एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार महाराज श्री व्यास और शुक मुनिप्रवर प्रणीत श्री व्यास और शुक प्रणीता ही यह कथा आज तक परम्परा से सब देश और सब कालके साधक पाते रहे, पर कलियुग जीवविमर्ष को पाकर, श्री शुक जी महाराज अपनी असीम कृपा और करुणासे श्री वृन्दावन के निकुञ्ज में श्री राधिका चरणाशरण नित्यविहारी श्री स्वामी हरिदास जीके रूप में प्रकट होकर प्रेमस्वरूपा प्रिया प्रियतम की अभिन्न रस रूपी इस लीला रसको जगत्के प्रेम रसिक जीवों को पुनः देने के लिये अवतीर्ण होकर संगीत साहित्य के साथ गाया। जिसमें उस लीला का नाम नित्य रसोपासना कहकर, प्रिया प्रियतम नित्य रस रूपमें विराजते हैं जिनका नाम श्री बिहारी बिहारिनि जी का रूप हुआ, जिसकी यह अष्टयाम की लीला विशेष प्रसिद्ध हुई? इस उपासना पद्धति का ही आधार पर संगीत के शास्त्र का वितान इस प्रकार स्थापित हो गया जिसे सब जन आज कल भी जानते हैं। जिस प्रकार श्री व्यास, शुकदेव और अनन्य रस रूपमें इस ही कथा का गान है, तो सत्य ज्ञान स्वरूप हुआ। यहाँ यह जान लेने की बात ध्यान देने योग्य है कि इस कथा में कहीं भी विरह या संकोच और संशय की बात नहीं कही गई। यहाँ जो स्वरूप है, वह एक व अखंड ही रस रूप में है जो कि इस बात को सिद्ध करता है। अतः यहाँ श्री--जी स्वरूप स्वामी हरिदास-जीने इस कथा को जिस रूप में गाया उसे हम कह सकते हैं कि शुद्ध प्रेम, राग रस, राग-रंगमयी रस, रस-रस रूप, अनन्य रस, जिसमें रस ही रस भरा हुआ है जिसमें न तो किसी प्रकार की कोई वासना का अंश मात्र भी स्थान पाता है और जिसका नाम केलिसौभाग्यसुख के नाम से कहा गया है जो सदा सत्य ही सत्य इस प्रकार भागवत के सब रस रूप तथा अन्य सब कथाओं में भी यह स्वरूप व रस समझाया जाकर स्पष्ट हो जाता जिसका कारण इसका नित्य रूप रस स्वरूप एक रस है, कि यह उस रस की बात नहीं जिसे हम और तुम मन से जान वा कहते हैं, इसलिए इस रस मयी कथा का आदर इस रस को ही जान कर किया गया है कि, जिससे कल्याण ही सदा रहे। इस प्रकार ऊपर की कथा को पढकर, समझ कर अपनी श्रद्धा भाव को दृढ करके श्री जी के रूप को समझ कर, जिसे स्वामी हरिदास जी ने इस रूप में आस्वादन कर सत्य कथा रूप में जन को दे दिया, जिससे सब जन को इस रस का ज्ञान हो जाय कि यह कथा केवल श्री युगल रस-स्वरूप की स्वरूप है जो कि अनन्य-शरण में रहने वालोंको सदा ही रस प्रदान करती, जिससे किसी जीव व भक्त के हृदय में इस प्रकार का कोई संशय कभी उत्पन्न नहीं हो सकता, जिससे अज्ञानजनित अन्धकार सदा मिटकर श्री स्वरूप का ज्ञान सदा-सदा रहकर, इस परम पावन रूपका, जिसमें सब सुख का आधार है वह हृदय में प्रकाश कर देता है। यद्यपि यह कथा आज काल के इस कलिकाल में विस्तार पा चुकी है तथापि इस बात का ध्यान सदा रखने की आवश्यकता है कि मन को इस ओर स्थिर रख कर सदा ही इस बात ध्यान रखना चाहिये कि यह कथा केवल सत्य ज्ञान रूप केवल ज्ञान रस स्वरूप-ही, सब प्रकार व स्वरूप सहित इसका लाभ ले लेना और अपने हृदयको इस रस रूप में रख कर, काम-क्रोधादि अन्य विकारों को त्याग देना जिससे कल्याण का मार्ग सुगम होकर सब प्रकार के आनन्द को देने वाला यह पावन भाव सब जन स्वीकार कर ही लें यही सब जन का भी धर्म बनता। अतः इन बातोंको जानकर ही इस बात को जान लेने की चेष्टा सब जनको करनी ही चाहिए कि जिससे कि मनुष्य जन्म सफल हो जाय क्योंकि यह साधन ही ऐसाहै, जो साधन से साध्य के रूप में बदलकर सब को इस पार से उस पार करनेवाला स्वयं व समर्थ है, जो सदा कल्याणकारी ही हो कर सब कल्याण साधक के समक्ष प्रत्यक्ष रूप इस प्रकार कर देता है कि जिसके द्वारा सब काम सिद्ध संसारके बन्धनों से छूट कर मनुष्य उस परमेश्वर तथा सर्वेश्वर रूप में मिलकर व उसका रूप बन कर अमर हो जाता है तथा जिससे संसार में कोई भी वासना व कामना उसके सम्मुख आ ही नहीं पाती जो कि सब बन्धन को उपस्थित कर देवे। इस ही विचार को मनमें रखकर, अपने सब कर्मों को निष्काम रूप करनेके लिए सदा तैयार रह कर सब जन इस पावन कथा श्रवण और पठन कर मनको शुद्ध कर प्रभुके ही स्वरूप में ही स्थिर करनेका यत्न करते ही रहें जिससे कि यह देह भी सफल हो सकती है और अन्य साधन इसके लिये व्यर्थ ही हो जाते हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, काम भाव, यह सब सदा सदाके लिए मिट कर प्रभु का रूप मन धारण कर। 61