एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचारशीलता हो; यदि यह विश्वास न जगा सकें और ज्ञान व्यर्थ हो, तो ज्ञान छोड़ो, उस विवेकहीन को पहले मिटो ऐसा ही पाप इन दस सिर वाले दस भावों का हो रहा था, जो कि राम विमुख थे, जो कि ज्ञान प्राप्त कर काम रूपी हो गये थे। काम रूपी ज्ञान को ही राम मारे दस इन्द्रियों न ज्ञान का विषय तो किया स्वीकार पर ज्ञान को, कर्तव्य रूप में तो रस न था, रस तो इन दस मुखों को केवल भोगवादी वासनाओं में था, भोग प्रधान काम बन काम की लीला--वह जो ज्ञान राम द्वारा न मिला हो काम का स्वरूप ले लेता, जो ज्ञान प्रभु द्वारा प्राप्त होकर राम रूपी वैराग्य का रूप धारण करता वह ही ज्ञान केवल रस को रस का रूप न देकर वासना का रस बना देता! सो ही काम बना! सो ही ज्ञान के दस सिर काम रूपी रावण के--दसों इन्द्रियों के रूप में वासना से भरे रस को ही अपना भोग्य बनाते रहे, रस में, रूप में, गंध में, स्पर्श में तथा शब्द में रस लेकर न केवल, उस परमात्मा रूपी रावण की पूजा करते रहे अपितु उसे भी काम का रूप देकर वासना का भोग स्वीकार किया जो कि राम की सीता रूप में पराशक्ति का रूप थी। सीता रूप का भोग कभी कोई रस के रूप में नहीं कर सकता। सीता तो भक्ति का रूप थी, सो भक्ति का, तो केवल ज्ञान से संबंध हो सकता दस सिरों से दस मुखों से जो केवल भोगवादी वासना तृप्त हो रही थी सो तो केवल भोग का रूप न देकर ही केवल रस स्वरूप थी, भक्ति तो ज्ञान थी, ज्ञान का आवरण ओढ़ कर कोई भक्ति का हरण कैसे कर सकता था जिसके दस सिर केवल काम के विकार भोग रहे थे। सो ज्ञान रूपी दस--दस सिरों, जो केवल--एक ही रस, रस-रूप का भोग मात्र कर रहे थे, ऐसे ही दस सिरों को केवल ज्ञान रूप ही देकर, या ज्ञान द्वारा ऐसा योग देकर जिसने केवल ज्ञान रूपी प्रभु रस रूपी भक्ति स्वरूप माना होवे, उसी दस सिरों को दस ही रस का रूप न देकर, जो केवल उस ईश्वर के चरण लीन हुए! रावण तो केवल ज्ञान रूप न था इसलिए वह तो राम रूप में न होकर राम का शत्रु, उस राम का दास न बन कर वासना का ही सेवक हो जाता रहा। सो ऐसे ज्ञान, ऐसे दस सिर वाले रावण के दस सिरों को राम द्वारा पहले ही मारा जाना चाहिए था जो उस ज्ञान को केवल अहंकार का रूप दे रहे थे। सो मारा! रावण तो दस सिरों वाला ही न था, उसके बीस हाथ भी थे। दस ज्ञान की तो दस कर्म की इन्द्रियां थीं, जो कि केवल वासना के ही विकार को भोगने वाली थीं। कोई सेवा भाव न था; कोई भी ऐसा काम, जो केवल ईश्वर स्वरूप सत्य के लिए ही किया जाता, कर्म भी दस हाथ केवल अपने स्वार्थ के लिए ही किए जाते थे। रावण के कर्म हाथ दस सिरों, ज्ञान सिरों के भोग वासना के लिए ही काम कर रहे थे। ऐसा ही दस हाथ वाला; दस ही रस को काम-भोग द्वारा भोगता तो दस कर्म, हाथ रस लेते; दस ही कर्मों द्वारा भी; दस ही ज्ञान द्वारा वासना स्वरूप बनकर न तो केवल अपने ईश्वर को पा सका, न ही प्रभु का सेवक बन सका। राम रूपी सत्य को, "सत्य ही तो धर्म, जप, तप के द्वारा पाया जाना चाहिए सो ज्ञान के द्वारा पाया जाना चाहिए सो तो नहीं, तप, पूजा भी सब काम" ज्ञान स्वरूप रावण के तो दस सिर केवल थे काम के, कर्म स्वरूप रावण के तो दस हाथ थे तो केवल काम के, जो केवल भोग रस को ही रस, जो केवल उस भोग रस को दस सिरों द्वारा भोगने का रूप देकर दस कर्म हाथों द्वारा उसी को पूर्ण कर "केवल रस को विकार स्वरूप बना रहा था" सो ही तो मारा जाना था, ज्ञान भी! अहंकार रूपी ज्ञान तो अहंकार रूप ही रह कर दस-दस के भोग को भोग कर समाप्त होता केवल अपने भोग के अहंकार में ही रह कर इस रूप वासना, अहंकार स्वरूप, न तो रस का कारण, केवल ही ईश्वर का रूप कहलाया, सो इसलिए अहंकार स्वरूप, जो कि ज्ञान का अहंकार रूप रहा, सो ज्ञान का रूप तो दस सिर के रूप में तो अहंकार द्वारा ज्ञान स्वरूप केवल तो 71