भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

विषयासक्ति का अन्त, मन स्थित होने पर होता, मन का निग्रह रस रूपी ईश्वर का हो तो, जीव रस रूपी मन पाएगा इसलिए जीव के स्वरूप परमात्मा के नाम रूपी नौका को ही सार जान राम-नाम रूपी नौका द्वारा ही संसार के दुख रूपी सिन्धु पार होने का यत्न कर। विचार करके अपने स्वरूप रूपी दीपक को जला ले ताकि तू भव रूपी तम का अन्त करने में समर्थ हो सके। जिस तरह तू दीप से तम को नष्ट करके अंधियारे स्थान में प्रकाश रूप विभूति पाता है, इसी तरह तू भी आत्म ज्ञान द्वारा परमात्मा रूप निज स्वरूप पहचान कर, जो कि तुम्हारा ही रूप है, जिसे तू जग रूपी भ्रम के भ्रम भुलाये हुए था, सत-ज्ञान रूप दीपक जला कर ईश्वर के ज्ञान रूपी धन, सत्य सुख रूपी परमात्मा को पा ले। सत्य ही सब जग का सार है। इस संसार रूप-रंग में जो सत्य स्वरूप प्रभु सर्व-व्यापक रूप में बसा हुआ है उसे जान-बूझ कर भी जीव, भ्रम में पड़ कर उस सत्य स्वरूप प्रभु से विमुख हो कर इस नश्वर जग में रत रहता है। जिस से यह जीव सुख के स्थान पर दुख रूपी कर्मों का फल भोगने को विवश होता है। जीव को यह सब जग व जीव के सब रूप अपने ही परमात्मा स्वरूप का ही रूप सब ओर दिख रहे हैं। परमात्मा तो सब आत्माओं का, सब जीवों का सार रूप परम पिता सब का सब कुछ आधार रूप है। फिर भी जीव नश्वर जग के रंग- रूप भ्रमों द्वारा अपने मन-बुद्धि को भर कर ईश्वर स्वरूप सत्य रूप को नश्वर समझ के परमात्मा स्वरूप प्रभु आत्मा को छोड़ कर भ्रम रूप में रत, सब ओर भ्रम ही का रूप देख रहा है। इस ओर ध्यान दो। जिस तरह गगन रूपी सत्य को जब घटा रूपी जल से भर कर बादलों द्वारा घिरा देखकर हर कोई यह तो जान ही जाता है कि गगन सर्व रूप में व्यापक होते हुए घटा-घिरे रूप में कभी-कभी जल बरसा कर शीतलता प्रदान करता है, न कि गगन सर्वदा वर्षा ही करता रहता है। वैसे ही यह देह भी कर्म रूपी वासना के अनुसार प्रभु रूपी आत्मा को घटा के समान घेरे हुए है। जिस तरह घटा अपने समय पर बरस कर समाप्त हो जाती है और फिर गगन का ही रूप रह जाता है, वैसे ही यह देह भी अपने कर्म रूप वासनाओं को समाप्त कर अपने देह रूपी घटा को समाप्त करके आत्मा रूपी सत्य में लीन हो जाती है। जिस तरह यह गगन सब को अवकाश या सहारा तो देता है पर स्वयं न तो किसी के सहारे है और न ही किसी से सम्बद्ध है। उसी तरह से यह प्रभु भी सब का आधार है, पर वह किसी का सहारा नहीं, न किसी रूप में लीन होता है। जिस रूप में परमात्मा, उसी रूप में वह जीव आत्मा रूप घट में वास करता है, जो सब को आधार देते हुए भी सर्वदा निर्लेप रहता है। जिस हेतु कहा-- घट घट में विराजे राम, वो तो जाने सब का हाल। जो नित्य चेतन आनन्द रूप ही हर एक घट में वास करता हुआ भी कभी लय को प्राप्त नहीं होता, उस के रूप सत्य रूपी आत्मा को जान कर, उस में लय होने रूपी सत्य ज्ञान को प्राप्त करके ही जीव, अमर हो जाता है। जो आत्मा घट-घट में व्यापक है उसका रूप ही परमात्मा स्वरूप है, जो व्यापक रूपी आत्मा के स्वरूप को समझ कर जानेगा, वही तो ज्ञानी कहा, न व जीव कहा, न प्रकृति स्वरूप घट स्वरूप को जान आत्मा स्वरूप ज्ञाता रूप में हो गया। ईश्वर रूप घट ज्ञान रूप में लीन होना चाहिए। केवल यह ही जान लेने से कुछ फल नहीं निकलता किंवा केवल ज्ञान, जो मन का भ्रम मात्र है, यह तो केवल बुद्धि ज्ञान अनुभव के प्रकाश से, कर्म के प्रभाव द्वारा होता है, जो कि सत्य ज्ञान है, जिसका फल केवल अनुभव से ही जाना जाता है। इस लिये जीव! तू केवल शाब्दिक ज्ञान में न रह! इस पर भी विचार कर कि सत-ज्ञान, सत्य ज्ञान क्या? जिसमें कोई संशय अथवा भ्रम का लेश मात्र न हो, जिसमें सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता, प्रत्येक समय, प्रत्येक अवस्था में दिखाई देता सत्य ज्ञान क्या है? उस को जान, उस स्वरूप को प्राप्त करके ही तू अमर सत्य रूप 58