एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतथा ज्ञान, तथा ध्यान, तथा विद्या इत्यादि साधनों का तो क्या काम जहाँ आनन्दमय स्वरूप का वास, जहाँ वासना रूप विषय-भोग का सम्बन्ध ही, वहाँ काम क्रोधादिक माया का चक्र-व्यूह रहता होगा ऐसा जान कर उन सब मुनियों ने एक मत हो कर श्री सच्चिदानन्द-घन प्रभु श्रीकृष्ण भगवान् के चरणारविन्दों का आश्रय ग्रहण किया जिससे वे सब के सब अनायास ही इस भव-सिन्धु पार उतर गये, तब शुकदेव जी, जो जन्म-काल सेही ज्ञानी तथा निष्काम रूप भगवान् के स्वरूप का ध्यान धरके उस समय ध्यान-मग्न हो गये। हे महाराज ! तब यह सब कौतुक देख, राजा परीक्षित ने भी विचार किया कि अरे रे! यह क्या हुआ, भूल तो हुई, पर बड़े भारी पुण्य-कर्मों के उदय से हुई। जो भगवान् ने मुझे मुनि के पास भेजा और मुनि ने मुझको शाप दिया। हे महाराज ! राजा ने ऐसा विचार कर अपने पुत्र को राज्य-भार देकर आप संसार से विरक्त हो, श्री गंगा जी के तीर पर जा बैठे और आमरण अनशन का व्रत धारण किया। उसी समय व्यास, पराशर, शुकदेव, नारद, दुर्वासा, विश्वामित्र, कश्यप, भृगु, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, अत्रि, भारद्वाज, अगस्त्य, कण्डु, च्यवन, कण्व, मैत्रेय, दालभ्य, और्व, आपस्तम्ब, मार्कण्डेय, शतानन्द, भारद्वाज, कपिल आदि बड़े-बड़े महर्षि अपने-अपने शिष्यों सहित वहाँ आये। राजा परीक्षित ने सब मुनियों का चरण-स्पर्श कर यथायोग्य पूजन किया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि, “हे मुनीश्वरो! कृपा करके मुझे वह साधन बताइये जिससे मेरा कल्याण हो और श्री भगवान् के चरणों में मेरा मन लगे।” राजा के ऐसे वचन सुन कर सब मुनियों ने आपस में विचार किया। कोई कर्म काण्ड को श्रेष्ठ कहने लगा, कोई ज्ञान को, कोई योग को और कोई तप को उत्तम बतलाने लगा। जब मुनियों में मत-भेद हुआ, तब राजा ने कहा कि “हे मुनीश्वरो! मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे सात दिन में मेरा उद्धार हो जाय।” जब सब मुनि आपस में विचार कर ही रहे थे कि इतने में श्री शुकदेव जी वहाँ पधारे। शुकदेव जी को देखते ही सब मुनि उठ खड़े हुए और उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। राजा परीक्षित ने भी शुकदेव जी के चरणों में प्रणाम किया और प्रार्थना की कि, “हे भगवन्! कृपा करके मुझे वह कथा सुनाइये जिससे मेरा उद्धार हो जाय।” शुकदेव जी ने कहा, “हे राजन्! सुनो, मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ जिसके सुनने से मनुष्य सब पापों से छूटकर भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है।” 298