एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवन का यह क्रम चलता रहा और एक दिन ऐसा आया जब सब लोग घर को लौट आये। सब लोग तो अपने अपने काम में लग गये परन्तु नन्दू उदास रहने लगा। उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता था। वह दिन रात अपने कमरे में बन्द हो कर या तो रोता रहता अथवा सो जाया करता; किसी काम की ओर उसका ध्यान नहीं जाता था। घर के सभी लोग बहुत चिन्तित हुए पिता, माताजी को, चचेरे भाई, बहनों को, सबको ही चिन्ता व्यापी कि नन्दू को क्या हो गया है। सब लोग चिन्ता करते थे, दया करते, प्यार करते थे। सब लोग उसके लिए सब कुछ कर देने को तय्यार थे पर नन्दू की उदासी को कोई न हर सका, न कोई उसका मन मोड़ सका। सब के ही मन टूट चुके थे। आशा की कोई किरण नहीं दिखाई देती थी किन्तु नन्दू की बड़ी भाभी शान्ता अपने ही ढंग की औरत थी। उस ने हार न मानी उसकी समझ में आ गया था। उसने नन्दू के जीवन को एक नया मोड़ देना चाहा- जीवन की एक नई दिशा में। वह दिन रात यही सोचती कि कैसे नन्दू को इस हाल से बाहर निकाला जाय। उसने कहा, 'मैं तो इस नौजवान लड़के को ऐसे नष्ट नहीं होने दूंगी। नन्दू वास्तविकता जानता नहीं, उस को पता ही तो नहीं चला कि जीवन कितना प्यारा है।' 'लेकिन किया क्या जा सकता है?' यह बात सब सोचते थे। कोई उपाय नहीं सूझ पड़ता था, पर जब एक दिन, जब नन्दू अपने कमरे में उदास लेटा हुआ था। शान्ता नन्दू के कमरे में गई और उस ने कहा, 'नन्दू बाबू! जरा उठो तो, बहुत दिन तुम चिन्ताओं में पड़े रहे, अब इन बातों को छोड़ दो। आज हम बगीचे में सैर करने चलेंगे। चलो, अपने कपड़े बदल लो।' नन्दू भाभी की ओर देखने लगा। उसकी समझ में कुछ न आया, 'भाभी यह क्या कह रही हैं?' नन्दू शान्ता भाभी का बड़ा आदर करता था, वह इनकार न कर सका और उठ कर बैठ गया। भाभी को उसने कहा, "लेकिन भाभी, मेरा जी तो कहीं नहीं जाता, मेरा मन किसी काम में नहीं लगता, तुम मुझ पर दया करो।" पर शान्ता कब सुनने वाली थी। नन्दू को हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसने उठाया और बाहर ला कर, उस गाड़ी में बिठा दिया जो पहले से ही तय्यार खड़ी थी। दोनों जन बगीचे में पहुंच गये। शान्ता नन्दू को हर प्रकार से खुश करने लगी। शान्ता ने कहा, 'आज तो हम दोनों इस बगीचे में एक खेल खेलेंगे, जिसमें जो जीतेगा उसको जो वह चाहेगा दिया जायगा। मैं तो जीतूंगी और हारोगे तुम, क्योंकि तुम तो पहले से ही हिम्मत हार चुके हो।' नन्दू के मुंह पर हल्की-सी हंसी आ गई। उस ने कहा, 'भाभी मुझे तो इस खेल का कुछ भी पता नहीं है।' नन्दू शान्ता के व्यवहार को देख कर हैरान हो रहा था। शान्ता ने उस की हंसी को देखा तो उसे बहुत सन्तोष हुआ। उस ने नन्दू के हाथ में एक रैकेट थमाया और अपने हाथ में रैकेट ले कर बैडमिण्टन खेलना शुरू कर दिया। खेल में नन्दू की रुचि नहीं थी, लेकिन भाभी का आग्रह था। थोड़ी ही देर में नन्दू खेलने में मस्त हो गया। खेल समाप्त होने पर शान्ता जीत गई। शान्ता खुश थी और नन्दू भी प्रसन्न था। शान्ता बोली, "नन्दू तुम हार गये, अब मेरी शर्त पूरी करो। तुम्हें मुझ को पार्टी देनी पड़ेगी।" नन्दू ने कहा, 'पार्टी तो मैं दे दूंगा पर किस प्रकार की?' फिर दोनों एक अच्छे से होटल में गये। दोनों ने मिल कर चाय पी, वहां शान्ता नन्दू को बहलाने का पूरा प्रयत्न करती रही और इस में वह सफल भी हुई; नन्दू के मुख पर एक मधुर मुस्कराहट खिल गई। दोनों देर तक होटल में बैठे रहे। शान्ता नन्दू के मन को तरह-तरह से बहलाने में लगी रही। नन्दू को ऐसा लगा मानों वह जीवन की एक नई राह पर आ गया है। नन्दू ने शान्ता से कहा, 'भाभी! आज मुझे बहुत दिन बाद ऐसा लगा है कि जीवन में कुछ रस बाकी है।' "यदि तुम चाहो तो जीवन में बहुत कुछ रस है, लेकिन जीवन को समझना पड़ता है। जीवन को रो-रो कर नहीं काटा जाता। यह जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है, इसका सदुपयोग होना चाहिए। तुम एक अच्छे गायक हो। मैं यह चाहती हूं कि तुम अपनी गायकी को चमकाओ। संगीत की साधना करो। इस से तुम्हारा समय भी कटेगा और मन भी प्रसन्न रहेगा।" शान्ता की बातें नन्दू को बहुत अच्छी लगीं। 62