भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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उन्होंने अपने इस स्वरूप द्वारा अनेक विचित्र अद्भुत प्रकार की तथा रस शालिनीलीलाएं करके समस्त संसारवासियों अथवा केवलगोकुलवासियों आदि को मोहित कर दिया। अथवा वह किसी अन्य को तो क्या संसारभरके समस्त वेदशास्त्रों को, इस प्रकार विस्मित करने वाले प्रभु कहाँ चले गये॥ भाव यह निकला कि, जो इस प्रकार लीला, रस माधुरीसहित अपने स्वरूपका प्रकाश कर रहेथे उन्हीं स्वामी कृष्णचन्द्र अब गोकुलवासियों को छोड़कर द्वारिकाको सिधारे। अथवा रस माधुरीयुक्त श्री स्वरूपका जो प्रकाश ब्रज मंडल में किया उसको स्मरण कर और अब उस स्वरूप के दर्शन विना जीवनको निरर्थकसा कर मान कर कोई तो कहती हैं कि अहो सखियो, हम तो घर ही घर बैठ कर रोती रहीं पर देखो उस अक्रूरने ब्रज मण्डल को शून्य कर, उस ब्रज निधि स्वरूप कन्हैयाको हरण करके ले ही लिया। दूसरी कोई कहती है कि सखी, अब जब ब्रज छोड़कर चले गये तब और किसी स्थानको चले जानेमें उस कन्हैया को भला क्या संकोचहोता, यह तो एक स्थानसे दूसरे स्थानको और दूसरेसे तीसरेको भी जासकते हैं। अथवा केवल इतना ही नहीं, यह तो मथुराराज को मारकर समस्त संसार को, हम सब को धोखा देगये इसलिये उनका क्या विश्वास कियाजाय पश्चात् श्रीयमुनाकिनारे पर स्थित होकर जल की ओर दृष्टि करके सब कहने लगीं कि अहो सखी देखोइधरयह श्रीयमुना जी कैसी नीले मेघ के समान श्यामवर्ण जल को धारण किये हुये मन्द २ बहतीहुई हंस, चक्रवाक, सारसों, तथा भौरोंके मधुर शब्दकरके श्री कृष्ण जी की लीला कथाओंका मानोंगानकरती, कदम्व, बकुलादिक वृक्षों की शोभा को लिये हुये तथा यमुना जी के किनारे विकसित कमल सुगन्ध युक्तशीतल मन्द सुगन्ध पवनसे व्याप्त होकर शोभित होरही हैं? परन्तु अब इस समय, जब कि इन लीला के करनेवाले श्रीगोविन्द ब्रज छोड़कर न जानेकहाँ चलेगये अबयमुनाजीकोभीदेखकरसखियोंकामन औरभी व्याकुल हो चला। तब कोई बोली, कि गोपियोंको ऐसा विरह देकर श्रीगोविन्द द्वारिकाको सिधारगये हैं वे वहाँ की सम्पूर्ण स्त्रियोंके मनको अपनी ओर आकर्षित कर रहे होंगे और उन स्त्रियोंके साथ अनेकप्रकारके विहार करते हुये अपने इस ब्रज देश को तथा हम सब विरहिणियों को भूल गये। सखी सच पूछो तो उस विरहाग्नि, की ज्वाला से बचने का उपाय तो कोई भी नहीं रह गया, सो सिवाय इस यमुनाजी की शरण पर दूसरी कोई कह उठीकि हे सखियो इस प्रकार तो, बात बनी सो बिगड़ी ही समझो क्योंकि यदि प्राण त्याग दिये गये तो ब्रज छूट जायगा, यदि शरीर ही न रहा, फिर प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण का आगमन पुनः किसी समय भी तो संभावित दीखताही है, फिर मिलन का सुख कैसे हो सकेगा और विरहव्यथा तो उन दिनों अधिक बढ़ जायगी जब हम नहींरहेंगी, उस समय तो रोने वाला भी कोई नहोगा ऐसा सोच कर, सब विरह व्याकुल गोपियों का ध्यान-मग्न मन हो गया और सोचने लगीं कियदि प्राणों को त्याग दिया तो मिलनकी कोई आशा नहीं रह जायगी अतएव धैर्य धारण करके जीवन को स्थिर रखना चाहिये। परन्तु धैर्य भी किस प्रकार बंधे, विरहव्यथा तो दिन दूनी और रात चौगुनी होती चली जारही है। इधर-उधर के नेत्रों द्वारा विरहाग्नि की ज्वाला से, गोपियों के कपोल जलने लगे अर्थात् अश्रुधारा प्रवाहितहोने लगी, पसीनेके साथ रोमांचादिकभी होने लगे। वे कृष्ण-विरहके कारण मूँगे, मोती आदिके समान वर्णवाले कपोलों परसे जब तप्त अश्रुओं को ढुलकातीहुई विलाप कर रहीथीं उससमय उनके केशजाल भी बिखरगये थे। यह देख कोई कहने लगी, सखियो जरा मुख धोलो, यह क्या दशा बना रखीहै? दूसरी बोली मुख धोनेसे क्या होगा सखी, विरह रूपी ज्वाला तो हृदयमें जल रही है। कोई कहनेलगी नेत्रों के अश्रुओं को तो पोंछना चाहिये? गोपीजनों की दशा ही ऐसी विरह व्यथाके कारणहोगई थीकि विरहकीप्रचण्डज्वालासे व्याकुल गोपियां अपने स्वरूप कोभी सर्वथा भूल चुकीं? इसप्रकार गोपियां, सब एक साथ मिलकर रोती हुई विलाप कररही थीं॥ इसी समय अपनी प्यारी, प्रियतमा सखियों का हालचाल जानने केलिए राधाजी की आज्ञा पाकर चन्द्रावली वहांपर आई। तब उस चन्द्रावली ने सब गोपियोंकीऐसीदशा देखकर, राधाजीके विरहकी दारुण व्यथा रूपी विष ज्वाल-माला फैली, जिससे न केवल राधाजी वरन् उनकी अन्य सखियों के प्राणोंके पखेरू उड़ने लगेथे उस को सुनाना प्रारम्भकिया॥ हेगोपी जनो यह तो श्रीकृष्ण स्वरूप लीला द्वारा अपने विरहका प्रकाश, स्वरूपानन्द स्वरूप रस प्रकाश स्वरूप के द्वारा सबको आकृष्ट कर लिया गया, सो यह लीला मात्र किसी के लिये केवल विरह ही न थी वरन् इस लीलामें तो परमानन्द की वृद्धि तथा समस्त रसों का प्रकाश मिलकर एक रस भरा अद्भुत स्वरूप संसार भर के सामने आ उपस्थित हुआ, जिससे यह स्पष्ट सिद्ध हुआ कि उन ब्रज विहारी नटनागर कृष्णचन्द्र आनन्द स्वरूप रसके सिवाय और कुछ नहींहैं। उनका यह सब विरह स्वरूप मात्र ही रस रूप है। गोपिका और कृष्ण का यह सम्बन्ध केवल सांसारिक या कामवासना की इच्छा मात्र रूप न था वरन् यह मात्र दिव्य प्रेम रूपथा॥ सखियो सुनो! भगवान् तो केवल प्रेम के वशीभूत होकर ही आतेहैं, साधारण मनुष्यों की तरह न तो इनका कोई जन्म व कर्महोताहै, केवल अपने जन प्रेमी भक्तों के लिये यह अपनी दिव्य लीलाओं का रस आस्वादन कराके अपने निज धाम पधार जातेहैं अतएव सब गोपियों 281