भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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इस काम-काज सम्बन्धी विचार अपने नित्य-कर्म सम्बन्धी विचार पर जोर मारता रहेगा कि साक्षात्कार कहाँ और कहाँ यह सांसारिक काम? लेकिन साक्षात्कार आवश्यकतानुसार प्रत्येक अवस्था का एक धर्म है, जो प्रत्येक साधनावस्था साधक को करना पड़ता ही है। संसार सम्बन्धी कर्त्तव्य साधनावस्था पर्यन्त चलते ही रहते हैं। जब शरीर को वस्त्र की भूख लगी तो वस्त्र देना ही होगा, पर इस काम--काज सम्बन्धी चिन्तन करते हुए यदि हम प्रत्येक क्रिया ईश्वर-स्मरण युक्त कर्त्तव्य-कर्म समझ कर करें तो चित्त का कोई विक्षेप इसमें बाधा नहीं पहुँचा सकता या कर्म ज्ञान-निष्ठा रूप में परिणत होगा। इसमें सन्देह नहीं, हे सच्चिदानन्द रूप ! प्रभु आपको भूलना ही, हे सच्चिदानन्द रूप! सर्वज्ञ होने पर भी अन्य किसी विषय को सत्य, दृढ़ या नित्य मानना ही अविद्या? अविद्या का परिणाम दु:ख? और इस अविद्या के सम्मुख सब प्रकार का संताप, संशय या मानसिक अशान्ति उत्पन्न करेगा, और कभी शान्ति? इसका नाश आत्मतत्त्वज्ञान रूपी प्रकाश से सब प्रकार अज्ञान रूपी अन्धकार मिटने पर पूर्ण आनन्द मिलेगा। हे प्रभु! मुझ स्वरूप को, हे ज्ञान रूप! नित्य व अनित्य वस्तु के विवेक ज्ञान से प्राप्त ज्ञान रूपी दीप जलाकर हे कारण-कार्यमय सब जगत् को, हे पर पर अनादि-अव्यक्त सब संशय युक्त रूप सब को प्रकाश कर, ज्ञान रूप सूर्य स्वरूप प्रकाश से सब का संहारक बनकर अपने आप को व्यापक रूप में स्थिर कर परमेश्वर रूपी समुद्र में लय कर स्थिर रूप करो, हे अ-कार्यमय सब रूप को, हे पर पर अनादि-अव्यक्त सब रूप भ्रम को लय कर चिदानन्दरूप सब जगत् रूप को हे परमात्मा लय, हे व्यापक रूप, हे प्रकाश रूप। ऐसा हे जगत् प्रकाशक परमात्मा। जिसके पास जो धन होगा वही, समय पड़ने पर उस धन द्वारा सहायता करेगा या उस का लाभ उठा सकेगा। जिसके पास ज्ञान होगा, समय पड़ने पर उस ज्ञान द्वारा अज्ञानता को दूर कर, प्रकाश का लाभ कर, संशय को दूर कर, भ्रम को दूर छुटकारा पा सकेगा, जिससे शान्ति प्राप्त होगी? जो अपने को शरीर मान कर केवल शरीर सम्बन्धी धन एकत्र करने में लगा रहा, जिसने न आत्मिक आवश्यकतानुसार अभ्यास किया, चिन्तन करके तत्त्व का अभ्यास किया, संशय का नाश कर ज्ञान प्राप्त कर लिया तो वह किसका अधिकारी है? इस पर विचार कर लो कि यह सब संशय किसलिए या इस संशय का आधार कौन है, सो अज्ञानता है, सो अज्ञानता केवल नाश होने वाली वस्तु मात्र नहीं, जबकि, अपने स्वरूप का ज्ञान न होने तक, केवल भ्रम का रूप बन कर रहेगी। जब अपने ज्ञान का, अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाता तब संशय कहाँ रह सकता? ज्ञान का या इस अविद्या का? जो सब तरह से भ्रम मात्र ही होगा! ज्ञान या इस विद्यावान्? का आधार ही ज्ञान होगा! इस ज्ञान का स्वरूप प्रकाश स्वरूप स्वरूप चिन्मय स्वरूप का प्रकाश सब ओर होगा! इस विचार द्वारा हे जीव तू, अपने संशय को सब प्रकार दूर--कर ले कि, संशय रहित! संशय का स्थान केवल भ्रम रूप सब तरह का होगा ही तब, जब तक तू विचार या इस संशय रूप सब भ्रम को लय कर ज्ञान स्वरूप को न जाने या न जाने का कारण यह होगा, सब केवल सब अज्ञानता रूप संशय, सब पर सब भ्रम मात्र सब को जान कर, इस ज्ञान को, इस ज्ञान को, इस ज्ञान रूप स्वरूप रूप हे जीव तू सब ओर सब तरह ज्ञान स्वरूप को जानकर प्रकाश रूप में व्यापक कर सब को जान ले, कि सब संशय का लय ज्ञान व ज्ञान, ज्ञान मात्र ही या ज्ञान व ज्ञान रूप में ही है, जिससे इस सब भ्रम संशय अभ्यास द्वारा सब ओर सत्य ज्ञान को, जो कि केवल ज्ञान मात्र स्वरूप-- ज्ञान व प्रकाश स्वरूप व्यापक प्रकाश हे प्रकाश रूपी परमात्मा। सब प्रकार के संशय का स्वरूप अविद्या मात्र, विद्यावान् ज्ञान, नित्य ज्ञान, अविकारी ज्ञान, व्यापक ज्ञान, प्रकाश का रूप ज्ञान होगा। अभ्यास स्वरूप या इस अभ्यास के फल रूप में, सो संशय मात्र का नाश निश्चय होगा। चित्त जब ज्ञान रूप द्वारा स्थिर होकर हे प्रभु! रूप सब जग भ्रम अविद्या को लय कर ज्ञान रूप, नित्य स्वरूप सब आधार का रूप, नित्य स्वरूप सब आधार ज्ञान सब ओर, प्रकाश का रूप स्वरूप ही होगा उस स्वरूप को ही सब! उस नित्य स्वरूप रूप से सब ओर व्यापक व्यापक ही हो। 248