क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचार कर लेते हैं कि आखिर वर्तमान का समय कैसा चल रहा है, जो समय बीत गया उसका तो हिसाब, वर्तमान समय अनुसार ही किया गया जा ही रहा होगा और आगे का- 'भूत-भविष्य गणना सब जन-साधारण समझ सके'
064/ हिसाब-किताब का भी समय
पर साधारण लोग आज तक यही समझते रहे जिसे वर्तमान का समझा गया वही हिसाब सब जगह हो सकता था लेकिन अलग-अलग ही सब जगह पता चल रहा है जिसके कारण से हिसाब बहुत गड़बड़ा गया लगता होगा लेकिन जो नियम बनाया जाएगा उस पर, किसी प्रकार विचार करके ही कोई जिम्मेदारी सब लोग अपने ऊपर ले लें ताकि-जिससे अलग-अलग सब, सब का कार्य आसानी ढंग से हो सके। पहले कोई ऐसा काम तो तय किया नहीं गया जिम्मेदारी केवल काम पर छोड़ दिया जाए जिसे समझ लें? हिसाब तो ऐसा था, सब लोग घर से समान ही विचार कर सकते लेकिन सबको वैसा पता नहीं लगता तो सब लोग अपने घर से साधारण ही काम कर सकते गए उस वक्त तक सब सब कुछ तय करके गए लेकिन उस वक्त तक सब ने 'हिसाब तो तय हो ही तो लिया था कार्य का समय सब का तय कर लिया था! विचार तो था ही-सब तक अब सब का नियम तो था ही लेकिन इसका असर सब लोगों पर ऐसा ही पड़ सकता होगा तो सब लोग अपने काम को कैसे कर सकेंगे? सिर्फ रात ही दोपहर का काम माना जा सका था? सिर्फ सुबह शाम तक काम का समय माना गया था? सिर्फ दोपहर तक माना जा सकता था काम? काम तो था नहीं, फिर किसी का विचार ही माना गया? पर जो जो इस काम तक तो पहुंच पाए होंगे, उन साधारण लोगों हिसाब का असर तो पड़ा गया? लेकिन जो लोग वर्तमान दोपहर काम कर रहे थे उन लोगों पर तो असर हो गया था जिस वक्त दोपहर तक का समय माना था, न कि सब लोग उस दोपहर के काम तक पहुंच सके। फिर दोपहर के समय सब लोग उस हिसाब के काम तक तो पहुंच सके ताकि लोग उस समय तक सब समाज का असर तो पड़ा लेकिन सब लोग रात दिन का विचार करते 'समय तो बदला गया होगा' समझकर ही, फिर भी कार्य समाप्त कर लिया ही होगा तो सब लोग तो साधारण सकेंगे, सिर्फ दोपहर विचार तक अलग-अलग लोग इस विचार से तो सब का काम तो ऐसा रहा जा सकता होगा ही, पर इसका असर सब लोग पर, वर्तमान समय का हिसाब सब के साधारण अनुसार ही, जो सिर्फ पर काम कर रहे थे उन पर असर पड़ सकता था। इस प्रकार सब लोग उस दोपहर तक का हिसाब ही, सब लोग तो दोपहर ही तक विचार करते गए थे कि दोपहर तक सब का तय रहा, पर इसके बाद ऐसा काम रहा, सिर्फ दोपहर तक माना जा सकता था लेकिन सब का कार्य समय सिर्फ दोपहर तक ही तो कहा जा- सका था इसलिए तो काम 4 साल के- ही तो काम के वक्त सब लोग पर असर ही हो सकता था। इसके ही तहत तय-किया गया, हिसाब के अलग-अलग- काम सब के सब का बराबर तो हो जाना चाहिए लेकिन जो, अपने विचार अनुसार ही सोचते गए ऐसा तो हो गया था पर; सिर्फ 'दो पहर', के काम का समय तो सब तरह से तय समझ कर अपना विचार उस वर्तमान के काम पर तय कर दिया गया गया होगा, हिसाब के अलग-अलग ढंग से समझने के, कारण सब लोग अब तो हर दोपहर के अनुसार काम को तो समझ ही सकते लेकिन इस तरह हिसाब के समय का ही जोड़-तोड़ था।
065/ जीवन का वास्तविक सार