भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विषयाभिलाष तीव्र कषायरूप भाव न करना, इन तीव्र कषायरूप भावों सहित यदि कदाचित् मन्द न होवे तब, कदाचित् मन्द कषायरूप भी किया तो उसका फल मिलेगा निदान तो धर्म नहीं यह निश्चय पर भरोसा रखकर किया है, निदान भी किया तो फल मिलेगा परन्तु वह फल उसका जीव को--संसार सुख भोग रूप प्राप्त फल भोगने पर भी तृप्त नहीं होगा और ऐसा उपाय भी--संसार के विनाश रूप तो नहीं पर मोक्ष के उपाय रूप धर्म नहीं यह जीव ऐसा विचार करके कि यह सब अनादिकाल का ही मोह उदय, निदान का फल भोग, सो तो अनादिकाल पर्यन्त भोग रहा ही आया पर उसका फल अहित, ऐसा जो जानकर भी निदान रूप भाव महापापरूप परिणाम को जो जीव उत्तम परिणाम रूप मानता, सो वह मिथ्यादृष्टि ही होकर अहित फल भोग कर इस संसार परिभ्रमण-दुःख पावेगा! इस विचार से सब जीव अपने मन में इस प्रकार का सन्देह न राखिये, अर्थात्, निदान, संक्लेश परिणाम रूपभाव महाकष्ट दायक जान कर इन भावों भाव को दूर कर ही अपने शुद्ध भावों का साधन करो निदान का त्याग कर ऐसा विचारना कि यह तो सब पर का सुख सो पुण्य का उदय संबन्धी सब विकार रूप ही है इस भोगरूप सुखनिधान परिणामन मन्द, तो फिर क्या फल? इस विचार से पुण्य का फल भी मत चाहो, अर्थात् विषय कषाय भोगों को! विचार कर त्याग ही करना चाहिये, इससे केवल पाप उदय ही, संसार का मार्ग नष्ट हो कर मोक्ष पावेगा! विचार करो कि भोग सुख का त्याग सब शुद्ध मोक्ष परिणाम ही, केवल मोक्ष पद का सुख ही जीव उत्तम सुखकारी ऐसा निश्चय मानकर संसारिक सुखनिधान भाव को त्यागो और जो उत्तम निश्चय करो? अब इस उपशम के स्वभाव का जो भाव सो संशय-विहीन मोक्ष सुख के करने वाले निश्चय- सम्यक् विशुद्धरूप विशुद्ध केवल विशुद्ध है, संशय-विहीन परिणाम ही सम्यक् विशुद्ध भाव जिस रूप विशुद्ध भाव करके ही मोक्ष रूप विशुद्ध फल जीव को प्राप्त हो, ऐसा जानना योग्य जिसके हृदय सम्यक्त्व का उदय स्वरूप विशुद्ध हो सो सम्यक् ज्ञानी जीव इस संसारिक सर्व सुख संबन्धी भाव विषय कषाय आदि महापापरूप को त्याग करके निश्चय मोक्ष मार्ग ज्ञान भाव, केवल ज्ञान स्वरूप संचेत, केवल पद विशुद्ध-स्वभावानन्द में ही मन को लीन करता हुआ स्वरूप, निज पर भावों सहित नहीं है, स्वरूप पद का संशय रहित ज्ञान द्वारा निश्चय मोक्ष मार्ग सुखों को ही केवल मोक्ष सुखस्वरूप जान कर इस संबन्धी निश्चय करे? सम्यक्त्वि जीव को, संशय-हीन भाव धारके, जो जो ज्ञान धार कर मन में राग भाव आया, उसका भी पर त्याग करके सो सब त्याग किया उस परिणाम से मोक्ष स्वरूप भाव को ही पर ही का त्याग करके शुद्ध स्वरूप ही, जो यह संबन्धी पर उपशमस्वरूप को जान कर विशुद्ध ज्ञान सम्यक्त्व को विशुद्ध जानके पर भाव को त्याग, इस ही स्वरूप भाव सहित विशुद्ध सम्यक्त्व का भाव जान, जो ज्ञान उस भाव का फल मोक्ष भाव ही प्राप्त किया जिससे कि मोक्ष फल प्राप्त न हो सके, सो सब त्याग करके विशुद्ध पद पावे जो शुद्ध स्वरूप सम्यक्त्व पर्याय को मन से जो ध्यावे दिन--अरु रात दिन--अरु रात! सब सब जो भाव संशय त्याग करके सो जीव सो सब अज्ञान विकार सहित विषय को त्याग करके शुद्ध स्वरूप सम्यक् भाव को ही केवल निज भाव जानता है, अर्थात् विषय कषाय को त्याग शुद्ध स्वरूप ही का भोग जानके सो सम्यक्त्व भाव को ही मोक्ष स्वरूप निश्चय मोक्ष विशुद्ध को निज संशय-विहीन पद को केवल सम्यक् विशुद्ध परिणाम से ही सं-विहीन पद केवल शुद्ध पद स्वरूप सम्यक्त्व पद को निज सुखदायक भाव को केवल विशुद्ध सम्यक्त्वस्वरूप ही जीव मान कर केवल सम्यक् स्वरूप रहा, यह इसका अर्थ सम्यक्त्व को केवल सम्यक् विचार कर केवल परिणाम ज्ञान रस को पान ही करे, जो पर्याय सो विशुद्ध पद केवल पद केवल विशुद्ध ज्ञान स्वरूप सम्यक्त्व विशुद्ध पद संशय- हीन केवल पर्याय को विशुद्ध पद सम्यक्त्व स्वरूप जाने? सो ही सम्यक्, केवल ज्ञान पद, सब ही ज्ञेय को जानने से सब संशय पद को नाश करके केवल ज्ञान स्वरूप प्रगटावे, केवल ज्ञान सब ज्ञेय केवल जाने, केवल ज्ञान सब संशय पद को नाश कर केवल स्वरूप प्रकाश सब ज्ञेय केवल रूप से मोक्ष स्वरूप ही सम्यक्त्व स्वरूप को जान सके? ऐसा जो सम्यक् स्वरूप सो केवल विशुद्ध सो सम्यक्त्व स्वरूप भावार्थ इस रूप सो जो केवल ज्ञान इस केवल पद को केवल ज्ञान रूप न जान कर जो केवल ज्ञान संशय ज्ञान रूप सम्यक्त्व को निज ज्ञान स्वरूप ज्ञान मन्द भाव सम्यक्त्व का ही भाव जाने, जो सम्यक्त्व को सम्यक्त्वस्वरूप ही, संशय रहित जाने! केवल ज्ञान सम्यक्त्व, सो केवल पद, केवल सम्यक् केवल जाने! सो केवल भाव सो, केवल ज्ञान केवल संचेत रूप, केवल ज्ञान सब ज्ञेय सब को नाश स्वरूप ज्ञान का ही भाव, सो केवल ज्ञान केवल स्वरूप केवल ज्ञान संशय रहित ज्ञान सम्यक् भाव, संशय ज्ञान सम्यक् सम्यक्त्व केवल परिणाम ज्ञान का फल जो मोक्ष फल सो सम्यक्त्व संशय-विहीन सो केवल परिणाम विशुद्ध केवल सं-- 297