भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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कथा सुन करके सब लोग आश्चर्यमग्न हुये कि कैसा मन्त्र, जो यह कामदेवस्वरूपी शुकदेव को मोहित करे। इसके पीछे सब ऋषिगणों तथा शुकदेवाचार्य आदि सब लोग व्यास जीके पीछे हो लिये। व्यास जीके आश्रम के निकट एक कुण्ड था, उसमें स्त्रियां नग्न होके नहाती थीं, व्यास जी वृद्धवस्था युक्त जब वहां गये तब तो उनने वस्त्र पहिन लिये, जब शुक जी वहां पहुंचे जिनकी सोलह वर्षकी पूरी अवस्था नथी, उनकी सुन्दर मनोहर मूर्ति देखकर किसी स्त्रीने अपने अङ्गों ऊपर वस्त्रों को नहीं डाला। शुकदेवजी महाराज तो सब जीवोंमें समाये, सब का प्राण अपना समझ कर शुकदेवजी स्त्रियों के अङ्गोंको देखकर नहर्षित हुये नप्रसन्न हुये। शुकदेवजी निष्काम थे। शुकदेवजी महाराज जबआगे चलेगये, स्त्रियां, जब शुकदेव को देखकर दो घड़ी न बोलीं, व्यास जी जब आये स्त्रियों से दो बात पूछने लगे, तब तो स्त्रियोंने हाथ जोड़ कर, व्यास जीसे विनती की किहे नाथ तुम तो नर और नारायण रूप सब कुछ जान रहे हो, जो बात तुम पूछते हो सब मिथ्या बात कह रहे हो। व्यास जीके आगे स्त्रियोंने हाथ जोड़ कर कहा किहे नाथ आप तो सूक्ष्म दृष्टि रखते हो। व्यास जी शुक जीके पीछे दौड़ते २गये, व्यास शुकजी को पुकारते हैं। व्यास पुकारते हैं, हे पुत्र शुकदेव! व्यास जीका शुकदेवजी को पुकारना सुन कर सब जड़ चेतन व्यास जीसे कह रहे हैं, जो तू शुकदेव को बुलाता है सो शुकदेव तो सर्वत्र भरा हुआ व्याप रहा है। हे व्यास जी! यह जीव जो माया करके सब ओर भ्रमता है, मायाके छूटने करके यह, जीव अपने रूप को प्राप्त होवे तब सब कुछ आपही रूप हो, उसकी कोई संज्ञा नहीं है॥ व्यास जीसे कौन कहे? किस जीवका यह पुत्र वा किसका पिता है, सो तू हे व्यास जी! तू तो हे सर्वज्ञ सबही कुछ जान रहाहै किस निमित्त रोताहै? उस वन के वृक्ष और लतादिकों करके यह जो शब्द शुक जीका सब बनमें सुनाया शुकजी को यह सब जीवों का रूप जान कर व्यास जी बड़े प्रसन्न हुये, शुक जी जब सब जीवोंके जीवोंमें व्याप रहे तो उनको सब जीव अपना समझ करप्यार करते हैं, व्यास जी शुकजी रूप सर्व जीवों कीमहिमा जान कर बड़े आनन्द को भये, जो मनुष्य सब जीवों आत्माके सम समझ करके, किसी जीवका अपराध नहीं करते सो निश्चय कर सबों प्यारे लगते हैं॥ सो शुक जीकी महिमा को देख व्यासजी अपने मन में विचारने लगे कि इस शुक जीको भागवत कथा श्रवण कराऊं। सो व्यास जी अपने शिष्योंको बुलाकरके भागवत के श्लोक सिखाने लगे। शिष्यों से कहा कि तुम यह श्लोक वन में जाकर के कहो, जब व्यास जीके कहने से शिष्य वन में जाकर श्लोक कहने लगे तब श्लोकों के शब्दों को सुनकर शुकजी बड़े प्रसन्न हुये, शुकदेव जी शिष्यों से पूछने लगे कि यह श्लोक किस के हैं॥ सो श्लोक यह है कि श्रीकृष्ण चन्द्र अपने शरीरके ऊपर पीताम्बर और मोर पंखका मुकुट शीशपर धरके, अधरों पर बंशी धर सब ग्वाल बालकोंके सहित औ वन फलमाला गलेमें पहिरे वन की शोभा बढ़ाते हुये, सब गोपियों सहित सुख दे रहे हैं, सो शुकदेवजी इस श्लोक को सुनकर शुकजीने, शिष्यों से पूछा कि यह श्लोक किस का है। शिष्यों ने शुकदेवजी को व्यास जीका नाम सुनाया, सो शुक जी शिष्यके मुखसे सुनकर बड़े प्रसन्न हुये, तब शिष्योंके मुखसे श्लोक सुन शुकजी न आये तब व्यासजीने दूसरा श्लोक अपने शिष्यों को पढ़ने को दिया, सो श्लोक यह है कि पूतना राक्षसी विष-भरे स्तनों पान करा कर, मारने के लिये आई तो श्रीकृष्ण जी नेउसको ? मार कर परमगति दीनी! सो ऐसे दयाके समुद्र श्रीकृष्ण जीके ऊपर कौन न प्रीति करेगा? शुकजी इस श्लोक श्रवण करके वन से आये॥ व्यास जी का मुख देखकर श्लोकों का अर्थ पूछने लगे कि व्यास जी इस श्लोक का अर्थ कहो तब तो व्यास जीने शुकदेव जीसे कहा कि हे पुत्र! व्यासजी, शुकदेवजी दोनों परस्पर मिल गये। भागवतकथाका पठन पाठन शुक जी व्यास जीसे करने लगे। जब व्यास जी शुकदेव जीको भागवत का ज्ञान करा चुके तब शुकजी बोले कि हे व्यास जी! अब सब कथाका विचार हो चुका, अब आज्ञा दो! शुकजी कथा सुन करके वनमें चले गये। व्यास जी परमार्थ विचार कर संसारके सब प्रपंचसे विरक्त हो गये॥ इसके पीछे शुकदेवजी का मन तो सब जीवोंमें समा रहा था, जो जीव व्याकुल होवे उसको सुखी करने का उपाय करते थे, किसीके घर पर, याचनाके निमित्त, जितना समय गौके दुहने काहोता है, उस काल से अधिक नहीं ठहरतेथे। शुक जी एकांत निष्काम नाम जपते हुये विचरते हुये सब जीवों को एक जान निष्काम रूप हो मन मन्दिरमें वास किये हुये भगवन्त का भजन करते॥