भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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दयाल, कृपालु, भक्तवत्सल--सब सम्बोधन तो ईश्वर के रूप और नाम हैं! केवल वाणी का रस घोल घोल कर ही उनका नाम लेने मात्र पचास वर्ष तक पाठ कर ले तो भी कोई लाभ न--सक-सकेगा मिलेगा--या तो भला ईश्वर पचास वर्ष के केवल नाम उच्चारण का फल प्रदान किए बिना ही दे दिया करे। यह सब प्रत्यक्ष बात सुन कर पंडित, राव और सेठ आश्चर्य चक में पड़ गए! जो जन प्रत्यक्ष बात सुन कर भी समझ, राव और सेठ आश्चर्य से मुँह बाए रह गए! कहा, सत्य बात को मान लेने में ही तुम्हारा भी और सब का भला है। ईश्वर का तो भजन सब कीजिए, इसमें कोई शक या दोष नहीं पर धर्मानुकूल कर्म भी कीजिए। केवल मुख से राम राम कहने मात्र से पाप, ताप, संताप अशान्ति मिट नहीं सकती। ईश्वर तो न्याय का रूप और सत्य रूप है। जैसा जो जो करेगा सो वैसा फल पा ही तो लेगा। मन से जो पाप करता रहा और मुख से राम का नाम लेता रहा सो फल तो उसे पाप का मिलेगा या मुख के राम नाम का? न केवल मुख से राम राम कह कर ही ईश्वर से छूट, छल अथवा कपट से फल मिलना मान ले। "तो यह दान पुण्य का, या दया धर्म मात्र रूप ईश्वर के किए हुए संकल्प का फल भी मनुष्य मात्र को ही दिया करे?" यह भी एक जन बोल उठा। दया का फल तो मिला "कर्म तो दया का किया था सो दया का ही फल मिला" तब तो वह जन मौन पड़ गया था। फिर भी महात्मा, सब को शान्त सा देख, उस ही बात का प्रभाव सब के मन में डालते हुए बोले, उस ईश्वर का गुण तो सत्य और धर्म का रूप है, दया, धर्म का फल तो ही दिया करे पर दान, पुण्य मात्र नाम, या यश चाहने का फल अथवा-- कभी मन को शान्ति स्वरूप न मिला। ईश्वर कर्म का फल दिया करता है न कि अभिमान का। धर्म का जो अनुष्ठान मन रूप भाव मात्र में समाया हो ईश्वर तो उस निष्ठा का फल ही दिया करे। दया भाव का निष्ठा या दान आदि का निष्ठा ही तो फल रूप मिला करता, इस रूप मात्र का नाम यश न होकर आत्मीय भाव का फल ही मिला। सो जन, या सज्जन सब जन को उस परम-पिता ईश्वर का ध्यान तो ही लो, ध्यान ही सत्य का स्वरूप है, सत्य रूप निष्ठा सब काल कल्याणकारी होती है। ज्ञान या अज्ञानजन्य कर्म का फल कर्म ही देता है, न किसी का पाप, न अज्ञान जन के नाम संकल्प से बढ़ के, निष्ठा से सब सब निष्ठा मात्र, नर- कल्पित जन, संकल्प-ज्ञान सब का फल उस काल का मन ईश्वर समान रूप स्वरूप का होकर सब काल में ही फल दे तो न ऐसा तो हो नहीं सकता कि न किया हो तो अकारण फल ही फल ही मिलेगा। कैसा विचार? दया का फल या निष्ठा? दया मात्र कल्याण कर उस प्रकार अपना स्वरूप बना ही लेता दया स्वरूप न बना सका, तो दया मात्र का स्वरूप तो सब विकार मात्र को ही तो फल दे सकेगा अज्ञान स्वरूप नाम मात्र का तो सब स्वरूप मन मात्र विकार मात्र का स्वरूप ही बना देगा, मन मात्र सब स्वरूप अज्ञानता का रूप बन जाएगा, जन तो मन स्वाध्याय निष्ठा स्वरूप तो पावे ही, पर उस निष्ठा से न भगवान का रूप प्राप्त मात्र हो सके जब तक कि वह मन ईश्वर में मिल गया हो तब ही ईश्वर का हो सकता है। ईश्वर सब प्रकार शक्ति रूप सर्व स्वरूप सब का नियन्त्रण या संचालन ही सब काल करता रहेगा? क्या अज्ञान का स्वरूप सब काल बना रहेगा या तो अज्ञान निवारण का उपाय ही सब काल कल्याणकारी रूप फल तो देगा? क्या अज्ञान सब काल रहेगा? क्या ज्ञान रूप भी अज्ञान ही रहेगा? क्या ज्ञान से भिन्न, सब काल अज्ञान रहेगा? क्या निष्ठा रहेगी? क्या अज्ञान रहेगा? क्या अज्ञान रहेगा? जब सब ही, या सब ज्ञान स्वरूप सब प्रकार अज्ञान रूप में कल्पित रूप-मात्र ही रहकर केवल स्वरूप का ज्ञान स्वरूप हो, तो ज्ञान स्वरूप सब प्रकार बना कर ही ज्ञान स्वरूप सब रूप सब प्रकार का नियंत्रण ही कर ही लिया कर सकेगा। अतः, सब जीव केवल ही ही ईश्वर कृपा रूप मात्र स्वरूप ज्ञान को विचार कर केवल ही बात का ध्यान रखकर ही आगे बढ़ो, कल्याण ही सब होगा, जो सब रूप ही ही रूप मन गए; सब जीव के सुख रूप स्वरूप परमात्मा 49