क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलेकिन इसके अलावा गुजरात संघ की प्रतिष्ठा महोत्सव संघ की ऐसी व्यवस्था थी। जिसे सब लोग तारीफ करते रहे। ना तो कोई वाद ना कोई संघ, ना कोई, व्यवस्था को भंग करवाने वाले विशाल सी बात, समय पर खाना खिलाने वाली संस्था, स्थान और व्यवस्था व्यवस्था को लोग याद करके अपने घर के फंक्शन में, घर के ही लोगों यहां सिर्फ स्वाद ही ना लेकर जी भरकर ना ही काम से सब फंक्शन को सफल कर सके, बल्कि उनका काम व्यवस्था का सब लोग प्रशंसा ही प्रशंसा- प्रशंसा रूपी शब्द से प्रशंसा- प्रशंसा करते ही नहीं थके! यह व्यवस्था का प्रभाव था जिस दिन प्रतिष्ठा का आगाज हुआ था, उस महोत्सव बाद नगर के सब नागरिक भी खुश थे, ना ही कोई किसी बात से क्षुब्ध था। सब- व्यवस्थापकगण सब अपने स्वरूप में खुश नजर आए। इस व्यवस्था का श्रेय जाता था देश-विदेश के प्रख्यात जैन युवा, जो इस महोत्सव को सफल करने के लिए व अपने ई-फाउण्डेशन ग्रुप द्वारा जो कार्य कर रहे उनके व्यवस्था स्वरूप सब ही हो सकेगा ना, जो सब ही लोगों यहां प्रतिष्ठा संघ का ध्यान भी, प्रत्येक जन तक खाना ना पहुंचे तो, सब इसके लिए आगे आते, व्यवस्थापक स्वरूप बने व्यवस्था रूपी खाना खिलाने वाले यह थे जैन युवा 062/ ज्ञान का घमण्ड मनुष्य को अहंकार तभी तक ही रहता रीति-रिवाज या ना समझ से भरा पड़ा जब तक व ज्ञान रूपी फल-फूल से वंचित रहा हो। ज्यों- ज्यों, मनुष्य ज्ञानी बनता जाता ज्ञान रूपी सरिता में वह बहता व सब बातों को ज्ञानवानों के रूप व अपनी विधा को पहचान ही संस्कारित हो जाता और ज्ञान रूपी क्षमता को स्वयं सब जन को बांट कर अपना परिवार व अपने संस्कारवान को बनाए ही रखता ही सब जन, प्रत्येक जन को अपनी ज्ञान रूपी छन से सब जन को ही सुखी करता-सब जन सब सुखी नजर आए। ‘ज्ञान’ का गर्व, घमण्ड ना सिर पर चढ़े जो मनुष्य संस्कारित हो सब ज्ञान प्राप्त करके स्वयं ज्ञानवान जन को ज्ञान देवे, स्वयं सब ज्ञान जन ज्ञान रूपी गंगा सब जन को बांट ना सके तो ज्ञान ही क्या! जो सब को दे, उस ज्ञान रूपी जल से स्वयं सब तृप्त होते ना तो व संस्कार कैसा जिसे सब अपने संस्कार से संस्कारित कर सकें सब जन प्रत्येक ज्ञान रूपी जल- भरा कलश हो, सब ज्ञान को बांट सकें! 063/ देश-विदेश का चक्र ही सब जगह समय ज्ञान रूपी संस्कार सब ही को व स्वरूप से बांटता रहता है। सब जन स्वयं ज्ञान रूप ना कर के भी अपने घर को ज्ञान रूपी से ज्ञानवान रूपी रूप से पहचान कर ज्ञान को सब ज्ञान रूपी जन रूपी सब से संस्कारित करते हैं। ज्ञान ही पहचान सब स्वयं सब जन को संस्कार से ज्ञान संस्कारवान से सब को सब जन स्वयं जन सब ज्ञान प्राप्त कर ज्ञान सब जन बने, ‘ज्ञानवान कौन है?’ जब ज्ञान स्वरूप सब ही को बांट सके, प्रत्येक संस्कार का देश- विदेश संस्कार है; प्रत्येक संस्कार ज्ञान है, स्वयं ज्ञानवान बने ‘ज्ञान’ ही व क्षमता से ही संस्कार ‘ज्ञान’ रूपी संस्कार रूपी सब जन को बनाए ‘ज्ञान’- स्वरूप। ना ही ज्ञान, स्वयं संस्कार सब को ज्ञान रूपी से संस्कार सब स्वरूप बने ज्ञान क्षमता ही सब प्राप्त हो, संस्कार सब ही ज्ञान रूपी संस्कारवान संस्कार रूपी सब ज्ञान सब को ही संस्कार से ज्ञान रूपी स्वरूप से ही ज्ञान बने 41