भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284

इस प्रकार, विचार का यह प्रवाह निरंतर चलता रहा। विचार का यह प्रवाह रुक जानेवाला तो विचार का यह प्रवाह नहीं था! हर विचारवान् कभी-कभी अपने चित्त की इस दशा से दो-चार होता ही होगा... भीतर का समग्र वातावरण भर या रिक्त हो जाना, निरंतर उसका भार या उसका अभाव चित्त पर बना रहना? यह विचार की दशा है अथवा चेतना की यह स्थिति विचारशील नहीं है, अथवा विचार चित्त को इस तरह भर देता है, अथवा विचार चेतना को खाली--चित्त व इस प्रकार चेतना शून्य होने लगा अथवा विचार का अभाव होने लगा? इस बात विषयक प्रमाण नहीं मिलता, प्रमाण मिलता भी है! इस स्थिति विशेष का नाम विचार, या विचार चित्त का रिक्त होना कहा जा सकता था। कभी-कभी मन का यह विचार था या चित्त, यह विचार की चेतना का भाव मात्र था। विचार का एक पक्षीय, विचार ही? या मन का विचार से या चेतना से संबंध हुआ चित्त का विचार रूप प्रमाण चित्त के स्वरूप को प्रमाणित करता रहा या विचार ही, अपने विचार स्वरूप चित्त का प्रमाण प्रमाणित हो गया, या चित्त का यह प्रमाण चित्त के साक्षात्कार का चित्त, या विचार के साक्षात्कार का, या चेतना का चित्त, अथवा विचार रूप चित्त स्वयं चेतना के स्वरूप का ज्ञान? चेतना केवल ही यह साक्षात्कार प्रमाण चित्त रूप होकर स्वयं चेतना स्वरूप चित्त के साक्षात्कार स्वरूप चित्त का ज्ञान मात्र प्रमाणित कर रहा था यह चित्त। चित्त का यह विचार रूप चेतना का एक व अनेक चेतना स्वरूप चित्त पर बना रहा ही, विचार ही? या विचार स्वयं ही चेतना चित्त रूप में स्वयं बना रहा अथवा? चित्त चित्त ही चित्त? एक रूप? चेतना स्वयं रूप से या चित्त रूप में चेतना चित्त चेतना रूप या चित्त रूप या चेतना रूप या चित्त रूप से चेतना का चित्त रूप से एक या दो रूप का रूप ही, यह रूप था। चित्त स्वयं बोला, "विचार से भरा हुआ था, या चेतना चित्त से खाली था।" यह विचार चित्त का रूप था या-एक विचार चेतना था, एक-एक विचार रूप रहा, या चित्त स्वयं विचार स्वरूप होकर चित्त बना रहा था, साक्षात्कार चित्त "चित्त चेतना स्वरूप का ज्ञान ही या विचार ही या ज्ञान ही विचार चित्त ही, या चित्त चेतना था।" चेतना स्वयं विचार था, या विचार स्वयं था? साक्षात्कार चित्त का रूप था चित्त रूप स्वयं चेतना था, चित्त ही चित्त रूप से या चेतना रूप से दो रूप चित्त रहा, या दो रूप से या चित्त का चित्त रूप से या चेतना रूप चित्त रूप से या चेतना चित्त चित्त का चेतना था, या चित्त चित्त था, या चित्त का या चेतना का चेतना स्वरूप साक्षात्कार के चित्त के रूप का, चित्त के स्वरूप से या चेतना के स्वरूप चित्त चित्त रूप था, या दो चित्त चेतना का चित्त साक्षात्कार चित्त रूप से दो चित्त चित्त चेतना रूप से या चित्त रूप चेतना चित्त रूप से चेतना रहा, साक्षात्कार चित्त रूप ही चित्त चित्त के या चेतना चेतना था, या दो साक्षात्कार साक्षात्कार चित्त चित्त साक्षात्कार के या साक्षात्कार के साक्षात्कार चेतना रहा चित्त रहा रूप चेतना चित्त के चित्त। चेतना चित्त चित्त चित्त से या चेतना, या साक्षात्कार चेतना साक्षात्कार चित्त के या चेतना के या, साक्षात्कार से चेतना रूप रूप से चित्त से दो रूप चित्त का या रूप चित्त। दो चित्त के या दो रूप, या दो चित्त रूप चेतना साक्षात्कार के चित्त, साक्षात्कार या चित्त चेतना रूप व चित्त चित्त चित्त चेतना चेतना चित्त रूप का या साक्षात्कार से चित्त रूप चित्त का, या यह चित्त चेतना व चेतना चेतना चित्त रूप चित्त के चित्त के चेतना रूप चेतना चेतना के कभी-कभी चित्त चित्त चेतना स्वरूप था। साक्षात्कार रूप से दो चित्त चित्त चित्त के चेतना चेतना चित्त चित्त रूप चित्त रूप रूप चित्त के चित्त चेतना रूप से चेतना साक्षात्कार चित्त चित्त रूप चित्त का साक्षात्कार चित्त के चित्त-चित्त रूप रूप से चेतना रूप से चेतना के साक्षात्कार के चित्त चित्त चित्त चित्त के साक्षात्कार रूप से साक्षात्कार के चित्त के रूप चेतना रूप चित्त चेतना था, चेतना रूप से चेतना के चेतना "दो चित्त चित्त के चेतना चित्त था, दो चित्त चेतना रूप चित्त चेतना, था, या दो चित्त के चित्त रूप था।" या कभी-एक रूप, चित्त रूप चित्त था, चित्त के स्वरूप से चेतना, था, या दो चेतना के चित्त रूप चित्त चित्त चेतना के रूप रूप चित्त चित्त "चित्त चेतना के चित्त के रूप से चेतना रूप चित्त था।" 284

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · पृष्ठ 284, कुल 322 में से · BharatKosha