एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब हम यह जान गये और मान भी, तो यह प्रश्न उठता है, बिना जाने भी क्या काम चला सकता है? तो उत्तर यह ही हो सकता है? नहीं! जब तक आप किसी वस्तु को पूरी तरह से, या यथार्थ रूप से नहीं जान लेते तब तक उस वस्तु से आप अपना अभीष्ट या प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकते। तो फिर हे मानव, तूने यह जीवन, जो संसार के इतिहास का आज तक का सब से बड़ा वरदान मनुष्य को मिला है? तो क्या परमात्मा से कभी पूछा-जाना? अपने ही मन से कभी भी तो पूछा होता कभी, अपने भीतर झांक कर तो देखा होता कभी निष्पक्ष होकर, कि जो कुछ मैंने अभी तक किया या कर रहा हूँ क्या वही सब कुछ है? क्या इसी के लिए मैं इस जगत में आया था कि खूब खाया पीया और सो गया और...? जिसे तुम यश, मान और धन कहते हो क्या कभी सोचा इन सब से, किसी तरह अपने वास्तविक या आध्यात्मिक को जोड़ा है? या फिर सब कुछ व्यर्थ नष्ट किया जा रहा है? यथार्थ ज्ञान न होने से मनुष्य सदा से ही भ्रमों और वहमों-वश सब कुछ विपरीत ही समझता आ रहा है, जिसे हम अपना समझ कर जीवन-भर के लिए अपना मान कर बैठे हैं? क्या यथार्थ में वह अपना है? जरा सोचो तो, जिस शरीर को, अपना समझ कर श्रृंगारते रहते हो क्या कभी सोचा, अन्त समय इसका क्या होगा? सम्भवतः चिन्ताग्रस्त ही जीवन समाप्त होगा? तो हे जन सुनो, आज के भयानक जीवन से यदि बचना चाहते हो तो भगवान् की शरण लो। सब कुछ उनके हाथ सौंप कर निश्चिन्त रहो, ईश्वर की, ज्ञान- गंगा में, ज्ञान में, भक्तियोग में, कर्म-योग में, राजयोग में, ध्यान-योग द्वारा स्नान करो, संन्यासी, त्यागी, बन कर, इस भव से तर जाओ, परमात्मा के नाम की महिमा जानते भी हो या नहीं? जो परमात्मा सब जीवों का जनक सब का कल्याण करने वाला है, उसके सामने सब लोग एक जैसे हैं। सब ही उस भगवान् के अंश हैं, अतः आपस में लड़ाई और नफ़रत को छोड़ कर प्रेम का भाव पैदा करो, मानवता क्या संदेश देती है? सब जीवों पर दया करो, जो कुछ दिया है उस प्रभु का दिया हुआ समझ कर प्रभु चरणों में सब कुछ अर्पण, सदा प्रभु स्मरण का ध्यान रखते ही सब कार्य पूरा करो, फिर देखो मुक्ति है? हे मानव तू जो भगवान् को भूल कर दिन-रात संसार के मोह-माया में लिप्त रहेगा, तो यह समय समाप्त हो ही तो जाएगा ही सो क्या कभी सोचा इस बात को फिर यह भवसागर से पार कैसे होगा? अतः भगवान् की भक्ति कर शरण में आ जाओ तब सब तरह का भय मिट जाएगा। परमात्मा की शरण में आने के बाद ही जीव निर्भय हो सकता है। क्योंकि जिस परमात्मा ने संसार को रचा उस परमात्मा से परे कोई शक्ति नहीं हो सकती, इसलिए संसार रूपी इस माया-मोह वाले भव-सागर से केवल प्रभु ही पार कर सकते हैं। सब कुछ परमात्मा का ही दिया, भगवान् ही हमें सबल बनाकर सब कार्य पूर्ण करा रहे हैं ऐसा ध्यान में सदा रहे, सब का कल्याण चाहो। क्या तू ही सब कुछ है? जो करेगा परमात्मा ही तो कर रहा है सब, फिर तू क्यों अहंकार करता है? तू तो उस प्रभु का बनाया हुआ खिलौना मात्र, जो सब परमात्मा की इच्छा पर है? हे मानव ... आज ही चेत जा, नहीं तो कल पछताना पड़ेगा। इस तरह समय, आयु सब समाप्त हो जाएगा और फिर नरक भोगना पड़ेगा। इस लिए तू अपनी समस्त वासनाएं त्याग कर प्रभु का नाम स्मरण कर मुक्ति पद को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त कर। परमात्मा ही तो केवल एक शक्ति तथा परम पिता परमात्मा रूप से ही सृष्टि की रचना करता और चलाता फिर उसी में सब को समाना ही सर्वशक्तिमान् है, विचारशील तू भी उस रब के भय से डर और अपने मन को शुद्ध कर जो प्रभु के आदेश हैं उसका ही तू अनुकरण, जिस प्रकार पिता अपनी सन्तान से प्रेम करता है उस तरह से, भगवान् भी सन्तान के समान ही भक्तजनों को प्यार कर अपने गले से लगा लेता अथवा गोद में बिठा कर आनन्दमय बना देता और अमर बना कर सब तरह से मुक्त कर देता है, बस एक शर्त भक्ति की; तू भी भगवान् रूपी उस अमृत रस को पी कर सब से प्रेममय बन कर प्रभु के गुणगान में लग जा। मन एकाग्रता से ही बन सके, जो सदा सत्य पथ पर चलते निर्भय बन दूसरों हित सदा लगा रहता है। प्रभु के आगे सब बराबर एक समान ही रहते 238