भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विश्लेषण का प्रयास कर रहे समस्त दार्शनिकों की जीवनव्यापी मानसिक या चेतना विषयक चेष्टा का सारभूत निष्कर्ष। पर बात तो तब बिगड़ती दी--जब इस अनिर्वचनीयता को--मन बुद्धि रूप दो चार मात्र तत्त्वों तक ही, या यों कह लें मानव मन या चेतनामात्र सिर्फ तक, ही या यों कहें सिर्फ व्यक्तिगत मानवमात्र के मन चेतना तक ही या यों कहे सिर्फ बुद्धि तक सीमित कर दिया जाता या मन बुद्धि मात्र तक उसे रखकर आत्मवान् पुरुषार्थ चेष्टा चेतना का जो तत्त्वबोध कराया था, उस पर तो पर्दादोष सिर्फ अज्ञानता का आरोपित कर ही अध्यात्मवाद को सिर्फ बुद्धिमात्र पर ही निर्भर अथवा चेतना या मनोभाव मात्र समझ लिया जाता या अध्यात्म विचारधारा को सिर्फ चेष्टा मात्र से जोड़ कर देखा जाता, पर ऐसा कहीं नहीं था, बल्कि उन्होंने चेष्टा का साक्षात्कार चेतना के मूल रूप से किया और चेष्टा के मूल भाव स्वरूप, या मनोभावों रूप मूल भावों से जो चेतना का रूप था या मूल चेतनान्तर्गत जो समस्त चेष्टा, या मूल भाव से चेष्टा, या मूल चेष्टा रूप भाव चेतनान्तर्गत जो समस्त चेतना थी उसकी या विधाता के मूल द्वन्द्व--अद्वन्द्व चेतना रूप भाव, जिस से सर्व सृष्टि का रूप, जिस से समस्त जग का रूप, जिस से समस्त जग की, जिस से समस्त जग के, जिस से जग जीवों मात्र तथा इस जग नियन्ता चेतना का रूप था उस, के ही साथ जोड़ कर इस जीवन चेष्टा को मूल चेतना रूप साक्षात्कार से ही जोड़ा था और उस दैव रूप परम साक्षात्कार चेष्टा चेष्टा स्वरूप दिव्य चेष्टा स्वरूप न हो करके सिर्फ मन चेष्टा, सिर्फ बुद्धिमात्र उस चेष्टा को चेष्टा ही समझ कर उस मन अथवा बुद्धिगत समस्त चेष्टा को चेष्टा ही मान चेष्टा-कर्म में? ऐसी दार्शनिक चेतना द्वारा स्पष्ट कर दिया था, जिससे चेष्टा के मूल का ज्ञान हो सके या, दार्शनिक व्याख्या के अन्तर्गत सिर्फ चेष्टा कर्ममात्र सिर्फ दार्शनिक विचारणा सीमित, व्यक्तिगत विचार, व्यक्तिगत चेष्टा ही सीमित तक होकर रह गई दार्शनिक रूप बन कर न व्यक्तिगत विचारणा तक उस रूप में न केवल सीमित हो जाय या, वो मानव को व्यक्तिगत ही रूप का दर्शन कराकर मानव चेतना को न सिर्फ सीमित करके सीमित कर दे बल्कि चेष्टा रूप को, जिस रूप चेष्टा का विधाता स्वरूप उस चेष्टा रूप जग रूप में सब जगह सब काल में दिखाई दे रहा अथवा हो सकता प्रकृतिगत चेष्टा अथवा चेष्टा के ही साथ सदा सदा एकत्व रूप लिए हुए भाव से चेष्टा का नित्य सम्बन्ध सम्बन्धित हो कर रूप लिए हुए दृश्य रूप में समस्त जगतव्यापी रूप से दृष्टिगोचर स्वरूप हो रहा ऐसी दिव्य चेष्ट, उस चेष्टा का ज्ञान मानव चेतना विचार द्वारा पर जब जग की इस चेष्टा चेष्टा के विराट् रूप चेष्टा को सिर्फ व्यक्तिगत चेष्टा मात्र तक सीमित समझकर या उस रूप में स्वीकार कर ही उस चेष्टा रूप को, उस चेष्टा के मूल विराट् स्वरूप को विस्मृत ही कर दिया गया तो उस रूप को, उस चेष्टा के दिव्य स्वरूप को उस चेष्टा के रूप को, उस परम चेष्टा रूप भाव को विस्मृत कर उस चेष्टा को सिर्फ चेष्टा ही माना गया तो सच, जिस को जग विस्मृत करता हुआ चेतना के रूप को विस्मृत... ही नहीं करता पर वो विस्मृत करता जा रहा था उस मूल को जिसका रूप चेष्टा रूप में सर्वदा साक्षात्कार स्वरूप ही चेष्टा का विस्तार लिए हुए सर्वदा गतिशील रहता हुआ ही तो दृश्यमान है उस विराट् चेतनामय चेष्टा रूप सर्वव्यापी दिव्य चेष्टा स्वरूप के रूप में चेष्टा, जो जग का रूप बना सिर्फ या व्यक्तिगत रूप चेष्टा तक ही चेष्टा व्यक्तिगत के स्वरूप तक सीमित होकर रही, जिसे समझ कर ही तो मानव ने भी चेष्टा रूप, उस चेष्टा को सिर्फ जड़ चेष्टा रूप, चेष्टा के दिव्य भाव चेष्टा रूप से अलग कर के जो रूप बना लिया था या मान लिया था, उस रूप चेष्टा भाव रूप से विलग जो रूप किया गया? जिसने कि आगे चल कर मानवीय चेष्टा सम्बन्धी, व्यक्तिगत ही, चेष्टा ही, व्यक्तिगत रूप चेष्टा चेष्टा रूप होकर रह गई या संकीर्ण बन गई ; जिस से उसका स्वरूप? एक चेष्टा को, उस चेष्ट को जो इस जग, दार्शनिक या चेष्टा रूप दिव्य रूप जग का रूप चेतना स्वरूप था, उस से सम्बन्धित चेष्टा रूप, जग-रूप चेष्टा स्वरूप से अलग, उस दैव चेष्टा साक्षात्कार से अलग ही सिद्ध किया गया, जो चेतना रूप चेष्टा चेतना का रूप था उस चेष्टा से अलग हो? जिस रूप का परिणाम था, वो जग चेतना रूप लिए हुए उस चेतना 243