एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाज का वर्तमान रूप चाहे जो भी हो, पर इसमें परिवर्तन आ-- सकताहै। इसके दो उपाय सर्वथा संभव दिखाई देते पहला तो यही जन-बल जाग उठे, पर सरकार तो इस जागरण का सिर ही तोड़ डालने के लिए सदा कटिबद्ध ही रही है। और यदि जन बल सिर न उठा सके तो कोई ऐसा महा पुरुष या दल या संस्था हो, जो कि वर्तमान शासन के स्थान पर ऐसा जन- तंत्र बना, देसके! जो न्याय के आधारपर संगठित हो जिसमें हर एक व्यक्ति की ही रक्षा नहीं वरन्, हर एक के तन का ही सुख न हो वरन्, जन-बल के जागरण द्वारा ही सब काम हों। इसे चाहें तो समाज वा समाज का नया संगठन कहसकते हैं, क्योंकि इस परिवर्तनशीलता में नया जीवन विकसित हो, इसका पता परिवर्तनशीलता खुद देगी कुछ लोग मत या धर्म के द्वारा इस काम को पूरा करना, तो असम्भव ही नहीं वरन् हर प्रकारसे हानिकारक ही नहीं वरन् समय को व्यर्थ खोना भी समझते हैं, वे भी इस बातपर सहमत हो रहे हैं, कि वर्तमान समाज व्यवस्था केवल आर्थिक आधार पर ही टिक सकती है; वर्तमान युग में हर एक व्यक्ति को हर तरहसे उपयोगी व सुखी बनाने की राह केवल यही है। यदि समाज को ही ले, तो समाजमें हर प्रकार का काम हर मनुष्य करे। मनुष्य के श्रम का मोल न हो वरन् यह बात हो, प्रत्येक को, आवश्यकता के, अनुसार मिले, तथा सब, हर एक काम को अपना ही काम समझकर काम करने में सुखका अनुभव करें। हर बात पर हर एक का हक हो; सब की बात पर सब का अधिकार हो; मत या विचार का आधार न धर्मपर ही हो न वर्तमान ढर्रे पर ही वरन् उस स्वतंत्र बुद्धिपर आधारित हो जो कि हर मनुष्यको दूसरे के प्रति निष्ठावान बना कर सब काम करने की क्षमता और स्वतंत्रता प्रदान करती है। समाज में आज तक यही होता आया है समाजमें किसी न किसी तरह का मतभेद पैदा करने की चेष्टा की गई। कभी रूपका आधार लेकर व रंगका आधार ले कर ऊँच नीच तथा छोटा बड़ा भाव पैदा किया गया, कभी धर्म का आधार ले कर नया झगड़ा खड़ा नहीं किया गया? साधारण जनके ही हित का ढोंग रचकर उनके स्वत्वों का कब हनन नहींकियागया? समाज आज तक जैसा बना हुआ था, वास्तवमें वैसा न होकर स्वतंत्र रूपमें आज तक मनुष्य को न पहचानसका क्योंकि मनुष्य सब एक, सब समान पैदा हुए हैं, इस बात को मनुष्य कभी जान ही नहींसका। समाज सदा ऐसा ही रहा है। समाजके किसी अंगको यदि कोई आघात पहुंचाता रहा हैतो संपूर्ण समाज व्यथित हो, इसका नाम समाज है, यही समाज का एक रूप हो सकता है। यह रूप बन सके इसके लिए सबसे पहले वर्तमान समाजको नष्ट करना होगा, जो कि सब का सब सड़ा हुआ है। इस व्यवस्था, का संहारकही नया जीवन, प्रदान कर सकता है। इस समाज को नष्ट कर, ही हर प्रकारके रोग दूर होसकते हैं। पर यह सब, जो कि सब कुछ समझने के कारण समाज सुधारक कहलाने का दम तो भरते हैं। पर किसी तरह भी समाजको इस सड़े हुए ढांचेको बदलने का जरा भी यत्न नहीं करते। केवल व्यवस्था बदलना कोई बात नहीं, यह काम तो नया जीवन चाहते ही स्वयंमेव पूरा हो जाय इसमें दो राय नहीं होसकती। इसलिए वर्तमान समाज रचना केवल शोषण प्रधान, मानव विरोधी भावना मात्रपर ही टिकती, नजर आ रही किसी बातमें कोई न, नया जीवन लाने का नया रास्ता निकलता न देख, विभिन्न विचारकों अथवा मत वादी प्रचारकों द्वारा जो विचार पेश किये जाते, उनसे समाज सुधार की आशा करना व्यर्थ जान पड़ता है। समाज व्यवस्था स्वतः नष्ट हो कर नया रूप धारण कर सकेगी या नहीं यह भविष्य के गर्तमें पड़ा हुआ ऐसा प्रश्न होगा, जिस पर हर एक विचार करने को बाध्य होना पड़ेगा। पर यह बात अवश्य विचार करने की योग्य है, कि समय के साथ जो परिवर्तन आताहै उसका रूप क्या हो सकता है। इसपर विचार करने की आज बहुत ही आवश्यकता मालूम हो रही... ! आज तक जो मत या विचार इस बात--विशेष का हल न कर सके समाजके हित--अहित के आधारपर उनका संगठन किया गया न जा कर के रूप में न होकर रह जाता है, तो सब व्यर्थ... ।
241