भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विचार कर मनुष्य किसी शुभ संकल्प रूप धन द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कर सकता है। अन्यथा वह दुर्गति को पाता। सम्भवतः, स्वामी जी सोचते थे; यद्यपि समाज की शक्ति क्षीण, उत्साह मन्द हो चुका था तथा लोग मोह निद्रा में सो कर अकर्मण्य बनते थे, परन्तु धर्म कथा द्वारा उनके हृदय में ज्ञान, दया, वैराग्य तथा भक्ति भाव उत्पन्न हो सकता, इसलिए लोग धर्म कथा श्रवणोत्सुकता को जब देश-देश में जा कर देखते थे समाज की दुर्दशा जागृत थी, अज्ञान अन्धकार से समाज को जगाने का यत्नशील हुआ करते थे। अनेक सम्प्रदाय बनते जाते थे तथा वे सम्प्रदायवादी ही, विशेष कर अद्वैतवाद या मायावादका पाठ ही जन साधारण जन को पढ़ा कर निष्क्रिय बना रहे थे। जब तक जैन धर्म प्रचार तथा श्वेताम्बर सम्प्रदाय, स्थानक, तेरहपंथ अनेक शाखा तथा उपशाखा का सम्प्रदाय फल फूला, स्वामी जी इन सम्प्रदायों की क्रिया रूप धर्म का फल शून्य ही, पा रहे थे। ऐसा था, इस पर भी वे जैन धर्म सम्प्रदाय का रूप धारण किये "सच्चे जैन ही स्वरूप का उपदेश देना अपना कर्तव्य था।" इस प्रकार विचार कर, जनसाधारण वर्ग के अन्तर आत्मा जगाना आवश्यक समझकर ही केवल साधुवर्ग तक उपदेशामृत रस जन जन्य पाकर ही जन कल्याण की आशा ही कल्याण रूप हो सकती साधक लोक को उपदेश देने का जो भाव था सो केवल जन कल्याण की भावना थी। सम्प्रदाय की सीमा रूप मर्यादा रक्षा करना उद्देश्य न था, इस कारण कभी कभी वे समाज के उन अंग को भी जो जैन मर्यादा तथा आचार विरुद्ध था, उस पर चोट किया कर सुधारने का यत्न भी करते थे, जन जन को न तो सम्प्रदाय विशेष माना अथवा प्रचारित करते थे। केवल जनसाधारण आत्मा कल्याण तथा जन कल्याण की दृष्टि सब में साम्य भाव लाते हुए ही वे सब धर्म का उपदेश दे रहे थे। केवल धर्म का उपदेश ही वे देते थे। जन-कल्याण जन-मंगलकारी वाणी के द्वारा संसार के जीव, भव्य, भव्य, अभव्य, साधारण, जन कल्याण परम्परा में सब स्वरूप प्राप्त करने का साधन हो सकता था इसलिए उपदेश दिया करते थे जन, जन की आवश्यकता थी, सो उनकी दशा सुधारने उपाय करने, सब का भला करने का धर्म ही जन हित रूप धर्म कहा गया, इस से, वे केवल यह धर्म का प्रचार करने का यत्न ही कर समाज का भला करने विचार करते हुए भी जन का भला तो समाज का भला स्वयं हो जायगा न? सो विचार कर धर्म ज्ञान? का उपदेश दे रहे थे। जन समाज की दुर्बलता को सुधारना हो तो, जन को अपनी भूल जान कर, उस का परिहार कर लेना, यह ही आत्मोद्धार का मार्ग था सो स्वयं धर्म कथा उपदेश द्वारा किया जा रहा, इस प्रकार विचार? सो जन समाज, अपने कर्तव्य कर्म जाग कर जन साधारण सुधार सम्भवशील हो सकता था, इसी लिए स्वामी ज्ञान कथा रूप में सम्प्रदाय प्रचार विचार न कर सब समाज सुधार तथा जनसा मारक पथ का ही पथ बना रहे, जिस पथ पर सब ही जन समाज निर्भय हो कर चल कर, आत्मिक कल्याण लाभ जनसाधारण को प्राप्त हो सकता था। यही विचार स्वामी आत्माराम जी द्वारा जन साधारण को समाज रीति-नीति तथा मर्यादा-विधि का जो ज्ञान था। सो तो सब जन ज्ञात, सो प्रत्येक को ज्ञान करा, सब को ज्ञान योग्य बनाने का धर्म उपदेश दिया जा रहा तथा समाज की उस मत को जो दुर्बल बना रहा था। धर्म ग्रन्थ- ज्ञान का साधन तो बना ही लिया तथा जन-साधारण को सरल लोक-भाषा शैली से अवगत करवाया भी, उस सब ज्ञान प्रचार को सब प्रकार सुगम करने ज्ञान दान की प्रथा को भी, घर घर तक फैला समाज का सब व्यक्ति ही आत्मवान होकर सब का संरक्षक बन सके, ऐसी सम्भावना सम्प्रदाय से सम्भव न थी जब तक प्रत्येक व्यक्ति को यह ज्ञात न हो कि वह जीव-जगत का रक्षक तथा पोषक ही कर्तव्यवान बने तथा आत्म-रूप ही अपने आत्मा को सब जीव रूप में ही सब जन जाने, तभी तो हो सके! सो उपदेश ही सब जन कल्याण वाणी का जन जन तक प्रसार किया गया इस प्रकार उन का यह, जन जन्य जीवन का ज्ञान मार्ग सब को सब तरह से स्पष्ट, सब जन का हो, जनसाधारण रूप से जीवन ज्ञान युक्त हो कर जन समूह, सब जन का हो, सब को आत्म स्वरूप का ज्ञान करा कर लोक धर्म जन जन तक, ऐसा ही मार्ग पर चलाकर जन कल्याण को ही, जन जन कल्याण कल्याण स्वरूप लोक कल्याण का रूप देकर ही लोक रूप जन जन का जन जन को, धर्म का ज्ञान कराना ही सम्भवता 318