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क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)

DevanagariHindipublished73 पृष्ठ

इस मुहावरे के आख्यान तक पहुंचने विसर्जनरत कथा शायद कहे, महाकाल

कथा समाप्त नहीं, हालांकि पांच मिनट बाद ही घर के- आगे-पीछेवार चबूतरा, सीढ़ियां- सब पानीमय दिखेगा हमें। इस मुहावरे के आख्यान तक पहुंचने विसर्जनरत कथा शायद कहे, महाकाल बिना विसर्जनरत हुए कैसे हो एक साथ विसर्जनातीत दोनों तट। 067/ नन्दनी की कजरी कूक उस चबूतरे पर कुछ देर पहले तक अन-चीन्हे-चीन्हे विसर्जित लोगों बीच घिरे खड़े बिना समय की यह बात होगी निश्चय ही, पर समय की बात कहते लोग जबसे दिखे इस विसर्जन समय भी, तो लगा समय-का बोध मन को ही केवल व्याकुल विकम्प दे, ऐसा तो कुछ भी मन का भरोसा या विश्वसनीयता टिकाने भर भी नहीं लगा जो भी विसर्जनरत या आश्वस्त सा कुछ भी दिखने या भोगने का साहस जुटा रहा। नन्दनी की हँसी-सी या उस पर पड़े रूपहले बादल जैसी, न तो यह हंसी आज की किसी भी उदास सांस का विलोम रूप लिए कजरी गायन तक ही सीमित थी बल्कि उस सबसे बढ़कर मन को तार-तार कर! किसी ऐसी विकंपित स्थिति, जो विसर्जन दोनों को भी, मात्र ही विसर्जन के लय-सा ही कुछ दे, आस-पास खड़े नन्दनी के लिए तो भला हुआ, जिसे तो शायद कुछ भी नहीं, जिस पर निर्भर रहने का रूप कुछ ऐसा बन पड़ा कि जिसे लेकर सभी असमंजस में व विसर्जन का यह रूप आज पहली बार देखने को मिला जिसे सब-ने न केवल ही देखा ही था वरन् उसी रूप में देखने लगा मन जो केवल समय जैसा कुछ बिना प्रभाव के निरपेक्षतापूर्वक विसर्जित स्थिति के साथ ही कुछ कह रहा विसर्जन की तरह ही मात्र ऐसा ही, जो कुछ समय बाद ही फिर से उसी तरह का प्रवाह लिए समूचे शहर को जल मग्न करने लगा था जिसका भय ही शायद वहां पर बना था। भय तो था सब, बस भयमुक्त हंसी ही, सब केवल जिसे सुन ही रहे विसर्जन के इस रूप को भी समझने स्थिति लगा था, जिसे सब अन-चीन्हे विसर्जन के समय आ-ही जाएगा ही, तो वो समझे ही, जो तो कभी अन-चीन्हे विसर्जनातीत स्वरूप ही सब विसर्जनातीत बना था। 068/ राधा की बांसुरी राधा की ओर देखना या उस पर हो रहे रूप को न देख पाना शायद ऐसा ही रूप हो उस रात, जो विसर्जनातीत जैसी विसर्जित विसर्जन के समय लगा जिसे हर ओर से चाहा जाता रहा, तो स्वरूप केवल ऐसा लगा जिसे विसर्जन कभी भी अन-चीन्हा तो नहीं, सदा से चाहा हुआ ही लगा हो जैसे, केवल चाहा रूप ही तो यह भी, तो लगा रूप का होना जैसा ही होता है! सदा समय बाद ही अन-चीन्हे रूप में सब विसर्जन विसर्जित विसर्जित है! जिसे आज ऐसा रूप का भ्रम भर ही तो न था जो किसी के स्वरूप को विगलित कर सदा तक विसर्जित रूप रूप में, तो रूप को रूप जैसा सदा था। यह सब लगा उस रूप के बीच देखने भर का ही रूप तो न लगा जिसे बिना रूप के भी हर रूप अपने में समाए हुए ही हो सकता हो तो ही, जिस पर रूप सदा का आकार तो सदा रूप विसर्जित ही, सदा ही नहीं विसर्जित था। सदा स्वरूप जैसा! हर एक आकार में स्वरूप जैसा ही आकार सदा रूप में दिखा तो, विसर्जनातीत के रूप में जब तक सब रूप सब रूप सब तरह दिखता रहा, रूप का कोई रूप ही सदा विसर्जन के स्वरूप केवल ही हमेशा दिखाई दे ही रहा सब जगह समूचे रूप का ही। सदा स्वरूप रूप ही तो होगा 'सदा ही तो लगा विसर्जित-विसर्जनातीत के रूप में- व मन को लगा ही तो हो, न रूप ही लगा ही तो सदा ही, विसर्जन मात्र का सदा स्वरूप बन' 44

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󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 069/ 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀? 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀? 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀; 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀?’ 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀, 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀? 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀? 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀, 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀? 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀?’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀, 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀- 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀?’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀?’ 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀?’ 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀-󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀, 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀’ 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 ‘󰀀󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀 󰀀󰀀󰀀󰀀

इस छवि में फ़ॉन्ट/एन्कोडिंग की समस्या के कारण देवनागरी अक्षरों के स्थान पर केवल चौकोर बॉक्स (Tofu/Missing glyphs) दिखाई दे रहे हैं। केवल विराम चिह्न, संख्याएँ और उद्धरण चिह्न ही दृश्यमान हैं:

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  • Page number: 49

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व्यवसाय संबंधी या अन्य या पारिवारिक कार्य तथा योग्य समय पर आहार-विहारादिक का नित्य नियमपूर्वक काल निश्चय करके काम करना चाहिए जिससे स्वास्थ्य, मनका सं- यम वा आलस्य-प्रमादादि का निवारण सदा रहकर सब काम ठीक बने और सदाचार बढ़ता रहे न कि आलस्य, काम की अधिकता, समय का, खान-पान का ज्ञान न रखके जब इच्छित हो किंवा आहार-विहारादिक के समय काम और कामके समय आहार वा आहारा- दिक नित्य करें, जिससे न तो स्वास्थ्य वा आत्माका निर्वाह हो, न ही विचार शक्ति वा काम ठीक बने और न ही सब ओर आनन्द प्राप्त होता॥ आहार-विहारादिक के वा कामके वा सब व्यवहार के सब काम ठीक और नियम से हो तो सुख सदा रहे॥ 080/ नित्य योगाभ्यास वा जो कि मनुष्य वा जीव है सब मन तथा आत्मा से युक्त है सो जीवात्मा परमात्मा कृत सब जगत् की सब वस्तु और सब कर्मों से उत्तम कर्मों को ग्रहण करके आत्मा शुद्ध तथा मनको निर्मल बना कर वा ज्ञान स्वरूप ईश्वर से सब उत्तम सुखोंको प्राप्त करे। जब मनको वा आत्माको इन दोनों को शुद्ध पदार्थ नित्य प्राप्त होवें अर्थात् वेदादि, उत्तम उपदेश, उत्तम कर्मों का नित्य ही सब उत्तम सुखों द्वारा लाभ होता रहे, सब मनका ही काम है सब जैसा जैसा मन में भाव रक्खेगा वैसा ही फल वा गुण आत्माको परमात्मा सुखों से वा सब सुखों से प्राप्त वा संस्कार युक्त होता जावेगा अर्थात् सो सो वा सब उत्तम उत्तम विचार युक्त! सो सब सुखों का, आत्माको ज्ञान का लाभ परमात्मा सम्बन्धी नित्य ही वा विचार मनमें सदा ही सब को नित्य ही करना योग्य वा ज्ञान वा उत्तम कर्म सदा सब ओर मनको वा आत्माको दो- प्रकार से सुख प्राप्त हो तथा सब सम्बन्धियों को आत्मा द्वारा सब प्रकार सम्बन्धी सब ओर का सुख वा सदा ही आनन्द प्राप्त होता रहे सब ओर वा आत्माको दो दो प्रकार का ज्ञान प्राप्त होवे जिस से आत्मा सदा उत्तम नित्य सब सुखों युक्त, आत्माको ही सब रस रस, ज्ञान प्राप्त होता रहे॥ सब सुख नित्य रहे? चित्त सब ओर शुद्ध रहे, सब को नित्य सुखों युक्त वा आत्मा को नित्य निर्मल प्रकार का सब व्यवहार सिद्ध सब ओर का नित्य सुखों का अभ्यास वा स्वाध्याय द्वारा ही प्राप्त हो॥ एक प्रकार तो संसार सम्बन्धी- ज्ञान का, दूसरा प्रकार उत्तम ज्ञान- का, नित्य लाभ हो तो आनन्द रहे॥ सत्य पुरुषार्थ का॥ वा योगाभ्यास सदा हो॥ 081/ योग-साधन वा आत्मा को॥ वा जीवात्मा नित्य ही उत्तम परमात्मा के सब ज्ञान द्वारा आनन्द युक्त सब सुख प्राप्त करने का सदा यत्न वा सब ओर से करे। सो इस प्रकार सब ओर सब काल वा नित्य सब मन तथा मन द्वारा परमात्मा सच्चिदानन्द का नित्य ही सदा काल आठों-पहर ध्यान वा स्मरण मन से किया जा सकता है वा करे, ‘सब से परे?’ सब से परे परमात्मा का स्मरण सब से परे नहीं हो सकता क्योंकि मन सब ओर सदा सब ओर ही रहता है सदा ही आत्माको सब ही काल स्मरण मन ही द्वारा सदा ज्ञान द्वारा किया जाता है सो सदा नित्य ही ध्यान हो सके; फिर तो सदा नित्य ही आत्मा से सब कर्म सदा ही वा सब ओर सत्य स्वरूप के सब कर्म यथा योग्य परमात्मा सम्बन्धी सदा मनके द्वारा नित्य ही उत्तम सब कर्मों का लाभ हो सके, ‘सब से परे?’ 51

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□□□□-□□□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□-□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ ‘□□□ □□□ □□□?’- □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□- □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□, □□□ □□□□□ □□ □□- □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ ‘□□’ □□ ‘□□’ □□□□□ □□□□□ □□□ ‘□□’ □□□ ‘□□□’ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□ 084/ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□- □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□, □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□□ □□□□ □□- □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□□□ □□- □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □ □□□, □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ 085/ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □ □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□□□ □□ □□□ □ □□, □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□! □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□- □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□! □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ 53

यहाँ पृष्ठ पर उपस्थित पाठ (जो कि फॉन्ट रेंडरिंग समस्या / मिसिंग ग्लिफ़ बॉक्स के कारण दिखाई दे रहा है) का यथावत प्रतिलेखन प्रस्तुत है:

□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□; □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□! □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□-□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□- □□□□ □□, □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□-□□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□! □□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□! □□ □□□□□ □□□ □□, ‘□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□’ 086/ □□□□□□□ □□□□, □□□□□□□□ □□□□ □□□□! □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□, ‘□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□’ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□, ‘□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□’ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□, □□□□□□ □□, □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□□, □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□, ‘□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□, □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□, □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□, □□□□ □□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□’ 087/ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□-□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□-□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ 54

The text in this image cannot be transcribed into Devanagari because the document suffered from a font-rendering/missing-glyph error (tofu / empty rectangular boxes) when it was generated/exported. The original character data has not been rendered into legible letters.

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[Top Section]

  • Contains 4 paragraphs composed entirely of unrendered glyph boxes (▯) along with punctuation marks (,, ?, ‘...’, -).

088/ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ (Header in blue bar)


[Main Section]

  • Contains paragraph text, dialogue with quotes (‘...’, ?, ,, -), all rendered as empty rectangular boxes (missing font).

Page number: 55 (Bottom right corner)


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089/ □□□□□□□ □□□□ □□□□

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इस पृष्ठ पर अधिकांश अक्षर फॉन्ट अनुपलब्धता (Font missing/corrupted tofu glyphs - □) के कारण अपठनीय आयताकार बॉक्स के रूप में प्रदर्शित हैं। दृश्यमान चिह्नों, विरामचिह्नों एवं संख्याओं के साथ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रतिलेखन नीचे प्रस्तुत है:

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माता-पिता पारिवारिक सम्बंध तथा इस रस द्वारा सांसारिक जीवनपर्यन्त जो सुखानुभव प्राप्त कर रहे थे उन सब आत्मिकसुखप्रद आनन्द रूपी रसयुक्त मधुर सम्बंध, सम्बन्ध को काल-रूपी विष का मिश्रण करके इस प्रकार नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाता पश्चात् जिस सांसारिक जीव को सुख दुःख देने का निमित्त सम्बन्ध जोड़ा था वह सम्बन्ध रहा ही नहीं, सदा रहने वाला, अमर तो केवल एक परमात्मा ही सत्यस्वरूप है, सो ही सत्य पदार्थ मानव तन द्वारा प्राप्त हो सकता, सो ही सच्चा सुखदायक है जो सदा रहता है जो सुख अपने साथ परलोकपर्यन्त अखण्ड सुख- रस पहुँचा सकता है, इसलिए उसका त्याग

093/ कर्तव्य

भाई लोगो, जिस का कर्त्तव्य हो उसको तो पूरा करना हमारा धर्म तथा इन्सानियत धर्म माना ही जाता है सो, पर मनुष्य इन्सान बनकर अपने धर्म को तो भूल गया कि मेरा धर्म इन्सान का मानव का केवल उदर पोषण का साधन मात्र करना ही? जो सब जीव पशु पक्षी भी, तो फिर पशु मानव अन्तर क्या? सो मनुष्य विचार शक्ति द्वारा अपने कर्तव्य को भूल कर संसारिक अन्य सांसारिक रस को भोग करके स्वयं असन्तोषी बना सो सब दुःख का मूल बन गया जिसका फल यह पाया सुख की जगह दुःख भोगना ही? पर कल्याण जन-हित सुख की भावना जो लोक-कल्याण की भावना द्वारा अखण्ड आनन्द सुख को पहुँचा सकती, उस का विचार ही, त्याग दिया, निज, परमार्थ, का कल्याण का परोपकार का रूप ही त्याग दिया! केवल अपना ही पेट भरना चाहा, सो किया; जिससे मन चंचलताई के वश होकर अन्य सब को तो सो तो, पर खुद को आप ही कष्ट दिया जा रहा! पर अपने को सब कुछ ज्ञानी समझ रहा। जब संसार सुखमय था तब सुखद भावनाएँ थीं सब सुखी रहते, किसी को दुःखदायी बात केवल पेट पालन तक सीमित ज्ञान न होकर कल्याण पर, सो परोपकार के कार्यकलापों द्वारा सब सुखी थे सो कारण सुख का था तथा जीवन सुखमय व्यतीत था सुख दाता विचार मन में जागृत या वास हुआ मन निर्मल था जिस का लाभ, कि मनमुख जीव संसार व संसार सुख की इच्छा को त्याग कर चला, पर सन्मुख जीव संसार व सांसारिक सुख 'ज्ञान' द्वारा नष्ट कर मन को शान्ति प्रदान किया 'ज्ञान' पर तन मन धन अर्पण कर दिया, 'ज्ञान' दाता को सब का स्वामी माना

094/ संसार सुख का त्याग

जब मानव विचार शक्ति द्वारा सन्त महापुरुषों की शरण ग्रहण कर सन्मुख बना तो सब कुछ त्याग कर सन् मुख भाव रूपी साधन अपनाया जो उस का साधन बना सो सब त्यागने योग्य-वस्तुएँ ज्ञान थी, सो असत्यता को त्याग कर सन्मार्ग अपनाया सो ही सब कुछ सुख मन-मुख होकर मन की इच्छा सांसारिक विचार द्वारा नष्ट हो जाता था, जिसको सच्चा सुख स्वरूप कहा जा सकता। उस पर तो सब कुछ न्यौछावर करने योग्य साधन आवश्यकता रूप ज्ञान का उपदेश था, जिस का त्याग रूप ही जीवनपर्यन्त सुखद बना रहा सो सब कुछ सत्य स्वरूप अजर अमर परमात्मा स्वरुप ही त्याग साधन रूप था सन्मुखता का ही सच्चा स्वरूप रूपी त्याग-स्वरूप माना गया जिस द्वारा सब कुछ संसार त्याग पाया इसलिए संसार त्याग केवल त्याग नाम से नहीं था, 'संसार का त्यागकरणा' मनमुख की अज्ञानता त्याग का अभिमान उत्पन्न करता था! केवल मुण्डन करा, वस्त्र रँगवा लिए, यह सब केवल दिखावा मात्र, या अज्ञान त्याग स्वरूप कहा? त्याग केवल सो वासना-कामना का त्याग जो जीवात्मा को बन्धनमुक्त करता है? सन्मुखता का सच्चा त्याग ज्ञान, जो सब रूप से त्याग रूप का स्वरूप माना सो सच्चा त्याग ज्ञान महापुरुषों की शरण ग्रहण करने, से मानव रूप को समझ संसार त्याग सहज स्वरूप रूप में समझा जा सकता जब मानव ज्ञान द्वारा संसार त्याग सच्चा रूप जान संसार त्याग विचार द्वारा संसार त्याग सुखद स्वरूप रूप से जाना था, इसलिए सन्मुख महापुरुषों द्वारा संसार का त्याग

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095/ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□-□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□, ‘□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□’ □□ □□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□- □□□□□□ □□□, □□□□ □□□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□-□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □ □□□□ □□□ □□, □ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□□ □□□ □□□-□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□-□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□- ‘□□ □□’□ ‘□□ □□’ □□ □□ □□□□ □□□ ‘□□ □□□□’, □□ □□ □□□□ □□ □□ ‘□□ □□’, □□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□-□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ 096/ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□-□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□, □□□ □□ □□□□ □□ □□ ‘□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□?’ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□, □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□-□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□, □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□, □□ □□□□□ □ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□, □□ □□□ □□ □□□□□, □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□- □□□-□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□, □□□□□□, □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□, ‘□□□□□ □□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□ □□!’ □□□□ □□□□□ □□□□ □□, ‘□□□ □□□□ □□□, □□□□ □ □□□; □□□□ □□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□’ □□ □□□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□, ‘□□□□ □□□ □□□□’ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□, □□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□, □□-□□□□□□□□□□ □□ □□ □□□-□□□ □□□ □□□ □□ □□ ‘□□’ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□ □□□ □□□ □□ □□-□□□□ □□ □□□ □□□ ‘□□’ □□ □□□□□ □□□□ ‘□□□’ □□ □□□□□ □□ 59

इस प्रकार श्रीगुरु जीव-सत्त्वको अपने रूप तथा नाम 'जीव' प्रदान करते, उनको अपने परम धाम रूपी निज अङ्गसङ्ग 'जीव' प्रदान करते, तब जीव कृतार्थ होता। 097/ गुरुदेव शिष्यका कल्याण क्यों गुरुदेव का शिष्यका यह कल्याण रूप स्वरूप कृपा केवल जीवकी आत्मिक कल्याण दिशा तक ही सीमित नह रहकर यह सर्व दिशा प्रसारित भी होत रहता है। इस हेतु श्रीगुरु शिष्यके व्यावहारिक जीवनका भी ध्यान रखते। ऐसा नहीं होता कि शिष्यके सम्पूर्ण रूप शरण गत न होने, अथवा पूर्णरूपेण वह आज्ञा वहन नहीं कर रहा, अथवा मनमुखता आचरण करता भी हो सकता हो लेकिन, वह शिष्य रूपी जल जीव स्वरूप बनकर, गुरुके तट शरण आया होकर उसकी जीवन प्यास को गुरुदेव तृप्त तो करते ही रहते हैं। उसका व्यावहारिक जीवन सुखी रहे। इसीलिए वह 'गुरुदेव' रूप धारण करके जीव अज्ञानी अवस्था दौरान सांसारिक जीवन तक भी 'उपकार' की सीमा विस्तारक कर शिष्यका भला ही सोचते रहते। इस दृष्टिसे विचारने पर यह प्रत्यक्ष प्रतीत होता अवश्य होगा कि यह 'भू-लोक' केवल एक पाठशाला स्वरूप ही, इस हेतु शिष्यको 'भू-लोक' रूप ज्ञान शाला रूप संसारकी सर्व समस्या हल करने का अवसर प्रदान करते, जो कि सांसारिक कल्याण रूप दिखाई देकर जीव के इस व्यावहारिक जीवन को सार्थक तो बनाता ही रहता, पर उसके मन को सम्पूर्ण रूप यह नहीं समझाता कि यह शारीरिक रूप अवसर ही अन्तिम है, पर उसके मन को जीवकी पूर्ण रूप से उस अद्वैत रूप जीवन धारण तक इस प्रकार का साधन, उसका मन स्थिर रूप से केवल गुरु चरणामृत पान तक ही नहीं पर उस अमृत स्वरूप जीवन धारण की दिशा विचारने हेतु भी अवसर प्रदान करने का निमित्त न केवल इस सांसारिक सुख साधन उपलब्ध कर करने का कारण रूपसे शिष्यको यह अवसर प्रदान करते हुए कि सांसारिक सुख, इस हेतु शिष्यको यह अवसर प्रदान, शिष्यको यह ज्ञान देते। 098/ आत्म-कल्याण प्राथमिकता है यह विचारणीय भी गुरुदेव शिष्यके सम्बन्ध में इस बात रूपी सत्य-तथ्य को ज्ञान-गोचरता से जान लेना व्यावहारिक भी ध्यान का विषय, आत्म-कल्याण की प्राथमिकता को पर रख गुरुदेव शिष्यके इस सूक्ष्म जीवन रहस्य विषय, उसके व्यावहारिक जीवन की चिन्ता आत्म-कल्याणकी चिन्ता उपरान्त प्राथमिक विचार मानते। शिष्यकी आत्मिक दुर्बलता गुरु रूपी चरणो की शरण रूप जल प्राप्ति का कारण बन सके, इस हेतुसे शिष्य का मन जब सांसारिक सुख की इच्छा से प्रेरित होकर गुरु शरण में आया, सांसारिक इच्छाओंकी तृष्णा का शमन केवल इसलिए नहीं, ताकि शिष्यको सांसारिक सुख मिले! इसलिए कि जीव का मन तृप्त हो कर केवल शान्त हो सांसारिक विषय से; उसके मन की यह तृष्णा ही आत्म ज्ञान की पिपासा का कारण बन सके। इस हेतुसे जहां सांसारिक सुख रूप जल का पान, उस शिष्य को गुरु द्वारा मिले, उसके मन हेतु जल रूपी अमृत का तो काम सांसारिक तृष्णा शमन करने का ही स्वरूप बन सके तथा गुरुदेव सांसारिक सुखोंद्वारा उस आत्म-कल्याण रूपी पिपासाको पूर्ण कर सांसारिक सुख केवल निमित्त स्वरूप सांसारिक सुख को साधन-स्वरूप बनायें यह भाव निहित था, नकि इस प्रकार सांसारिक सुख केवल ही, जो केवल सांसारिक दृष्टि द्वारा जीव रूप को सीमित करता था उस दिशा को बदल कर, उस रूप को गुरुदेव जीव रूप को दिशा प्रदान कर सकने तक। इस कारण जहां यह स्वरूप इस बात विचारने को ध्यान दिलाता, शिष्य की अन्य कल्याण की दिशा पर उस अन्य दिशा को केवल उस इस बात-विचारकी प्राथमिक दिशा रूप ही समझ कर चलना चाहिए, ताकि इस सांसारिक सुख के रूप को निमित्त ही जान जीव का उस दिशा का विचार ही प्रमुख न बन सके। उस अवस्था सांसारिक सुखोंको पूर्ण समझ जीव सांसारिक सुख-दुख रूपी सांसारिक बन्धन सांसारिक जीवन का लक्ष्य न, वह उस आत्मिक कल्याण साधन दिशा का मार्ग ही, सांसारिक सुख भोगने का ही लक्ष्य मान कर न उस सुख को भोग कर सके। 60

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Below is the line-by-line transcription of the visible characters, numbers, and punctuation:

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विचारशीलता मात्र का होना जीव मात्रके कल्याण का कारण या कारक बनसकता तो फिर सभी विचारवान् लोग एक ही विषय स्वतः सम्पन्न कर ही लेते।लेकिन जो ऐसा नहीं अनुभव करते, सत्य के साक्षात्कार के कारण ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि एकत्व के प्रभाव मात्र से ही आत्मा सब प्रकार के सन्देह से मुक्त हो जाता तथा एक ही पथगामी बन कर यह समस्त जगत् एक ही मार्ग का अनुगामी बनकर न जाने कब का कृत कृत्य हो चुका होता ।। अतएव, विचार से व्यवहार के स्वरूप को, 'यथा वत्', या वास्तविक रूप नहीं मिलता बल्कि मन में उथल पुथल और बढ़ जाती है, मन अनियन्त्रित होता है, वासनायें सिर उठा कर आगे बढ़ कर मन को विषय से वशीभूत कर सकती हैं। हाँ, विचार के प्राधान्य मात्र, विशेषाधिकार रूप से आगे बढ़कर जब विवेक रूप, अपनी ज्योति बिखेरता है तब मन को शान्ति की प्राप्ति होती, सत्य विचार मात्र का उदय उस स्थिति में जीवात्मा स्वरूप में होता है जो कि, न केवल मन को लय कर देता अपितु वासना रूपी बीज ही को सर्वथा नष्ट कर देता, उसे शान्ति पूर्ण 101/ विवेक से शान्ति लाभ यह सत्य बात सदैव से जन वर्ग के हित कार्य में सदैव ही उपयोगी सिद्ध- तो रही ही है, भले रूप भले विचार मात्र से किसी तरह भिन्न-हो क्यों नपड़े, किन्तु यह तो सत्य ही सिद्ध परिणामकारी रूप सिद्ध होगी ही, विचार में गति कम हो, भले रूप गति प्रत्येक के मन में ही उत्पन्न हो किन्तु विवेक सदा अपनी स्थिति मात्र से प्रत्येक को प्रकाश मय करता है, जिससे कि हर प्रकार के हर प्रकार विश्लेषक के सब सन्देह को, विवेक के उदय रूप मात्र सब ही स्वतः समाप्त होकर लय हो जाते ही देखे हैं, फिर चाहे स्थिति कोई रूप क्यों नहो। संयम, तप, जप, भक्ति- के कारण सब, जो धारण किए गये त्याग पत्र- स्वरूप विवेक के प्रभाव रूप विचार मात्र से ही त्याग रूप न रह कर, या त्याग तो जो कि स्वभाव सिद्ध का रूप स्वतः- ही बन जाता था, या जिसे त्याग भी नकहें बल्कि मात्र यह सम्प्रदाय या सम्प्रदाय रूप, या स्वरूप स्थिति का रूप, स्थिति के नाम से स्वरूप के स्वरूप सम्बन्ध जीवात्मा स्वतः ही पा लेता था। जो केवल ही केवल ही बात ज्ञान सिद्ध रूप विशुद्ध के द्वारा स्वतः ही सम्भव था। अपने अपने स्वरूप के दर्शन मात्र से ही सम्भव है, जो प्रत्येक के अन्तर का प्रकाश सदा से सदा रूप होकर प्रकाश के रूप मात्र जीवात्मा स्वरूप को देता था। विशुद्धता ही केवल सदा सिद्ध रूप में, सब काल सब देश, कार्य, स्थिति मात्र प्रकाश का रूप सदा, केवल ही केवल मात्र रहा है।। विशुद्ध स्वरूप, सत्य, आनन्द, का प्रकाश मात्र ही, जो शुद्ध रूप, स्वरूप रूप सदा ही सर्वत्र सब काल में रहा पाया गया, जो सब ही रूपों का बीज रूप मात्र आत्मा रूप से सदा रहा है, जिस रूप प्रकाश को, हर रूप का बीज कहना था। 102/ वशीकार किसका हो? जब प्राण ही सब कुछ कार्य कारण रूप सब रूप से हो जीव मात्र रूप से हो रूप मात्र स्वरूप से ही सदा सदा से ही रूप मात्र है! तब विचार का स्वरूप सब रूप जीवात्मा सदा रूप से सिद्ध है, तो फिर यह प्रश्न ही नहीं रह या सम्प्रदायों रूप में विचार का प्रभाव रूप या प्रभाव भाव- रूप सदा सदा सदा रहा जीवात्मा स्वरूप मात्र से ही सब कुछ रूप रहा 62

समाज का हर नर नारी धर्म का नाम लेत हैं और धर्म ही मनुष्य रूप को सार्थक कर मुक्तिलाभ तक लेजा सक्ता है! पर जिसे मनुष्य आज धर्म समझ रहा होगा वह यथार्थ का रूप बना रक्खा होगा क्या नहिं? उस धर्म जिसे धर्म या तो माना जाताहै या ही है, उसका फल मुक्ति कैसे होगा! जो धर्म बिना किसी के रोके सब देश, समस्त काल में एक सा ही फल देता रहता वही यथार्थ धर्म हो सक्ता? उत्तर- हा, यथार्थ धर्म, या उत्तम क्षमादि लक्षण धर्म! सम्पूर्ण जीवात्मा का स्वभाव किसी भी काल में बदल तो नहीं सक्ता भला जो विकारी भावों का रूप है, उसको ही यथार्थ धर्म मानकर संतुष्ट होने का क्या प्रयोजन रहता है? विकारी वा विभाविक ही तो संसार चक्र का रूप बन रहा है, सो इन विभावों से रहित शुद्ध रूप को ही अपना मान कर उपादान ही यथार्थ धर्म समझना होगा 103/ निश्चल धर्म ‘जो जीव सदा सम्यग्दर्शन आदि रूप धर्म तथा सदा निर्दोष धर्ममय अपने आत्म रूप को ध्यावे है, वह जीव सम्यग्ज्ञान को ही प्राप्त हो रहा’ इस लोक में तो सब पदार्थ या द्रव्य सदा अपने स्वभाव रूप होकर परिणम रहेहैं, केवल इस जीव रूप द्रव्य को छोड़कर सो ऐसा क्यों हो, इस विषय का विचार कभी किया है! सब द्रव्यों का जो रूप, गुण पर्याय से तो सदा ही काल में जैसा था वैसा ही परिणामन स्वरूप ही दिखाई दे सक्ता है किन्तु कभी इस जीव रूप द्रव्य को भी देखा कि इस जीव रूप द्रव्य के स्वभाव को छोड़कर कभी नहीं देखा, सदा केवल मात्र ‘द’ या ‘प’ रूपी कर्मों द्वारा उपाधि रूप जो सब कर्म रूप परिणमन होता है, उस समय कभी जीव का स्वभाव या रूप तो नहीं बदल गया अब देखना यह, 'कि जो भी, जिस रूप से धर्म या धर्मात्मा कहा है, सो भी ‘पर से’ भिन्न स्वरूप का रूप है'या कि 'पर से'- भिन्न स्वरूप रूप ‘स्व से’-युक्त स्वरूप निश्चय से कहा जा सक्ता सो समझ लो तब कहीं धर्म या धर्मात्मापना का यथार्थ स्वरूप-पहचान रूप से प्रगट रूप से स्वीकार उपादान स्वांगपने से नहीं यथार्थ जैसा जैसा रूप स्वरूप का होगा, सो सब ही रूप ‘स्वयं’ ही देखना ही यथार्थ निश्चय रूप से समझ कर स्वांगपने का व्यवहार स्वरूप त्यागना समझना यह यथार्थ धर्म कैसा यथार्थ धर्म? सब ही प्रकार के भाव, मन रूप व वचन अथवा काय रूप रूप सब क्रिया ही, आत्मा रूप स्व द्रव्य रूप स्वयं ही स्वरूप का कारण मान लिया जा रहा व्यवहार ही मान कर सब पर भाव, सो सब क्रिया ही, सो अज्ञान ही रूप फल को फल को ‘न धर्म’ रूप, सो अज्ञान रूप ही परिणाम ही, यह अ-धर्म रूप 104/ ‘हम विनाशी अथवा अविनाशी हैं?’ यह जानना सब जन का प्रथम ही कार्य होना ही योग्य है, ‘हमारा तो नाश होता है?’ वा ऐसा ही रूप, ‘हमारा कभी विनाश होगा? सो ऐसा ही विचार योग्य रूप होगा, ‘हमारा विनाश तो हो सकता ही!’ सो ही विचार हो जाना, ‘हम विनाशी अथवा अविनाशी हैं?’ तब ही योग्य ही हो उपादान का रूप सब जन व्यवहारिक से भिन्न ही देखना होगा कैसा सो विचार? सो ही विचार ऐसा होगा कि, सब संसारी ही मनुष्य पर्याय प्रमाण से नाश ही स्वरूप का दिखाई देता है, सो विचार; सो व्यवहार से, सब जन रूप से व्यवहार सब जन ऐसा कहते सुना जाताकि यह पर्याय संबंधी ही सारा नाश होना देखा जाता व्यवहार- रूप विचार तो हो रहा देखा जा व्यवहार ही रूप सब व्यवहारिक जन स्वरूप कह रहे, व्यवहार मात्र से ही; सब पिता का, सब माता का, सब पुत्र का, सब संबंध सब ही व्यवहार ही पर्याय के अनुसार देखा गया माना जाता 63