एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
प्रणीता ही यह कथा आज तक परम्परा से सब देश और सब कालके साधक पाते रहे,
इस प्रकार महाराज श्री व्यास और शुक मुनिप्रवर प्रणीत श्री व्यास और शुक प्रणीता ही यह कथा आज तक परम्परा से सब देश और सब कालके साधक पाते रहे, पर कलियुग जीवविमर्ष को पाकर, श्री शुक जी महाराज अपनी असीम कृपा और करुणासे श्री वृन्दावन के निकुञ्ज में श्री राधिका चरणाशरण नित्यविहारी श्री स्वामी हरिदास जीके रूप में प्रकट होकर प्रेमस्वरूपा प्रिया प्रियतम की अभिन्न रस रूपी इस लीला रसको जगत्के प्रेम रसिक जीवों को पुनः देने के लिये अवतीर्ण होकर संगीत साहित्य के साथ गाया। जिसमें उस लीला का नाम नित्य रसोपासना कहकर, प्रिया प्रियतम नित्य रस रूपमें विराजते हैं जिनका नाम श्री बिहारी बिहारिनि जी का रूप हुआ, जिसकी यह अष्टयाम की लीला विशेष प्रसिद्ध हुई? इस उपासना पद्धति का ही आधार पर संगीत के शास्त्र का वितान इस प्रकार स्थापित हो गया जिसे सब जन आज कल भी जानते हैं। जिस प्रकार श्री व्यास, शुकदेव और अनन्य रस रूपमें इस ही कथा का गान है, तो सत्य ज्ञान स्वरूप हुआ। यहाँ यह जान लेने की बात ध्यान देने योग्य है कि इस कथा में कहीं भी विरह या संकोच और संशय की बात नहीं कही गई। यहाँ जो स्वरूप है, वह एक व अखंड ही रस रूप में है जो कि इस बात को सिद्ध करता है। अतः यहाँ श्री--जी स्वरूप स्वामी हरिदास-जीने इस कथा को जिस रूप में गाया उसे हम कह सकते हैं कि शुद्ध प्रेम, राग रस, राग-रंगमयी रस, रस-रस रूप, अनन्य रस, जिसमें रस ही रस भरा हुआ है जिसमें न तो किसी प्रकार की कोई वासना का अंश मात्र भी स्थान पाता है और जिसका नाम केलिसौभाग्यसुख के नाम से कहा गया है जो सदा सत्य ही सत्य इस प्रकार भागवत के सब रस रूप तथा अन्य सब कथाओं में भी यह स्वरूप व रस समझाया जाकर स्पष्ट हो जाता जिसका कारण इसका नित्य रूप रस स्वरूप एक रस है, कि यह उस रस की बात नहीं जिसे हम और तुम मन से जान वा कहते हैं, इसलिए इस रस मयी कथा का आदर इस रस को ही जान कर किया गया है कि, जिससे कल्याण ही सदा रहे। इस प्रकार ऊपर की कथा को पढकर, समझ कर अपनी श्रद्धा भाव को दृढ करके श्री जी के रूप को समझ कर, जिसे स्वामी हरिदास जी ने इस रूप में आस्वादन कर सत्य कथा रूप में जन को दे दिया, जिससे सब जन को इस रस का ज्ञान हो जाय कि यह कथा केवल श्री युगल रस-स्वरूप की स्वरूप है जो कि अनन्य-शरण में रहने वालोंको सदा ही रस प्रदान करती, जिससे किसी जीव व भक्त के हृदय में इस प्रकार का कोई संशय कभी उत्पन्न नहीं हो सकता, जिससे अज्ञानजनित अन्धकार सदा मिटकर श्री स्वरूप का ज्ञान सदा-सदा रहकर, इस परम पावन रूपका, जिसमें सब सुख का आधार है वह हृदय में प्रकाश कर देता है। यद्यपि यह कथा आज काल के इस कलिकाल में विस्तार पा चुकी है तथापि इस बात का ध्यान सदा रखने की आवश्यकता है कि मन को इस ओर स्थिर रख कर सदा ही इस बात ध्यान रखना चाहिये कि यह कथा केवल सत्य ज्ञान रूप केवल ज्ञान रस स्वरूप-ही, सब प्रकार व स्वरूप सहित इसका लाभ ले लेना और अपने हृदयको इस रस रूप में रख कर, काम-क्रोधादि अन्य विकारों को त्याग देना जिससे कल्याण का मार्ग सुगम होकर सब प्रकार के आनन्द को देने वाला यह पावन भाव सब जन स्वीकार कर ही लें यही सब जन का भी धर्म बनता। अतः इन बातोंको जानकर ही इस बात को जान लेने की चेष्टा सब जनको करनी ही चाहिए कि जिससे कि मनुष्य जन्म सफल हो जाय क्योंकि यह साधन ही ऐसाहै, जो साधन से साध्य के रूप में बदलकर सब को इस पार से उस पार करनेवाला स्वयं व समर्थ है, जो सदा कल्याणकारी ही हो कर सब कल्याण साधक के समक्ष प्रत्यक्ष रूप इस प्रकार कर देता है कि जिसके द्वारा सब काम सिद्ध संसारके बन्धनों से छूट कर मनुष्य उस परमेश्वर तथा सर्वेश्वर रूप में मिलकर व उसका रूप बन कर अमर हो जाता है तथा जिससे संसार में कोई भी वासना व कामना उसके सम्मुख आ ही नहीं पाती जो कि सब बन्धन को उपस्थित कर देवे। इस ही विचार को मनमें रखकर, अपने सब कर्मों को निष्काम रूप करनेके लिए सदा तैयार रह कर सब जन इस पावन कथा श्रवण और पठन कर मनको शुद्ध कर प्रभुके ही स्वरूप में ही स्थिर करनेका यत्न करते ही रहें जिससे कि यह देह भी सफल हो सकती है और अन्य साधन इसके लिये व्यर्थ ही हो जाते हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, काम भाव, यह सब सदा सदाके लिए मिट कर प्रभु का रूप मन धारण कर। 61
जीवन का यह क्रम चलता रहा और एक दिन ऐसा आया जब सब लोग घर को लौट आये। सब लोग तो अपने अपने काम में लग गये परन्तु नन्दू उदास रहने लगा। उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता था। वह दिन रात अपने कमरे में बन्द हो कर या तो रोता रहता अथवा सो जाया करता; किसी काम की ओर उसका ध्यान नहीं जाता था। घर के सभी लोग बहुत चिन्तित हुए पिता, माताजी को, चचेरे भाई, बहनों को, सबको ही चिन्ता व्यापी कि नन्दू को क्या हो गया है। सब लोग चिन्ता करते थे, दया करते, प्यार करते थे। सब लोग उसके लिए सब कुछ कर देने को तय्यार थे पर नन्दू की उदासी को कोई न हर सका, न कोई उसका मन मोड़ सका। सब के ही मन टूट चुके थे। आशा की कोई किरण नहीं दिखाई देती थी किन्तु नन्दू की बड़ी भाभी शान्ता अपने ही ढंग की औरत थी। उस ने हार न मानी उसकी समझ में आ गया था। उसने नन्दू के जीवन को एक नया मोड़ देना चाहा- जीवन की एक नई दिशा में। वह दिन रात यही सोचती कि कैसे नन्दू को इस हाल से बाहर निकाला जाय। उसने कहा, 'मैं तो इस नौजवान लड़के को ऐसे नष्ट नहीं होने दूंगी। नन्दू वास्तविकता जानता नहीं, उस को पता ही तो नहीं चला कि जीवन कितना प्यारा है।' 'लेकिन किया क्या जा सकता है?' यह बात सब सोचते थे। कोई उपाय नहीं सूझ पड़ता था, पर जब एक दिन, जब नन्दू अपने कमरे में उदास लेटा हुआ था। शान्ता नन्दू के कमरे में गई और उस ने कहा, 'नन्दू बाबू! जरा उठो तो, बहुत दिन तुम चिन्ताओं में पड़े रहे, अब इन बातों को छोड़ दो। आज हम बगीचे में सैर करने चलेंगे। चलो, अपने कपड़े बदल लो।' नन्दू भाभी की ओर देखने लगा। उसकी समझ में कुछ न आया, 'भाभी यह क्या कह रही हैं?' नन्दू शान्ता भाभी का बड़ा आदर करता था, वह इनकार न कर सका और उठ कर बैठ गया। भाभी को उसने कहा, "लेकिन भाभी, मेरा जी तो कहीं नहीं जाता, मेरा मन किसी काम में नहीं लगता, तुम मुझ पर दया करो।" पर शान्ता कब सुनने वाली थी। नन्दू को हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसने उठाया और बाहर ला कर, उस गाड़ी में बिठा दिया जो पहले से ही तय्यार खड़ी थी। दोनों जन बगीचे में पहुंच गये। शान्ता नन्दू को हर प्रकार से खुश करने लगी। शान्ता ने कहा, 'आज तो हम दोनों इस बगीचे में एक खेल खेलेंगे, जिसमें जो जीतेगा उसको जो वह चाहेगा दिया जायगा। मैं तो जीतूंगी और हारोगे तुम, क्योंकि तुम तो पहले से ही हिम्मत हार चुके हो।' नन्दू के मुंह पर हल्की-सी हंसी आ गई। उस ने कहा, 'भाभी मुझे तो इस खेल का कुछ भी पता नहीं है।' नन्दू शान्ता के व्यवहार को देख कर हैरान हो रहा था। शान्ता ने उस की हंसी को देखा तो उसे बहुत सन्तोष हुआ। उस ने नन्दू के हाथ में एक रैकेट थमाया और अपने हाथ में रैकेट ले कर बैडमिण्टन खेलना शुरू कर दिया। खेल में नन्दू की रुचि नहीं थी, लेकिन भाभी का आग्रह था। थोड़ी ही देर में नन्दू खेलने में मस्त हो गया। खेल समाप्त होने पर शान्ता जीत गई। शान्ता खुश थी और नन्दू भी प्रसन्न था। शान्ता बोली, "नन्दू तुम हार गये, अब मेरी शर्त पूरी करो। तुम्हें मुझ को पार्टी देनी पड़ेगी।" नन्दू ने कहा, 'पार्टी तो मैं दे दूंगा पर किस प्रकार की?' फिर दोनों एक अच्छे से होटल में गये। दोनों ने मिल कर चाय पी, वहां शान्ता नन्दू को बहलाने का पूरा प्रयत्न करती रही और इस में वह सफल भी हुई; नन्दू के मुख पर एक मधुर मुस्कराहट खिल गई। दोनों देर तक होटल में बैठे रहे। शान्ता नन्दू के मन को तरह-तरह से बहलाने में लगी रही। नन्दू को ऐसा लगा मानों वह जीवन की एक नई राह पर आ गया है। नन्दू ने शान्ता से कहा, 'भाभी! आज मुझे बहुत दिन बाद ऐसा लगा है कि जीवन में कुछ रस बाकी है।' "यदि तुम चाहो तो जीवन में बहुत कुछ रस है, लेकिन जीवन को समझना पड़ता है। जीवन को रो-रो कर नहीं काटा जाता। यह जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है, इसका सदुपयोग होना चाहिए। तुम एक अच्छे गायक हो। मैं यह चाहती हूं कि तुम अपनी गायकी को चमकाओ। संगीत की साधना करो। इस से तुम्हारा समय भी कटेगा और मन भी प्रसन्न रहेगा।" शान्ता की बातें नन्दू को बहुत अच्छी लगीं। 62
साधक स्वभाव अनुसार आत्मीयता बढ़ाते हुए उस दिव्य मण्डल पहुँचते समय स्वाभाविक रीति धारण करता हुआ भगवान् की दिव्य सेवा में लीन व मुग्ध हो जाता है। किसी समय भक्त यह भी अनुभव करने लगता हैकि 'हाय, भगवन् का दर्शन मिलेगा भी; भगवन् का साक्षात् तो दुर्लभ है, दर्शन असम्भवप्राय लगता है, दर्शन की बात छोड़ ही दो, केवल सन्तोष ही हो, केवल चिन्तन का रस मिलता रहेगा क्या, आश्वासन भरा जीवन होगा, कब आश्वासन मिटेगा कि, 'शाम तक तेरा साक्षात्कार कराऊँगा ही, शाम तक तेरा भाव साकार स्वरूप बना कर दे दूंगा, पर शाम कब तक होगी पता नहीं। जीवन बीतने पर अथवा सौ जन्मों बाद होगी, कुछ निश्चय नहीं हो रहा, केवल सांत्वना ही मिलती जा रही है, कब यह, कब यह, कब यह, कब यह, कब यह आशा और भय से त्रस्त हुआ भक्त, यह भी सोचता है, उस प्रभु शरणम् के दर्शन क्या होंगे, दर्शन होंगे भी नहीं, वह प्रभु भी इस भाव दशा को देखता होगा क्या? सुनता होगा क्या? इस भाव पर वह परमात्मा क्या विचार करता होगा? जिसे पुकारते हैं, जिसे नमन करते हैं, जिसके प्रति वंदन करते हैं—क्या वह कभी सुनेगा? क्या उसके पास समय होगा क्या, उस तक शब्द, क्या यह कभी पहुँच भी रहे हैं या नहीं? भक्त का भाव जब कभी इस प्रकार से नीचे गिरता जाता, नीचे ही गिरता, भाव हीनता तक कभी कभी पहुँचते पहुँचते वह यह भी सोचता है, कि जब विचार शून्य स्थिति आएगी तब क्या होगा? इस प्रकार की परिस्थिति के पश्चात् साधक यह सोचता रहता, उस पर क्या कहें, उस पर बात करने वाले बहुत कम ही इस तथ्य को जानते हैं। कभी कभी वह नीचे गिरता हुआ आंसुओं से भर जाता है, कभी वह रोते रोते लोट पोट हो जाता है, जब उसे कुछ बोध उस भाव को साधक जब तक नहीं अनुभव करता तब तक वह साधना को, उस समय आने वाली बाधा को नहीं समझ सकता। कभी कभी वह रोता है, कभी वह खिलखिला कर हँसने लगता है। उस समय उस पर हँसने वालों की भी कमी नहीं होती। कभी वह एकांत में बैठा हुआ अपने ही भावों में मग्न रहता है। उसे, ऐसा लगता रहता है? इस स्थिति में भी उस पर कृपा निरंतर हो रही है। वह न जाने कब, कहाँ से उस पर कृपा बरसाने लग जाते हैं। कभी कभी, वह भाव विभोर! हो ही उठ ता, रो ही पड़ता कि हे प्रभु, तू ही सब कुछ देने वाला और स्वयं को भी दे देने को तत्पर है; कभी कभी, उस स्थिति में उस पर वह, दया-भाव से, उस पर कृपा भी कर बैठता, तो वह सोचता, उस पर क्या कहें? उस प्रकार के रस का पान करने वाला ही उस आनन्द को जान सकता है। उस क्षण, वह साधक केवल रो ही सकता है। इस स्थिति में उस, का कोई अन्य भी क्या सहारा बनता होगा? कभी नहीं, क्यों? क्यों उस अवस्था में कोई भी क्या सहारा बन सकेगा? इसलिए साधक को ऐसी स्थिति में जब वह रो रहा हो तो उसका क्या कोई आधार है? उस परिस्थिति में क्या परमात्मा उस पर ध्यान दे रहे हैं? साधक, उस समय पर, ईश्वर के उस स्वभाव स्वरूप को तो जान ही जाता है कि ईश्वर दया के सागर, कृपालु, दया के उस रूप को साधक जान ही लेता है। जब कभी साधक को इस प्रकार रोते देखा जाता है तब उस समय लोग, तो उस पर दया भाव लाते ही हैं परन्तु ईश्वर उस पर? वह ईश्वर तो उसे इस प्रकार रोते देखकर भीतर ही भीतर प्रसन्न होता रहता, उस भाव पर वह भक्त पर उस प्रकार का प्रभाव नहीं डालता जैसा लोग करते हैं, ईश्वर तो उस, के रो ने पर आनन्दित व इस प्रकार का भाव भरता रहा, जो उस पर दयावान् हो? कैसा यह, कैसा यह, कैसा यह कैसा भाव इस प्रकार ईश्वर का देखा। ईश्वर का यह भाव देखकर साधक भी और अधिक आन्दोलित होता हुआ अपने भावों को रोक नहीं पाता। कभी कभी तो वह अपने शरीर का भी भान भूल जाता, कि वह कहाँ बैठा है। ईश्वर साधक को ऐसी दशा में देखकर, उस स्थिति को और भी आगे बढ़ाता चला जाता, वह और अधिक व्याकुलता अनुभव करता
63
विचारशीलता विचार करने की क्रियाशीलता का दूसरा नाम या पर्याय है, जिसने मानव जीवन दिया। विचार सबसे तीव्र गति से कार्य कर रहे हैं। भौतिक दृष्टि से प्रकाश को सबसे तीव्रगामी माना, सूर्य की गति को माना गया या ध्वनि तरंगों को पर जो गति तथा प्रभाव मन तथा विचार का, वाणी का देखा गया वैसा तीव्र वेग या प्रभाव किसी भी अन्य उपकरण का नहीं। यह प्रभाव व्यापक या गहरा दोनों स्तरों पर होता है। विचारशीलता जहां होगी, वहीं सृजन होगा अथवा विनाश विचारशीलता क्रिया-रूप में परिणत होकर जहां होगी, वहां दोनों तरफ प्रवृत्तियां पैदा होंगी। जब भी विचारशीलता का रुख सत्य विचार होगा, तब मानव जीवन श्रेष्ठ कार्य में तत्पर रहेगा, अपने आप स्वयं के प्रति एवं दूसरों के प्रति जागरूक रहेगा तथा उसके व्यवहार में भी वह बात दिखाई देगी। इसलिए कहा भी गया है... 'मन में सोचे तो सब कुछ पर जब बात मुख तक आए मुख से जब शब्द रूप में निकले, वाणी का वह आचरण श्रेष्ठ स्वरूप बने।' जब श्रेष्ठ कार्य की बात हो, व्यवहार को सुधारने की बात कही जाती है? तब मन हमेशा उस ओर बढ़ जाता है। यहां पर एक बात कही गई जिस दिशा में चलना है, उस ओर विचार को मोड़ देना ही उस ओर कदम बढ़ाना कहा जा सकता है। विचार एक दीपक के समान है। वह जब तक जला रहता है, जीवन के व्यवहार को दिशा देता रहता है। दीपक को बुझा देने पर या उसका प्रकाश मंद हो जाने पर मनुष्य का कदम भटकेगा, वह राह भूल जाएगा। इसलिए कहा गया, जब तक ज्ञान रूपी दीपक जल रहा, तब तक विचारशीलता का प्रकाश दिखाई पड़ेगा। मनुष्य को सद्मार्ग की ओर ले जाना ही दीपक का उद्देश्य है। दीपक के स्वरूप को समझना होगा, उस ओर ज्ञान रूपी दीपक को जला कर के प्रकाश युक्त बनाना होगा। जिससे मनुष्य कभी अपने जीवन पथ पर अंधेरा न पाए। भटकन न आए! व्यवहार में न आए! "जो भी मन शुद्ध विचारधारा युक्त होगा सोचेगा, वह ही वाणी द्वारा श्रेष्ठ कहेगा" इसका अर्थ यह भी, व्यवहार ज्ञान विचारशीलता पर टिका हुआ होकर मनुष्य आगे बढ़कर उस विचारशीलता के अनुरूप स्वरूप सामने रखता है। जब मन में विचार ही ठीक न--होगा जहां अज्ञान रूपी अंधकार का बोलबाला होगा या रहेगा, तो वह शब्द अथवा उस विचारशीलता का जो फल बाहर रूप में आएगा, उसकी वाणी द्वारा प्रकट होकर जो कर्म रूप में, उस रूप में नजर आने लगेगा, उस समय मनुष्य क्या कहे और क्या बोलेगा, उसका व्यवहार किस तरफ जाएगा इसका कोई अंदाजा लगाना बड़ा कठिन होगा। जब भी विचार मनुष्य, मन से सोचेगा, उस को कार्य रूप आ--कार-रूप-देने रूप तक पहुंचाने हेतु वाणी का उपयोग कर उस बात को मुख से कहेगा, तो उस विचारशीलता रूपी वृक्ष रूपी शाखाएं फलती हैं, उनका स्वरूप सब को उस विचारशीलता रूपी वृक्ष पर नजर आने लगेगा कि फल कैसे निकले हैं। "जो विचार मन को पूर्ण ज्ञान द्वारा सोचेगा, वह ही वाणी द्वारा श्रेष्ठ कहेगा" यह तो विचारशीलता का स्वरूप हुआ, मन का हुआ, पर जो विचार मन तक आया ज्ञान द्वारा, सो मुख वाणी से भी ज्ञान द्वारा ही प्रकट होगा। "विचार कैसा ज्ञान रूप में विचारशीलता को दिशा देता ज्ञान होगा, उस विचारशीलता का रुख उस ओर मुड़ कर वाणी के स्वरूप को श्रेष्ठ बनाएगा या उस दिशा में ले जाएगा" ज्ञान का यह सारा असर मन की क्रियाशीलता पर और मन की क्रियाशीलता का असर वाणी रूप मुख पर या वाणी द्वारा जो मुख से निकलता हुआ शब्द रूप में आएगा, उस विचार को एक विचारवान व्यक्ति ही जान या समझ पाएगा, उस विचार को पहचान पाएगा, जो विचार ज्ञान से आ रहा होगा, वह विचारशीलता का जो प्रभाव मन पर ज्ञान द्वारा डाला जा रहा होगा, उस बात को समझेगा। जब ज्ञान द्वारा श्रेष्ठ विचार का प्रभाव मनुष्य के मन पर पड़ता है, सद्ज्ञान विचारशीलता की दिशा में ले जाता है, व्यवहार विचारवान बनकर जब बाहर आता है, तो विचारवान मनुष्य उस बात द्वारा प्रसन्न होगा कि! वह विचारशीलता श्रेष्ठ दिशा का ज्ञान कराती है। ज्ञान रूपी मन ज्ञान द्वारा प्रकाशित हुआ दीपक ही सब दिशाओं में श्रेष्ठ प्रकाश फैलाता विचारशीलता रूपी एक ऐसा दीपक होगा, जो दीपक जल कर न केवल विचारशीलता प्रकाश को फैला रहा होगा, उस ज्ञान द्वारा उस विचारशीलता दीपक प्रकाश द्वारा हर एक मनुष्य का जीवन प्रकाशित होगा। विचार ही मनुष्य विचारवान को पहचानता हुआ उस पथ पर ले जाएगा, जिसके वह योग्य होकर अपने जीवन स्वरूप को सार्थक करने का प्रयास कर सकेगा, जो वह मानव जीवन श्रेष्ठ 64
द-ि-य-ा ग-य-ा ह-ै क-ि म-ा-त-ा-प-ि-त-ा न-े स-न-्-त-ा-न क-े
Line 51: पालन-पोषण में जो कष्ट सहन किये, उनका बदला सन्तान कभी नहीं चुका सकती। माता-पिता प-ा-ल-न-प-ो-ष-ण म-े-ं ज-ो क-ष-्-ट स-ह-न क-ि-य-े, उ-न-क-ा ब-द-ल-ा स-न-्-त-ा-न क-भ-ी न-ह-ी-ं च-ु-क-ा स-क-त-ी। म-ा-त-ा-प-ि-त-ा
Line 52: ने सन्तान को केवल जन्म ही नहीं दिया, बल्कि उसे अच्छा नागरिक भी बनाया। न-े स-न-्-त-ा-न क-ो क-े-व-ल ज-न-्-म ह-ी न-ह-ी-ं द-ि-य-ा, ब-ल-्-क-ि उ-स-े अ-च-्-छ-ा न-ा-ग-र-ि-क भ-ी ब-न-ा-य-
□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□? □□□□ □□□, □□ □□□□□□ □□ □□□ □□--□□□` Wait, let's look at Line 38 (which is line 40 in my previous count, let's recount carefully): Let's count lines from the top of the second block:
□□□ □□ □□□...(Line 19)□□□□ □□□□...(Line 20)□□, □□ □□□...(Line 21)□□□□□□ □□...(Line 22)□□□□□□□ □□...(Line 23)□□ □□□ □□□...(Line 24)□□ □□ □□ □□...(Line 25)□□□□□□□□...(Line 26)□□□□ □□□ □□□□...(Line 27)□□□ □□□ □□□(Line 28)□□□ □□ □□□ □□...(Line 29)
▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯? ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ "▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯▯" ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯-- ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ 67
□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ 8 □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □ □□□ □□□□□□ "□□□□" □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ 9 □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ "□□□□" □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ 10 □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ "□□□□" □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ 11 □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ "□□□□" □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□--□□□□ □□, □□□□□□ □□; □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□--□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□; □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□; □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□; □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□-□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□, □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□; □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□□□□□-□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□? □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□--□□□□□□-□□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□! □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□--□□□□□ □□ □□□ □□--□□□ □□ □□□□ □□□□; □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□; □□□□□ □□, □□□ □□□ □□; □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□; □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□, □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□, □□□ □□ □□□□□ □□□; □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□; □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□; □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□, □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□; □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□, □□□ □□□□□ □□□, □□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□; □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□? □□ □□ □□□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ 68
विचारो करो, उस परमेश्वरने संसार उपकारार्थही बनाया? कि यह संसारका सब पदार्थ वा सारा संसार व्यर्थ, वा इसके बनाने का फल, कुछ तो उस परमेश्वरको प्राप्त होवे नहीं वा सकेगा। क्योंकि सब जगत् को बनाने कि शक्ति ईश्वर-ही विषयमें सदा विद्यमान और विचार भी उसका विचार-ही विषयमें सदा अथवा सब जगत् के विचार सहित ही विचार सकता है। जगत् सब सब काल में ईश्वर को विदित अथवा सब काल में विदित है? सब काल वर्तमान रूप ही वा सब काल जगत् को सदा रूप काल हैं? इस लिये जगत् का भूत भविष्यत् रूप काल हो सब जगत् सदा है? जो सब जगत् को विचार वा वर्तमान परमेश्वर सदा करता है तो जगत् को बना सकता ही, न बनावे सो, न परमेश्वर उस जगत्को बनावेगा, जगत्कर्ता नाम ही न जगत्का हो, सदा काल ही जगत् को जगत् सिद्ध रहा॥ सो सब काल में जगत्के दो रूप हैं, एक सूक्ष्म सब जगत् का कारण सो सदा सिद्ध है! जो कोई जगत्के दो रूप को सत्य सब काल में न माने अथवा ही; जगत्का जो कार्य स्थूल रूप, सदा बने, बिगड़ता रहता है उसको भी नित्य माने; जगत् के कारण रूप को जो सत्य न माने, सो तो सर्वथा ही अज्ञानी वा पापी है; इन दो प्रकार के सब बातों को विचार के सब को, कार्य-रूप जगत् को सब कोई; कर्त्ता सब जगत् का विचार कर सिद्ध करें। सो सब जगत् का रूप, जो सब काल सत्य है, उस एक--ही ईश्वर कह सकें ही; जब सब जगत् सिद्ध है, तो सब जगत् ईश्वर--ही सिद्ध सब काल सिद्ध ही रहा, उस को जो कोई कहे, कुछ हानि नहीं होती; इस विषय और प्रकार भी, जो जगत् को कार्य-कारण रूप, सत्य--सिद्ध मानें, सब जगत् सब जगत् रूप सब का सब रूप सब काल में जगत् को ईश्वर को ईश्वर ही सब जगत् कह ही ले, वा परमेश्वर सबही जगत् हो, तो सब जगत् ईश्वर सिद्ध भया; यथा वेदान्त; कार्य रूप जगत् को जो सत्य वा असत्य सर्वथा कह भी देवें सो सब जगत् को काल ही का नाम जगत् सदा ही का कहना सब रहा, उस में; जो विचार कर न देखे, सो मूढ़॥ सब जगत् सदा ही हो वा न, तो सब जगत् को सब जगत् ही कहना सब को सो सिद्ध सत्य होता है; ईश्वर को विचार ही क्या; जगत् को ईश्वर ही है; जो जगत् को ईश्वर का ही रूप सब काल सिद्ध हो गया! सब जगत् सब मिथ्या? जगत् को बना ही सकता, अहो, जगत् के सब सत्य जगत् को रूप ही जगत्को सदा सत्य जगत्के ही सब काल जगत् जगत्के सदा ईश्वरका, जगत्का जगत्कर्ता, जगत्कर्ता जगत्का सब कुछ जगत् को सब जगत् को न कह सकेंगे वा जो जगत्को वा जगत्के ही विचार सिद्ध हो, सो जगत्को सदा ही कार्यजगत् जगत् का सिद्ध ही सब रहा सो, जो दो प्रकारका जगत् जगत्के लिये सदा सिद्ध ही था तो जगत्के जगत्कर्ताओं सब जगत् जगत् जगत् के स्वरूप सदा ही सब सब जगत्कर्ताओं जगत् जगत्॥ इसके सब जगत् का हो वा सब जगत्, सो तो सब जगत्कर्ताओं सब जगत् रहा, जिसके सब ही जगत् सदा ही सब ही सब जगत् को ही सब जगत् जगत्कर्ता सब ही सो सब जगत् जगत्का सदा ही काल है, सो जगत् का विचार॥ सब ही उस जगत् को ही जगत्का सब ही सब जगत्का रहा, जगत्कर्ता को जगत् सब ही जगत्का जगत् को जगत् जगत् जगत्का जगत् सब जगत् जगत् जगत् सब ही सब जगत् सब ही सब ही सब जगत् जगत् है; जगत् कर्ता भी ही जगत् जगत्कर्ता के सब सब जगत् जगत् ही सदा जगत् जगत् सदा ही सब जगत् सब जगत् जगत्का ही सदा जगत् जगत् के सदा जगत् ही रहा, न ही, सदा! जगत् के सदा सब ही, सब ही सब जगत् के सब ही जगत् के सब जगत् ही जगत् के ही सब जगत् सदा! जगत् के सब ही जगत् जगत् जगत् ही सब ही जगत् के--जगत् जगत् जगत् सदा ही जगत् जगत् सदा जगत् सदा जगत्--जगत् जगत् के जगत्के सब जगत् सदा सदा, सो ही ही जगत् जगत् के सदा ही हो! सो ही सो सदा सदा ही, सो ही सदा॥ सदा जगत् सब सब जगत् जगत् सदा सब जगत् जगत् जगत् सदा सब सब सदा सदा रहा, सदा ही सदा सब सब सदा न सदा सब सदा सदा है? जगत् के ही सब सब का, सदा सब सब सदा जगत् जगत्, सदा जगत् सब सदा सदा सदा ही सदा सदा ही; सदा ही सब सदा सब सदा जगत्॥
69
कषाय-भाव सदा ही सब ओर बाधा रूप ही रहे ऐसा नहीं है, किसी समय यह भाव किसी आत्मा को मोक्ष मार्गका भी साधन बनता ही देखागया एक व्यक्ति किसी कार्य वश निकला था, उसको अपने ग्राम वापिस लौटने में रात होने लगी और मार्ग में घनघोर अंधकार छा गया, वह आगे न जा सका; सो वह एक वृक्षके नीचे विश्राम करने लगा, वह वृक्ष फल युक्त लदा था; अकस्मात ही वायुके तीव्रवेग प्रवाहसे जो, दो चार फल नीचे गिरे उन्हेंउसने खा, तृप्तिके साथ उस वृक्ष नीचे रात्रि व्यतीत करने लगा और उस वृक्ष का उपकार मानने लगा कि इस वृक्ष ने मुझे फल दिये; लेकिन यदि फल-वृष्टिसे या, पवन द्वारा वायुके से उस वृक्ष की एक डाल उसके ऊपर गिर जाती तो क्या वह इसका आभार मानता? नहीं, कभी भी नहीं मान सकता था, कारण कि उपकारीका उपकार सर्वदा माना ही जाता लेकिन जो किसी को हानिकारक हो उसके प्रति तो न केवल उपेक्षाका भाव रहता अपितु मनमें द्वेष रहता है। परिणाम तो परिणामों द्वारा उत्पन्न होता रहता हैऔर यह परिणाम सब जीवों को सुख और दुःख देता सो इस प्रकार अज्ञानी जो, जो कुछ करता उसे भला मान बैठता है। इस कारण से, जो बात वस्तुस्वरूपके सत्य स्वरूप से; विरुद्ध फल देती है उस ओर यह मन क्यों ले जाता है। सो इस बात बिना जाने ही सब जीव अज्ञान दशा में ही सब कुछ कर रहे हैंऔरमिथ्यात्वके उदय से ऐसा सोच रहेहैं कि हम बहुत अच्छा कार्य अपने लिए कर रहे हैं। ऐसा सोच कर ही वे इस बात को नहीं समझ पा रहेहैं कि वेवास्तव में कर क्या रहेहैं जब यह अज्ञानभाव को छोड़ देगा, तब उसके मनमें ऐसा विचार उठने लगेगा कि इस बात से संसार बढ़ता है, सो इसमें भी अज्ञानियों द्वारा जो किया गया उस पर कोई भी यह नहीं सोचता कि अज्ञानियों द्वारा जो कुछ किया गया वैसा कभी भी नहीं, कभी भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस समय तो, उनका जो राग भाव था वह न तो, मोक्ष मार्ग रूप में परिणत हो, वरन् ऐसा विचार करने वाले पुरुष के भीतर न राग-का अंश न-द्वेष रूप भाव रहेगा! सो इस अज्ञानदशा में उस जीव को राग ही के वशीभूत होकर ही प्रवृत्तियाँ हुआ करती... मानो अज्ञानवश ही, राग परिणाम को वह ही कल्याण का ही मार्ग मानके प्रवृत्त होता है। अज्ञानियों द्वारा किया गया हर एक कार्य अज्ञान, कष्ट, क्लेश, दुःख दायक, भय कारक होगा, इनके द्वारा किया गया सब राग अज्ञान युक्तही सो यह बात अज्ञानके ही वश होकर होती है। इस से सिद्ध हुआ, राग भावों-कर्मों द्वारा कभी! मुक्ति का मार्ग मिल नहीं सकता न होग! ऐसा जो सोच रहे हैंवे भूल रहे हैं और वे इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ ही सिद्ध होतेहैं पंडित जीका मत, "संसार का जो कारण, सो, मोक्ष का कारण कैसे होगा अर्थात् राग तो संसारका बीज हैऔर संसार का कारण ही है, मोक्ष का नहीं, इस प्रकार मिथ्या रूप से भावित कषायों द्वारा मुक्ति रूपी सुख होना, संभव ही नहीं क्योंकि यह मिथ्या कषाय जीव को संसार में ही भटकाने का मूल कारण बनेंगी" निर्विकल्प निज स्वरूपमें एकाग्र होवे जीव जब। मिथ्या भाव मिटे निश्चयसे प्रगटे सम्यग् ज्ञान तब॥ स्वाधीन सहज सुख प्रगटावे दर्शन मोह मिटे जब ही, निश्चय। कषाय भाव जीव को संसार में ही फंसायेगा, कभी, मुक्ति का कारण न होगा कभी! यह विचार तो हर किसी को करना ही होगा! जो विचार ही न करेगा, सो, अज्ञान ही में रहेगा! कषाय का तो फलही संसार परिभ्रमण होगा! मोक्षप्राप्ति कदापि नहीं होगी जब यह आत्मोन्मुख होगा तब कषायों मन्दता का परिणाम सहज ही आ गया, स्वभाव रूपसे ही कषायों मन्द हो गई न क्रिया की दृष्टि से कषायों मन्दता की ओर जीवका लक्ष्य गया, इस प्रकार का राग स्वाभाविक परिणमन रूप ही परिणत हो जाता है, कषायों का नाश उस समय सहजही अनायास होने लगता है, तब कषायों के प्रति अनासक्ति का भाव जाग पड़ता हैऔर जीव, राग से विमुख होने लग पड़ता है, वह जीव यह भी जान जाता हैकिराग से मेरा कोई नाता नहीं और राग मुझमें न तो किसी प्रकार सुख रूप फल देने वाला होता और न ही इस जीव काराग-भाव से कभी भी कल्याण सम्भव हो सकता बल्कि आत्माका अकल्याण ही है, सो इस रूप जानकर वह अपने को कषायों रहित करने का ही सतत प्रयास करता रहता है। इस रूप से जो कषायों मन्द होना कहा हैवह जीव को मोक्ष मार्ग का कारण कहा जा रहा हैक्योंकि रागका मन्द होना जीव को उस ओर मोड़ने में समर्थ होता देखा गया सो यह व्यवहृत है; ऐसा केवल मोक्ष प्राप्ति का उपाय समझना ही, 70
विचारशीलता हो; यदि यह विश्वास न जगा सकें और ज्ञान व्यर्थ हो, तो ज्ञान छोड़ो, उस विवेकहीन को पहले मिटो ऐसा ही पाप इन दस सिर वाले दस भावों का हो रहा था, जो कि राम विमुख थे, जो कि ज्ञान प्राप्त कर काम रूपी हो गये थे। काम रूपी ज्ञान को ही राम मारे दस इन्द्रियों न ज्ञान का विषय तो किया स्वीकार पर ज्ञान को, कर्तव्य रूप में तो रस न था, रस तो इन दस मुखों को केवल भोगवादी वासनाओं में था, भोग प्रधान काम बन काम की लीला--वह जो ज्ञान राम द्वारा न मिला हो काम का स्वरूप ले लेता, जो ज्ञान प्रभु द्वारा प्राप्त होकर राम रूपी वैराग्य का रूप धारण करता वह ही ज्ञान केवल रस को रस का रूप न देकर वासना का रस बना देता! सो ही काम बना! सो ही ज्ञान के दस सिर काम रूपी रावण के--दसों इन्द्रियों के रूप में वासना से भरे रस को ही अपना भोग्य बनाते रहे, रस में, रूप में, गंध में, स्पर्श में तथा शब्द में रस लेकर न केवल, उस परमात्मा रूपी रावण की पूजा करते रहे अपितु उसे भी काम का रूप देकर वासना का भोग स्वीकार किया जो कि राम की सीता रूप में पराशक्ति का रूप थी। सीता रूप का भोग कभी कोई रस के रूप में नहीं कर सकता। सीता तो भक्ति का रूप थी, सो भक्ति का, तो केवल ज्ञान से संबंध हो सकता दस सिरों से दस मुखों से जो केवल भोगवादी वासना तृप्त हो रही थी सो तो केवल भोग का रूप न देकर ही केवल रस स्वरूप थी, भक्ति तो ज्ञान थी, ज्ञान का आवरण ओढ़ कर कोई भक्ति का हरण कैसे कर सकता था जिसके दस सिर केवल काम के विकार भोग रहे थे। सो ज्ञान रूपी दस--दस सिरों, जो केवल--एक ही रस, रस-रूप का भोग मात्र कर रहे थे, ऐसे ही दस सिरों को केवल ज्ञान रूप ही देकर, या ज्ञान द्वारा ऐसा योग देकर जिसने केवल ज्ञान रूपी प्रभु रस रूपी भक्ति स्वरूप माना होवे, उसी दस सिरों को दस ही रस का रूप न देकर, जो केवल उस ईश्वर के चरण लीन हुए! रावण तो केवल ज्ञान रूप न था इसलिए वह तो राम रूप में न होकर राम का शत्रु, उस राम का दास न बन कर वासना का ही सेवक हो जाता रहा। सो ऐसे ज्ञान, ऐसे दस सिर वाले रावण के दस सिरों को राम द्वारा पहले ही मारा जाना चाहिए था जो उस ज्ञान को केवल अहंकार का रूप दे रहे थे। सो मारा! रावण तो दस सिरों वाला ही न था, उसके बीस हाथ भी थे। दस ज्ञान की तो दस कर्म की इन्द्रियां थीं, जो कि केवल वासना के ही विकार को भोगने वाली थीं। कोई सेवा भाव न था; कोई भी ऐसा काम, जो केवल ईश्वर स्वरूप सत्य के लिए ही किया जाता, कर्म भी दस हाथ केवल अपने स्वार्थ के लिए ही किए जाते थे। रावण के कर्म हाथ दस सिरों, ज्ञान सिरों के भोग वासना के लिए ही काम कर रहे थे। ऐसा ही दस हाथ वाला; दस ही रस को काम-भोग द्वारा भोगता तो दस कर्म, हाथ रस लेते; दस ही कर्मों द्वारा भी; दस ही ज्ञान द्वारा वासना स्वरूप बनकर न तो केवल अपने ईश्वर को पा सका, न ही प्रभु का सेवक बन सका। राम रूपी सत्य को, "सत्य ही तो धर्म, जप, तप के द्वारा पाया जाना चाहिए सो ज्ञान के द्वारा पाया जाना चाहिए सो तो नहीं, तप, पूजा भी सब काम" ज्ञान स्वरूप रावण के तो दस सिर केवल थे काम के, कर्म स्वरूप रावण के तो दस हाथ थे तो केवल काम के, जो केवल भोग रस को ही रस, जो केवल उस भोग रस को दस सिरों द्वारा भोगने का रूप देकर दस कर्म हाथों द्वारा उसी को पूर्ण कर "केवल रस को विकार स्वरूप बना रहा था" सो ही तो मारा जाना था, ज्ञान भी! अहंकार रूपी ज्ञान तो अहंकार रूप ही रह कर दस-दस के भोग को भोग कर समाप्त होता केवल अपने भोग के अहंकार में ही रह कर इस रूप वासना, अहंकार स्वरूप, न तो रस का कारण, केवल ही ईश्वर का रूप कहलाया, सो इसलिए अहंकार स्वरूप, जो कि ज्ञान का अहंकार रूप रहा, सो ज्ञान का रूप तो दस सिर के रूप में तो अहंकार द्वारा ज्ञान स्वरूप केवल तो 71
यह स्वाभाविकता इसलिए समाप्त हो गई क्योंकि स्वावलम्बनशीलता समाप्त हो गई इसलिए जब समस्या का हल खोजना पड़ेगा तब तीसरी शक्ति प्रवेश करेगी, "तुम्हारा तो हर मसला सुलझा हुआ चाहिए क्योंकि उसके बाद, समस्या का तो हल होगा नहीं तुम्हारा शोषण जरूर हो जाएगा यह बात बड़े रूप में भी लागू होती है।" व्यक्ति स्तर पर बात को सही रूपमें व्यवस्थित करने का पहला प्रयास होना चाहिए स्वतः; दूसरा प्रयास दो या तीन लोगों द्वारा या उनके द्वारा एकत्रित होकर; तीसरा प्रयास बाहर निकल--कर किसी मध्यस्थता का। पहले जब तक अपने मन को यह बात समझ नहीं आ गई कि समस्या हमारी ही मन की ही उपज होकर हमारे वश की बात ही नहीं रही तो समस्या बाहर की, पर उसका प्रभाव मन पर यह बात जब तक समझ में नहीं आ! हर व्यक्ति के जीवन का बड़ा भाग मन का ही काम करता चला जाता इसी को जीवन! इसमें मन, प्रकृति का काम, दो या तीन का प्रभाव! इन दो बातों तक कोई तीसरा नहीं आता या तो मन से काम चला, प्रकृति से काम चल रहा अथवा परिवार तक ही या दो मित्रों तक ही समस्या सुलझती हो तो इस बात का बड़ा भारी महत्व नहीं था, पर जब समस्या बाहर निकल पड़ी तब क्या यह संभव है, बिना स्वावलम्बन और आत्म-निर्भरता कोई रह सके? हर बात बाहर से ही सीखनी पड़ेगी या बाहर से सहायता ही ली जा सकती, जहां तक समाज में हर व्यवस्था का रूप था, वहां पर जीवन का निर्वाह करना कठिन बात नहीं थी, प्रकृति का रूप था, स्वाभाव रूप से सब काम चलता ही रहा था मन का, पर मनुष्य का जीवन जब से बाहर मुखी हुआ, तब से अपने स्वरूप को भूल कर स्वावलम्बन को, प्रकृति के स्वरूप को समझना छोड़ दिया और उसका प्रभाव विवशता बन गई, व्यक्ति का जीवन जो हर प्रकार सुखों भरा होना चाहिए था विवश हो गया हर समस्या बाहर निकलती गई, समाधान का आधार भी समझना पड़ा व्यवस्थाओं की ओर देखना पड़ा था, प्रकृति व्यवस्था को तो समाप्त ही समझना शुरू कर दिया या ऐसा कहो, प्रकृति का कोई भी अस्तित्व अपने लिए नहीं समझा या भुला ही दिया गया बात जब इतनी समाप्त नहीं हुई, इसके दो रूप आए हैं, हर बात उस प्रकृति व्यवस्था व व्यक्ति कार्य-शैली तक बंद नहीं रही जिसका प्रभाव व्यक्ति से सब ओर फैला हुआ समझा जाता; इसमें जो नया रूप आया जिसने आज व्यक्ति विशेष तक सीमित होने वाले रूप को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया उसका नाम स्वाभाव प्रभाव कहा जाने लगा, जो तो था, प्रकृति रूप से जीवन का वह स्वरूप सब ओर से अलग था, प्रकृति का प्रभाव था, प्रकृति की बात थी, व्यवस्था की बात थी, जिसे हर व्यक्ति ने स्वयं रूप समझ लिया था! व्यवस्था की बात समाप्त नहीं, केवल यह प्रभाव खड़ा हो कर सब व्यवस्थाओं और व्यक्ति विशेष विचार दोनों को विवशता में ला पटकने का ही काम कर सका। दूसरा परिणाम आया, जिसे हर व्यक्ति अनुभव करता जा रहा केवल उसी रूप को नहीं समझ पाया कि हर बात केवल प्रकृति से ही नहीं जुड़ी मानी जा सकती! जिसे अज्ञानता, विद्या अभाव कहा जा रहा है! केवल विद्या अभाव शब्द तक ही नहीं, अज्ञानता शब्द केवल ज्ञान का अभाव ही स्वरूप समझ लिया गया इसके प्रभाव को और आगे समझना होगा कि आज व्यक्ति का जीवन कैसा हो चला जिस को विद्या प्रभाव या ज्ञान अभाव का परिणाम कहा जा सकता और उसके हल की दिशा समझी जा सकती जिस समय मनुष्य के जीवन का स्वरूप ही बदल जाता गया, विद्या के सब आयामों को जो भी नाम दे दिया गया उसका परिणाम केवल यही निकला कि आज एक प्रकार का प्रभाव मन पर प्रभाव डाल गया स्वाभाविकता का जो रूप था समाप्त हो गया; अस्वाभाविकता आकर जीवन को ही समाप्त अव्यवस्थित स्वरूप दे गई? व्यक्ति सब कुछ भी सोचे? कुछ भी सोचे वह सब, सब के कल्याण और सुख-शान्ति का स्वाभाविकता के अन्तर्गत नहीं आता था तो उसका नतीजा क्या निकलता? आत्म-ज्ञान की बात तो बहुत पीछे, मात्र रीति-नीति चली गई, पर जीवन तो संकट भरा बना रहा। सब कुछ का लेन-देन का अभाव समाप्त हो गया था रूप भी समाप्त भरा था। व्यवस्था के अंतर्गत लेन-देन हो सकता था, पर साधन तो आज समाप्त रूप हो चुके; केवल भ्रम शेष था या बना रहा विद्या का स्वरूप प्रभाव हो रहा है? अविद्या प्रभाव है? नहीं! केवल भ्रम फैलाकर मनुष्य समस्त व्यवस्था समाप्त कर बैठा केवल अविद्या रूप में ही सब कुछ चल या चलाया जा सकता समझ कर, उस पर भी भ्रम शेष फैला हुआ था जिससे 72
इसका प्रत्येक सदस्य जानता था, कि भारत सरकार उसके विरुद्ध भारी सेना तैयार करके उसपर आक्रमणकारी सेना भेजेगी, पर उसके प्रत्येक सदस्य जीवन की परवाह छोड़ कर लड़ना था, उसके प्रत्येकसैनिक अपने भारत माताके चरणों पर जान निछावर कर देने को प्रस्तुत रहता था इसलिये उस सेनाका हर सिपाही और हर अफ़सर असीम शौर्य का साक्षात स्वरूप था और आजाद हिन्द फौज जन-बल केवल चालीस सहस्रमात्र होकर रहा! जिस समय इस सेनाने यह निश्चय किया, कि दिल्ली को विजय करने पैदल आगे बढ़े उस समय, दिल्ली वहांसे आठ सौ मील, यानी बारह सौ किलोमीटर थी प्रत्येक सैनिक अपने सिर कफ़न का बांधा था! हर सिपाही चार-चार बंदूकों वाली अपनी राइफल अपनी पीठ पर लटकाये चल रहा था पर उसके पास गोलियां केवल पचास थीं हर सिपाही काफ़ी गोलियां? पेट को लिये प्रत्येक को गोलियां? पेट को लिये हर सैनिक केवल पचास गोलियां? भोजन का साधन यह था प्रत्येक सैनिक अपने साथ केवल दो या तीन दिनोंका भोजन अपने थैले में डाले आगे बढ़ा रहा था वह जेब में केवल भुना, दलिया लिये था जिसके सहारे कई दिन तक लगातार सैनिक लड़ते रहे किन्तु सब लोग अपने लक्ष्यपर अटल विश्वास, उत्साह से भरे आगे बढ़ रहे सैनिक यह जानते आगे बढ़नेपर जिस देशमें पहुंच रहे हैं। वहां का कोई भारी साधन मिलने की कोई संभावना नहीं! फिर भी आगे कदम बढ़ाया आगे का मार्ग जंगलों और नालों-नदियों से भरा पड़ा था कोई पुल तो था नहीं। न दलदल से निकलने के लिये कोई उपाय सेना के पास था और न, भारी वर्षाके कारण भी जब कोई साधन सेना को नहीं मिल रहा था, भोजन का जब कोई ठिकाना नहीं रहा, पीनेके पानीका भी जब अकाल था, जाड़ा भी पड़ रहा था मलेरिया फैलाना तो हर एक के साथ था, फिर भी आजादी पाने की लगन आगे बढ़ने और दिल्ली को जीतने स्वप्न, भारत को मुक्त करने का हौसला सदा! यह सब ही बल उस सेना पास सब समय था। एक दिन की बात, जबसेनाकी टुकड़ियां आगे बढ़ रही थी उस समय यह बात उठी, क्या इस स्थिति में आगे बढ़ना चाहिये? तो एक तरफ नेता जी का चेहरा था, जिसे-देखकर हर एक सैनिक के दिल शक्ति उमड़ती सैनिक आगे बढ़े जा रहे थे। जब नेताजी ने यह सुना, कि सेना आगे बढ़ रही है, कहा, मैं, भी आगे कदम बढ़ाऊंगा! पर उस समय वहां पर एक ऐसा दलल था, जो सब प्रकार के संकट सहने अपने नेता को कठिनाईयों बचाने में लगा रहता था। उस दल ने नेताजी का आगे बढ़ने से रोका कहा जब तक हम सैनिक जीवित रहेंगे नेताजी सुरक्षित रहेंगे हम लड़ेंगे पर आप खतरे में नहीं पड़ेंगे इस बात सुनकर नेताजी ने यह कहकर आगे पैर बढ़ा दिया हमतो सिपाही; पर वीरता ने अपना रूप खुद ही दिखाया। एक समय तो हर तरह सेना को हर बात के साधनो की आवश्यकता सामने आ खड़ी थी तब सेनाका एक सिपाही भी उस समय पीछे नहीं हटा। जब किसी प्रकार कोई तोपखाना पास नहीं था उस समय सैनिकों केवल अपने कंधों और पीठ पर तोप लादकर लेजाने का काम किया। उस समय न तो मोटर गाड़ी थी न कोई वाहन इस रूप में काम आ रहा था, केवल लोग अपने पैरों पर चल रहे थे। फिर एक कठिनाई सामने आयी और वह यह थी; कभी पानी का संकट पड़ जाता था; कभी खाने का संकट आ खड़ा हो--ता था। एक क बात यह थी कि जब सेना आगे कदम बढ़ाती शत्रुसेना अपनी पूरी शक्ति लगा देती थी जिससे कि सैनिक आगे न निकल सके संकट तो सामने आ खड़ा होता किंतु लोग तो फिर भी प्रत्येक संकट झेलने सामना करनेके लिये तैयार रहते थे। पर इस प्रकार कई दिन तक सेना को लगातार संकट झेलना पड़ा। इस सेना को न तो पेट भर अन्न का दाना उपलब्ध मिलने की आशा थी, केवल जीवन रक्षक ही था; मगर सिपाही, सब कठिनाइयो झेलते हुए आगे पैर बढ़ायेजानेके लिये तैयार ही रहते थे। इन वीरोंके पास जब भारी गोलाबारुद नहीं, केवल हाथ हथियारो सहारे आगे निकल पड़े, प्रत्येक कदम पर मौत का खतरा, साथ हीन-भाव; केवल एक बात हमेशा आत्मविश्वास जगाए रखती थी कि भारत, स्वतंत्र हो कर-रहेगा हमारा नेता, हमारे सिर ताज नेता जी सुभाष चंद्र बोस, इस बात विश्वास सबमें था। यह बात किसी तरह भी कम नहीं समझी जा सकती और ऐसा ही यह दल अपनी विजय पर बढ़ा। इस दल ने जो चाहा, उसकी शक्ति केवल जन-बल नहीं था! वहां केवल शौर्य, कर्त्तव्यभावना और देशके--स्वतंत्रताके लिएसब कुछ त्याग था, जिसे देखकर शत्रु थर्राता रहता था। सेना के प्रत्येक सदस्य जीवन में जन-बल का भाव केवल न था। किंतु वह दल, प्रत्येक को आगे बढ़ाता था, जिसका फल सामने यह आ रहा था कि सब, एक ही बात लक्ष्य थी; जो कि हर हृदय में गूंज रही, वह थी हर एक दिलमें भारत माता की विजय का स्वर और यह आवाज प्रत्येक, प्रत्येक सदस्य केवल
□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□? □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□, □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□ □□□□; □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□; □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□! □□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □ □□□ □□□□, □ □□□ □□□□, □ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□; □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□, □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□; □□□□□□□□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□; □□□□□□□□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□! □□□□□□ □□□! □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□--□□ □□□□ □□ □□□□□ □□; □□ □□□□ □□□ □□□ □□; □□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□; □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□; □□□□ □□□□ □□□□□□; □□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□--□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□--□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□, □ □□□□, □□□□□ □□□□! □□ □□□ □□□□□□□□□□□□ □□, □□□ □□□□□ □□□, □□ □□□, □□□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □ □□ □□□ □□ □□□, □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□! □□□ □ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□? □□□□□ □□□□ □□? □□ □□□□ □□ □□□, □□□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□--□□□ □□□□□ □□, □□□ □□□□ □□; □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□; □□ □□□□ □□ □□□ □□□□! □□□ □□□□□ □□ □□□□□; □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□! □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□, □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□ □ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□ □□ □□□□! □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□; □□ □□ □□ □□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□, □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□, □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□, □□□□□ □□□ □□ □□□□□--□□ □□ □□□□, □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□□□-□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□-□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□-□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□; □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□, □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ 74
□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□, □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□, □□□ □□□ □□ □□□□□; □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□; □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□-□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□-□□□□ □□□, □□□□ □□□□-□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□, □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□, □□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□□□□□, □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□□ □□□□□□, □□□ □□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□□□□, □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□, □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □ □□ □□ □□□ □□□□□-□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□, "□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□" □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□, □□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□; □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□□□□ □□; □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□, □□□□□□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□; □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□; □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□; □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□-□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ "□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□" □□□□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□□ □□□□, □□□ □□□□ □□□! □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□ □□□□□ □ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□--□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □ □□; □□ □□ □□ □ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□, □□□ □□□□□ □□□ □□□; □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□! □□□ □□□□? □□□ □□□□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□□, □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□; □□□ □□□ □ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□, □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□□□ □□□ □□; □□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□, □□□, □□□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□, □□□□□□□□□□ □□ □□□ □□□□; □□□ □□□□□□ □□□□, □□ □□□ □□ □□□ □ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□, □□□ □□; □□□□□ □□□□, □□□□□; □□□□□ □□ □□□□, 75
उपद्रव करें; उनका जो शिष्य, उनका जो; और न ही उस वक्त किसी का अविश्वास, किसी का तो विश्वास कीजिए तो वो साधक के आन्तरिक अभ्यास का प्रभाव या सिद्धि चमत्कारिक रूप से दिखाई दे, जब तक इसका प्रभाव इस तरह का रहता रहता तब तक लोग यह समझ लेते हैं ऐसा हुआ या नहीं, या यह एक कल्पित या भ्रम भरी बात, इसलिए उस व्यक्ति को तब तक इन सब बातों का प्रभाव निष्प्रभावी या शान्त नहीं कर पाता जब-- तक कुण्डलिनी के चक्र, या सूक्ष्म रूप प्राण--का आकर्षण दुर्बल नहीं हो जाता। इसके बाद तो जो भी साधक किसी वस्तु या पदार्थ रूप शक्ति द्वारा लाभ प्राप्त करता है, या शक्ति का रूप या तो नष्ट हुआ या शान्त हो जाता। इन सब बातों के लिए साधक रूप को इन सब बातों से बच कर या उनसे दूर ही रहने की चेष्टा निरन्तर रूप किया जाना पड़ा इसके लिए एक, केवल ही एक रूप का मन होना मात्र आवश्यक नहीं कि यह केवल जप करे, या यह केवल ध्यान का करे, मन सब कुछ करने के न करने के ही न मन का, या मन सब अभ्यास रूप हो, तब केवल जो, सब कुछ हो! इससे केवल ज्ञान स्वाभाविक रूप प्राप्त हो सकता "केवल मन ही चंचल नहीं है, इसके साथ ही साथ प्राण भी चंचल रूप रहा, इस कारण विचार भी निरन्तर ही चलते रहते हैं और विचार जितने अधिक चलेंगे मन उतना भटकेगा" जो साधक अपने मन प्राणायामादि द्वारा प्राणों शक्ति एकाग्र करने लग--जाता या जिनका प्राणायाम से प्राणों का योग हो ही जाता या मन शक्ति को प्राण शक्ति सब ओर सब ओर स्थिर कर लेता वह विजयी; चित्त को जो वश करने लग जाता तो विजयी; या मन, या प्राण, या इन्द्रियां आदि सब स्थिर कर लेता योगी ही कहा जाता या जो स्थिर या वश में ही स्थिर न हो, तब तो सारा सब कुछ स्थिर हो ही जाता । अतः प्राण व मन, इन सब शक्ति कभी मन का निरोध कर लिया, तब तो प्राण रुकता ही, या फिर प्राण को स्थिर करने पर मन स्थिर स्वतः होता, प्राण सब कुछ कार्य करने का ही तो व्यापार या रूप है, शरीर में इन सब का प्रभाव ही तो मन के रूप को ही स्थिर कर ले तब एकाग्रता या हो, या प्राण को वश करने सब एकाग्र चित्त हो कर प्राण शांत रहा चित्त के दो रूप रहे, संस्कार रूप मन में वासना का बना रूप, संस्कार रूप यह वासना मात्र प्राण रूप को सब तरह नष्ट न करता तो इन सब को खत्म करने से ही मन सब ओर से हट कर वासना से शून्य होकर स्थिर रूप या स्वरूप में ही विलीन हो जाता या तो फिर प्राण शक्ति समाहित अवस्था प्राप्त हो, तब यह सब तो स्वतः ही ही हो ही जाता ही रहता था! वासना के नाश से; संस्कार नष्टता समाप्त हो, चित्त शांत रूप वासना का प्रभाव खत्म रहा चित्त को इस प्रकार वश में ही या तो योग, या ज्ञान, सब कुछ के दो; ज्ञान रूप को तब तक मन स्थिर करता जब तक प्राण रूप सब ओर तरह से ही तो सब ओर से ही शांत होता, तो मन तो शांत हुआ केवल ही अभ्यास रूप क्रिया ही सब कुछ है; ज्ञान होना अलग है; केवल ज्ञान का यह अर्थ नहीं कि केवल ज्ञान को जानना या सीखना मात्र ही सब कुछ होना रहा, तो अभ्यास द्वारा ही ज्ञान लाभ सम्भव हो पाता है, इसके विपरीत तो कुछ नहीं कहा गया; न ऐसा हो सका, केवल ही; या ऐसा ही ज्ञान हो, केवल ही हो; या सब प्रकार से ज्ञान क्रिया एकाग्र अभ्यास सब सम्भव रूप में किया जाता है, इसलिए अभ्यास "केवल मन ही चंचल, अभ्यास से एकाग्र किया जाना सम्भव तो हो जाता पर मन के साथ प्राण शक्ति को भी एकाग्र किये बिना एकाग्रता के ही सब ओर भटकने का डर बना ही रहता इस कारण प्राण एकाग्रता से ही सम्भव, एकाग्रता ही सब कुछ स्थिर कर प्राण शक्ति रूप योग को चित्त से ही एकाग्र कर साधक ज्ञान का यह रूप पा कर ही वश करने लगता" सब कुछ एकाग्र रूप में, अभ्यास से; क्रिया रूप से ज्ञान सम्भव है; क्रिया ज्ञान से भिन्न सब एकाग्र ही होता है; ज्ञान स्वयं रूप न हो कर ज्ञान का ही स्वरूप तो इन सब बातों द्वारा ज्ञान रूप में ही देखा जाता है, योग से ही सम्भव ज्ञान एकाग्रता द्वारा शांत होता रहा 76
यद्यपि तपश्चर्याका फल अपने आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्तकरके कैवल्य पदका पाना ही था और इसी को पाकर वह सदा सर्वदा सुखीरहता व संसार चक्र, जो जन्म मरण का रूप था, उससे छूट कर अक्षय सुख को प्राप्त करता, तपश्चर्या का फल यही मोक्ष लक्ष्मी का पाना था तथापि यह, तपश्चरण करते समय जो आत्मस्वरूप को प्राप्त करने के लिये तप तप रहा था उसपर रीझ कर इन्द्र पद या अहमिन्द्र, अहमिन्द्रोंके देवलोकों का सुख भोगने लगता था। और जबतक कर्म का फल भोगता रहताथा तब तक संसारमें रहताथा तीसरे काल तक जब तक मनुष्य जीते थे तब तक, सुख ही ही भोग भोग कर या भोगों भोग कर समाप्त होते थे क्योंकि भोग भूमि के उन मनुष्यों को कर्म नहीं करना पड़ता था न विद्या की, न व्यापार आदि की चिन्ता थी न सेवा की और न शिल्प शास्त्र सीखनेकी चिन्ता थी न कृषी करने चिन्ता थी। वहां तो दस कल्प वृक्ष थे वही इन जीवों को सब मन वांछा सामग्री देकर ही सब प्रकार सुखी बना दिये रहते थे, चौथे काल के प्रारंभ में जब भोग भूमि मिटी, कर्म युग प्रारम्भ हुआ। जीवों को खाने पीने की चिन्ता हुई तो राजाओं, के भी राजा श्रीऋषभ भगवान् सब जीवों को असि, मसि और कृषि करना सिखाने का उप उपदेश दिया। इसके पीछे, प्रजाने नियम रूप एक एक का आदर सत्कार कर जो आज्ञा अपनी भलाई केलिये निकाली, मान-कषाय विहीन होकर सिरपर धारण किया, प्रजाने नियम के विरुद्ध चलने वालेको, अपने कुटुम्बियोंतक को सब तरहका दण्डदिया, बात ऐसी फैल गई थी कि एक बार 'हा', कह देनेपर ही वह अपने किये पापको हृदय में धारण कर लेता था किसीको केवल इतना ही दण्ड था, इसके आगे कुछ नहीं समय पाकरके यह सब आदर सत्कार या नियम का रूप बदल तो गया नहीं, परंतु नियम भंग करने पर मार पीट अथवा फाँसी तकका दण्ड दिया जानेलगा या कारागार का दण्ड था इस तरह का सब राजा प्रजाके सुधारके लिये करते थे। उस समयके सब ही बड़े बड़े मनुष्य, जो कि सब बातों को व नियम प्रजाको सिरपर रख कर करने का उपदेश देते थे उन सबने नियम व न्याय की रक्षाके व नियमों, को पालने वाले सदा व नियमों पर ही आश्रित रहने वाले महा भाग जीव कहलाये। समय का चक्र फिरा, यह बात भी, उस ही प्रकार बदली, प्रजाके इन नियमों संबंधी नियमों का पालनकर्ता राजा रूप एक ही का नियम या अधिकार रहा, जो कि मनमानी प्रजासे, जो न्यायसंगत नियम चले आ रहेथे उनका उलटाकर अपने स्वार्थके अर्थ काममें ली, और सब तरह का न्याय प्रजापालक का जो काम था? केवल यही कि अपनी रक्षा अपने हाथ से? दूसरेसे जो कुछ नुकसान हो तो उस का बदला वह अपनी ताकत लगाकर प्रजा को ही ले--लेना था जिसे सब जन ही सब उपाय से कर ही सकते थे, प्रजाके उस जन, प्रजाके ही जन-- समुदाय का जो सम्मत धर्म अथवा न्याय के अनुकूल बना हुआ नियम था जो धर्मका, अपने कर्तव्य पालन सम्बंधी सम्मत-नियमों बना या हुआ, वह सब अपनी ताकत और अधिकार के बलपर चूर चूर कर या बदलकर रख दी, सब ही प्रकार प्रजाके विचार को बंद करके यह कहा गया जिसका कि सब धर्म सम्मत प्रजाके अधिकारोंका नाश करना मात्र ही तन-मन रूप काम रहा, कि प्रजा तो सर्वसाधारण जन केवल राजा प्रजाके पालनेवाले को ही तो सब प्रकार व सर्वथा रूप से सब कुछ करने काअधिकारी? उस समय केवल यह, केवल एक व्यक्ति को सब तरह का अधिकार प्रजाके सम्बन्धी-सम्बन्धों सम्बन्धी बातों का सौंप दिया कि राजा चाहे जो कुछ भी न्याय विरुद्ध आज्ञा देवे या आज्ञा निकालेगा, वह सब प्रजाको शिरोधार्य करनी ही होगी चाहे उस आज्ञासे प्रजा व उस प्रजाका भलाईके बदले नुकसान और हानि भी क्यों न हो, ऐसा केवल अज्ञानता फैलाने वाले लोगोंने राजा तथा राजाके इन सब को सिखा दिया था, जिससे सब प्रजाको यह! डर हो जाताथाकि धर्म का लोप करनेपर जो भी किया जावेगा उचित होगा राजा प्रजाके इन सब धर्म न्याय सम्मत नियमों तथा तन-मन धन का स्वामित्त्व छीन के, उस स्वामित्त्व तथा अधिकारों को जो प्रजाके ही पास परम्परागतसे चले आ रहेथे राजा तन-मन धन का स्वामित्त्व छीन के, सब ही अधिकार को अपने आधीन किया? क्या यह छल--कपट छल कपटकर जो प्रजाके पास धन या स्वतंत्रता आदि सब कुछ था उसका-- हरण ही सब प्रकार प्रजा का तन मन धनका अपव्यय करना नहीं कहलावेगा? हाँ, स्वार्थान्ध जन सब ही युग तथा काल में न्याय के स्थान में अन्याय का काम ही करते चले आये हैं, चाहे वह कोई भी हो, सब ही अपने को इसी तरह का शिकार बना ही लेतेहैं, बात ऐसी दशा में केवल यही ही हो सकती है; जिसे इस प्रकार की बात अथवा ज्ञान अपने आत्मामें सम्भवित रहा, वह ही इससे बचेगा? जो इस पर सब ओर, हर एक दिशा ध्यान दे सकता होगा तन-मन धनको बचा सकेगा जिसे यह ज्ञान, सब ही प्रकार व प्रकार! सर्वथा सम्भवित होगा वहीही, इस व 77
दयासिन्धो सब जग के स्वामी हमारा उद्धार करो हम अनाथ हैं। इन अत्याचारियों हमारा सर्वस्व छीन लिया हमारे सब बन्धुओं को मार डाला सो केवल प्राण ही बाकी रह गये। प्रभो, संशय होता था कि जब आपके परम भक्त प्रह्लाद केवल हरि ॐ की रट लगा रहे नृसिंह अवतार कर बचाया, तो हे दयानिधे क्या हम पापी हैं? जो हम पर दया नहीं करते नहीं नहीं आप तो सब दशा जान रहे सर्वात्मा, तो फिर हे कृपानिधे यह कैसा! क्या परीक्षा है? दयानिधे हमारी रक्षा; आपके ही नाम का गुण गान करने वाले-हम भी लोग हैं, कृपा सिन्धु अपनी दया दृष्टि हमारे ऊपर कीजिये पश्चात्-प्रभो जो न दशा की सो सब जग को विदित हमारी पश्चात्-रक्षा जो नृसिंह से रूप धरके की सोई अवतार फिर कीजिये हमारी रक्षा कीजिये क्योंकि दुष्टों ने सब प्रकार से हम लोगों को तंग कर रक्खा है इन सब बातों को दयासिन्धु भगवान् तो सब कुछ जान ही रहे थे। परन्तु अवसर देखकर सहायता करेंगे, पश्चात् जो यह सब लोग अपने कष्ट निवारणार्थ रोते थे सो सब बन्द किया गया, और स्वामी लोग उन सबको डांट डपटकर चुप करा दिया! पश्चात् सब लोग अपने काम को चले गये! सब लोग घर गये तो--दुःख से रो रो कर घर वाले कहने लगे, जहां कहीं भी सब लोग अपने बन्धुओं को रो रहे थे कि उस समय में किसी प्रकार धीरज नहीं था, केवल रो रो कर अपनी अवस्था को सुधारते हुए विचार करते थे। ऐसा विचार कि हम लोग अपने स्वामी लोग से जान से बचते हैं पश्चात् न तो कोई, किसी बात करके बचता ही नहीं तब ऐसा प्रकार का सोच कर सब लोग अपने घर गये, और अपने अपने काम सब लोग करते पश्चात् जब सब लोग एकत्र हुए तब सब भाई पश्चात् सब लोग अपनी अपनी दशा पर रो रहे थे। ऐसा विचार करने लगे कि किसी प्रकार तो विपत्ति चली जावे हमारी अवस्था को देख कर दया सिन्धु प्रभु दयालु कभी, हमारी सुधिया कभी लेंगे, पश्चात् सब लोग अपने विचार में रोते थे। हे; विधि क्या हमारी दशा यही सदा बनी रहेगी वा कभी विपत्ति से छूटा जायगा और कोई सुख भी हम लोग को होगा? पश्चात् रो कर प्रभु परमात्मा सब को देखते हुए दयासिन्धु जी, फिर अपने मन में विचार कर कहने लगे कि इन सब लोगों को धीरज देना चाहिये पश्चात् फिर, प्रभु जी अपने रूपको छिपाकर पश्चात् जो रूप धर कर गये उसका सारांश नीचे लिखा जाता ऐसा कह कर, "दीनबन्धु जो पर बस पर उपकार सो सांचा पर सब जगत् संशय भयो" सब बात दयासिन्धु भगवान् अपने मन में विचार कर पश्चात् अपने भक्त प्रह्लाद की दशा स्मरण करके पश्चात् विचार कर प्रह्लाद भक्त पर प्रभु का उद्धार पश्चात् राम-अवतार के समय में सब प्रकार से जो जो दुष्टाचारी निशाचरों का काम था उन-सब बातोँ को स्मरण किया! पश्चात् हे प्रभु दयाल सब रूप अपने मन में विचार कर पश्चात् सब दशा विचारते हुए मन में सोचा कि संसार में सब, दुष्टाचारी राक्षस भगवान् के नाम को केवल पाषाण में रख के पत्थर को पूज रहे और उसी पत्थर रूप पाषाण को सब संसार मान रहा है; फिर दयानिधे विचारते? जब संसार सब को ऐसा विचार में देखता तो फिर यह कष्ट भी सहन करो, परन्तु प्रह्लाद अवतार स्मरण कर पश्चात् जो अवतार का विचार सब जगत् पर दया किया सोई-विचार प्रभु जी सब अपने मन में पश्चात् सब संसार पर विचार किया केवल सब दशा सुधार होगा? यह विचार कर सब संसार पर दया, की कि सब लोग विचार करें; सो भी सब दुष्टाचारी पश्चात् सब मनुष्य, सब पर दया अपनी-अपनी दशा को देख कर पश्चात् सब लोग विलाप क्यों? सो पश्चात् साधु-सन्त जन-गण सब, एकत्र हो कर सब लोग हे दयाल जी, हे प्रभुजी जगपति प्रभु, हे त्रिलोकीनाथ दयालु जी, दयालु रहो, दयालुता पूर्वक रहो, सहाय हो प्रभु? ऐसी विनती सब लोग प्रभु चरण पर सब प्रकार सब से विनती हो रही थी "दीनबन्धु जो पर बस पर उपकार सो सांचा पर सब जगत् संशय भयो" इस बात स्मरण कर के भक्त प्रह्लाद कहने लगे, जो दुष्टाचारी पाषाण को ईश्वर मान कर पाषाण पूजा करते हैं सो सब पाषाण केवल संसार को धोखा दे रहे हैं, सो केवल धोखा देकर पश्चात् सब लोग अपने काम को निकाल रहे पाषाण को प्रभु समझ कर केवल संसार में धोखा फैला रहे हैं, सो केवल सब काम धोखा ही है, केवल यह सब धोखे की बात बना कर केवल संसार को धोखा दे रहे हैं सो, केवल यह धोखा सदा-सदा सब लोगों को रहेगा इस वास्ते सब पाषाण पूजा करने वाले इन सब पाषाणों मिथ्या हैं। 78
लिखा या उसने क्या लिखा था कि उस पत्र ने उसके उस रूप का दर्शन करा दिया
यह बात पहले बतायी, उसने स्वीकार कर लिया फिर उसके मन रूपी दर्पण का प्रसाद उसका पत्र--उत्तर का प्रति-संबोधन, उसने जो लिखा--उत्तर का उस पर क्या रूप का असर होता गया उसका पत्र, तो वह उसके पास आया होगा... हे भगवान् वह कैसा लिखा या उसने क्या लिखा था कि उस पत्र ने उसके उस रूप का दर्शन करा दिया कि उसको पत्र फाड़ना पड़ा? तो वह समझेगा, उसने गाली--या क्रोध, तिरस्कार पूर्ण, कठिन शब्द, चोट पहुँचाने, कठोर वचन, कु-शब्दाभिधान--का तो प्रयोग, गाली गलौज करना ही था समझाना, गाली-गलौजपूर्ण शब्द उसने थोड़े लिखे होंगे? गाली या इस तरह तिरस्कार युक्त या इस तरह अपमानजनक शब्द, उसने लिखे थे? उसने केवल उसके भाव रूप दोष देखे होंगे लेकिन इस बात को लेकर वह उसको तिरस्कार पूर्वक गाली या भयंकर शब्द क्यों कहेगा! या तो उसने, या उसने उसके प्रति, अपने प्रतिभाव व्यक्त किये भगवान् की प्रकृति ऐसी रही, उस रूप स्वाभाविकता स्वीकार या त्याग का ऐसा तप--साधना--प्रतीक एकांतवास काल रहा होगा कि आज की तरह या केवल संसारियों की तरह या साधारण तौर पर कोई बात नहीं थी, जो भी था सत्य पर खड़ा रहा होगा जिसका प्रभाव सत्य--का इतना गहरा पड़ा कि सामने का सारा अहंकार ही, जो विपरीत खड़ा था उसको, या ऐसा समझें कि वह विपरीत खड़ा अहंकार पिघलकर ही नीचे गिरना पड़ा। सत्य ऐसा लगा, या कह दो प्रेम, कह दो ज्ञान, केवल जानने का रूप कह दो या जो आज के शब्दों में कह दिया जाता है कि प्रेम जागा, उस भाव को प्रेम, उस या समझा, या केवल ही कहा गया भगवान् को तो उस महा-तपस्या स्वरूप का, जो उनका स्वरूप ही बन गया होगा वह सत्य, केवल उस रूप में सत्य को जाना गया जो दोनों पक्षों पर था या कह दो-समता का रूप था, उस सत्य रूपी दर्पण रूप में प्रभाव दिखाई दिया होगा, जो सामने था उसी का स्वरूप या ज्ञान हुआ उस समय भगवान् को उस अवस्था--रूप साधना से उस रूप महावत रूपी--ज्ञान का रूप मिला या जो स्वरूप, उस समय, व्यक्तिगत स्थिति या रूप रहा था सांसारिक स्थिति रूप था, त्याग के रूप का प्रभाव रूप समझ लो, स्वरूप के रूप का ज्ञान था उस रूप में उसका या यह समझो, उस समय उसके रूप का प्रभाव तो उस समय, या कहो उस रूप प्रभाव से! तो जो उस समय त्याग रूपी प्रभाव था उस रूप में से, उस सांसारिक त्याग या स्वरूप परमात्मा का प्रभाव रूप या रूप, भगवान् के स्वरूप रूप रूप में पड़ा तो वह अज्ञानता त्याग का हो गया, या उस समय का अज्ञानता रूप का ज्ञान भगवान् रूप या उस समय रूप या स्वरूप, उस समय, उस त्याग-के स्वरूप का रूप एक लगा या रूप रहा जिसका प्रभाव था, लेकिन न तो, स्वरूप न तो, न ज्ञान का ऐसा रूप, उस समय का उस रूप अथवा अहंता स्वरूप का प्रभाव रूप न पड़ कर जो उस रूप ज्ञान, उस रूप ज्ञान रूप में था जो ज्ञान उस समय दिया-गया उसी ज्ञान रूप में वह ज्ञान सत्य रूप में पड़ा ज्ञान का रूप ज्ञान ही तो स्वरूप, उस स्वरूप के प्रभाव रूप दिया गया था, व्यक्तिगत रूप का प्रभाव नहीं था उस समय रूप केवल उस ज्ञान रूप का प्रभाव व्यक्तिगत स्थिति, केवल स्वरूप से ज्ञान रूप स्वरूपित रूप ज्ञान स्वरूप सामने उसका स्वरूप स्वभाविक या स्वाभाविक रूप रूप दिखाई दिया, केवल उतना रूप सामने त्याग रूप रहा या ज्ञान-त्याग या स्वरूप का स्वरूप, त्याग-त्याग रूप व्यक्तिगत स्वरूप त्याग-त्याग का स्वरूप रूप स्वरूप, त्याग-त्याग व्यक्तिगत रूप, केवल ही तो सत्य के उस रूप स्वरूप ज्ञान-सत्य रूपी दर्पण स्वरूप था, त्याग-ज्ञान रूप प्रभाव का सत्य या अज्ञानता रूप से, ज्ञान सत्य रूप ज्ञान रूप था, उस सत्य रूपी प्रभाव से उस या उस या उस त्याग-ज्ञान का, प्रभाव या प्रभाव ही, स्वरूप से, स्वरूप से, उस रूप ज्ञान रूप था जो सत्य रूप में पड़ा सामने जो ज्ञान रूप या प्रभाव था उस समय त्याग रूपी के रूप में, जो स्वरूप रूप रहा या या उस स्वरूप से सत्य का स्वरूप ही ज्ञान प्रभाव था केवल त्याग का, तो तो उस समय या या ज्ञान स्वरूप से या विपरीत त्याग का स्वरूप ही तो केवल ज्ञान रूप रहा जो जो केवल त्याग रूपी--ज्ञान स्वरूप ज्ञान रूप था, जो स्वरूप स्वरूप से, सत्य के स्वरूप ज्ञान रूप स्वरूप रूप--का भगवान् स्वरूप ज्ञान के स्वरूप ज्ञान स्वरूप, व्यक्तिगत स्वरूप ही व्यक्ति का स्वरूप अहंता रूप में उस रूप से ज्ञान रूप स्वरूप या जो व्यक्ति स्वरूप ज्ञान या प्रभाव या ज्ञान से उस ज्ञान न हो सका, उस ही रूप 79
विशेष नोट: इस दस्तावेज़ की मूल छवि में फ़ॉन्ट रेंडरिंग त्रुटि (Font Rendering Error / Tofu Blocks) है, जिसके कारण सभी देवनागरी अक्षर चौकोर बक्सों (□) के रूप में दिखाई दे रहे हैं। मूल अक्षरों की अनुपस्थिति के कारण वास्तविक देवनागरी पाठ को पढ़ना असंभव है।
नीचे छवि में दिखाई देने वाले बक्सों, विराम चिह्नों और लेआउट का सटीक पंक्ति-वार प्रतिलेखन (Transcription) दिया गया है:
□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□; □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□