एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपवासों का नियम तो ऐसा चला जाता था कि, दो उपवास तो कोई बात नहीं थी नौ उपवास आठ उपवास तक तो वो बिना पानी पिये निकाले हैं! उनके दो बेटे और एक बेटी थी जो दो-दो साल, छः-छह मास की उम्र वाली बिना माँ के हो गये। उन दोनों लड़कों को बड़ा किया उन्होंने लेकिन वो बड़े काम वाले या काम सिर चढ़ाने वाले साबित न हुए और घर में हमेशा लड़ाई झग-झग लड़ाइयां ही होती थीं और सब से बढ़कर बात तो यह हुई कि, ऐसा समय आ पड़ा कि उनपर दो हजार रूपयों का कर्ज़, सिर पर खड़ा मिला। वो विचार करें कि ऐसा कर्ज़ उतारूँ तो उतारूँ कैसे क्योंकि जो कुछ था वो तो गया था, फिर कहाँ से लाऊंगा और लड़का तो घर में न लायक ही निकला तो इन्होंने मन में, दिल में सोचा कि अब मुझे तो कहीं न कहीं से काम तो मिलेगा ही, तो इस का कर्ज़ उतार सकूं नहीं तो मेरा धर्म बिगड़ेगा कि दूसरा ब्राह्मण तो मेरे पर ही आस लगा कर बैठा था कि मुझे कहीं से आ कर देगा लेकिन जब वो रुपया न दे सका तो उसने नालिश करनी चाही, जिस पर वो बड़ा भारी घबराया। उसने केवल दो आने से, शहर में जाने का इरादा किया ताकि कुछ तो भी कमा कर कर्ज़ चुका सकूं, वरना कर्ज़ ना दे सका कैसा रहेगा? जब उसने मन में यह पक्का कर लिया तो, शहर की ओर रास्ता तय किया। रास्ते में जाते समय वो सोच रहा था कि, हे प्रभु तू हमारा है? हमारा तो कोई नहीं जो कि उस समय मदद करता तो इस मुसीबत से बच जाते ऐसा वो मन को कह रहा था, वो भी ऐसा कहते कहते थक गया। आगे कहां तक चलूँ? ना पास घर का अन्न, कोई सहारा देने वाला नहीं! वो पैदल चलते चलते बड़ा परेशान होकर दो कोस दूर ही पहुंचा तो उस समय रात, सांझ का हो गया समय। खैर, भगवान किया बड़ा! एक मील पर उसने उजाला देखा जहां एक महात्मा का डेरा था, उसने जाकर वो महात्मा दर्शन किये और फिर चाहा कि महात्मा जी विश्राम का समय देवे ताकि रात को तो मैं इस जगह आराम पाऊं। क्योंकि वो भूखा प्यासा दिन से निकला हुआ था और पैर भी काम न देते थे। महात्मा जी विश्राम का नाम सुनकर कहने लगे कि धर्मशाला में चले जाओ जो कि थोड़ी दूर पर बनी हुई थी और उसने तो महात्मा के दर्शन से मन तृप्त पाया था, "संत मिलन को जाइये, तज के कपट गुमान" "कोटि जनम का पाप कटे जो पहुंचे दरवेश" उसने मन में कहा कि हे मेरे ईश्वर तू, सच्चा है? वो दर्शन कर के आगे चला तो आगे दो धर्मशालाएं बनी देखीं जिनके दो दो द्वार थे तो उसने सोचा कि किस में विश्राम करूं... तभी तो उसका विचार न हुआ, वो खड़ा ही रह गया, किसी एक के सामने और उस पर छाया अंधेरा पसरा हुआ लगा, तो वो सोच? लगा कि उसका भाग्य कितना खराब है! उसके दिल में सब कुछ का दर्द था जिस से उसका दिल भर आया तो महात्यागियों की तरह वो बैठ कर रोने लगा और रोते रोते रोते उसे क्या ख्याल आया जिस से ख्याल हटा कर उसने सामने देखा तो देखा कि बड़ा चमक- दमक का प्रकाश आ गया। आश्चर्य से देखा तो क्या बात थी कि कोई प्रकाश का पुंज था, वो प्रकाश का देवता न होकर वो तो स्वयं भगवान ही थे। फिर वो, उन का रूप देखकर आश्चर्य-युक्त भगवान बोले किः भगवान ने तो सब कुछ जानबूझकर भी अपने आंसुओं द्वारा रो कर ही महात्यागियों जैसा न रो, तू तो हमारा ही है तो रोता क्यों है, तू क्यों घबराता है, तू अपने कर्ज़ की जो फ़िक्र कर रहा था उसको भूल जा, सब ठीक होगा! वो तो सब सुन कर आश्चर्य में पड़ गया कि प्रभु, तू सब कुछ तो जानता ही था सब कुछ, लेकिन वो बोलने से तो रहा क्योंकि सिर- पैर सब कांप, के गिर पड़ा तो फिर प्रभु बोले और अब तू सब प्रकार से सुखी होगा, कष्ट तो निकले, समय भारी महाकष्टों भरा तो इसने काट निकाला तो वो सुख के समय को क्यों न देखेगा! वो उठ, हाथ तो जोड़ सके, पर वो तो कुछ कह नहीं सका तो फिर प्रभु, भगवान अंतर् ध्यान उस पल हो गए। 283