एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयह सब भगवान् का रचा, भगवान् का अंश केवल परोपकार प्रयोजन का बना हुआ ही जगत का स्वरूप या रूप है, तब काम, मद तथा लोभ रूपी विष फल क्यों इस पर फलते या फल गये या फल रहे हैं और इन का फल भोग क्यों हो रहा है और हम या आत्मा का इस रूप जगत अथवा संसार का इन चार फल भोगों रूपी सुख वा दुःख रूपी से क्या भाव तथा कारण सम्बन्ध बना और बन रहा या बना रहेगा। इस शंका का उत्तर पहले कह चुके--जैसे महाराज जनक राजर्षि अथवा और राजा लोग या गृह लोग वा योगी लोग वा गृह आश्रम में वा जगत् के भोग रूप पदार्थों का सेवन करते तथा रचते दृष्टि आते रहे; ऐसा ही काम रूपी भोग केवल या सुख, जो ब्रह्म के अंश संसार सम्बन्ध स्वभाव ? ऐसा ही मद केवल अहंकार रूप? लोभ केवल? आत्मा का केवल? सो ऐसा ही उत्तर काल के प्रमाण, सो इन सब का जो अंश केवल कारण है, सो तो परोपकार स्वरूप परमात्मा का अंश केवल स्वभाव? आत्मा का भोग केवल उस अंश तक; सो अंश तो तीन काल सत्य रहने का फल का नाम था, ऐसा रूप समझना ही तो प्रमाण सो इस प्रकार काम केवल का फल तो काल रूप से फल जो इस पर लगा काल रूप से काल के भोग केवल स्वरूप के प्रमाण रूप फल का? अथवा अविद्या का केवल प्रमाण! ऐसा अज्ञान जो जग के अज्ञान से जो उत्पन्न हुआ था, सो तो सब जग भोग रूप या काम केवल भोग रहा? सो तो काल रूप फल का काल से सम्बन्ध, आत्मा केवल का प्रमाण? ऐसा काम ही तो काल से उत्पन्न स्वरूप के फल का, ऐसा भोग तो सब काल रूप ही का फल भोग रहा? आत्मा केवल आत्मा का? ऐसा मद, जो कि जगत् के आधार स्वरूप से, काल से जग को जग से जो काम केवल रूप भोग लगा सो तो अज्ञान, मद केवल अहंकार, सो केवल अज्ञान सो जो अविद्या केवल स्वरूप सो तो काम केवल अज्ञान भोग रूप फल जो केवल अज्ञान केवल स्वरूप का फल केवल अहंकार रूप फल का फल भोग रहा केवल सो फल अविद्या का भोग तो केवल फल भोग रहा? मद का फल? ऐसा काम फल? मद केवल का फल? जग केवल का भोग फल का! क्योंकि जगत् तो भगवान्, सो काम अविद्या अहंकार रूप फल सब का फल भोग प्रमाण जग रूप से ही केवल स्वरूप, क्योंकि कारण रूप से तो जग केवल ऐसा ही रूप लोभ का, तब केवल जो सत्य केवल रूप से लोभ रूप फल जग रूप में, सो तो जग के स्वरूप व्यवहारिक कारण केवल केवल जग केवल का अंश, न अविद्या केवल का, न आत्मा केवल के केवल स्वरूप रूप जग रूप केवल स्वरूप का फल लोभ, जगत् केवल जगत् रूप, व्यवहारिक काल केवल स्वरूप केवल जगत् का फल, व्यवहारिक स्वरूप जग रूप का, व्यवहारिक स्वरूप का केवल फल, सो जो जग का रूप फल लोभ, केवल व्यवहारिक फल जग रूप में ही प्रमाण, सो तो सब केवल सत्य न सत्य का रूप तो केवल व्यवहारिक ही का स्वरूप, ऐसा जग केवल, सत्य का न फल! केवल तो व्यवहारिक का स्वरूप सब व्यवहार के अंश केवल के व्यवहार रूप में केवल, जग केवल के जग केवल स्वरूप में, जग के रूप का केवल केवल रूप केवल ऐसा ज्ञान रूप, जो केवल ज्ञान, ज्ञान न जग रूप का, न जग केवल काल रूप ज्ञान न केवल केवल जग के स्वरूप के केवल रूप से केवल ज्ञान स्वरूप केवल रूप से व्यवहारिक सत्य स्वरूप केवल, सो व्यवहार केवल ज्ञान स्वरूप, सो व्यवहारिक केवल स्वरूप सब जग के भोग केवल स्वरूप, सो जग केवल ज्ञान स्वरूप, केवल से केवल के स्वरूप केवल स्वरूप स्वरूप, केवल के केवल रूप सब जग-रूप ज्ञान रूप जग जग-रूप से ही सब ज्ञान रूप है, केवल ज्ञान केवल रूप केवल का भोग केवल केवल सत्य केवल के व्यवहार ज्ञान, जग रूप से केवल सब केवल रूप का केवल, जग रूप का स्वरूप ऐसा ही जग के रूप से केवल, सो तो काल; सो तो काल के प्रमाण, सो जग के प्रमाण ही प्रमाण अब जग का केवल रूप सब परोपकार रूप से तो ज्ञान रूप फल रूप से तो जग केवल रूप से ज्ञान रूप ही फल व्यवहारिक रूप से ज्ञान रूप सब ज्ञान का 249