एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसका प्रत्येक सदस्य जानता था, कि भारत सरकार उसके विरुद्ध भारी सेना तैयार करके उसपर आक्रमणकारी सेना भेजेगी, पर उसके प्रत्येक सदस्य जीवन की परवाह छोड़ कर लड़ना था, उसके प्रत्येकसैनिक अपने भारत माताके चरणों पर जान निछावर कर देने को प्रस्तुत रहता था इसलिये उस सेनाका हर सिपाही और हर अफ़सर असीम शौर्य का साक्षात स्वरूप था और आजाद हिन्द फौज जन-बल केवल चालीस सहस्रमात्र होकर रहा! जिस समय इस सेनाने यह निश्चय किया, कि दिल्ली को विजय करने पैदल आगे बढ़े उस समय, दिल्ली वहांसे आठ सौ मील, यानी बारह सौ किलोमीटर थी प्रत्येक सैनिक अपने सिर कफ़न का बांधा था! हर सिपाही चार-चार बंदूकों वाली अपनी राइफल अपनी पीठ पर लटकाये चल रहा था पर उसके पास गोलियां केवल पचास थीं हर सिपाही काफ़ी गोलियां? पेट को लिये प्रत्येक को गोलियां? पेट को लिये हर सैनिक केवल पचास गोलियां? भोजन का साधन यह था प्रत्येक सैनिक अपने साथ केवल दो या तीन दिनोंका भोजन अपने थैले में डाले आगे बढ़ा रहा था वह जेब में केवल भुना, दलिया लिये था जिसके सहारे कई दिन तक लगातार सैनिक लड़ते रहे किन्तु सब लोग अपने लक्ष्यपर अटल विश्वास, उत्साह से भरे आगे बढ़ रहे सैनिक यह जानते आगे बढ़नेपर जिस देशमें पहुंच रहे हैं। वहां का कोई भारी साधन मिलने की कोई संभावना नहीं! फिर भी आगे कदम बढ़ाया आगे का मार्ग जंगलों और नालों-नदियों से भरा पड़ा था कोई पुल तो था नहीं। न दलदल से निकलने के लिये कोई उपाय सेना के पास था और न, भारी वर्षाके कारण भी जब कोई साधन सेना को नहीं मिल रहा था, भोजन का जब कोई ठिकाना नहीं रहा, पीनेके पानीका भी जब अकाल था, जाड़ा भी पड़ रहा था मलेरिया फैलाना तो हर एक के साथ था, फिर भी आजादी पाने की लगन आगे बढ़ने और दिल्ली को जीतने स्वप्न, भारत को मुक्त करने का हौसला सदा! यह सब ही बल उस सेना पास सब समय था। एक दिन की बात, जबसेनाकी टुकड़ियां आगे बढ़ रही थी उस समय यह बात उठी, क्या इस स्थिति में आगे बढ़ना चाहिये? तो एक तरफ नेता जी का चेहरा था, जिसे-देखकर हर एक सैनिक के दिल शक्ति उमड़ती सैनिक आगे बढ़े जा रहे थे। जब नेताजी ने यह सुना, कि सेना आगे बढ़ रही है, कहा, मैं, भी आगे कदम बढ़ाऊंगा! पर उस समय वहां पर एक ऐसा दलल था, जो सब प्रकार के संकट सहने अपने नेता को कठिनाईयों बचाने में लगा रहता था। उस दल ने नेताजी का आगे बढ़ने से रोका कहा जब तक हम सैनिक जीवित रहेंगे नेताजी सुरक्षित रहेंगे हम लड़ेंगे पर आप खतरे में नहीं पड़ेंगे इस बात सुनकर नेताजी ने यह कहकर आगे पैर बढ़ा दिया हमतो सिपाही; पर वीरता ने अपना रूप खुद ही दिखाया। एक समय तो हर तरह सेना को हर बात के साधनो की आवश्यकता सामने आ खड़ी थी तब सेनाका एक सिपाही भी उस समय पीछे नहीं हटा। जब किसी प्रकार कोई तोपखाना पास नहीं था उस समय सैनिकों केवल अपने कंधों और पीठ पर तोप लादकर लेजाने का काम किया। उस समय न तो मोटर गाड़ी थी न कोई वाहन इस रूप में काम आ रहा था, केवल लोग अपने पैरों पर चल रहे थे। फिर एक कठिनाई सामने आयी और वह यह थी; कभी पानी का संकट पड़ जाता था; कभी खाने का संकट आ खड़ा हो--ता था। एक क बात यह थी कि जब सेना आगे कदम बढ़ाती शत्रुसेना अपनी पूरी शक्ति लगा देती थी जिससे कि सैनिक आगे न निकल सके संकट तो सामने आ खड़ा होता किंतु लोग तो फिर भी प्रत्येक संकट झेलने सामना करनेके लिये तैयार रहते थे। पर इस प्रकार कई दिन तक सेना को लगातार संकट झेलना पड़ा। इस सेना को न तो पेट भर अन्न का दाना उपलब्ध मिलने की आशा थी, केवल जीवन रक्षक ही था; मगर सिपाही, सब कठिनाइयो झेलते हुए आगे पैर बढ़ायेजानेके लिये तैयार ही रहते थे। इन वीरोंके पास जब भारी गोलाबारुद नहीं, केवल हाथ हथियारो सहारे आगे निकल पड़े, प्रत्येक कदम पर मौत का खतरा, साथ हीन-भाव; केवल एक बात हमेशा आत्मविश्वास जगाए रखती थी कि भारत, स्वतंत्र हो कर-रहेगा हमारा नेता, हमारे सिर ताज नेता जी सुभाष चंद्र बोस, इस बात विश्वास सबमें था। यह बात किसी तरह भी कम नहीं समझी जा सकती और ऐसा ही यह दल अपनी विजय पर बढ़ा। इस दल ने जो चाहा, उसकी शक्ति केवल जन-बल नहीं था! वहां केवल शौर्य, कर्त्तव्यभावना और देशके--स्वतंत्रताके लिएसब कुछ त्याग था, जिसे देखकर शत्रु थर्राता रहता था। सेना के प्रत्येक सदस्य जीवन में जन-बल का भाव केवल न था। किंतु वह दल, प्रत्येक को आगे बढ़ाता था, जिसका फल सामने यह आ रहा था कि सब, एक ही बात लक्ष्य थी; जो कि हर हृदय में गूंज रही, वह थी हर एक दिलमें भारत माता की विजय का स्वर और यह आवाज प्रत्येक, प्रत्येक सदस्य केवल