भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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यह स्वाभाविकता इसलिए समाप्त हो गई क्योंकि स्वावलम्बनशीलता समाप्त हो गई इसलिए जब समस्या का हल खोजना पड़ेगा तब तीसरी शक्ति प्रवेश करेगी, "तुम्हारा तो हर मसला सुलझा हुआ चाहिए क्योंकि उसके बाद, समस्या का तो हल होगा नहीं तुम्हारा शोषण जरूर हो जाएगा यह बात बड़े रूप में भी लागू होती है।" व्यक्ति स्तर पर बात को सही रूपमें व्यवस्थित करने का पहला प्रयास होना चाहिए स्वतः; दूसरा प्रयास दो या तीन लोगों द्वारा या उनके द्वारा एकत्रित होकर; तीसरा प्रयास बाहर निकल--कर किसी मध्यस्थता का। पहले जब तक अपने मन को यह बात समझ नहीं आ गई कि समस्या हमारी ही मन की ही उपज होकर हमारे वश की बात ही नहीं रही तो समस्या बाहर की, पर उसका प्रभाव मन पर यह बात जब तक समझ में नहीं आ! हर व्यक्ति के जीवन का बड़ा भाग मन का ही काम करता चला जाता इसी को जीवन! इसमें मन, प्रकृति का काम, दो या तीन का प्रभाव! इन दो बातों तक कोई तीसरा नहीं आता या तो मन से काम चला, प्रकृति से काम चल रहा अथवा परिवार तक ही या दो मित्रों तक ही समस्या सुलझती हो तो इस बात का बड़ा भारी महत्व नहीं था, पर जब समस्या बाहर निकल पड़ी तब क्या यह संभव है, बिना स्वावलम्बन और आत्म-निर्भरता कोई रह सके? हर बात बाहर से ही सीखनी पड़ेगी या बाहर से सहायता ही ली जा सकती, जहां तक समाज में हर व्यवस्था का रूप था, वहां पर जीवन का निर्वाह करना कठिन बात नहीं थी, प्रकृति का रूप था, स्वाभाव रूप से सब काम चलता ही रहा था मन का, पर मनुष्य का जीवन जब से बाहर मुखी हुआ, तब से अपने स्वरूप को भूल कर स्वावलम्बन को, प्रकृति के स्वरूप को समझना छोड़ दिया और उसका प्रभाव विवशता बन गई, व्यक्ति का जीवन जो हर प्रकार सुखों भरा होना चाहिए था विवश हो गया हर समस्या बाहर निकलती गई, समाधान का आधार भी समझना पड़ा व्यवस्थाओं की ओर देखना पड़ा था, प्रकृति व्यवस्था को तो समाप्त ही समझना शुरू कर दिया या ऐसा कहो, प्रकृति का कोई भी अस्तित्व अपने लिए नहीं समझा या भुला ही दिया गया बात जब इतनी समाप्त नहीं हुई, इसके दो रूप आए हैं, हर बात उस प्रकृति व्यवस्था व व्यक्ति कार्य-शैली तक बंद नहीं रही जिसका प्रभाव व्यक्ति से सब ओर फैला हुआ समझा जाता; इसमें जो नया रूप आया जिसने आज व्यक्ति विशेष तक सीमित होने वाले रूप को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया उसका नाम स्वाभाव प्रभाव कहा जाने लगा, जो तो था, प्रकृति रूप से जीवन का वह स्वरूप सब ओर से अलग था, प्रकृति का प्रभाव था, प्रकृति की बात थी, व्यवस्था की बात थी, जिसे हर व्यक्ति ने स्वयं रूप समझ लिया था! व्यवस्था की बात समाप्त नहीं, केवल यह प्रभाव खड़ा हो कर सब व्यवस्थाओं और व्यक्ति विशेष विचार दोनों को विवशता में ला पटकने का ही काम कर सका। दूसरा परिणाम आया, जिसे हर व्यक्ति अनुभव करता जा रहा केवल उसी रूप को नहीं समझ पाया कि हर बात केवल प्रकृति से ही नहीं जुड़ी मानी जा सकती! जिसे अज्ञानता, विद्या अभाव कहा जा रहा है! केवल विद्या अभाव शब्द तक ही नहीं, अज्ञानता शब्द केवल ज्ञान का अभाव ही स्वरूप समझ लिया गया इसके प्रभाव को और आगे समझना होगा कि आज व्यक्ति का जीवन कैसा हो चला जिस को विद्या प्रभाव या ज्ञान अभाव का परिणाम कहा जा सकता और उसके हल की दिशा समझी जा सकती जिस समय मनुष्य के जीवन का स्वरूप ही बदल जाता गया, विद्या के सब आयामों को जो भी नाम दे दिया गया उसका परिणाम केवल यही निकला कि आज एक प्रकार का प्रभाव मन पर प्रभाव डाल गया स्वाभाविकता का जो रूप था समाप्त हो गया; अस्वाभाविकता आकर जीवन को ही समाप्त अव्यवस्थित स्वरूप दे गई? व्यक्ति सब कुछ भी सोचे? कुछ भी सोचे वह सब, सब के कल्याण और सुख-शान्ति का स्वाभाविकता के अन्तर्गत नहीं आता था तो उसका नतीजा क्या निकलता? आत्म-ज्ञान की बात तो बहुत पीछे, मात्र रीति-नीति चली गई, पर जीवन तो संकट भरा बना रहा। सब कुछ का लेन-देन का अभाव समाप्त हो गया था रूप भी समाप्त भरा था। व्यवस्था के अंतर्गत लेन-देन हो सकता था, पर साधन तो आज समाप्त रूप हो चुके; केवल भ्रम शेष था या बना रहा विद्या का स्वरूप प्रभाव हो रहा है? अविद्या प्रभाव है? नहीं! केवल भ्रम फैलाकर मनुष्य समस्त व्यवस्था समाप्त कर बैठा केवल अविद्या रूप में ही सब कुछ चल या चलाया जा सकता समझ कर, उस पर भी भ्रम शेष फैला हुआ था जिससे 72