एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिकालज्ञ भगवान् सर्वज्ञ को यह प्रत्यक्ष ज्ञात होता रहता कि भरतक्षेत्र का अमुक जीव अमुक नामावाला या अमुक जीव का जीव अमुक पर्याय को छोड़ अमुक पर्याय को प्राप्त होने वाला आगामी तीर्थंकर, प्रत्येक बुद्ध अथवा चक्रेश होने वाला है। इस प्रकार जो जीव जिस पर्याय को प्राप्त होने वाला है, उस जीव तथा उस पर्याय सम्बन्धी जानकारी को जो ज्ञान जानता या कर सकता, सो उस सर्वज्ञ विशेष का ज्ञान है, सर्वज्ञ विशेष का ज्ञान सर्व सामान्य ज्ञानस्वरूप आत्मा को ही जानता है, सो मानना नितान्त मिथ्या ही जानना, जो कि सब को भली भांति समझ में आवेगा। इस कथन का यह भी सार समझना योग्य है कि भव्य जीव, मिथ्या दृष्टि; इन दोनों का जैसा स्वरूप जिनागमों में कहा सो सर्व को सम्यक्त्व लाभ का कारण हो सकता है। अन्यथा इन दोनोंस्वरूपों सम्बन्धी जिनागम का कथन ही सब व्यर्थ हो जावे, सो तो जैन मत रूपी सत्य धर्म का कभी भी नहीं हो सके अतः जिनागम का प्रमाण--वचन प्रमाण! इस व्याख्यान का विचारवानोंको यत्न से मन लगाकरविचारनाचाहिये कि इस में शंका योग्य कोई बात नहीं दिखती सो प्रथम कथन का जो अभिप्राय कहा सो ठीक समझ पड़ा? अथवा ऐसा कथन भी जिनागमों विरूद्ध समझ पड़ा अथवा ज्ञान स्वरूप का स्वरूप इस कथन द्वारा कुछ भी निश्चय हो सका कि नहीं ऐसा निश्चय मन द्वारा करो। अथवा जो कथन जिनागमों का इन दोनों शब्द द्वारा कहा गया सो ठीक? या मिथ्या स्वरूप भी इस कथन का माना जावेगा? सो भी विचारवान् पुरुष जिनागम मन्त्र को यथार्थ भाव से समझ जिनागम को सत्य जानकर जिनागमों का जो कथन सो सब ही सर्वज्ञकथित ही हो सकता अतः, सर्वज्ञकथित होने, सो मिथ्या हो सकेगा? इस बात को विचारवान् ही यत्न द्वारा समझ कि जिनागमों का कथन मिथ्या, या इस कथन रूप? ऐसा जो मन में मान कर इन दो शब्दों का जो जिनागम का मत है, सो तो सर्व जिनागम मत का त्याग ही करना है, इस प्रकार जो जैन सम्बन्धी सब मत रूपी ज्ञान स्वरूप को समझ कर ही मन द्वारा निश्चय कर इन दो शब्दों का यथार्थ भाव समझ में आवे? सर्वज्ञ ज्ञान सर्वव्यापकता को लिये हुए--इस सर्वव्यापकता ज्ञानस्वरूपका विचार जब आत्मस्वरूपों को ही इन दोनों शब्दों द्वारा निश्चयकरेगा, सो ही समझ में सर्वज्ञ स्वरूप का भी लाभ हो सके, सो उस जन द्वारा दोनों शब्द रूप इन दो अर्थ ज्ञान रूप लाभ प्राप्त हो सके। ऐसा ज्ञान सर्वज्ञस्वरूप को समझाने का सर्वज्ञता स्वरूप का मुख्य ज्ञानस्वरूप ही इन दोनोंशब्दों द्वारा ही समझ में सर्वज्ञता को ही कथन कर सर्वज्ञता सम्बन्धी हो सके! अतः विचारवान् पुरुषों को सर्व इन दोस्वरूपों का लाभ प्राप्त समझना ही चाहिये इस बात को यत्न समझकर जिनागम सम्बन्धी सर्व ज्ञान लाभ प्राप्त करना ही कर्त्तव्य है। ज्ञान लाभ सम्बन्धी जो विचार सब पुरुषों द्वारा किया जाता सो तो जिनागम का कथन समझ कर ही किया जाना चाहिये सो उस जिनागम रूप ज्ञान द्वारा, सब जीवों को ज्ञान स्वरूप लाभ का यत्न करना योग्य व उचित। इन दोनों शब्द का जैसा जैसा स्वरूप इन दो शब्दों द्वारा कहा गया सो तो सर्व जगत पूज्य भगवान् सर्वज्ञ द्वारा ही स्वरूप कहा गया समझ, सो सच्चा यथार्थ कहा गया इन दो स्वरूपों को समझ कर सर्व जन को सुख लाभ ही उत्पन्न होगा। भव्य जीव का स्वरूप या मिथ्या का स्वरूप जब सर्व जन सर्वज्ञ के द्वारा समझकर उस को यत्न से मन द्वारा मन में लेवे, तो उस के मन का भ्रम, जो इन दोस्वरूपों ज्ञान या सर्व-ज्ञान रूप में उत्पन्न हो रहा था। सो सब मिटकर, सत्य ज्ञान व सर्वज्ञ स्वरूप ज्ञान उस को प्राप्त हो? अथवा इन दोनों का यथार्थ स्वरूप नहीं? अथवा ज्ञान स्वरूप का लाभ हो? ज्ञान सर्वज्ञता का होगा? अथवा भव्य जीव का ज्ञान स्वरूप मन को सम्यक्त्व का लाभ दे सके कि इस प्रकार निश्चय कर यत्न करना चाहिये, ज्ञान द्वारा ही जो अज्ञानता का क्षय करना योग्य माना सो अज्ञानता स्वरूप इन दो शब्द द्वारा सर्व-भ्रम का क्षय रूप जानना सो, इन सब बातों विचार से सर्व मन को लाभ प्राप्त हो सर्वज्ञता स्वरूप ज्ञान सब को इस प्रकार प्राप्त हो सो जिनागम स्वरूप समझना योग्य है, सो प्रत्येक जन को ऐसा ज्ञान लाभ प्राप्त करनेको सब जिनागम मत का विचार करना उचित। ऊपर के लिखे का मन में सब प्रकार से जो जन मन को लगा कर जो विचार करे सो भव्य, सो सर्व का सार रूप हो जावे, सो सब अज्ञानता रूप जो सन्-देह रूप था मिटकर सब लाभ प्राप्तहो। 239