भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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कथा समाप्त हो जानेके पश्चात् उसने उस सेठ को बुलाया, और उससे कहने लगी कि तुम अपने कपड़े और सोने का हार ले लो तथा मुझे घर पहुँचाने की कृपा करो। सेठने इसके उत्तरमें उस वेश्या लवणवती से जो जो बातें कीं उनपर पाठक विस्मय करेंगे! सेठने उससे कहा कि उस धर्मकथाके फल से तो मैंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध किया है। मैं पहले कामी था, पापकर्म करके अपना जीवन, अपनी यह देह खोता था। उस कुशीलके फलसे नरक में जाना पड़ता था तथा इस लोक में भी दुर्गति का पात्र बनना पड़ता था, परन्तु अब मैं, धर्मकथा सुन पवित्रात्मा बन गया हूँ! इसलिये मुझमें पाप क्योंकर सम्भवे? अब कामिनी का क्या काम है, विषय का क्या काम, सम्पदा का क्या काम, हार का क्या काम? सो आप ले जाइये। इन बातों को सुन वह रो पड़ी कि जिस सेठ को वेश्या बनाने आई, वही उलटा शिक्षा दे रहा है। अपने मनमें सोच विचारकर उसने भी यह बात स्वीकार की और बोली कि जी, आपकी बहिन अथवा बेटी हूँ--सो मुझे भी धर्मोपदेश करो, जिससे नरकके डर से बचूँ। अब तो मेरा पाप, उस पापी जीवके सदृश नरक पहुँचाने वाला होगा? क्या उपाय करूँ? मुझे कोई उपाय सुझाया जाय! हे भाईजी! मुझे तारिये। मुझे पवित्र बनाइये! मुझपर भी दया की जायगी? मुझे भी धर्मका मार्ग मिल जायगा? मैं भी ऐसी पवित्र बनूँगी, कि फिर पापस्थान में कभी पैर नहीं धरूँ। मेरा सारा जन्म पापमें क्यों बीता होगा? इस पापकर्म से मुझे मुक्ति कैसे मिल जायगी? इन बातों को सुन सेठजी बहुत ही प्रसन्न हुए, सो यह बात विचार-योग्य विचारने की विचारना से भरा हुआ मनुष्य जब कभी भी उपदेश पाता है तभी चेतता है, यह सोच सेठने भी उसे सच्चा नियम दिलाकर धर्मोपदेश दिया, अब दोनों ही के मनमें वैराग्य जागा था, "संसार अनित्य, अशरण संसार, संसार असार।" सेठजी तो अपने घर से ही सब धर्म कर्म के फल को जान आये थे। अब लवणवती को साथ ले नगर की ओर आये, मार्ग में उस वेश्या लवणवती को जो मिलें सो सब उससे कहें कि लवणवती तू सेठ के साथ कहाँ से आती है? इस पर वह लवणवती कहने लगी, धर्मस्थान से आई हूँ। तुम भी चलो। इस तरह वह भी, इस नवीन रीति वाली हुई--सो नगर में जाने पर ही उसने जो लम्पटों का मेला था तोड़-फोड़ कर, धर्मका ही फल चाहा, सब ही को धर्म कहा, लम्पटों से मुख फेर सब धन धर्म में लगाया, सो भी ऐसा कि; उस समय जो निर्धन थे, धनवान् हुए, जो रो रहे थे सो हंसने लगे तथा सब मनुष्य ही धर्मके काम करने लगे। सेठजी के धन का भी कोई पार नहीं था। वे भी मुक्तहस्त से दान करने लगे। सेठने जो लवणवती वेश्या बनाई थी उसको छुड़ा दिया। सो इस प्रकार विद्या-मन्दिर तथा औषधालय इत्यादि का सब काम ही उस पुण्य वेश्या के हाथमें सौंप दिया। इस प्रकारके अनन्त वैभव और धन को त्याग कर, सेठने तथा वेश्या दोनोंने ही अपना परलोक का मार्ग सुधारा। सो भव्य जीवों को, "सद्धर्म प्रभाव से ही सुमार्ग मिलता है।" ऊपर लिखे गये पाठ से हे भव्यो, विचार करो कि उस धनपाल सेठने जिसे, एक ही कथा से यह लाभ हुआ, सो धर्मस्थान कभी-कभी जब जाओ तो मन लगा कर कथा को सुनो। इस प्रकार, सुलोचना का रूप धार कर वेश्या जो उस सेठ को रिझाने आई थी वह निष्पाप कैसे हुई? क्या लवणवती ने धर्म का नाश कर उस सेठ को वश में किया था? क्या सेठने उस वेश्या को भोगके वश उस रूप सुलोचना को चाहा था? सो नहीं, कभी भी नहीं, दोनों ही शुद्ध विचार से पवित्र निकले; उस कथा को सुन कर ही दोनों ही पार हो गये। इस लिये ऐसा धर्म जो सब पापों को दूर कर मुक्ति को पहुँचाने वाला है। इस धर्म का ऐसा प्रभाव है कि जिसे प्राप्त कर, मनुष्य सब प्रकार के भोग- विलास त्याग कर वैराग्य को प्राप्त होता है। जब भी जीव को धर्म का सत्य स्वरूप मालूम होता है तब वह सब पापों को त्याग देता है। सो इस प्रकार धर्म का फल सब जीवों को जान लेना चाहिये; यही विचार करके धर्म का फल भी भोगना चाहिये! अब इस कथा से निश्चय हो गया, कैसा प्रभाव इस कथा का है? उस कथा प्रभावसे क्या नहीं हुआ, सो अज्ञानी जन इस बात को क्या जानें? अस्तु, पाठकों को सदा धर्म कथा को ही सुनना चाहिये। यह मन कभी भी एक ओर नहीं रह सकता। इसलिये भाई, सदा उत्तम काम को ही चित्तमें लगाये रखना चाहिये। सो सब प्रकार ठीक। 310