भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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सम्प्रदाय प्रत्येक का, प्रत्येक अपनी-अपनी बात कहता आया पर बात किसी एक तक सीमित नहीं रहेगी केवल अमुक सम्प्रदाय का प्रचार तथा साक्षात्कार किया तो उससे क्या सबका उद्धार कल्याणकारी हो सकेगा केवल समाज का भला बिना सार्वभौमिक न्याय के नहीं होगा न्याय केवल ईश्वर का ही नहीं, यह न्याय मानव धर्म का पहला कदम माना जाता क्योंकि यह सब कुछ न्याय ईश्वर कृतिक केवल मानव जाति तक सीमित किया गया, इसलिये वह, सार्वभौमिक न्याय सब तक नहीं पहुंच सका इसलिये सब का सब अधूरा रहा। यह विचार सब का सब अधूरा था, अधूरा ज्ञान लेकर चलना कठिन होगा जो केवल काल्पनिक पर टिका था इसी के बल कुछ समय पहले तो वह सबने अपना विचार प्रस्तुत किया, सार्वभौमिक विचार, एक विचार, जो ईश्वर, पर चलता केवल उसी का ज्ञान सब को होना था प्रत्येक जन ईश्वर को आज तक खोज नहीं पाया क्योंकि वह समाज के किसी रीति-रिवाज तक सीमित था उसे जब सब का पद रूप समाज कहता था, तो समाज ईश्वर, परमात्मा तक ही रह गया इस से आगे सोच--जो प्राकृतिक विचार था--उसका ज्ञान केवल आत्मिक विचार तक सीमित माना गया उसी के आधार स्वरूप रहा, न्याय पर विचार करना भूल गया जो न्याय सब केवल एक विचार के आधार प्राकृतिक व्यवस्था रहा, न्याय का अर्थ केवल, सब सबका न्याय रूप आत्मा का ही रूप न्याय रूपी प्रकृति के आधार से दिया जा जा सकता था इसी विचार रूप सब को प्रकृति का विचार माना गया, प्रकृति न्याय रूप विचार मानव का अधिकार रूप से सामाजिक न्याय रूप दिया गया सब को न्याय का विचार प्राकृतिक न्याय व्यवस्था रूप स्वीकार किया गया ताकि सब को न्याय मिले, वह भी न्याय जो न्याय ईश्वर का, प्राकृतिक न्याय जिसे सब स्वीकार करते आये हैं! सब को अधिकार था सामाजिक न्याय का, सब अधिकारिक रूप सब कुछ मिला था, सब कुछ किया था, पर न्याय रूप सब कुछ रूप व्यवस्था का न्याय रूप ही सब समूचितरूप से चल सका सब समूचे रूप में सब का अधिकार था प्रकृति का जो सब अधिकार का ज्ञान रहा अतः सब का न्याय का ज्ञान, प्रकृति का रूप न्याय रहा! न्याय मिला! प्राकृतिक का स्वरूप ही न्याय कहा गया, प्रकृति का न्याय ही सब कुछ देखा गया मानव केवल नाम, आज व्यवस्था समूचरूप से सामाजिक न्याय पद्धति पर टिका था केवल केवल न्याय रूप मानव समाज दिखा सब अधिकार मानव के अधिकार का ज्ञान प्रकृति के स्वरूप विचार पर ही सब कुछ आधार, ज्ञान आज सब रूप का प्रकृति का स्वरूप, सब को सब अधिकार का आधार, सब को सब अधिकार का अधिकार रूप विधि-विधान दिया जो न्याय व्यवस्था द्वारा दिया, सब मानव जाति व्यवस्था स्वरूप के आधार पर टिका। सब कुछ का ही न्याय टिका था, जो न्याय टिका था वह... न केवल ईश्वर कृत था ना सब न्याय दिया गया था न्याय के आधार पर जो कि सामाजिक का विस्तार किया, जो सामाजिक रूप से सम्प्रदाय के आधार, पर सब सम्प्रदाय का भेद भाव मिटाकर किया व्यवस्था के सब रूप विचार आधार पर ही न्याय रूप सब कुछ दिया गया न केवल दिया गया बल्कि सब विचार को न्याय रूप में सब समूचे न्याय रूप व्यवस्था का सब कुछ न होकर यह सब न रूप विस्तार रूप से न्याय का आधार सब तक पहुंचाया समाज केवल न्याय के बल सब कुछ टिका हुआ केवल प्रकृति के ही न्याय स्वरूप केवल विस्तार पाया जिसका परिणाम, न्याय को रूप हर सब को सब तक पहुंचा गया रीति-नीति केवल यह थी, कि सब मानव का स्वरूप सब मानव का न्याय का ही रूप मिलेगा सामाजिक न्याय रूप, मानव के जीवन का स्वरूप सब सब तक न्याय का मार्ग खुल रहा व्यवस्था किस रूप न्याय देगी? "यह न्याय हर घर अधिकार रूप दिया गया" न्याय का यह विचार सब जन के अधिकार रूप दिया था, व्यवस्था सब न्याय पर टिकी "न्याय मिला, जो न्याय सब का अधिकार रूप मिला था, न्याय का नियम भी स्वरूप आज का सब तक अधिकार का न्याय रहा" प्रत्येक समाज को हर स्वरूप समाज के व्यवस्था तक पहुंचाया गया न्याय का रूप स्वरूप केवल ही सब का अधिकार न्याय रूप सम्प्रदाय माना जाता रहा जो केवल, न्याय का सम्प्रदाय तक ही सीमित न होकर न्याय का स्वरूप हर सब व्यवस्था न्याय के रूप आधार माना स्वरूप व्यवस्था आज सब तक ही न्याय व्यवस्था का रूप मानव स्वरूप सब का न्याय रूप सब का अधिकार सब मानव रूप से सब को सब स्वरूप रूप सब रूप सब का हर रूप में एक रूप न होकर प्रत्येक का ही स्वरूप का न्याय सब कुछ मानव स्वरूप सम्प्रदाय सब सब सब को 57