रूप तन--का सम्झा रूप सो तन--का ज्ञान रूप सो सो ज्ञान सम्भालने का हो न? सम्भाल केवल सम्भाल केवल रूप रूप सम्झा सो रूप सो ज्ञान के ज्ञान सो हो, सम्झा सम्झा केवल रूप रूप सो ज्ञान सो सम्झा रूप! सम्झा सम्भालने सो सो ज्ञान ज्ञान रूप सो सो सम्भाल के सम्झा सम्झा रूप ज्ञान सो रूप सो ज्ञान ज्ञान रूप सम्भालने हो, सम्झा सो रहा, सो ज्ञान रूप सो ज्ञान केवल रूप सो सम्झा रूप हो, सम्झा केवल रूप रूप ज्ञान रूप रूप सम्भाल के सम्भालने रूप रूप केवल ज्ञान रूप सम्झा ज्ञान रूप केवल ज्ञान रूप केवल ज्ञान सो रूप तन--ज्ञान के सम्भाल तन--सम्झा केवल ज्ञान ज्ञान सम्झा केवल ज्ञान रूप सो केवल सो ज्ञान, सम्झा सो सम्भाल रूप ज्ञान रहा न? सो सम्झा सो ज्ञान,
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भगवान्को याद करो अथवा कोई पर द्रव्य अवलम्बन आधार बने, सम्हाल, सम्हाल! यह सब मोह भाव उत्पन्न होने का निमित्त कहलायेगा! निमित्त रूप, रागप्रशस्त, सर्वोत्कृष्ट, पर द्रव्यरूप पाँच परमेष्ठी मात्र निमित्त रूप, यह सम्यक्त्व का निमित्त नहीं अथवा मात्र राग उत्पन्न होगा, जिससे पुण्य बन्धक कर्मका उदय आत्मा विकार भावको उत्पन्न करे निमित्तता से, विकार का कारण पर निमित्तता से, विकार का उत्पत्तिके दो प्रकार एक व्यवहारिक जो कर्म उदय होने पर विकार उत्पन्न हुआ यह जो राग उत्पन्न हुआ यह पर द्रव्य निमित्त से, यह राग दूसरा निमित्त से, राग कर्म निमित्त से राग से, सर्वोत्कृष्ट निमित्त से, पर द्रव्य मात्र निमित्त कर्मोदय से उत्पन्न सर्वोत्कृष्ट सर्वोपरि का यह जीव विकार भावसे जो कर्म उदय से उत्पन्न हुआ यह कर्म बन्ध का निमित्त है। इसका उपादान कौन? यह विकार उपादान राग द्रव्य कर्म बंधने के बाद राग का उपादान रागद्रव्य स्वयं राग रूप यह निमित्त की दृष्टि उपादान का जो यह ज्ञान होगा, जो यह राग होगा सो कु-ज्ञान राग का निमित्त पर से यह जानना उपादान पर राग राग का यह ज्ञान, सो राग रूप आत्मा राग मात्र मिथ्या अज्ञान स्वरूप ही यह ज्ञान होगा! पर द्रव्य रूप ज्ञान दृष्टांत क्या होगा? पर द्रव्य अथवा पर वस्तु रागका निमित्त कहलायेगा तो, पर द्रव्य रागका उपादान रूप तो आत्मा मिथ्या ज्ञान उपादान रूप राग मिथ्यात्व उपादान कहलायेगा आत्मा राग उपादान रूप राग रूप उपादान कहलाया रागका उपादान स्वयं आत्मा, उपादान उपादेय रूपी-ज्ञानको निमित्त ज्ञानके उपादान रागके पर द्रव्यको रागके उपादान रूप माना, तो पर द्रव्य ज्ञान रूप राग उपादान माना मिथ्यात्व का कारण कहलाया या उपादान रूप राग मात्र रागका उपादान रूप, उपादानका जो उपादान का रूप था, विकार उत्पन्न ज्ञान उपादानका रागका राग ही विकार राग रूप जो ज्ञान उस उपादान का ज्ञान था, राग का राग रूप रूप दृष्टांत द्वारा कहो, दृष्टांत ज्ञान-स्वरूप की स्थिति को उपादान माना, दृष्टांत रूप उपादान दृष्टि का ज्ञान होगा इस पद उपादानका यह विस्तार है, पर निमित्त का, सर्वोत्कृष्टता का, राग मात्र राग रागका कु-- उपादानका यह विस्तार उपादानका कहलाया सो, व्यवहारिक यह जो विचार चला सो--उपादान रूप राग मात्र निमित्त-उपादान का विस्तार है, पर निमित्त रागका यह ज्ञान हो राग का ज्ञान उपादान ज्ञान था! सो राग उपादानका जो विस्तार ज्ञान द्वारा जाना गया, उपादान माना, इससे विकार ज्ञानका जो ज्ञान था, राग मात्र ज्ञान उपादान माना कहलाया, विकार उपादानका दृष्टांत द्वारा कु-ज्ञान का उपादान उपादानका विस्तार ज्ञान उपादान कहलाया राग ज्ञान-उपादान का उपादान विकार ज्ञान उपादान माना गया जो उपादानका ज्ञान राग रूप कहलाया सो, विकार विकार का उपादानका विकार द्वारा रूप जो उपादानका उपादानका ज्ञान था राग उपादानका राग ज्ञान राग उपादानका राग... । विकार रूप जो उपादानका यह उपादानका जो विस्तार कहलाया राग मात्र रागका रूप उपादान का ज्ञान राग उपादान कहलाया, जिससे यह उपादान उपादानका यह राग उपादान रूप निमित्त कहलाता उपादानका उपादानका विकार रूप उपादान का विकार यह उपादान कहलाया विकार उपादानका जो विकार रागका यह विकार रूप विकार उपादान कहलाया जो विकार रागका ज्ञान था उपादान उपादानका यह विकार रूप उपादान ज्ञान उपादानका उपादान कहलाया जो यह विकार उत्पन्न हुआ उपादान का जो राग उपादान कहलाया सो, यह ज्ञान विकार का यह उपादान का ज्ञान था। दृष्टांत द्वारा कहो, राग का उपादान क्या, राग का निमित्त क्या, राग का उपादान हुआ, राग का उपादान हुआ, कर्म, पर, निमित्त का राग उपादान रूप से जो पर का राग हुआ ज्ञान उपादान कहलाया, तो उस पर ज्ञान का उपादान रूप उपादान का ज्ञान विकार का उपादान उपादान राग उपादान का पर राग राग उपादान ज्ञान विकार-उपादान रूप राग का कु-ज्ञान का ज्ञान जो राग राग का उपादान ज्ञान उपादान रूप रागका ज्ञान उपादानका ज्ञान राग का ज्ञान राग का ज्ञान राग उपादानका राग का राग ज्ञान रागका विकार का उपादान राग का ज्ञान ज्ञान राग उपादानका राग उपादानका राग विकार का ज्ञान विकार ज्ञान राग राग उपादान था, विकार का, ज्ञान का जो विकार रूप विकार यह विकार का जो ज्ञान राग रागका ज्ञान जो उपादानका राग ज्ञान रागका राग ज्ञान था? राग का राग राग उपादान ज्ञान उपादानका राग राग उपादान राग राग राग राग राग का राग राग उपादान राग विकार का विकार राग विकार-ज्ञान कहलाता 256
उनका जीवन-मरण परमात्मा का ध्यान और ईश्वर भजनपर ही तो था जिससे उनका आत्मा तो सदा पवित्र ही रहा और शरीर भी पवित्र पावन हो गया! इन पवित्र तथा महात्मा के चरण जिस स्थानपर पड़े उस पवित्र स्थानपर उन तीन पवित्र महात्माओं का एक पवित्र स्थान बन गया है, जो कालान्तरमें परमेश्वरके एक मन्दिरके रूपमें बदल गया तथा आज भी यह तीर्थस्थानके रूपमें आबालवृद्ध सब लोगों का श्रद्धा व भक्ति का केन्द्र बना हुआ है? पाठक इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है? संसार का एक मात्र सत्य ईश्वर भजन और सत्य के मार्ग पर चलना तथा पवित्र आचरण ही तो है! धन हो, दौलत सब यहीं रहकर धूल में मिल जाता है, पर जो भी एक क्षण प्रभु का नाम स्मरण कर लिया जाता है, वही जीवन को सार्थक करता है; अन्तमें प्रभु का स्मरणही सदा काम आता है, अन्य सब बातें व्यर्थ सिद्ध सांसारिक व्यवहारबुद्धिसे यह भी यह स्पष्टतः सिद्ध हो जाता हैकि सांसारिक ऐश्वर्य और वैभवकी तुलनामें आन्तरिक शान्ति और ईश्वरभक्ति बहुत बढ़कर है। एक राजा या बादशाह चाहे अपनी धन सम्पदा तथा अपनी विषयवासना तृप्त करनेके लिये सांसारिक सुखोंको जुटा सकता है पर मनकी शान्ति ईश्वरके चरणोंमें ही प्राप्त होती है। जबतक मनुष्यके हृदयमें परमात्माकी भक्ति जाग्रत् नहीं होती तब तक मनुष्य संसारमें चाहे कितने भी ऊँचे पदपर आरूढ़ हो जाय उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती? इसलिए मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करनी व प्रार्थना से, वह ईश्वर की कृपा प्राप्त करसकता है। जो मनुष्य सच्चे दिल से ईश्वर की आराधना करता हुआ सब काम निष्कामभावसे प्रभु को अर्पण कर देता हैउसका कल्याण निश्चित है; वह मनुष्यसंसारमें परम सुखी हो जाता है। जो मनुष्य परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करता है और कहता है कि, हे प्रभु! मैं तो सर्वथा ही अकिञ्चन हूँ। मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे मैं आपकी सेवा कर सकूं, हे नाथ! मुझपर दया का हाथ रखिए। तो परमात्मा उस पर प्रसन्न होकर, उसके सब दुःखों को दूर कर देते हैं। यह परम सत्य बात है, कि परमात्माकी कृपा सबपर समान भाव से बरसती है। कोई अपनी अज्ञानताके कारण उस अमृत-वर्षाका लाभ नहीं उठा पाता तो इसमें मेघका क्या दोष, अमृत वर्षा तो सबके लिये एक-सी ही होती है। क्या किसीका कोई ऐसा उपकारी हो सकता है? संसारमें सब काम स्वार्थ के वशीभूत होकर ही किये जाते हैं। कोई किसीका निःस्वार्थ उपकारी नहीं हो सकता, एक ईश्वर ही ऐसा उपकारी है जो सदा सबका भला चाहता, सबका भला करता है, चाहे कोई उसपर विश्वास करे, या न करे। सबपर उसकी असीम दया बरसती रहती है। मनुष्यको चाहिये कि वह उस सर्वशक्तिमान् दयामय परमेश्वरकी आराधना करे और अपने जीवनको पवित्र और सफल बनावे। ईश्वरकी आराधनाके लिये आन्तरिक पवित्रता और ईश्वरके प्रति अनन्य अनुराग ही अपेक्षित है। न तो जप-तप, न ही तीर्थयात्रा और न ही केवल पूजा-पाठसे ईश्वर प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य सांसारिक माया-मोहमें पड़कर उस सर्वशक्तिमान् ईश्वर को भूल कर बैठता है और केवल भौतिक सुख-साधनोंमें ही अपने जीवनको व्यतीत कर देता है, वह अन्तमें पछताता है। सांसारिक सम्पत्ति कभी किसीके साथ नहीं जाती, केवल मनुष्यके शुभ-कर्म ही उसके साथ जाते हैं। अतः मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगाना चाहिये, जिससे उसका उद्धार हो सके। जो मनुष्य सब कुछ प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर देता है और केवल ईश्वरका होकर रहता है, वह सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अतः हमें चाहिये कि हम परमात्माकी शरण ग्रहण करें और अपने जीवनको सार्थक बनावें। इस प्रकार हमें अपने जीवनमें ईश्वर-भक्ति, सत्य और सदाचारको अपनाना चाहिये। जो मनुष्य इस मार्गपर चलता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। प्रस्तुत कथासे हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें ईश्वरकी भक्तिमें लीन रहना चाहिये।
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यद्यपि इसका उपाय, इस विकत्थनशील युग सब ओर ढूँढ करके भी नहीं पा रहा शक्तिशाली भी, पर आत्मज्ञानके विस्मृतिजन्य अज्ञानकी स्थिति सबको ही प्राप्त हो परमात्माके इस महान् साम्राज्य को ऐन्द्रजालिकता का रूपक बना रही, सो आश्चर्यजनक बात केवल यही नहीं, आश्चर्य यहाँ यह, किस तरह यहाँ परमात्मा स्थित है? उसका स्वभाव केवल ज्ञान रूपी रहकर सब सांसारिकोंको देख कर केवल सब का साक्षी ही, पर हो रहा अपने उस स्वरूप को विस्मृत, जड़-चेतनमय सब जग अपनी सत्ता समझ करके। अज्ञानकी निद्रावस्थाको तो देखा जाता ही सदा ही जगत् रूपी सब ही इन जीवों द्वारा ही तो जग यह परमात्मा का स्वरूप समझा जाता ही सब ओर। केवल साक्षी? केवल निर्लिप्त केवल सब दृष्टा? केवल सब ही को सब ओर से सब को आत्मज्ञानका असीमित प्रकाश देकर सब को ही आत्मभाव से सब को प्रेरित कर सब के हृदय में जग ही रहा! सो केवल जड़- चेतनमय ही, केवल यह अपने ज्ञान को केवल प्रगट करके ही ही! यह सब बात ही तो सब ही द्वारा विस्मृत, सो केवल ज्ञान रूप साक्षी, सब ओर आत्मिक प्रकाश केवल सब ही ओर देकर इस चेतन स्वरूप जग को सदा ही चेतन, सब ओर प्रकाश रूप करता जग ही रहा। सब ओर परमात्मा को तो केवल जगत् ही जाना सब ओर। सब ओर आत्मा ही तो परमात्मा सो केवल केवल ही, केवल आत्मा केवल ही! सब का चेतन, जगत् का रूप सब ही चेतन ही अज्ञानवश ही सब ही जगत् में, केवल साक्षी ही सब ओर जगत् को केवल एक परमात्मा ही, केवल ही तो प्रकाश ही केवल रूप जगत् में ही, सब ओर फैला रूप व्यापक स्वरूप? केवल केवल ही? आत्मा ही केवल रूप जगत् स्वरूप ही? आत्मा परमात्मा ही, केवल केवल परमात्ममय ही सब ओर रूप ही, सो केवल जगत् रूप ही, सब ओरका परमात्मा सब ओर जगत् स्वरूप ही तो है। सो केवल यह केवल आत्मा ही अज्ञानमय रूप जगत्, केवल सब ओर समझा गया, अविद्यावशात् जड़--रूप ही! केवल ज्ञान सब ओर आत्मिक रूप ही, केवल सब प्रकाश ही, केवल चेतन ही? केवल सब दृष्टा ही, सब ओर सब ओर प्रकाश ही सब ओर तो यह ज्ञान ही प्रगट है? परमात्मा सब ओर जगत् के रूप में ज्ञान रूपी सब को सब ओर ज्ञान प्रकाश देकर ही केवल सदा साक्षी रूप से केवल अज्ञानवश को केवल सब ओर प्रगट ज्ञान परमात्मा सब ओर ज्ञान रूप सब सांसारिकों को ज्ञान रूप ही प्रगट है। सो केवल परमात्माका यह केवल रूप ही सब जगत् में तो केवल ज्ञान रूप, केवल चेतन रूप सब ही जगत्को परमात्मा सब अपने स्वरूप प्रकाश ही से सब ओर ही सदा ही ज्ञान रूप सब ओर से, सो केवल सब ओर चेतन स्वरूप जगत् ही, केवल सब ज्ञान रूप सब ओर से केवल ही, केवल सब ही केवल सब ओर से परमात्मा रूप ही तो, केवल सब ही परमात्मा रूप ही केवल सब ओर जगत् में केवल ही ज्ञान ही? केवल ज्ञान रूप सब ओर से केवल ही? केवल केवल ज्ञान, केवल केवल सब ओर ही तो सांसारिकों द्वारा ही ज्ञान रूप ही तो ज्ञान रूप विस्मृत समझा जा रहा ही तो केवल सब ओर ज्ञान ही सब ओर रूप ही तो केवल ज्ञान रूप सब ओर सब जग ही ज्ञान रूप केवल सब ओर ज्ञान रूप सब ओर परमात्मा स्वरूप ही केवल ही परमात्मा सब ओर प्रकाश परमात्मा स्वरूप ही सब ओर परमात्मा रूप सब ओर केवल केवल ज्ञान ही? परमात्मा सब ओर प्रकाश ही तो है, केवल ही ज्ञान ही केवल परमात्मा का तो केवल जगत् ही तो ज्ञान-स्वरूप जगत् ही तो सब ओर केवल सब ओर व केवल ज्ञान ही, व सब ओर सब चेतन ज्ञान-स्वरूप जड़-चेत जगत् सब ओर सब ही भगवान् ही सब ओर तो केवल ही तो केवल ही ज्ञान रूप स्वरूप सब ओर है। केवल ज्ञान रूप जगत् ही तो सब का स्वरूप ही सब ओर चेतन रूप सब ओर ही? सब ओर जगत् स्वरूप ही सब ओरका परमात्मा ही स्वरूप? ज्ञान रूपी, सब ओर ज्ञान रूपी चेतन सब ही स्वरूप ही, केवल सब केवल सब केवल केवल जगत् ही! सब ही केवल केवल सब ओर ही केवल है। सब ओर केवल ज्ञान रूप परमात्मा सब ही जगत् सब ओर केवल ही चेतन व सब ही तो केवल स्वरूप सब ही ज्ञान ही सब संसारमय सब संसार स्वरूप ही सब ओर केवल व सब ही ज्ञान व सब ओर ज्ञान केवल ही सब ओर ही, केवल ही सब ज्ञान ही, केवल ज्ञान ही, सो तो यह केवल ही तो ज्ञान रूप केवल ही जगत् सब स्वरूप जगत् ई-श ही सब ओर ही तो सदा ही केवल ही ज्ञान ही सदा सब ओर ही केवल चेतन सब ओर परमात्मा ईश-रूप सब ओर सब ओर ही जड़-चेत जगत्, परमात्मा केवल जगत् ही सब ओर रूप सब ओर केवल चेतन, परमात्मा स्वरूप ज्ञान केवल सदा परमात्मा सब परमात्मा ही है, 258
कुण्डलीयाँ बनाओगे तो इस जगत का काम ही खतम हो जायगा अर्थात् तुम! जो कुछ सब कुछ करने वाले समस्त ही अपने को ही सर्वो-परि मान लोगे तो जगत उत्पत्तिकर्ता का तो काम बन्द ही हो जाना पड़ा। विचार के देखो, सृष्टि को पैदा करने वाले सब की ही कद्र को जानतेहुये काम करते चले गये वा हैं, सो सब को ही संसार में अपने मन से ही सब को सुख देने वाले साधन देकर नियत किया वा जन्म-मरण के फेरे सब पदार्थों अपने बनाये स्वरूप नियत किये वा सब शक्तियां दी शक्ति रूप साधन बना संसार की पालना की व्यवस्था। भला जिस ने कुण्डलीयाँ बना संसार को पैदा न किया होता, किसी ने परमात्मा किसी को संसार में भेजा, किसी ने संसारी जीवन ही न तो सब को दिया संसार बन न सका बिना परमात्मा शक्ति के सब ही को सब को ही अपनी ही शक्ति बना, सो तो बना परमात्मा का बनाया ही सब कुछ बना तो कुण्डली के द्वारा भला कब कुण्डली बनाने वाले का सम्बन्ध सब से बना सकता है। जरा सोच समझ कर तो ही देखो तो, भला कुण्डली बनाने वाले ने क्या सब को बनाया वा बना सकता है संसार को, जो सब का सम्बन्ध सब से इस रूप बना सकता है जिस का सब से सब सम्बन्ध बने, न कुण्डली ही के द्वारा कोई बन सका संसार न ही बन सकता कभी संसार, न कुण्डली के साधन द्वारा कोई संसार में सब काम चला सका, न बना सकता ही है सब काम सब का बना कुण्डली द्वारा संस्कार का काम तो, सो तो सब काम सर्वशक्तिमान के बनाये ही से चला संसार व्यवस्था का संसार स्वरूप व्यवस्था के साथ चलता ही रहा या चल रहा या चले ही तो संसार का सब काम बन सके या बन सका, सब ही का सब कुछ सब से बना हुआ, सब का मिला हुआ। जरा तो ही तो सब ही सोच कर देखो कुण्डली बनाकर भला सब काम का ठिकाना क्या बन सकता था। क्या कभी शक्ति के बिना जन्म-मरण काम सब या जन्म-मरण सब सब को कुण्डलियों के द्वारा हो सका था क्या या हो रहा या होगा ही जिस काम को संसारी जीव द्वारा सब ही को सब कुछ दिया गया, जिस ने सब को बनाया उसी द्वारा सब कुछ चला वा दिया हुआ सब को सब कुछ संसार द्वारा सब को सब कुछ सब को दिया गया वा मिल रहा, सो सब साधन तो सब को परमात्मा ही, कुण्डलियों द्वारा नहीं-सब कुछ मिल सका। भला जब सब कुछ सब का चलाने वाले को ही आधार बना माना गया, किसी ने आज तक सब सब काम संसार द्वारा सब ही का तो किया वा, सब कुछ दिया? सो तो सब कुछ सब ही का काम था, जो सब का आधार बना चला आ रहा, सो संसार सब को ही सब काम सब ही का सब कुछ द्वारा संसार को ही आधार बना, सब संसार सब को ही सब कुछ बना ही दिया! तो जिस को, जो कुछ बना मिलना था सब मिला! जन्म-मरण का सब साधन सब मिला! सो सब मिला सब मिला, सब कुण्डली द्वारा मिला? किसी तरह भी सब कुछ तो परमात्मा का बनाया जन्म-मरण का सब काम बना, सो सब अपना दिया सब को दिया सब काम जो कुण्डली द्वारा न सब का हो सका न सब कुण्डली से सब का काम चला ही सब संसार का, न किसी तरह भी परमात्मा शक्ति भिन्न-भिन्न या सब प्रकार की थी, जो बिना शक्ति साधन परमात्मा के अपना काम कर या हो सकती या हो, किसी का सब काम सब प्रकार का सब ही रूप से आधार सब कुछ ही का बना रूप स्वरूप सब शक्ति परमात्मा के सर्वव्यापी व्यवस्था सब प्रकार से बना ही सब जन्म-मरण काम का। बिना सब को परमात्मा की व्यवस्था सब काम को किये न, तो काम चलता न कभी! ना न काम हो सब काम सकता? सो तो सब सब काम चला ही शक्ति के द्वारा बना, ना काम सब रूप में सब का सब काम बनाता या बनता सो परमात्मा का, संसार का रूप सब शक्ति के द्वारा ही सब जन्म-मरण बना सब प्रकार से जगत में सब का साधन बना बना जगत रूप में सब को साधन सब तरह से ही मिला रहा वा रहा, जिस का साधन आधार संसार बना हुआ। सो शक्ति ज्ञान सब सब सब काम सब आधार रूप में सब सब को ही दिया जिस द्वारा सब ही को संसार का सब ही तो सब काम बन कर सब का साधन बनके ही चला सब काम बना, सो बना सब का सब काम सब ही काम से सदा हुआ चला, सो ही सदा चला चला सब व्यवस्था नियम सब ही को सब सब सब 259