भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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गायकवृन्द गाते व बजातेथे कि, महाप्रभुजी परिकरों सहित लीला में पधारे। इसके बाद सब लोग रोने लगे। समस्त ब्रजवासी एकत्र हो दर्शन करने पधारे। नन्दजी रोते हुए कहने लगे कि बेटा कृष्ण तूने कहाँ गमन किया? क्या किसी नेतुझे डाँटा, या कोई कष्ट दिया, या भैया, यह जानकर कि नंदबाबा तो बूढे हैं इसलिये अब मथुरा चलना चाहिये तथा तूने तो विचार किया होगा कि नंद बाबा बूढे हैं, इनसे तो कुछ बनेगा नहीं तथा इसीलिये तूने यह निश्चय किया। नंद रोने लगे, यशोदाजी रोने लगीं तथा रोते रोते रो पड़ीं, उस समय सबलोग भी रोने लगे। इसके अनन्तर श्री महाप्रभुजी ने, अपने निज स्वरूप द्वारा, ब्रजमंडल लीला का रस दान दिया... ॥ जब श्रीकृष्ण बलरामजी को लेकर अक्रूरजी रथ पर बैठाकर चले तो गोपियों ने आकर अक्रूरजी का रथ रोक लिया कि आप कौन हो? यह हमारा लाल तो नंद यशोदा का बालक होकर आया है। तुम कौन होते हो ले जानेवाले। हम तो जाने नहीं देंगी। तब श्री बलरामजी ने गोपियों को समझाया कि तुम जाने दो। हमारे जानेके बाद नन्द यशोदा भी पीछे-पीछे आ ही रहे हैं। तुम सबको हम साथ ले चलेंगे। जब ब्रज मंडल से मथुरा तक का पक्की सड़क मार्ग ही बन गया तब श्रीकृष्ण की ओर देखकर गोपी कहने लगी कि आप अपने पिता नन्दजी से भी बड़े हो गये क्या जो हम सब छोड़कर तुम्हारे साथ चलेंगी? हम तो नन्द बाबा के साथ जायेंगी? तब श्रीकृष्ण ने कहा, ठीक है। तब गोपियों ने श्रीकृष्ण से कहा, हम सब लोग जब तक नन्द यशोदा नहीं आयेंगे तब तक यहाँ पर ही रहेंगी। हम सब लोग आपके साथ मथुरा में कभी न जायेंगी। हमलोग तो नन्द यशोदा के साथ ही रहेंगी। इस प्रकार मथुरा की ओर रथ लेकर अक्रूरजी चले। अक्रूरजी ने जब कृष्ण बलरामजी की ओर देखा तथा इस बात का विचार करने लगे कि मथुरा में कंस तो बहुत बलवान् है। यह बालक क्या लड़ेंगे? इन बालकों का कोमल शरीर देखकर कंस कैसे दया करेगा या मारेगा अथवा जीतेगा? अक्रूरजी को सन्देह हुआ। जब रथ यमुना तट पर पहुँचा, तब अक्रूरजी ने मन में विचार किया कि संध्या वन्दन का समय हुआ है। अतएव यमुना जल में स्नान करके संध्या वन्दन करू तो क्या होगा? इस प्रकार विचार कर अक्रूर जी रथ से उतरकर यमुना जल में गये। स्नान करके जैसे ही ही जल में डुबकी लगाई, वैसेही जल में कृष्ण और बलराम को देखा। अक्रूरजी घबराकर जल से बाहर निकल आये, देखा कि दोनों भाई तो रथपर बैठे हैं। अक्रूरजी को आश्चर्य हुआ कि दोनों जल में हैं या रथ में हैं। जब अक्रूर जी ने मन में सन्देह किया तो तुरन्त अक्रूरजी को जल में भी चतुर्भुज रूप में एवं रथ में भी चतुर्भुज रूप में दर्शन दिया। फिर अक्रूर जी ने जल में शेषशायी रूप का दर्शन किया। दर्शन करके जब अक्रूरजी जल से बाहर निकले, देखा कि दोनों रथ पर सामान्य रूप से बैठे हैं। अक्रूरजी ने मनमें विचार किया कि अवश्य ही यह कोई भगवान् का अवतार है। कोई साधारण मनुष्य नहीं है। अक्रूरजी हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। तब श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से पूछा कि चाचाजी आपने जल में कोई अचरज देखा है क्या? इस पर अक्रूरजी ने कहा कि प्रभु जो कुछ आश्चर्य है वह सब आपमें ही है। आश्चर्य भरा संसार आप में ही है। तब अक्रूरजी ने अक्रूर घाट पर श्रीकृष्ण एवं बलराम की अनेक स्तुति की। अक्रूरजी को मुक्ति हुई। इसके अनन्तर श्रीकृष्ण बलराम मथुरा में पहुँचे। मथुरा पहुँचकर रजक, दर्जी, कुब्जा आदि का उद्धार किया। कंस के कुवलयापीड, चाणूर, मुष्टिक, कंसआदि का वध करके अपने माता-पिता को मुक्त कराया? जब कंस का वध, तब कंस की दो पत्नियां थीं? एक अस्ति और एक प्राप्ति उनका नाम क्या? एक अस्ति का नाम, एक का, प्राप्ति नाम था? इन दोनों का पति मरा कहा कि? हम दोनों विधवा हो गईं! वह अपने पिता के पास, मगध में अपने पिता के पास जाकर कहने लगीं कि हमारे पिता के जीवित रहते हुए हमारा पति मर गया तो क्या फायदा हुआ? जरासन्ध कहने लगा कि कंस मारा गया कंस पक्षी जितने थे सब मारे गये तब हम क्या करेंगे, तब उसने कहा कि हम जरासंध... ने सेना सब को लेकर चढ़ाई किया तो कृष्ण सब सेना मार भगाया फिर वह लौट कर गया, फिर सेना एकत्र कर के ले आया। वह, इस प्रकार सत्रह सेनापति को लेकर आया, वह सत्रह सौ अक्षौहिणी की सेना लेकर गया था सेना मरा, तब सत्रह अक्षौहिणी की सेना को न केवल एकबार समाप्त किया, इस बार सत्रह सौ अक्षौहिणी सेना को सेना सहित जरासंध मरा तब भगवान् द्वारिका चले गये और जरासंध द्वारिका गया सब कुछ द्वारिका में जला कर भस्म कर दिया तब रुक्मणी के साथ विवाह कर के सेना सहित मथुरा वापस आ गये इस प्रकार से जरासंध का नाश करके भगवान् द्वारिकाधीश कहलाये। 253