भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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यद्यपि वह मनुष्य मात्र सांसारिक सुखभोग भोगते समय केवल अपने सांसारिक सुख भोगनेमें लगे हुए अपने पराक्रम मात्र का ही यश तो गानेंगे नहीं, तथा भी उनका यश तो हो जायगा। फिर उनकी यश बात यदि मात्र सांसारिक ही तक रह जाय तब तो कोई विशेष बात नहीं हुई; किंतु यहां बात तो यह नहीं मिलेगी, यहां बात मिलेगी ऐसी कि जिसको सुनकर संसारके सब छोटे बड़ों का मन पिघल जाय, जो परमात्मा का भजन करें, या न करें, किसी का बुरा, भलाईका काम जिसमें यश मात्र ही न मिले, पर भलाईका बदला, भलाईका बदला, भलाईका यश तो मिलेगा यश तो मिलेगा उस विभीषण यश के तो सब पात्र नहीं, जब तक उस पर कृपा सब प्रभु की न हो जाय या प्रभु, उनके परिवारके ऊपर या उन पर जो उस वक्त उनके साथ थे। भक्तिका यश सब को इस रूप में मिले ही, ऐसा सब भक्तोंके साथ न हुआ हो इसका तो हम यश सब नहीं कह रहे हैं। सब को ऐसा यश मिलना कठिन होता कि भक्त, जो अपने पराक्रम के बल पर संसारके सब बड़े पुरुषों को हरा देवे और उस को इस प्रकार न भगवान् के बलपर यह सब यश का यश रूपमें प्राप्त हुआ हो। इस रूप में जो यह सब हुआ वह संसार के किसी भी मनुष्य के भाग्य में नहीं लिखा था-जो प्रभु की कृपा से विभीषण को मिला। विभीषण को भगवान् ने आज्ञा देकर यह सब कुछ कराया जो कि प्रभु की कृपा-मात्र समझो, केवल विभीषणके इस पराक्रम समझो कोई बात नहीं और न ऐसा यश, केवल एक विभीषणके भाग्यमें यह लिखा, केवल राम कृपा से हुआ उस वक्त सब वानर विभीषणके साथ विभीषणके आगे खड़े होकर प्रभु श्रीराम- लखनके यश का यश गाते हुए हर्षित होते हुए कह रहे, मानो प्रभु का यश गाते गाते आज वे सब उस रूपमें प्रभुके यशको देख रहे थे। सब तो कह रहे थे जो कुछ हुआ सो सब प्रभुकी कृपा, पर यह भी तो सोच रहेथे विभीषणके भाग्य क्या समझिये? वह तो समझे, प्रभु का ऐसा विभीषणपर प्यार था जो इस प्रकार विभीषणके भाग्यमें सब कुछ हो रहा था। सब लोग तो प्रभुके चरणों में साष्टांग दंडवत् प्रणाम कर विभीषणके सम्मुख खड़े होकर बोले, प्रभु की कृपा का तो कहना क्या विभीषण का भाग्य ऐसा है, प्रभु जिसका साथ देते उसका संसारके सब संकट कष्ट दूर होकर ऐश्वर्य सब प्रकारके मिलते हैं। प्रभु, प्रभु हैं। सब कुछ करने वाले प्रभु और प्रभु सब के विधाता; सो प्रभु, जब विभीषणपर प्रसन्न होकर कृपा कर रहे हैं तो क्यों न विभीषणका सब यश होवे। संसार के सब सुख यश विभीषण को मिले, जो प्रभुके चरणों में नित्य रहता हो उस को संसारके सब सुख मिलने का क्या संशय हो सकता है? विभीषण सब बातों को प्रभु कृपा समझ हाथ जोड़े विभीषण खड़े थे, जो सब कुछ प्रभुका ही रूप तो संसार में सब रूपके साथ देखा गया। इसलिए यह कहना कि विभीषण का भाग्य, विभीषणका यश यह सब प्रभु कृपा ही थी। विभीषण तो सब रूप से प्रभु का ही भक्त विभीषणके रूप में ही प्रभु--लीला रूपमें लीला कर रहे थे। विभीषण को जो यश, विभीषण को प्रभु-कृपा रूपमें मिला सो संसार को दिखाने केलिए कि प्रभु अपने भक्तपर जो भी कृपा करते हैं उसका फल ऐसा ही होता, जो संसार के सब लोगों को भी इस भक्त लीला विभीषण का यश देख प्रभुके चरणोंमें भक्ति का साधन मिल सके और प्रभुका यश गा सकें, जिससे सब का इस रूपमें कल्याण-साधन हो सके और सब भक्तिकर सकें, सो विभीषण के भाग्य का यश-गान केवल प्रभुकी भक्ति के स्वरूप में इस प्रकार प्रभुने संसार के सब जीवों के कल्याणके अर्थ कराया। लंका, लंका, लंका सब के मुखसे--विभीषणका लंका यश और प्रभु-कृपा आज लंकाके घरघरमें फैल रहा था। सो इस--रूप से सब के मन में भक्ति का जो संचार हुआ सो सब प्रभु कृपा थी। सब लोग लंका-निवासी सब के मुखपर प्रभु की ही महिमाका यश था, प्रभुके ही यश का "विभीषण के यश को विभीषण के रूप में संसारके सामने रख संसारका प्रभुने भला किया, ऐसा विधाता, प्रभु को छोड़कर, कौन विधाता होगा" विभीषणके यशको प्रभुने अपना यश बनाया प्रभुने अपना यश विभीषणके चरणोंमें समर्पण किया सो इस यशको केवल प्रभुके रूपमें न देखना विभीषणके रूप में तो संसार के विभीषण के, सब को प्रभु रूप में प्रभु का स्वरूप समझ केवल प्रभु की भक्ति का यह विभीषण का रूप सब लोग क्यों न कहें? 48