माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूपमें गिरे? उसको किसने रास्ता दिखाया? मरुस्थलमें वह क्या मरुमरीचिकामात्रके वश पड़ गया था। फिर उस साधकका सर्वस्वचोरीमें लुटनेसे बच भी जाय तब भी जीवनके लक्ष्य बिन्दुका ज्ञान होगा कि यह जीवन किसलिये मिला और इसके मिलनेका फल क्या है? अज्ञानतावश यदि यह इस पथ पर पैर भी रखना चाहे तब भी पग पग पर पग पग पर पग पग पर ठोकरें खा कर पथभ्रष्ट होकर अन्तमें नरकका ही भाजन होगा या दुर्गति भोगने को मिलेगी। इसलिए साधकको इस बातका विचार, सावधान होकर सावधानीके साथ कर लेना चाहिए जिससे कि लक्ष्य दूर न रहकर प्राप्तिके अनुकूल हो जाय। प्रत्येक जीवको यह सोचना, विचार करना चाहिए कि हमारे जीवनका क्या फल है? केवल पेट भरना? केवल सन्तानोत्पत्ति ही करना अथवा सब प्रकार सांसारिक सुख भोगना मात्र ही इसका फल है? कदापि नहीं यह तो सब पशु-पक्षी भी भोग लेते हैं मनुष्यके इस मानव तनका फल तो कुछ अन्य ही होना चाहिये? जब तक आत्मा परमात्माके पदको प्राप्त न करले तब तक समझो कि जीव अज्ञानी, अचेत तथा सब प्रकार अंधकार में विचरता, माया मोहके जालमें फँसकर आवागमनके चक्रमें भटक रहा है। प्रत्येक आत्माको इस बातका चिन्तन करना आवश्यक है, जिससे उसकी आत्मा जाग्रत होकर, मोक्षकी ओर अग्रसर हो सके। साधकको चाहिए कि वह अपनी आत्माको जागृत करे एवं परमात्माके पदका सम्यक् रूपसे दर्शन करे। आत्माके परमात्माके स्वरूपको सम्यक् रूपसे जानकर तथा पहचानकर मोक्ष प्राप्तिका यत्न करना उचित होगा। इसलिए आवश्यक हैकि पहले साधक, स्वाध्यायके माध्यमसे तत्त्वका पूरा बोध कर सत-असत्का, स्व तथा परका सम्यक् अन्तर जाने। जब तक सत क्या है? यह न जाने तब, क्या असत् से पृथक् रहेगा? जब तक यह जानेगा, कि असत् किसे कहते हैं? असत्का रूप क्या है? साधकके लिए असत्, हेय वस्तु, त्याज्य वस्तु, सब प्रकार त्याज्य वस्तु केवल मात्र ही त्याग ही करने की वस्तु है। इस प्रकार जब सत, असत् का भेद भली प्रकार जान लेगा तब, स्वतः उस असत्का परित्याग कर देगा। वह त्यागके लिए किसी प्रकार यत्न न करेगा क्योंकि, जब यह ज्ञानके प्रकाशसे जान जायगा कि असत्का तो स्वरूप ही त्याज्य है, वह त्यागनेयोग्य ही वस्तु है। इसलिए वह स्वयं ही असत्का त्याग न कर देगा, स्वतः त्यागके रूपमें परिणत हो जायगा फिर उस त्यागको त्याग भी, त्यागके रूपमें ग्रहण नहीं करेगा। तब त्यागका अहंकार भी समाप्त होकर त्याग भी एक सहज स्वाभाविक रूप धारण कर लेगा। यही बात स्व तथा परके सम्बन्धमें कही जा सकती है। जब तक आत्माको यह ज्ञान नहीं हो जाता कि आत्मा, जिसको केवल ज्ञान दर्शन रूप अथवा चैतन्य रूप माना गया है। वह ज्ञान दर्शन स्वरूप आत्मा न किसी अन्यके रूपमें परिणत हो सकती है। और न ही यह अन्य रूप परिणत हो सकती है। जब आत्माका अन्य किसी रूपमें किसी प्रकार से परिणमन नहीं--हो सकता, तब यह, यह सोच--समझ कर कि यह अन्य समस्त संसारी वस्तुएँ आत्मा से भिन्न हैं? अतः इन भिन्न वस्तुओंका आत्माके साथ सम्बन्ध अस्वाभाविकहै। यह भाव ही अनादिकालसे इस जीवके साथ लगा हुआ है। इस प्रकार का ज्ञान जब आत्मा को होता है? तब आत्मा स्वाभाविक रूप से, समस्त वस्तुओंके साथ जो मोह सम्बन्ध है उसको तोड़ देता, समस्त सांसारिक बन्धन टूट जाते तथा आत्मा जाग्रत होकर उस! परम तत्त्वके स्वरूपको पहचान कर समस्त भय से रहितहोकर अपनी ही सत्तामें स्थित होकर निर्वाण स्वरूपको प्राप्त कर लेता है। वास्तवमें यह जीव जबतक स्वयं अज्ञानी, उस अवस्थाको प्राप्त करनेके यत्नसे अपने मुखको मोड़े रहता है तबतक, अपने स्वरूप लक्ष्य को जानकर उस पद रूप निर्वाण स्वरूपको प्राप्त नहीं कर सकता। अत एव ज्ञानी साधकको इस पथका दर्शन प्राप्त कर! इस प्रकार अपने स्वरूपको जाग्रत करके उस लक्ष्यको सिद्ध करना चाहिए। आत्मा को यह विचार करना होगा, केवल विचार मात्रसे ही कल्याण सम्भव तो नहीं हो सकता केवल विचार ही, उस आत्माको जाग्रत करके अपने स्वरूपको अवश्य करा सकता, किन्तु उस ज्ञान को धारण करके ज्ञानके बताए पथ पर जब तक चलेगा नहीं, तबतक उस पदको प्राप्त नहीं, कभी कर सकता अतः, ज्ञान मात्र साधन मात्र, केवल ज्ञान साधन मात्र, ज्ञान मात्र साधन मात्र ही साधन मात्र, कल्याणका मार्ग नहीं, कल्याणका मार्ग स्वाध्याय रूप ज्ञानके साथ साथ, उस ज्ञान को उस पथको भी धारण, करना, उस पथ पर चलनेके लिए सतत प्रयासरत रहना आवश्यक है। केवल ज्ञान ही सब कुछ कर सकता, यह कहना न्याय संगत नहीं कहला सकता। इसलिए ज्ञानके साथ साथ उस ज्ञान रूपी दीपकको सम्मुख रखकर उस पथ पर उस मार्ग पर चलना होगा। अतः ज्ञान, जिसका प्रतिपादन पूर्व शास्त्रमें किया गया, उस ज्ञानको समझ, कर जान... कर आत्मस्थ करके उस पर ही पग आगे रखना इस जीवका कर्तव्य होगा! तभी यह स्वाध्यायका फल, आत्मा को प्राप्त हो कर मोक्षका मार्ग प्रशस्त होगा 101