एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस न्यायानुसार न तो, जो जल को पीता न हो, वह प्यास से तड़फता हुआ मर सकता अथवा मरेहुए को जीवन दान या शीतलता कभी-कभी प्राप्त कर सके, ना आत्माराम भगवान् आत्मा रूप जो चैतन्य गंगा का जल, शान्त, या उस रस युक्त ज्ञान रस भरा हुआ समस्त भरा इस का नाम ज्ञान भाव ? ज्ञानानन्द रूप रस को ना पीवे अथवा आत्मानुभव रूप आनन्द ना पावे उस को तो जन्म, मरण या जन्म मरण क्लेश, यह दुख रूप संतापमय उस जीव को तृषा लगी इस संतापावस्था तृष्णा तृषा को जो इस रस को आस्वादन करके मिटावे सो नर-भव पाकर धन्य हुआ ऐसा जानना जी, तब अध्यात्मिक रस उस आत्मारामके पास जब इस प्रकार देखा तो ऐसा स्वरूप ज्ञानानन्द रूप से जो सर्वथा उत्कृष्ट सो ऐसा सब ओर आनन्द स्वरूप भरा रस रूप आत्माराम का रस आस्वादन अध्यात्मिक आस्वादन किया सो ही ऐसा उत्तम कार्य किया जिस का आस्वादन महाभाग्य जीव ही पावे अन्य अज्ञानी मूढ़ सो अध्यात्मिक रस ऐसा उत्तम ही अध्यात्मिक ज्ञान केवल अतीन्द्रिय ज्ञान रूप देखा सो अध्यात्मिक रस जो सो प्रत्यक्ष रूप केवल ज्ञानानन्द रस भरा उस रस का आस्वाद सो ही सो अध्यात्म ज्ञान रस निर्मल उस ज्ञान ही में ऐसा देखा इस लिये उस रस के रस रूप केवल आनन्द रस का ही अनुभव ऐसा ज्ञान-ध्यान से प्राप्त हुआ जो रस सो ज्ञान ही का रस ऐसा जो सो उस स्वरूप ही में मन को लय कर स्वाध्याय से प्राप्त हुआ जिस से स्वाध्याय फल पाया ऐसा ज्ञान का तो अभ्यास किया पर जो इस अभ्यास करके भी ज्ञान रस का आस्वाद आनन्द न अध्यात्म अनुभव से प्राप्त हुआ तो उस अभ्यास का फल क्या हुआ सो उस अभ्यास कर रस पाया, सो क्या फल न हुआ सो यह हुआ? उस अभ्यास का फल तो ज्ञान रस प्राप्त होना है? ऐसा जान कर उस रस को लय कर पाया सो ज्ञान का फल ज्ञान स्वरूप ही हुआ सो रस सो, ना उस ध्यान स्वरूप ज्ञान को लय कर उस ज्ञान को लय किया, ज्ञान ही को लय कर जिस रूप उस को रस का रस पाया सो, रस ज्ञान रूप, ज्ञान ही का रस रूप, सो ज्ञान रूप, न तो उस प्रकार से न अनुभव रूप किया, किन्तु अध्यात्मिक रस रूप रस, जो ज्ञान रूप सो, ना ही उस ज्ञान स्वरूप अनुभव फल का फल है? इसी लिये यह ज्ञान केवल ज्ञान ही रूप का फल, ज्ञान ही का फल हुआ जब अध्यात्म ज्ञान रस के जानने का अभ्यास किया तो उस रस के प्राप्त कर लेने से उस रस का रस ऐसा ज्ञान स्वरूप में आया, ना ज्ञान को छोड़कर आनन्द रस-भाव का ध्यान ना सो रस आनन्द का लय या ज्ञान का लय ज्ञान ही हुआ आनन्द स्वरूप रस ज्ञान का ध्यान रस-भाव केवल ज्ञान स्वरूप में ही रस मिला, ज्ञान ही को ज्ञान रूप से लय किया सो ज्ञान स्वरूप रूप में आनन्द रस का ज्ञान केवल ज्ञान रूप से ही आया ना कि अन्य, रस ज्ञान रूपी ज्ञान केवल न रहा जी! जिस को न जान कर, ना जानने रूप उस अध्यात्म के ज्ञान रूप को अज्ञान कह रहे हो? सो अज्ञान रूप केवल अज्ञान होगा; ज्ञानानन्द रूप ज्ञान ऐसा उत्तम स्वरूप को ना कर ज्ञान आ-के सो, आ-के रस ज्ञान रूप ज्ञान ऐसा उत्तम आनन्द रस उस रस का अज्ञान स्वरूप ज्ञान कह कर अज्ञान से रस कह ज्ञान, सो अज्ञान का ज्ञान स्वरूप ना तो ज्ञान कह ना ही उस अध्यात्म ज्ञान-स्वरूप को ज्ञान ना कह कर अज्ञान स्वरूप कह सो अज्ञान स्वरूप ज्ञान ही को ज्ञान कह रहे हो? तो ज्ञान कहो! ना ज्ञान कहो! कह तो ज्ञान, रस केवल ज्ञान कहा उस रस को, ज्ञान कहा तब अध्यात्म ज्ञान स्वरूप उस ज्ञान स्वरूप केवल आनन्द ज्ञान स्वरूप ज्ञान का रस कहा जी, सो ज्ञान ही ज्ञेय से ज्ञान रहा जी! ज्ञान का स्वरूप केवल ज्ञान स्वरूप ही, ज्ञान स्वरूप ना ज्ञान से ही ज्ञान का ज्ञान उस रूप को ज्ञान रूप कहा जी, सो सो अध्यात्म ज्ञान-ध्यान स्वरूप से ही ही ही ही ज्ञान का ध्यान रूप से ज्ञान का ध्यान सो रस, ना आनन्द का ध्यान ना उस ज्ञान स्वरूप जी! अध्यात्म केवल जो रस कहा, केवल ज्ञान रूप ज्ञान से अध्यात्म का रस ऐसा ज्ञान कहा सो क्या? ज्ञान क्या? सो 289