भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

साधक स्वभाव अनुसार आत्मीयता बढ़ाते हुए उस दिव्य मण्डल पहुँचते समय स्वाभाविक रीति धारण करता हुआ भगवान् की दिव्य सेवा में लीन व मुग्ध हो जाता है। किसी समय भक्त यह भी अनुभव करने लगता हैकि 'हाय, भगवन् का दर्शन मिलेगा भी; भगवन् का साक्षात् तो दुर्लभ है, दर्शन असम्भवप्राय लगता है, दर्शन की बात छोड़ ही दो, केवल सन्तोष ही हो, केवल चिन्तन का रस मिलता रहेगा क्या, आश्वासन भरा जीवन होगा, कब आश्वासन मिटेगा कि, 'शाम तक तेरा साक्षात्कार कराऊँगा ही, शाम तक तेरा भाव साकार स्वरूप बना कर दे दूंगा, पर शाम कब तक होगी पता नहीं। जीवन बीतने पर अथवा सौ जन्मों बाद होगी, कुछ निश्चय नहीं हो रहा, केवल सांत्वना ही मिलती जा रही है, कब यह, कब यह, कब यह, कब यह, कब यह आशा और भय से त्रस्त हुआ भक्त, यह भी सोचता है, उस प्रभु शरणम् के दर्शन क्या होंगे, दर्शन होंगे भी नहीं, वह प्रभु भी इस भाव दशा को देखता होगा क्या? सुनता होगा क्या? इस भाव पर वह परमात्मा क्या विचार करता होगा? जिसे पुकारते हैं, जिसे नमन करते हैं, जिसके प्रति वंदन करते हैं—क्या वह कभी सुनेगा? क्या उसके पास समय होगा क्या, उस तक शब्द, क्या यह कभी पहुँच भी रहे हैं या नहीं? भक्त का भाव जब कभी इस प्रकार से नीचे गिरता जाता, नीचे ही गिरता, भाव हीनता तक कभी कभी पहुँचते पहुँचते वह यह भी सोचता है, कि जब विचार शून्य स्थिति आएगी तब क्या होगा? इस प्रकार की परिस्थिति के पश्चात् साधक यह सोचता रहता, उस पर क्या कहें, उस पर बात करने वाले बहुत कम ही इस तथ्य को जानते हैं। कभी कभी वह नीचे गिरता हुआ आंसुओं से भर जाता है, कभी वह रोते रोते लोट पोट हो जाता है, जब उसे कुछ बोध उस भाव को साधक जब तक नहीं अनुभव करता तब तक वह साधना को, उस समय आने वाली बाधा को नहीं समझ सकता। कभी कभी वह रोता है, कभी वह खिलखिला कर हँसने लगता है। उस समय उस पर हँसने वालों की भी कमी नहीं होती। कभी वह एकांत में बैठा हुआ अपने ही भावों में मग्न रहता है। उसे, ऐसा लगता रहता है? इस स्थिति में भी उस पर कृपा निरंतर हो रही है। वह न जाने कब, कहाँ से उस पर कृपा बरसाने लग जाते हैं। कभी कभी, वह भाव विभोर! हो ही उठ ता, रो ही पड़ता कि हे प्रभु, तू ही सब कुछ देने वाला और स्वयं को भी दे देने को तत्पर है; कभी कभी, उस स्थिति में उस पर वह, दया-भाव से, उस पर कृपा भी कर बैठता, तो वह सोचता, उस पर क्या कहें? उस प्रकार के रस का पान करने वाला ही उस आनन्द को जान सकता है। उस क्षण, वह साधक केवल रो ही सकता है। इस स्थिति में उस, का कोई अन्य भी क्या सहारा बनता होगा? कभी नहीं, क्यों? क्यों उस अवस्था में कोई भी क्या सहारा बन सकेगा? इसलिए साधक को ऐसी स्थिति में जब वह रो रहा हो तो उसका क्या कोई आधार है? उस परिस्थिति में क्या परमात्मा उस पर ध्यान दे रहे हैं? साधक, उस समय पर, ईश्वर के उस स्वभाव स्वरूप को तो जान ही जाता है कि ईश्वर दया के सागर, कृपालु, दया के उस रूप को साधक जान ही लेता है। जब कभी साधक को इस प्रकार रोते देखा जाता है तब उस समय लोग, तो उस पर दया भाव लाते ही हैं परन्तु ईश्वर उस पर? वह ईश्वर तो उसे इस प्रकार रोते देखकर भीतर ही भीतर प्रसन्न होता रहता, उस भाव पर वह भक्त पर उस प्रकार का प्रभाव नहीं डालता जैसा लोग करते हैं, ईश्वर तो उस, के रो ने पर आनन्दित व इस प्रकार का भाव भरता रहा, जो उस पर दयावान् हो? कैसा यह, कैसा यह, कैसा यह कैसा भाव इस प्रकार ईश्वर का देखा। ईश्वर का यह भाव देखकर साधक भी और अधिक आन्दोलित होता हुआ अपने भावों को रोक नहीं पाता। कभी कभी तो वह अपने शरीर का भी भान भूल जाता, कि वह कहाँ बैठा है। ईश्वर साधक को ऐसी दशा में देखकर, उस स्थिति को और भी आगे बढ़ाता चला जाता, वह और अधिक व्याकुलता अनुभव करता

63