एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसमझा दूँ? जब तक सब का सन्देह न, हो जाय तब तो केवल कहने से लाभ क्या कह बैठते हैं, सो क्या सब लोग सब बातोंका यथार्थ स्वरूप जानते ही हैं? इसलिये सब का, जिस बात में जो सन्देह हो सो निवारण हो जाय वही उत्तम इससे आगे भी जो लोग ज्ञान रूपी अमृत पान करने की इच्छा रखते हैं; सुनो सुनो, ऐसा ही कहूँ न? सो सुनो जी, सब लोग सब बातों को नहीं जान सकते कोई किसी बात को, किसी बात को कोई दूसरा जाने, कोई किसी बात को न जानने का दावा कर ले, सो तो योग्य नहीं, क्यों भला? सब तो सब नहीं! हां जो सर्वज्ञ हो, सदा ऐसा व्यापक यथार्थ तत्त्व, सब बातें, सब के सब भावों को सदा जानता, सो सर्व ज्ञानी कोई संसार में तो सब लोग सब निमित्त रूप जान पड़े, यथा क्या? किसी को कोई उपकार का काम पड़े, बस उ सी-को सब निमित्त ही तो हैं! इसलिये जिस बात का जिस को निमित्त हो उस को उस का, सो भी निमित्त मात्र ही जान पड़ता निमित्त तो संसार के निमित्त मात्र निमित्त से नाम मात्र सं-सार, सो यह भी केवल सब निमित्त निमित्त ही तो है सब को, किसी को तो कुछ ज्ञान ही न हो सो निमित्त ही क्या हो सके जो कुछ भी... न निमित्त कहलाने के ही निमित्त से सब को सब में जान पड़े, जिस से कि सब को सब रूप जान पड़े। सो परमात्मा केवल तो सब रूप सब सब स्वरूप ही, जो सब ज्ञान रूप सब सब स्वरूप है, सो परमात्मा केवल केवल ही सब ज्ञान से हीन है? सब तो हीन नहीं ज्ञान सदा सब, "ज्ञान सब ज्ञान रूप सब रूप सब का" सब का सब तो सब तरह से, सो केवल ज्ञान, सो सब का केवल ही ज्ञान सब ही का रूप सब का ज्ञान केवल ही सब स्वरूप सब रूप जान पड़े, सो सब को सदा सब सब स्वरूप सब स्वरूप केवल सब का, सो सब तो केवल स्वरूप ही सब रूप रहा। केवल सदा ही, सो परमात्मा सदा तो केवल ही ज्ञान ही ज्ञान रूप का ज्ञान सब परमात्मा सदा ज्ञान रूप ही तो सो परमात्मा सदा सब का ज्ञान स्वरूप परमात्मा से सब ही सदा ज्ञान रूप, सब ही, सदा ही सब ज्ञान रूप परमात्मा सो सब केवल स्वरूप ज्ञान ज्ञान से सब को सब तरह से जान पड़े सब रूप सब सदा सब के ज्ञान ही का केवल ही ज्ञान ही रूप, सब सदा परमात्मा केवल ही सब सदा ज्ञान ही सब तरह सदा सदा ही ज्ञान सब ज्ञान निमित्त से सब को सब ज्ञान ही सब ज्ञान रूप सब निमित्त से सब ज्ञान सदा ज्ञान ही केवल ज्ञान, सो तो सब का सब ही स्वरूप "सब का ज्ञान सदा केवल ज्ञान स्वरूप ही निमित्त केवल सदा ज्ञान ज्ञान ज्ञान-ज्ञान सदा सब, केवल सब ज्ञान ज्ञान ही तो सब का" परमात्मा तो सब तरह सब ज्ञान रूप ही तो सब का रूप ही ज्ञान रूप सो तो सब का सब रूप सब केवल परमात्मा ही सब तरह से सब रूप सब परमात्मा सदा ही ज्ञान ही तो सब सदा ही तो सब रूप सब रूप सदा ही ज्ञान ही ज्ञान केवल सब रूप सब रूप का, सो परमात्मा स्वरूप रहा, ज्ञानस्वरूप सदा रहा, सो सब रूप सब रूप सब सदा ज्ञान ही, सब रूप सब रूप सब केवल रूप सब तरह से, सो परमात्मा केवल सदा, सब तो केवल रहा, सो केवल सदा ही ज्ञान रूप से केवल सब रूप सदा ज्ञान ही ज्ञान ही सदा ही, सब का रूप सब ज्ञान स्वरूप ही सदा ही सो परमात्मा सब रूप ही सब का, सो ज्ञान रहा; सदा सदा ही रहा ही, सो सदा रहा। परमात्मा परमात्मा सब ही तो सब सब तरह सब रहा, सदा सदा रहा, न सब रूप से, न सब तरह न सब तरह, न सब परमात्मा रूप सब स्वरूप ही सो सदा ही केवल सदा केवल ज्ञान सदा, सो सब स्वरूप सो परमात्मा परमात्मा ही स्वरूप रहा, केवल तो सब ज्ञान केवल ही तो ज्ञान रूप ही परमात्मा ही सब स्वरूप रहा, सब परमात्मा ही सब ज्ञान रूप सदा सदा रहा, "परमात्मा सदा सब ही केवल ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान रहा, सदा सब परमात्मा सदा ज्ञान ही सदा सब स्वरूप केवल सदा रहा" सदा सदा रहा, सो तो सब केवल रहा, केवल ही केवल सदा स्वरूप परमात्मा केवल परमात्मा सदा ज्ञान ही, सो निमित्त से सब ज्ञान सदा सं--सार निमित्त से स्वरूप सं--सार ही तो सदा सदा सब का, सो तो तो केवल ही तो 321