भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 322 में से

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उनका जीवन-मरण परमात्मा का ध्यान और ईश्वर भजनपर ही तो था जिससे उनका आत्मा तो सदा पवित्र ही रहा और शरीर भी पवित्र पावन हो गया! इन पवित्र तथा महात्मा के चरण जिस स्थानपर पड़े उस पवित्र स्थानपर उन तीन पवित्र महात्माओं का एक पवित्र स्थान बन गया है, जो कालान्तरमें परमेश्वरके एक मन्दिरके रूपमें बदल गया तथा आज भी यह तीर्थस्थानके रूपमें आबालवृद्ध सब लोगों का श्रद्धा व भक्ति का केन्द्र बना हुआ है? पाठक इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है? संसार का एक मात्र सत्य ईश्वर भजन और सत्य के मार्ग पर चलना तथा पवित्र आचरण ही तो है! धन हो, दौलत सब यहीं रहकर धूल में मिल जाता है, पर जो भी एक क्षण प्रभु का नाम स्मरण कर लिया जाता है, वही जीवन को सार्थक करता है; अन्तमें प्रभु का स्मरणही सदा काम आता है, अन्य सब बातें व्यर्थ सिद्ध सांसारिक व्यवहारबुद्धिसे यह भी यह स्पष्टतः सिद्ध हो जाता हैकि सांसारिक ऐश्वर्य और वैभवकी तुलनामें आन्तरिक शान्ति और ईश्वरभक्ति बहुत बढ़कर है। एक राजा या बादशाह चाहे अपनी धन सम्पदा तथा अपनी विषयवासना तृप्त करनेके लिये सांसारिक सुखोंको जुटा सकता है पर मनकी शान्ति ईश्वरके चरणोंमें ही प्राप्त होती है। जबतक मनुष्यके हृदयमें परमात्माकी भक्ति जाग्रत् नहीं होती तब तक मनुष्य संसारमें चाहे कितने भी ऊँचे पदपर आरूढ़ हो जाय उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती? इसलिए मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करनी व प्रार्थना से, वह ईश्वर की कृपा प्राप्त करसकता है। जो मनुष्य सच्चे दिल से ईश्वर की आराधना करता हुआ सब काम निष्कामभावसे प्रभु को अर्पण कर देता हैउसका कल्याण निश्चित है; वह मनुष्यसंसारमें परम सुखी हो जाता है। जो मनुष्य परमात्माके चरणोंमें नित्य-प्रति प्रार्थना करता है और कहता है कि, हे प्रभु! मैं तो सर्वथा ही अकिञ्चन हूँ। मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे मैं आपकी सेवा कर सकूं, हे नाथ! मुझपर दया का हाथ रखिए। तो परमात्मा उस पर प्रसन्न होकर, उसके सब दुःखों को दूर कर देते हैं। यह परम सत्य बात है, कि परमात्माकी कृपा सबपर समान भाव से बरसती है। कोई अपनी अज्ञानताके कारण उस अमृत-वर्षाका लाभ नहीं उठा पाता तो इसमें मेघका क्या दोष, अमृत वर्षा तो सबके लिये एक-सी ही होती है। क्या किसीका कोई ऐसा उपकारी हो सकता है? संसारमें सब काम स्वार्थ के वशीभूत होकर ही किये जाते हैं। कोई किसीका निःस्वार्थ उपकारी नहीं हो सकता, एक ईश्वर ही ऐसा उपकारी है जो सदा सबका भला चाहता, सबका भला करता है, चाहे कोई उसपर विश्वास करे, या न करे। सबपर उसकी असीम दया बरसती रहती है। मनुष्यको चाहिये कि वह उस सर्वशक्तिमान् दयामय परमेश्वरकी आराधना करे और अपने जीवनको पवित्र और सफल बनावे। ईश्वरकी आराधनाके लिये आन्तरिक पवित्रता और ईश्वरके प्रति अनन्य अनुराग ही अपेक्षित है। न तो जप-तप, न ही तीर्थयात्रा और न ही केवल पूजा-पाठसे ईश्वर प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य सांसारिक माया-मोहमें पड़कर उस सर्वशक्तिमान् ईश्वर को भूल कर बैठता है और केवल भौतिक सुख-साधनोंमें ही अपने जीवनको व्यतीत कर देता है, वह अन्तमें पछताता है। सांसारिक सम्पत्ति कभी किसीके साथ नहीं जाती, केवल मनुष्यके शुभ-कर्म ही उसके साथ जाते हैं। अतः मनुष्यको परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगाना चाहिये, जिससे उसका उद्धार हो सके। जो मनुष्य सब कुछ प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर देता है और केवल ईश्वरका होकर रहता है, वह सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अतः हमें चाहिये कि हम परमात्माकी शरण ग्रहण करें और अपने जीवनको सार्थक बनावें। इस प्रकार हमें अपने जीवनमें ईश्वर-भक्ति, सत्य और सदाचारको अपनाना चाहिये। जो मनुष्य इस मार्गपर चलता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। प्रस्तुत कथासे हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें ईश्वरकी भक्तिमें लीन रहना चाहिये।

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