एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंविषयाशक्त होकर जो आत्मज्ञान को ना जानकर केवल आ--काश की तरफ देखता, केवल सो जाता रहता, केवल सो कर उठकर शौच मुख प्रक्षालनादिक क्रियाओं निमित्त इधर उधर जाता आता हुआ रहता तथापि उस आत्मा को एक क्षण भी विचारता ना, सो किसका भला करता? अपना भला? कैसा भला कि जब कि वह वृथा खोवेगा? तब किस प्रकार इस नर देह के अवसर को पाकर अपना कल्याण कर ही सकेगा। विषयभोग तो यह केवल अविद्या, कर्म या पुद्गल कर्म जनित सुख जान कर जो इन विषयभोग रूप, महामोहरूपी तम निवारक इस ज्ञान नेत्र को केवल विषय वासना रूप अंध कर खो बैठा सो कैसे भला, क्योंकि जो इस प्रकार खोवे उसको तो सब कोई अंधा ही, पर जो यह नर देह जीवात्मा पुण्यात्मा पाकर उस भव-जल पार कर लेता वह सब इस अवसर को पाकर न केवल अपने को ही तारेगा वरन अन्य जन्म-जन्मांतरों के पापकर्मों को भी भस्म करने समर्थ होगा। सो जीवात्मा केवल इस प्रकार संसार के मिथ्या बंधनों को यदि बांध लेता, पश्चात्ताप की अग्नि हृदय मध्य प्रज्वलित न होने देता, और आत्मा में न रमता, उस पुरुष के इस संसार रूप अंध कूप में गिरे, बिना पश्चात्ताप के कौन निकाले? वह ज्ञान नेत्रहीन, इस संसार महाभयानक कूप में गिरता-पड़ता हुआ सब ही समय इस प्रकार अपने समय को वृथा ही ना खोता वरन सब ही नर देह के अवसर पाकर उस परम पद को प्राप्त करने वाले उत्तम पुरुषार्थ को करता। इस प्रकार ज्ञानीजन विचार कर के अज्ञानांध होकर इस विषय रूप कूप मध्य पड़े हुए जन को जो कि काम-क्रोध, अहंकार-ममकार, राग-द्वेषादिक इस प्रकार इन अज्ञानियों के अज्ञान भावों को देख कर परम ज्ञानी पुरुष भी महादोषी जन जानकर इन मिथ्या ज्ञान को धारण कर स्वयं तो न बंधे पर इस प्रकार सर्व समय ही, जब तक आत्मा अविनाशी परमात्मा को प्राप्त ना होवे तब तक ही, उस पद हेतु निरंतर ध्यान रूप साधन में रत व केवल आत्म-साधना ही कर निज स्वरूप साक्षात जानेगा। इस प्रकार जो ज्ञान ही, परमात्म, परमतत्त्वानुशीलन हेतु साधन रूप जानकर, ज्ञान-चक्षु द्वारा निज स्वरूप को देखते हैं, उन भव्य जन का संसार ही निष्प्रयोजन हो गया, फिर उनको तो ना ही कर्म जनित सुख की ही चाह, ना ही राग, ना द्वेष उन को केवल व केवल परम पद से, सब ओर से उदासीनादि भावों सहित रहते हुए, उस पद को प्राप्त हो जाता। ज्ञान के इस रूप को जानकर परम तत्व का ध्यान करने वाले जन को केवल सब प्रकार राग द्वेष आदि से विरक्त होकर केवल उस परमात्म स्वरूप का ज्ञान करना ही निज आत्मा का मुख्य कर्तव्य जानकर, उस ज्ञान स्वरूप नित्य आत्म पद को प्राप्त करना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ, मद आदि षड् रिपु रूपी काम कौन करता? इन ही रिपु रूपी महा दुर्धर बंधनों को जो जन ज्ञान रूपी तलवार द्वारा काट देता है सो ही उस परमात्मा के यथार्थ रूप को! ना कि सब प्रकार अज्ञान जन समान अन्य, जो ज्ञान के परम रहस्य को न जानते हुए भी अज्ञानी ही रहते हैं? सो जीवात्मा को सब ओर चित्त को स्थिर कर, महाशून्य या परम पद परमात्मा नित्य रूप ध्यान करना चाहिए जो कि इस भव-जल रूप संसार के सर्व पाप कर्मों को नष्ट कर देने वाला व केवल आत्मा को निज ज्ञान रूप में स्थिर कर सब ओर से मुक्ति, सब ओर से परम सुख को दे, सो सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त कर भव-जल से पार निकल कर सर्व प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर निज परमानंद के प्रकाश रूप में ही अवस्थित होना चाहिए व वही, सो अपने को उस रूप में लीन होना अति आवश्यक जानकर केवल निज आत्मा का ही ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार जो अज्ञान के नष्ट हो जाने पर अपने आप में लीन, उस स्वरूप व अखंड परम ज्योति स्वरूप परमात्म को प्राप्त कर, सब से अलग होकर निज स्वरूप पद को प्राप्त कर ही लिया जाता है। अतः जीवात्मा को परमात्मा का ध्यान सब ओर एकाग्र होकर ही करना व योग्य, सो जीवात्मा ऐसा रूप होगा? फिर तो वह परमात्मा रूप ही बनकर सब रूपी माया को निवारक होगा? उस परम शांत स्वरूप होगा? तब ही यह जीव अपने स्वरूप को पावे। 252