भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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जब जीव का यह या वह नाम पाया जाता तथा जब तक वह नाम बना रहताथा, तबतक जीवके उस नाम द्वारा ही उस पदार्थ ग्रहण होता; पर वास्तवमे जितने परमाणु का स्कन्ध बना; वह समय-समय विनष्ट पर्याय स्वभाव, सो उसका नाम... । अब देखना यह है कि यह शरीर मेरा स्वरूप, अथवा मैं पृथक्भूत हूँ? इस शरीर से मेरा स्वरूप पृथक् नहीं, जैसा कि देखा गया, अथवा मैं पृथक्भूत ही बना रहता हूँ? यद्यपि इस शरीरमें मेरा, जैसा कि देखा गया नाम पड़ा था तथा इस देह संयोगके निमित्त से मैं नाना देह रूप बना था तथा शरीर में कर्मों का सम्बन्ध रहा, जिससे कि देहसे सम्बद्ध प्रत्येक परमाणु मुझ जीव सम्बद्ध था, जिस कारण इस देहके साथ ही मेरा सम्बन्ध बना सो वास्तवमे तो नहीं; पर इस शरीर के साथ मेरा जो सम्बन्ध, सो केवल उपाधि मात्र था। यद्यपि देह संयोग के रूप में जो कुछ देह बना दिखता आत्मामें कर्मोका सम्बन्ध बना था, जिस कारण आत्मा देह रूप, देह आत्मा स्वरूप प्रतीत हुआ करता था? पर अब ऐसा सम्बन्ध सम्भव नहीं रह गया जिससे कि मैं इसे देह रूप कह सकूँ अथवा देहको आत्मा? देह पृथक् अथवा आत्मा? देह पृथक् आत्मा? सो, यह सब बात केवल उपचार से थी, जो अब मात्र कल्पना प्रतीत होने लगी। वास्तवमे आत्मा देह रूप कभी भी उपचारमात्र से भी नहीं बन सकता इसका कारण आत्मा चेतन रूप है। इस कारण न तो मैं इस देहका सम्बन्ध मात्र रहा और न यह देह ही किसी प्रकार से मेरा सम्बन्धी बन सकी, वास्तवमें देह विनाशी पदार्थ है, जो नष्ट होने पर भी जीव का कुछ न हुआ सो, यह जीव इस देह का कुछ रूप नहीं बना। जो कुछ मेरा कहा जाता रहा तथा जो कुछ भी अन्य पर्यायें या तो देह रूप हों, या देह से भिन्न हों, वे केवल नाममात्र थीं, सो केवल नाम, जो किसी का कोई पदार्थ बन सकेगा? नाम इस रूप कभी किसी वस्तु को रूप नहीं दे सकता या जो केवल नाम ही नाम मात्र कहा जाता हो सो जो कुछ ऐसा कहा जाता, यह केवल शब्दों की ही चेष्टा है। इस जीवका स्वरूप केवल नाम मात्र-रूपी नहीं हो सकता है, जिस कारण से नाम मात्र जीव रूप नहीं? नाम तो न कभी जीवका स्वरूप बन ही सकता जिससे नाम मात्रको जीव समझा जा सके-नाम केवल उच्चारण करने मात्रके लिये है? या किसी वस्तु को संज्ञा मात्रके देनेके लिये है। वस्तु नहीं! सच तो यह, कि यह कल्पना रूप जीव तो केवल न समझने का ही रूप हो रहा था, इस कारण नाम केवल सम्बोधन मात्रके लिये प्रयोग किया जाता है। इस लिये जीवका स्वरूप तो वास्तवमे न तो नाम रूप ही हो सकता है। जिस रूप में नाम रूप चेष्टा मात्र रही सो उस प्रकार की चेष्टा का जीव सम्बन्धी कोई भी सम्बन्ध वास्तवमे कर्मोका नहीं देखा गया, जिस से देहके साथ कोई सम्बन्ध हो सके। सो अब देह या देहके नाम रूप जो भी रूप बन गये थे, वे सब नष्ट रूप हो गये जिनका सम्बन्ध वास्तवमे कभी भी मुझ जीव से न था। वे सब देह सम्बन्धी नाम रूप ही रहे सो देह तक सीमित रहे सो वास्तवमे कभी, न तो मैं उस देह का रूप बना, न कभी मेरा ही उस देह सम्बन्धी नाम-रूप से कोई सम्बन्ध ही रहा। इस प्रकार यह देह, सम्बन्धित बातें सब ही मुझ आत्मा से सर्वथा भिन्न रहीं, नाम सम्बन्धी रूप तो केवल नाम रूप शब्दों का रहा। जो देह रूपमें रहा सो केवल नाम रूप रहा सो वह भी देह तक ही सीमित रहा। "व्यवहार से जो कुछ भी उपचार रूप सम्बोधन या कथन किया गया सो केवल देह मात्र रूप रहा, जिसे उपचार, मात्र ही समझना चाहिये सो जो कुछ कहा गया, वह सब मात्र नाम के रूप में ही कहा गया। इससे जीव का कोई सम्बन्ध न था और आत्मा का भी कोई सम्बन्ध इससे न था। इस कारण सो तो सब नाम रूप ही था जो नाम व्यवहार का ही मात्र रूप माना गया है और रहेगा" इसका स्पष्ट तात्पर्य यह समझ आया कि देह का जो नाम पड़ा सो तो इस देह तक ही सीमित रहा जो देहके विनाशी होने पर उसी समय नष्ट हुआ जिस समय यह देह नष्ट हुई, सो जीवका कोई नाम देह सम्बन्धी नहीं हो सकता तथा जीव का देह-सम्बन्धी नाम, जो कभी जीवका? वास्तवमें तो यह सब उपचार मात्र पर्याय सम्बन्धी रूप मात्र था। इसका जीवसे कोई लेना देना न देखा गया। इस प्रकार यह सारा कथन केवल देह, जीव के सम्बन्ध का रूप मात्र दिखलाता तो कहा पर देहके साथ जीव का न तो कोई सम्बन्ध ही रहा और न नाम 47