भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

विचारो करो, उस परमेश्वरने संसार उपकारार्थही बनाया? कि यह संसारका सब पदार्थ वा सारा संसार व्यर्थ, वा इसके बनाने का फल, कुछ तो उस परमेश्वरको प्राप्त होवे नहीं वा सकेगा। क्योंकि सब जगत् को बनाने कि शक्ति ईश्वर-ही विषयमें सदा विद्यमान और विचार भी उसका विचार-ही विषयमें सदा अथवा सब जगत् के विचार सहित ही विचार सकता है। जगत् सब सब काल में ईश्वर को विदित अथवा सब काल में विदित है? सब काल वर्तमान रूप ही वा सब काल जगत् को सदा रूप काल हैं? इस लिये जगत् का भूत भविष्यत् रूप काल हो सब जगत् सदा है? जो सब जगत् को विचार वा वर्तमान परमेश्वर सदा करता है तो जगत् को बना सकता ही, न बनावे सो, न परमेश्वर उस जगत्को बनावेगा, जगत्कर्ता नाम ही न जगत्का हो, सदा काल ही जगत् को जगत् सिद्ध रहा॥ सो सब काल में जगत्के दो रूप हैं, एक सूक्ष्म सब जगत् का कारण सो सदा सिद्ध है! जो कोई जगत्के दो रूप को सत्य सब काल में न माने अथवा ही; जगत्का जो कार्य स्थूल रूप, सदा बने, बिगड़ता रहता है उसको भी नित्य माने; जगत् के कारण रूप को जो सत्य न माने, सो तो सर्वथा ही अज्ञानी वा पापी है; इन दो प्रकार के सब बातों को विचार के सब को, कार्य-रूप जगत् को सब कोई; कर्त्ता सब जगत् का विचार कर सिद्ध करें। सो सब जगत् का रूप, जो सब काल सत्य है, उस एक--ही ईश्वर कह सकें ही; जब सब जगत् सिद्ध है, तो सब जगत् ईश्वर--ही सिद्ध सब काल सिद्ध ही रहा, उस को जो कोई कहे, कुछ हानि नहीं होती; इस विषय और प्रकार भी, जो जगत् को कार्य-कारण रूप, सत्य--सिद्ध मानें, सब जगत् सब जगत् रूप सब का सब रूप सब काल में जगत् को ईश्वर को ईश्वर ही सब जगत् कह ही ले, वा परमेश्वर सबही जगत् हो, तो सब जगत् ईश्वर सिद्ध भया; यथा वेदान्त; कार्य रूप जगत् को जो सत्य वा असत्य सर्वथा कह भी देवें सो सब जगत् को काल ही का नाम जगत् सदा ही का कहना सब रहा, उस में; जो विचार कर न देखे, सो मूढ़॥ सब जगत् सदा ही हो वा न, तो सब जगत् को सब जगत् ही कहना सब को सो सिद्ध सत्य होता है; ईश्वर को विचार ही क्या; जगत् को ईश्वर ही है; जो जगत् को ईश्वर का ही रूप सब काल सिद्ध हो गया! सब जगत् सब मिथ्या? जगत् को बना ही सकता, अहो, जगत् के सब सत्य जगत् को रूप ही जगत्को सदा सत्य जगत्के ही सब काल जगत् जगत्के सदा ईश्वरका, जगत्का जगत्कर्ता, जगत्कर्ता जगत्का सब कुछ जगत् को सब जगत् को न कह सकेंगे वा जो जगत्को वा जगत्के ही विचार सिद्ध हो, सो जगत्को सदा ही कार्यजगत् जगत् का सिद्ध ही सब रहा सो, जो दो प्रकारका जगत् जगत्के लिये सदा सिद्ध ही था तो जगत्के जगत्कर्ताओं सब जगत् जगत् जगत् के स्वरूप सदा ही सब सब जगत्कर्ताओं जगत् जगत्॥ इसके सब जगत् का हो वा सब जगत्, सो तो सब जगत्कर्ताओं सब जगत् रहा, जिसके सब ही जगत् सदा ही सब ही सब जगत् को ही सब जगत् जगत्कर्ता सब ही सो सब जगत् जगत्का सदा ही काल है, सो जगत् का विचार॥ सब ही उस जगत् को ही जगत्का सब ही सब जगत्का रहा, जगत्कर्ता को जगत् सब ही जगत्का जगत् को जगत् जगत् जगत्का जगत् सब जगत् जगत् जगत् सब ही सब जगत् सब ही सब ही सब जगत् जगत् है; जगत् कर्ता भी ही जगत् जगत्कर्ता के सब सब जगत् जगत् ही सदा जगत् जगत् सदा ही सब जगत् सब जगत् जगत्का ही सदा जगत् जगत् के सदा जगत् ही रहा, न ही, सदा! जगत् के सदा सब ही, सब ही सब जगत् के सब ही जगत् के सब जगत् ही जगत् के ही सब जगत् सदा! जगत् के सब ही जगत् जगत् जगत् ही सब ही जगत् के--जगत् जगत् जगत् सदा ही जगत् जगत् सदा जगत् सदा जगत्--जगत् जगत् के जगत्के सब जगत् सदा सदा, सो ही ही जगत् जगत् के सदा ही हो! सो ही सो सदा सदा ही, सो ही सदा॥ सदा जगत् सब सब जगत् जगत् सदा सब जगत् जगत् जगत् सदा सब सब सदा सदा रहा, सदा ही सदा सब सब सदा न सदा सब सदा सदा है? जगत् के ही सब सब का, सदा सब सब सदा जगत् जगत्, सदा जगत् सब सदा सदा सदा ही सदा सदा ही; सदा ही सब सदा सब सदा जगत्॥

69