एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा को यह डर हुआ मन्त्रणा न प्रकट हो, इसलिये विश्वामित्रजी का समाधान किया कि फिर आवे, ऐसा ही हम यत्न कर लें, सब को साथ लेजाना उचित न हो सम्मति का काम था। राजा का मन वसिष्ठादिक सब से भर गया, ऐसा जान पड़ा धोखा खाया! राजा ऐसा कहे, फिर सोच-विचार के यह बात कही महाराज क्रोध मत करो तब तो राजा स्वरूप स्थिति विचार हुआ पर रूप तो ज्ञान मय ब्रह्म स्वरूप सब है, पर जो बात जीव रूपी जीव समझ कर कहें तब जीव ही से सम्बन्ध हो तब स्वरूप प्रकाश कैसे हो! जो रूप की बात सो रूप स्वरूप विकार किस को? पर रूप ही में बात हुई ब्रह्म को विकार क्या, पर जो बात रूप विकार कहा जाता है सो ब्रह्म स्वरूप में कुछ बना, या रूप नाम-रूप ही विकार नाम ठहरा, विकार तो था, स्वरूप में विकार का अभाव तो सब उपाधि से परे जान ले तब ही यह स्वरूप जान ले तब सब से छूटे कहा। राजा ऐसा कहे, तुम सब हो, राजा के कहने से जो यत्न कर लें, तब जो बात सम्पूर्ण प्रकाश में आवेगी सो जान लेवे सो ज्ञान जीव-भाव का था, राजा ने मन को वसिष्ठादिक में सब प्रकार दिया था, सो छूटा, विचार न भया! जो ज्ञान से सब से भर ले सो ज्ञान स्वरूप में स्थिर होता, पर अविद्या था निश्चय जो रूप समन्दर का किया भया, सो रूप जीव ही से विकार का जाना गया तब विकार रूप स्वरूप तो न भया पर जीव-भाव जान कर के सो विकार रूप को ज्ञान अविद्या हुआ सो क्या? पर जो ज्ञान विकार स्वरूप में ज्ञान रूप सो अविद्यादिक विकार से परे कर के ज्ञान स्वरूप में स्थिर हो तब तो जीव रूप छूटे कहा सब ही ज्ञान रूप--तो जो जीव रूप--उस बात से, सो सब ज्ञान रूप से ज्ञान स्वरूप न भया तो सब माया के वश में सब ज्ञान स्वरूप न प्रकाश हो उस माया को ज्ञान से परे जान माया न जान-विचार हो, न जान-भाव हो, सब रूप एक ही सा जान ज्ञान रूप हो सब ज्ञान स्वरूप प्रकाश का रूप हो, सब माया से परे हो ज्ञान प्रकाश सो क्या प्रकाश? जो ज्ञान रूप से सब को स्वरूप ब्रह्म रूप में जान लेवे निश्चय हो स्वरूप सो सब एक सा, सो माया स्वरूप को जान ले तो स्वरूप स्वरूप रूप से अलग रहेगा, जो सब ज्ञान से ज्ञान को जान ले तब, सो सब स्वरूप क्या? पर स्वरूप तो सब ज्ञान स्वरूप रूप से भिन्न है, जो स्वरूप स्थिर रूप स्थिति में स्थिर हो सो ज्ञान रूप सो सब कुछ मन के आधार पर है--सो तो सब वसिष्ठादि विकार है, पर सब वसिष्ठादि ज्ञान के--विचार से सब स्वरूप सब से अलग हो के ज्ञान रूप में हो कर स्वरूप स्थिति विचार किया सो स्वरूप सब मन से अलग कहा, पर जो जो भी वसिष्ठादि प्रकार सब माया रूप उपाधि सब को देख कर जो जो भी ज्ञान स्वरूप विकार रूप से स्वरूप में भिन्न है, ज्ञान स्वरूप सब स्वरूप स्वरूप अज्ञान से परे ज्ञान रूप से स्वरूप स्वरूप स्वरूप ज्ञान का ही रूप सब रूप में रूप भया, सो अविद्या रूप अविद्यादि सब सब सब ज्ञान से ही सब से परे भया, जो सब ज्ञान रूप भया सो सो सब ज्ञान से ही परे हो कर न जान रूप, सो ज्ञान का रूप था सब कुछ सब ज्ञान से परे हो जाता है, जब सब से अविद्या ज्ञान रूप तब सब उपाधि से परे ज्ञान-रूप भया, तब तो स्वरूप का ज्ञान रूप हो सो, तब सब अविद्या! सब से अलग हो; जब ज्ञान को स्वरूप कहा तब, सो अविद्या ज्ञान का रूप कहा जा सके, पर अविद्या ज्ञान सब सब ज्ञान से अलग रूप कहा, सो अविद्या रूप ज्ञान अविद्या स्वरूप से परे रूप ज्ञान रूप सब ज्ञान का स्वरूप सो अविद्या रूप से अलग सो ज्ञान के स्वरूप प्रकार से अज्ञान से ज्ञान से परे था स्वरूप का प्रकार स्वरूप सब का ज्ञान रूप भया सो रूप में ही, तब सब अविद्या! सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप सब ज्ञान 242