एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभिमान बड़ा था, इतना विशाल वपु था, इन्द्रजीत जैसा सुभट जिसका पुत्र था। किन्तु इस सबके होते हुए जिस प्रकार एक ही क्षण में वह सब नश्वर होकर उस महारथी का विनाश कर सकता था उसी तरह सब कुछ देखकर भी गान्धारी समझती थी, कि दुर्योधन का बड़ा भारी नाश होने वाला है। उसकी समझ, सब व्यर्थ सिद्ध होकर विवश होकर अपने नेत्रों द्वारा पश्चात्तापमय अश्रु ही बहा सकती थी। गान्धारी का शोक उस समय का था जब उसका ज्येष्ठ सुपुत्र दुर्योधन--जिस पर उसे बड़ा ही गर्व था। वह जब रणक्षेत्र में जाने लगा तो उस समय उसने अपने पुत्र को किस प्रकार से क्या कह कर विदा किया संसार रूपी नाटक-रंगमंच पर यह सब जो कुछ कौतूहल प्रदर्शित होता है, वह सब एक मायावी जादूगर के हाथ की कठपुतली रूपी-नाट्य मात्र है। किसी पर कोई गर्व कैसा, क्षणभंगुर संसार, क्षणभंगुर काया, सब कुछ एक क्षण में नष्ट भ्रष्ट हो जाने वाला है। फिर भी यह सब देख कर, मानव इस पर गर्व कर बैठता है। जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं उस पर वह अपना हक समझने लगता है, यह भी उसकी भूल ही है। मोह और अज्ञानता ही इसका मूल कारण है। उसने कहा, वत्स ! यह युद्ध धर्म और अधर्म का संग्राम है। अतएव धर्म की जय होगी तू अधर्म पथ पर चल रहा है, इसलिए तेरी ही पराजय होगी और धर्म की ध्वजा लहराने वालों की ही जय होगी। तूने क्या कभी सोचा है? कि जन्म--मृत्यु किसके वश में है, यह, सब, विधाता का खेल है। हम तो मात्र रंग मंच के पात्र हैं? तू, उस दिन तो भगवान् कृष्ण का बड़ा भारी अपमान कर बैठा था। वत्स, तू तो बड़ा हठी है? उस समय-समय, तू ने उस भगवान्, जो कि न्यायाधीश, न्यायकर्ता देवता, तथा इस समस्त सृष्टि का जो कर्ता-धर्ता एवं स्वामी है--उस का तो मान-मर्दन किया? क्या तू उन्हें अपने जैसा ही समझता? क्या वह एक-साधारण मानव हैं? वे तो त्रिलोकी के स्वामी हैं? उनका नाम ही तो संसार में सबसे बड़ा! उनका तो स्मरण ही भव सागर पार-- उतारने वाला एक मात्र साधन है। जिस पर वे प्रसन्न होकर कृपा कर दें उसके जैसा दूसरा कोई नहीं रहता। संसार के सर्वशक्तिमान् कहे जाने वाले भी, उनके सामने हाथ जोड़े नतमस्तक हो, उनके चरण कमलों को स्पर्श कर, अपने दोनों हाथों को फैलाकर वरदान माँगते हैं। उनका ध्यान करने मात्र से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तो फिर, तूने तो उनका अपमान किया। गांधारी का हृदय इस समय ममता रूपी धारा में बहने लगा था। वह अपने दुर्योधन रूपी पुत्र का ध्यान इस प्रकार से कर रही थी मानो अपने प्राणों से प्यारे पुत्र को कोई संकट न आवे। वह अपने हृदय पर पत्थर रखकर अपने पुत्र के दुर्गुणों को देखकर भी, अनदेखा कर, अपने पातिव्रत धर्म का प्रभाव डालना चाहती थी। वह जानती थी कि दुर्योधन अवश्य पराजित होगा, पर एक माँ का हृदय ममता के वशीभूत होकर अपने पुत्र को बचाने का कोई उपाय तो अवश्य करेगा ही। इसलिए उसने दुर्योधन को आज नग्न होकर आने को कहा था, जिससे कि उसका शरीर वज्र का बन सके। वह अपने इस पातिव्रत प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं थी, पर दुर्योधन ने उसकी आज्ञा का पूर्ण पालन नहीं किया। उसने अपनी जंघाओं पर वस्त्र लपेट रखे थे। जिसके कारण उसका सारा शरीर तो वज्र का बन गया पर जंघाएँ न बन सकीं। जब गान्धारी ने यह देखा, तो वह फूट-फूट कर रो पड़ी और बोली--“वत्स ! तूने यह क्या किया? तूने तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। तूने मेरी बात न मानी, जिसका फल तुझे भोगना ही पड़ेगा। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता। तूने भगवान् श्रीकृष्ण का अपमान किया, संतों का अनादर किया, धर्म का मार्ग छोड़ दिया, अब तू उस भगवान् की शरण में जा। शायद वे ही तेरी रक्षा कर सकें। गान्धारी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और दुर्योधन लज्जित होकर खड़ा था। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।” गांधारी ने, जो न देख
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