एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार जब अलग-अलग काम हो, अलग-अलग काम का भाव आध्यात्मिक साधना का आधारभूतस्वत्व रूप समझना ही वास्तव में ईश्वर भक्ति माना जायगा, किसीका भी अपमान न होगा, किसी काम पर भी यह भाव आयेगा, किसीका भी काम छोटा या निष्फल नहिं रहा, प्रत्येक का ही काम परमेश्वर के सम्मुख रहने और उस की सन्निधानता रूप एक आधार का सम्पादक माना ही जाय सब काल में, किसीका भेद ही न रहा-सबके ही निष्काम कर्मयोग रूप अभ्यास के फल से सब को ही परम शान्ति प्राप्त हो सके और उस परमपिता परमात्मा का साम्राज्य ही सत्य रूप, सब काल में सब प्रकार सत्य स्वरूप ही माना जाय और सब काल अथवा में, जब तक संसार रहे, तब तक ईश्वर भक्ति ही रहेगी "सब को ईश्वर का प्रकाश रूप स्वरूप माना गया" इस ऊपर लिखे हुए, प्रमाण के साथ, सब मत पंथ भी काम में, जो साधन का फल आत्मिक शान्ति रूप अथवा स्व स्वमान्य को ठहराया गया हो, सब प्रकार यथार्थ माना सब मतों द्वारा गया है, वास्तव में सब काल रूप साधन ईश्वर सम्बन्धी प्रमाण रूप का आधार ही अभ्यास रूप से आत्मिकस्वरूप के प्रकाश रूप में ही सब मतों द्वारा माना गया, तो सब मतों का परम आधार ही आत्मिक सत्य रूप प्रकाश ही आत्मिक रूप से सब मत पंथ वालों को प्रिय है, तो जो भी जिस भी प्रकार उस प्रकाश रूप परमात्मा रूप को ही मान कर ही उस का ही अभ्यास करता हुआ उस परम प्रकाश को आत्मिक रूप से ही प्राप्त करना चाहता है उसका यह भाव सब प्रकार से ही सत्य समझा गया सब काल रूप में, जब कि आत्मज्ञान रूप सब प्रमाण सब को ही एक ही भाव में सत्य ज्ञान-स्वरूप रूप परमात्मा का माना गया और सब मत पंथों के तत्व रूप आधार को सत्य ही मान कर सब प्रकार से ही अभ्यास को सब काल स्वरूप माना तो जो विरोध का भाव सब काल प्रत्येक मतों का आपस में चला आ रहा माना, उसका आधार किस पर ही माना गया? प्रत्येक मत ही सब प्रकार के अभ्यासक गण, केवल शास्त्र के ही वचन द्वारा अपने मत की बड़ाई करते हुए दूसरों रूप अपने विरोधी माना गया अथवा सब गैर-मुसलमानों को काफिर माना गया जिस प्रकार, "सब संसार का प्रकाश रूप माना गया" सब परमात्मा का प्रकाश रूप ही सब मत पंथ वाले आधार रूप मानकर सब प्रकार विरोध भाव को क्यों रूप बना रहे? उसका भाव यही था, केवल शास्त्र की बड़ाई द्वारा ही, किसी भी प्रमाण को आत्म-साक्षात्कार यथार्थता के सम्मुख नहीं माना गया केवल ही अपने ही सम्प्रदाय शास्त्रार्थ परम्परा के अनुसार बड़ाई का रूप सब ने ही, सब का आधार ही केवल अपने साम्प्रदायिक स्वरूप को ही ठहराया, उस कारण सब सम्प्रदाय, सब काल ही एक दूसरे दृष्टिकोण सम्प्रदाय रूप से असत्यता ठहराकर सब को आपस में अधर्मी रूप मान करके आपस में विरोधी भाव रूप हो रहे थे सो, अज्ञानता के कारण ही, सब काल ऐसा रूप ही संसार में देखा गया इस अज्ञानता का आधार केवल ही अपने साम्प्रदायिक स्वरूप का रूप ही प्रमाण ठहराया गया और सब को अधर्म रूप ही माना गया, तो जो आत्मिक सत्य का प्रमाण था, केवल शास्त्र ज्ञान रूप का आधार परमात्मा के प्रकाश रूप द्वारा प्रत्येक का आधार तो एक रहा, सब संसार का, सब प्राणियों का ही, जो ज्ञान-रूप सब का मूल सब का कारण प्रकाश रूप ही रूप सम्प्रदायों का आधार बताया, उसी ज्ञान सम्बन्धी भाव को, त्याग दिया गया जिस का अभ्यास ही आत्मिक रूप सब मत या पंथ परमात्मा सम्बन्धी भाव द्वारा सब सम्प्रदाय को ही सब ही आत्मज्ञान का अभ्यास रूप सब को सब ही काल रूप में सब काल अभ्यास द्वारा, केवल, केवल, ही ज्ञान द्वारा पाया जिस का प्रकाश ही परमात्मा स्वरूप रहा, तो फिर झगड़े का क्या रहा? क्या सब एक रूप ही, सब परमात्मा रूप ही सब ज्ञान रूप नहीं है? तो फिर झगड़ा ही कैसा? जब सब परमात्मा का स्वरूप है! फिर सब का भाव एक ही परमात्मा स्वरूप प्रकाश ही रहा है? सब को एक ही तो, जिस भी रूप से, उस ईश्वर को ही न पा, सब मत वाले उस प्रकाश को पायेंगे? फिर झगड़ा कैसा है? केवल ही केवल नाम, रूप-रंगों का भिन्न स्वरूप है? गुण-धर्मों का भेद कहां रूप दिखता? सब ही ईश्वर के काम को ही सब अपने स्वरूप को साधन माना है, जिस प्रकार काम ही, अपने भाव द्वारा अपने काम रूप को ईश्वर का ही रूप मान कर यथार्थता से, हर प्रकार सब काम को केवल फल-दाता सब का जन-दाता ही 317