भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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तब राजा दण्डवत प्रणामकरि, उन सात महात्माओं पास हाथ जोरि जो बोले सो सुनिये। हे स्वामी ! कृपा करि यह कहो, महाराज दशरथ अपने भवन पर प्रसन्न सहित आन विराजैं कहूँ नहीं वा, उनकूँ कोई दुःख विघन व्यापैगा नहीं? तबहीं विश्वामित्र बोले, "राजा जनक, तुमारे मनोरथ, सबही पुरेंगे" राजा को ऐसा आश्वस्तकरि सब ऋषि जो विश्वामित्र सहित मिथिला नगरीकूँ पधारे तहां सकल लोग हर्षित भये। सब देवगण भी जो विमान पर सवार होय आकाश में से पुष्प-वर्षाकरते भये वा बाजे बाजे, नगर वासी प्रसन्न होय राजा को भेंट दिये वा बधाईयां दी, आनन्द के मंगल कलश साजे गए वा, सब पुर को साज-सँवार करि के, वन्दन-वार बांधे वा, चन्दन केसर अगर कपूर से सब बाज़ार को छिड़क दिया, जगह जगह स्वर्ण कलश धरे वा ध्वज पताका फहरा दिये पश्चात् विश्वामित्र सब ऋषि सहित पुर के मध्य में पधारे जनसमूह दर्शन करि करि पांयन परन लगे, विश्वामित्र जी आशीर्वाद देतेय हुए राजा जनक सहित राज मन्दिरकूँ पधारे। विश्वामित्र महामुनि सब ऋषिन समेत आसन बिछे हुएन पर विराजे वा जन समूह चरणामृत लाय वा पान बीड़ा देकर वा चन्दन अतर आदि से सब की पूजाकारि हाथजोड़ स्तुति की तदनन्तर, राजा विश्वामित्र चरणकूँ धोय के चरणामृत सब कुटुम्ब के लेवाय, चरणामृत पी, पाद्य अर्ध्य दे, षोडशोपचार सहित पूजन करि विश्वामित्र सहित सब ऋषिन को हाथ जोड़ करि, हाथ बांध के प्रणामकरि के बैठ गये। राजा को विश्वामित्र ने फिर आश्वस्तकरि कहा कि सीताजीकूँ बुलाय ल्याओ, तब राजा जनक ने सीताजीकूँ आज्ञा भिजवाई तब सब सखी सीताजीकूँ लाय के, विश्वामित्र जी, शतानन्द गुरु सहित जितने भी मुनिगण विश्वामित्र के, शुभागमन निमित्त एकत्रित हुये सबको पांयन पराय शीश नवायन कराया वा मुनि आशीर्वाद देय जनक सहित सब सभा आनन्दित भई। पश्चात् विश्वामित्र बोले, जनक जी सुता तुम्हारी, सबही भांति से धन्य हो धन्य जनकजी की जय बोलते हुए बोले "धन्य जनक" सब सभा भी जनकजी महाराज की जय जय बोल के जयजय शब्दकरि प्रसन्न भये पश्चात् सब मुनि आज्ञा ले अपने निज आश्रम गये, पश्चात् "दूत का प्रस्थान" श्री राम विश्वामित्र गुरु, शिव--धनुष, सीता विवाह, स्वयंवर, मिथिला नगरी दशरथजी को सब समाचार सुनाने को एक योग्य दूत को आज्ञा की विश्वामित्र जी, शीघ्र अयोध्या को प्रस्थान करो राजा जनक से, सतानन्द, जनक, विश्वामित्र जी राजा दशरथ को पत्रिका दो, शीघ्र गमन कर अयोध्या प्रवेश करो वा, हाथी, रथ, पदातिक सब साथ कर के दूत को रवाना कर, दूत शिव--धनुष भंजन वा स्वयंवर सब हाल ले गया जी, जो पत्रिका विश्वामित्र जी की वा राजा जनक जी ने पत्रिका दी थी विश्वामित्र विश्वामित्र आज्ञा से सब वृतान्त राजा दशरथ जनकजी स्वयंवर का सब समाचार लेकर दूत जो गए वह शीघ्र तीन दिन चलकर अयोध्या नगरी पहुँचे। तब दूत नगर में प्रवेश हुए वा सब महल देखे महल के आगे सब द्वारपाल बैठे व दरबान, इन को विश्वामित्र आज्ञा अनुसार व पत्रिका दिखलाय कर भीतर को प्रवेश, दूत का सम्मान, राजा दशरथ को समाचार कहा महाराज अयोध्याधीश की जय जयकार कर हाथ जोड़ व सिर नवाकर पत्रिका दी, व कहा सब हाल विस्तार दूत को सब हाल सुना हुआ, शिव--धनुष टूटना सीता विवाह की बात सुन सब अयोध्या नगरी हर्षित भई राजा दशरथ सहित सब पुर में आनन्द ही आनन्द मंगल गान होने लगे वा सब पुर के लोग यह मंगल बात पर विश्वामित्र राम की प्रशंसा करने लगे। तब राजा ने सब मन्त्री वा पुरोहितोंकूँ आज्ञा दिवाई कि सब सेना को भी सुसज्जित कराओ, पश्चात् दशरथ अपनी रानी को यह सब सुनाया, तब सब रानियां प्रसन्नता पूर्वक हाथ जोड़ कर बोलीं "राम जी सब दुख हरने वाले हैं, सीता बहू समेत हम सब भेंटेंगे" सब पुर लोग प्रेम से भर गये सब लोग जय जय जयकार बोलने लगे वा सीता जी, मिथिलापुरी राजा जी की कीर्ति को अपने मुख कहते सब पुर के, मिथिलापुरी राजा की जय जयकार के नारे लगने लगे सब अयोध्यावासी प्रसन्न हुये वा, विश्वामित्र गुरुजी राम लक्ष्मन की जय जयकार बोलने लगे वा सब लोग मिलकर जो बधाई गान करने विश्वामित्र गाथा गाय गाय आभूषण लुटाने की आज्ञा करी सब लोग धन्य धन्य कह के बोले धन्य, जनक राजा को, जिनकी सुपुत्री सीता जिनके साथ श्री राम का सम्बन्ध हुआ? फिर विश्वामित्र गुरुजी? की जय जय राम 320