माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविनायकराव उनका यह रूप देखकर स्तब्ध, भय विह्वल होकर चुपचाप वहीं खड़े रहे। इसके बाद फिर, भगवान सहाय का विकराल रूप और अधिक भयंकर होकर गरजने लगा। विनायकराव किसी प्रकार हिम्मत बांधकर अपने कमरे की ओर रवाना हुए, परन्तु विनायकराव का पीछा भगवान सहाय ने नहीं, वरन उस प्रेत रुपी विकराल शरीर ने किया। विनायकराव अपने कमरे में खिड़की के पास बैठे ही थे कि प्रेत रुपी भयंकर रूप, जो पहले बड़ा, अब छोटा होकर पीछे खड़ा दिखाई पड़ा। इसके पश्चात वह छाया विलीन हो गयी। इसके पश्चात बहुत दिनों तक इस प्रेत का विनायक सहाय से पीछा न छूटा और प्रेत बाधा मित्रों, यह प्रेत बाधा ही थी जो प्रेत के समान भगवान सहाय हमेशा विनायकराव, अपने भाई तुल्य मित्र को डराता रहा। इस रूप में आकर भगवान सहाय ने यह स्पष्ट कर दिया कि मृत्यु के बाद भी उसका प्रेत अपने भाई समान मित्र से बदला ले सकता है। जब प्रेत का विनायकराव पीछा करता रहा तो वह किसी प्रकार भी अपने घर के कार्यों में हाथ नहीं बंटा पाया। परिणाम स्वरूप गृह कलह, बीमारी विनायक सहाय के पीछे पड़ी; उनका व्यवसाय चौपट हुआ; परिवार के सभी लोगों को इस प्रेत बाधा भुगतने को विवश होना पड़ा। जब तक, विनायक सहाय जीवित रहे प्रेत बाधा भगवान की दी कृपा हमेशा हमेशा के लिए नहीं रहती। भगवान की दी इस कृपा को भी मनुष्य संचित कर्मों के आधार पर नष्ट कर देता है। भगवान द्वारा दी गयी कृपा को मनुष्य तब खोता समझें जब मनुष्य अज्ञानता के वशीभूत होकर कोई न कोई ऐसा पाप कर्म कर बैठता जिसका असर विनायक सहाय की तरह ही दूसरों पर पड़ता है। विनायक सहाय ने केवल एक गलती के कारण अपने, परिवार तथा इस प्रेत बाधा भुगतने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन तबाह किया। भगवान की दया हमेशा मनुष्य पर बनी नहीं रहती। इसका कारण भगवान की कृपा में कमी का होना नहीं वरन मनुष्य की वह गलतियां तथा अज्ञानता जनित दुष्कर्म हैं जो भगवान की दी कृपा को नष्ट कर--मनुष्य भगवान की कृपा को--खो देता, जब कभी मनुष्य कर्म पाप, भगवान की कृपा के आधार को नष्ट कर देता है। भगवान का नियम अज्ञानता की अज्ञानता रहने तक ही सीमित है। जब मनुष्य का यह अज्ञान कर्म का रूप धारण करता है तो मनुष्य को उसका फल हर हालत में भुगतना ही पड़ता है! ऐसा विनायक सहाय को भुगतना पड़ा इसलिए मनुष्य को भगवान सर्वशक्ति सम्पन्न होने पर भी, यह सोच कर कि भगवान दया कर रहा है तथा कभी हमारे अपराध को माफ करेगा व वह कर्म-बंधन से छूट जायेगा भ्रम, हे मानव मत पालो, हे मानव यह ध्यान रखो हमेशा भगवान सबका भला तो कर सकता पर वह पाप का फल अवश्य देगा। जब मनुष्य का यह पाप कर्म का रूप धारण कर लेता तथा अज्ञानता का रूप त्याग कर अहंकार का रूप ले लेता है। अतः पाप कर्म, अज्ञानता से नहीं वरन मनुष्य अपने मन-मस्तिष्क में द्वेष की भावना तथा अहंकार-युक्त वासनाओं के वशीभूत होकर ही कोई पाप या गलत काम करता है। अस्तु पाप--मुक्त रहो, गलत कर्म मत करो, गलत विचार मत रखो, निष्काम कर्म करो। निष्काम कर्म, जो भगवान अर्पण, समर्पित होगा, वही मोक्ष का साधन बनेगा। मोक्ष प्राप्ति हेतु हर हालत विषय-विकार त्याग दो, यह ध्यान रखो न कोई तुम्हारा है, न तुम किसी के हो, न कोई तुम्हारा था। जो कुछ तेरा भाग्य था वह प्रभु कृपा से मिला, जो तू प्रभु कृपा द्वारा भुगतेगा उसका फल ही तो तुझे भोगना पड़ेगा! भगवान दया का सागर अवश्य रूप से तुम्हारा दाता है! भगवान दया का ऐसा भंडार है जो सदा खुला रहता है! भगवान दया की ऐसी गंगा है जो मनुष्य के पापों को धोकर पावन बनाती है! भगवान दया का ऐसा सागर है जो प्रत्येक का उद्धार करता है! भगवान से बड़ा दाता और कौन? क्या कोई भगवान की तरह दया करेगा? क्या कोई भगवान की तरह समझेगा? अतः तुम अपने लिए, प्रभु की शरण ग्रहण करो। अपने लिए प्रभु से कुछ मांगो? भगवान से बड़ा दाता संसार में कोई नहीं। जो कुछ वह दे सकता है वह और कोई नहीं दे सकता। जो कुछ वह तुम्हारा बना सकता है वैसा कोई और नहीं बना सकता। अतः प्रभु चरणों में विनायक सहाय की तरह नतमस्तक होकर रहो। प्रेत बाधा, इस विषयक विस्तृत विवेचना कर यह सिद्ध करने का मेरा, यह उद्देश्य रहा, कि प्रेत योनि, का भोग तब, ही प्राप्त होता है जब वह आचार-विचार से भ्रष्ट हो कर मन से विकारों का शिकार बन जाय! अतः सदा मन वचन कर्म से प्रभु
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