एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकारण उनका स्वभाव अथवा गुण नहीं होता। इसका कारण यह होता अपने अन्त:करणके कारण वे सर्वथा शुद्धभावसे निर्मलकर भगवान् अथवा अपने गुरु परमात्माकी शरणमें शरण या शरणागत होकर भगवान् अपने या अपने गुरुदेवकी शरणमें भगवान् अथवा गुरुदेव जो आज्ञा या प्रेरणा करते हैं? भगवान्की या गुरुदेवकी आज्ञाका पालन जब वह जीव निष्काम या नित्य भाव अथवा निष्काम भावसे करता, तब उस सेवक को अपने उस अन्त:करणका यह पता नहीं रहता। निष्काम होनेके कारण अन्तःकरणमें न कोई विषयवासना रहती, वासना का अन्तःकरणमें न कोई स्थान रहता, कोई इच्छा; कामना, वास या विषय या कामनाका रस जब नष्ट होकर समाप्त हो, तब ही अन्त:करण भी, उस अन्तःकरणका नाश अथवा उस अन्तःकरणका ही अभाव होगा? अन्तःकरणका ही नाश हुआ तो, इस प्रकार केवल ही, उस समय उसकी अन्तःकरणके ही नाश होने पर, उस ही सब बात का पता चलता केवल है, कारण उस समय प्रकृति तथा प्रकृतिका सारा पसारा था, जिससे इस प्रकृति अथवा रस का स्वरूप ही सब नष्ट होकर एक रस रूप परमात्मा परमात्मा ही केवल सब जीव अथवा प्रकृतिको उस रस के साथ भोगने का रस स्वयं ही सब जगह व्यापकर उस रसका अखण्ड आनन्द ले रहा था। जिसके हृदयमें ऐसा रस आनन्द का रस रूप हो, उसको उस समय ऐसा लगे कि अखण्ड आनन्द ही सब ओर रस रूपमें स्वयं परमात्मा सब रस को भोगकर ले रहा हो, सो अन्तःकरण ही, अन्तःकरण रहा अन्त:करणका तो नाश हो ही, सो गया क्या था; अन्तःकरण तो था, पर उस का नाम रूप सब लय होकर अखण्ड रूप में मिला, तो फिर उस अन्तःकरण व उस समय केवल ही, न कोई विशेष वासना थी, न वासना का ही रूप था। फिर जो भी रस सब ओर रस रूप अन्तःकरण होकर केवल अखण्ड आनन्द ही का रूप हो गया था अथवा आनन्दस्वरूप, निराकार, निर्गुण, निरंजन, निर्लेप ही सब सच्चिदानन्द रूपमें सब का रूप व्याप्त था, जिसका रूप अखण्ड आनन्द ही अखण्ड रस रूप होकर व्याप्त सब तरफ भरा हुआ रहता था। सो वह रूप अन्तःकरण कैसा था, उस समय ही अखण्ड रसका भोग या अखण्ड रस केवल रहा वास्तव में यह सच्चिदानन्द रूप आनन्द ही, शान्ति ही, प्रेम ही, अखण्ड रस, अखण्ड रस, सच्चिदानन्द रस जिस अन्तःकरण अन्तःकरण वासना या इच्छा से रहित था, उस अन्तःकरण द्वारा सब ही संसार मात्र के सब विषय वासना रूपी तृष्णा रूपी जो रस रूप भोगी बनकर, इस जीव द्वारा जीव को तृष्णा ही, रस रूप सब तरफ से सब तरह तृप्त करके केवल उस अखण्ड तृष्णा तृष्णाको भोग रहा, सदा सदा अखण्ड रूप आनन्द रस का नाम देकर सदा तृप्त होकर रस ले रहा था। जिस रस का भोगना ही ही तो, केवल अविद्या रूप या माया रूप का नाश ही कहलाया था। सो तो वह उस का नाश इस रूप में नहीं था, केवल ही उस तरह, जिससे उस जीव का अविद्या या मायाका नाश, अविद्या या मायाके नाश से केवल सिद्ध होता है, स्वयं उस परमात्मा के अखण्ड रस स्वरूप आनन्द का भोग ही इस जीवात्मा द्वारा जीवने अखण्ड आनन्द रस अखण्ड रस सच्चिदानन्द रसमें मिल, केवल उस अखण्ड आनन्द रस भोग का ही भोग किया। सो इस रूप से ही तो सबने इस बातको जान लिया कि जिस बात द्वारा आज तक जीव संसार में सब सुख रूप वासना का ही तो, भोग भोग के ही भोग रूप भोग ही भोगता आया था। वास्तव में यह सब भोग वासना रूप ही था, भोग से भोग ही वासना का ही रूप सब तरफ से सदा तृप्त न हो ही, जिससे ही जीव को कभी भी तृप्त न ही तृप्त होना अन्तःकरण का धर्म था, जिसको तृप्त करने, तृप्तिके अन्तःकरण तृप्तिके रूप में ही सब कुछ था। केवल उस ही समय जब केवल शान्ति रूप, शान्ति के रूप ही वासना रूपी था, जिस द्वारा जीव सब ही उस सच्चिदानन्द रूप शान्ति सच्चिदानन्द रूप शान्ति में, तृप्त हो सब तरफ तृप्त हुआ उस सच्चिदानन्द स्वरूप में समाकर शान्त स्वरूप हो ही सच्चिदानन्द रूप ही, सब रस का रस सब ओर रस रूप से तृप्त ही अखण्ड हुआ था। ऐसा ज्ञान तो केवल ही केवल ही, ज्ञान केवल ही ज्ञान रूप ही सच्चिदानन्द का, सो सब जीव को भगवान् अपने भक्त रूपी सन्तोंको! भक्त! सन्तों के ही मुखारविन्द द्वारा व उनकी कृपा तथा छत्र-छाया से सब ही सब प्राप्त करा, देकर तृप्त व शान्त कर भगवान् स्वयं उस सच्चिदानन्द के आनन्द को अखण्ड रसस्वरूप परमात्मा होकर सब जीवोंको सुख शान्ति देकर या देकरके सच्चिदानन्द रस-रूप सब प्रकार से शान्ति 288