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क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)

DevanagariHindipublished73 पृष्ठ

उसको इतना बड़ा फल नहीं मिलता जो प्रतिदिन वेद पाठ करता रहता हो, इसलिए जो प्रतिदिन वेद पाठ अथवा स्वाध्याय करता रहेगा उसे विशेष फल अवश्य मिलेगा ही इसमें संदेह करने योग्य गुंजाइश लेशमात्र भी नजर नहीं आती, अतः जो लोग नित्य वेदों का पाठ नहीं करते वह भी, सप्ताह में कम से कम एक दिन अथवा महीने में चार दिन, या प्रतिदिन थोड़ा पाठ तो अवश्य किया करें तब ही फल प्राप्त होगा नहीं, तो विशेष लाभ प्राप्त हो यह कहना ठीक नहीं होगा स्वाध्यायशील जन विशेष आदरणीय हैं, सर्व जन, सर्व जन समाज आदरणीयता सदा बनाए रखने का प्रयत्न करते रहें ताकि समाज सदा सुखी रहे, जो स्वाध्याय करता रहेगा स्वयं तथा दूसरों सुख पहुंचाता ही रहेगा, तो ऐसा अवसर सबको प्राप्त हो यह हम सब लोगों की कामना है। आ-ओ३म् शम् नो मित्रः शं- नो भवतु अर्यमा शं नो मित्रावरुण इन्द्रो वृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। सो भो, तन मन धन तीनों जिस जन को प्राप्त नहीं हुए सो जन तो प्रभु का भजन सिमरन कर के प्रभु से अपने उद्धार का साधन बना सकता है, क्योंकि सब कुछ सामर्थ्यवान् ही कर सकता ऐसी बात नहीं, जो निर्धन प्रभु नाम जप कर के निष्कामता से सिमरन का उत्तम फल पाता रहेगा सो वह जन अपने उत्तम 'ओ३म् ज्योतिर्मय- तेज को प्रकाश'ता ही जाता देखा गया, अन्य जन विचार कर प्रभु स्मरण करते रहें। सारांश, सब उत्तम अवस्था का फल दाता ईश्वर ही सबको अपने कर्मों का फल दाता स्वामी बना रहता सदा से अपने ज्ञान से सबको ज्ञान देता ही है इसलिए सो ऐसा जन भी अपना जीवन सुधारे स्वाध्याय जन से ज्ञान लाभ प्राप्त कर लिया करे। तो वो स्वाध्याय जन सब को प्रभु ज्ञान दे कर धन्य हो सकता है, इसलिए सब प्रेम से, प्रभु भजन किया करो! 115/ भगवान् का प्रकाश हर मानव मन में परमात्मा जन कल्याण का दाता, हर कर्म फलदायक व हर का पालक होने से स्वाध्याय जन द्वारा सब विधि प्रकाश रूप में सत्य, सब को बतलाता है; सो सो जन, प्रभु परमात्मा का स्वाध्याय करें। स्वाध्याय विद्या का उत्तम महा-विद्या का फल सब को मिले, सो इसके लिए सब को यत्न करना सो उत्तम परमात्मा की शरण, 'ओ३म्' का जाप सब जन तो नित्य प्रातः सायं करते रहें जो 'ओ३म्' वा- प्रभा-प्रकाश 'ओ३म्' का प्रकाश सब मानव प्रभु चिन्तन से जन जन को 'ओ३म्' रूप प्रभु सब स्वाध्याय का ज्ञान प्रदान किया करें, स्वाध्याय जन परमात्मा का रूप समझ कर ही स्वाध्याय जन विचार किया करें। सो ऐसा अभ्यास करना चाहिए तो ही, सब लोग प्रभु सत्य-धर्म को समझ कर चलेंगे सो, सब जन प्रभु का आश्रय सदा ही बना करके ही कल्याण पाया करें, कल्याणकारी परमात्मा ही सदा रक्षा करे। इसलिए मानव को, परमात्मा का दिया हुआ उत्तम जन्म सत्य स्वाध्याय द्वारा, तन मन से, सफल किया जा सके यह यत्न हर जन मानव सदा ही प्रभु शरण धारण करे, सदा जन प्रभु का ज्ञान पाकर जन परोपकार कर्मों का ही पालन करे ताकि परमात्मा का ज्ञान सब में व्याप्त हो सदा सत्य ही जाने 'ओ३म्' को, उत्तम दाता जो हर प्रकार से कल्याण दाता प्रभु 'ओ३म्' का प्रभु ध्यान किया जाया करे। मानव जन जब ज्ञान द्वारा प्रभु का उत्तम ज्ञान प्राप्त किया करते तो परमात्मा के कृपा पात्र बन जाते मुक्ति-द्वार तक पहुंच कर, वो मुक्त आत्माएं बन कर अमर स्वरूप प्राप्त कर मुक्ति के सुख को भोग कर फिर मानव तन, जो पाकर फिर ज्ञान पा, जो मुक्ति से वंचित रहे उस मानव, प्रभु ज्ञान रूप गुरु कृपा द्वारा प्रश्न हुआ कि 'हे भगवान् ज्ञान-दाता तू दाता है, सो अ- ज्ञानी पर प्रकाश कब तक अपना प्रभाव रखेगा?' भगवान् ने कहा, 'मानव का मन उत्तम कर्मों से- ही तो बनता है, सो मानव को मन द्वारा परमात्मा प्रकाशित हो'। सो मानव सदा सत्य को ही धारण कर के चले, भला करके सब भला करें परमात्मा का ध्यान तो अवश्य किया करो, सो मन, मलीन अविद्या कर्मों से ही दूर रहा करे। 69

‘□□□’ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ ‘□□□’ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□, ‘□□ □□□ □□□□ □□□□?’ □□□□□ □□□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□’ 116/ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□, □□□□□□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□ □□, □□□□□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ ‘□□□’ □□□□ □□, □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□, □ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ ‘□□’□ □□□□□ ‘□□□’, □□□□□□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□□, □□ ‘□□ □□’, □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ ‘□□’ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□, □□□□□□ □□□ 117/ ‘□□□’ □□□□□ □□, ‘□□□’ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□, ‘□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□’□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□- □□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□- □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□! □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□- □□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ ‘□□□’ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ ‘□□□’ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□, □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□□□□□ □□, □□□ □□□□□□□□ □□□ ‘□□□’ □□□□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ ‘□□□’ □□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□, □□ □□ □□□□ ‘□□□’ □□□□, □□□ □□□□ □□ ‘□□□’ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□, □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ ‘□□□’ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□□□ □□□ 70

इस 'ज्ञान' का नाम चाहे कितना उछालो जी, पर तत्व तो केवल ज्ञान ही; सो ज्ञान मात्र स्वयं सिद्ध है, उसे कोई मिटाने वाला नहीं। यह प्रत्यक्ष जाना प्रयोजनवान ही रहा, इसलिए ही तो पहले कहा कि 'ज्ञान' मात्र कहकर 'ज्ञेय' का नाम मात्र भी नहीं निकाला कि जैसा जो भाया, वैसा जाना सो यह भी ज्ञान रूप ही रहा तथा अन्य भिन्न प्रकार से प्रतिपादन भी किया ही, सो ऐसा अभ्यास ही प्रत्येक का होना रहा। इसलिए तो 'ज्ञान' मात्र कहा गया कि केवल उस ज्ञान को ग्रहण किया गया कि जिसके बल से समस्त का स्वरूप ही सिद्ध हो जाता गया होता ही, उस स्वरूप मात्र पर ही तो ठहरना रहा प्रत्येक का, केवल ही जो स्थिर ही ठहरा सो, अपने स्वरूप मात्र रहा ज्ञान रूप ही तो 'ज्ञान' का नाम ही रहा सिद्ध हुआ कहा गया जो कि केवल स्वकीय रूप, सो तो सदा ही तो सब ही को 'ज्ञान' का यह नाम ही तो सिद्ध ही सो प्रमाण ही कहा गया रहा। वास्तव में जहां गैर- भाव असम्भव ही रहता तो वहां सत्य ही तो ही रहा गया सो, सो सत्य ही कहा गया, जो प्रत्येक का ही सर्व ही रूप से ग्रहण किया गया प्रकाश रूप ही। तो 'ज्ञान' का ही स्वरूप तो सत्य ठहराया ही, सो असत्यता का कोई भी अभाव ही रहा सो 'ज्ञान' का स्वरूप- असत्यता से, सदा ही, पृथक ही, पृथक रहा सो प्रकाश के स्वरूप मात्र प्रकाश ही तो प्रकाश कहा गया, सो तो केवल सिद्ध मात्र ही रहा सब का ही सो अप्रमेय असत्यता से, तो सत्य का स्वरूप ही प्रकाश का स्वरूप ही प्रकाश मात्र रहा। 118/ 'सर्वव्यापी तो स्वयं ही ही रहा, ना कि असत्यता का असत्यता ही' शून्य को जब शून्य ठहराया ही, तो शून्य का रूप शून्य ही रहा ठहरा, पर शून्य ठहराने वाला ज्ञान मात्र था सो व्यापक ही तो स्वयं ही ठहराया ही कहा रहा। शून्य का रूप तो सब प्रकार से स्वरूप शून्य रहा कहा असत्यता ही प्रकार से शून्य स्वरूप ठहरा स्वरूप व्यापक रहा तो स्वरूप ठहराने वाला ज्ञान मात्र था सो असत्यता स्वरूप नहीं था, सो प्रत्यक्ष ही स्वयं स्वरूप ही असत्यता को शून्य रूप ही ठहरा ठहराया, जिसने शून्य को जाना व कहा, ज्ञान स्वरूप ज्ञान-रूप रहा जो कि शून्य रूप नहीं सो सत्य ही ठहरा सो, सो तो रूप ही रहा, ज्ञान का स्वरूप ठहरा ज्ञान ही तो सत्य का स्वरूप ही ठहरा सिद्ध सत्य रहा सो ज्ञान, ना कि शून्य का स्वरूप रहा, ना तो असत्य ही ठहराया 'ना' ही था, 'ज्ञान' का स्वरूप ठहरा तो ज्ञान ही, ना तो रूप ही शून्य था, ज्ञान का, मात्र रूप तो, ज्ञान रहा। स्वरूप तो रहा ही, 'सत्य ही ठहर रहा ज्ञान स्वरूप का स्वरूप, पर स्वरूप का ना रहा सो असत्य'। रूप तो सत्य स्वरूप ठहरा ही रहा सो स्वरूप स्वरूप ही, सो स्वरूप ही सत्य रहा तो सब प्रकार सिद्ध ही, सो स्वरूप ही, स्वरूप ही तो सब रूप कहा सो, सब ही स्वरूप का स्वरूप रूप ही तो सत्य रहा। सो असत्यता का तो ना कोई रूप ठहरा सो स्वरूप ही स्वरूप ज्ञान ज्ञान स्वरूप ही रहा ज्ञान असत्यता का केवल ही सत्य स्वरूप रहा सत्य ही रहा स्वरूप स्वयं का सब का ही सत्य ही रहा सो, सब ही सत्य ही स्वरूप मात्र सत्य मात्र रहा ज्ञान मात्र सब रूप सत्य ठहरा हुआ सो ही सत्य रहा सो, 'सत्य, ना असत्यता का रूप, ना सत्य शून्य रहा; ना तो असत्यता का रूप, ना सत्य शून्य ही स्वरूप का रूप रहा'। रूप तो ही स्वरूप सो ज्ञान सत्य स्वरूप मात्र ठहरा असत्यता का रूप असत्यता का ठहरा रूप मात्र रूप ज्ञान स्वरूप रहा सो 'असत्यता ही मात्र ना तो ना ठहरा, ना ही असत्यता का असत्यता रूप ही असत्यता स्वरूप का रूप रहा, ना ही तो असत्य ही ठहरा सो, ना तो असत्यता रूप असत्य रूप रहा हो?' 71

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119/ □□□□ □□□□ □□? □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ ‘□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□-□□□□□□□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□- □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□- □□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□□’□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□, □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□□□ □□ ‘□□□’ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□, □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□- □□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□, □□□□ □□□, □□□□ □□□□□□- □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□- □□ □□□-□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□- □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□- □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ 120/ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□, □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□-□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□-□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ 72

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