माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचारो तो वो भी कितना प्यारा होगा जिसने इतना प्यारा बनाया! वो कितना सुन्दर होगा जिसने हम सब को और इस सुन्दर संसार को रचना दी। जिसने तितलियों को रूप दिया जिन्होंने कोयल को कंठस्वर दिया। उस रबने जिसने सब को सुन्दर बनाया और हम सबने उस सुन्दर रब को क्या बना दिया? वो कहते हैं मंदिर में बैठता तो कोई कहे मस्जिद में तो कोई कहता वो काबा में बैठा, गिरजाघर में, कोई कहता वो चर्च चला गया तो तुम्हारा दिमाग खराब हुआ कि नहीं? जिसे तुम कैद करने चले वो सर्वव्यापक परमात्मा रोम-रोम, घट-घट व्यापता कण-कण जिसको ना पहचाना तो बेकार हो तुम, ना तुम संत कहलाने का हक रखते और ना ही परमात्मा कहलाने का हक रखते। वो कहते ना कि संत वो होता जो सबके साथ मिल के रहे प्यार से उसका ना विचार ना विचार सिर्फ इंसानियत। वो रब जिसने इतना प्यारा रूप दिया, वो कहते ना इंसान को तू इंसान समझ और इंसानियत की जिंदगी जी और सबको प्यार से इंसान समझ कर इंसानियत की जिंदगी बख्श, क्यों वो कहते ना इंसान वो इंसान नहीं जो इंसानियत का खून पीता है। वो इंसान नहीं, वो राक्षस कहलाने के हक में होता, वो ऐसा इंसान कहलाने योग्य, इंसान कहने योग्य नहीं जिसको मानवता पहचान ना आए। जो अपने ही भाई को मारकर ना जाने कौन सी बात हासिल करना चाहता, उसने परमात्मा देखना तो बहुत दूर की बात, आत्मा तक नहीं समझी परमात्मा को तो क्या देखना। वो इंसान जिसने इंसानियत त्याग दिया तो वो पशु समान हो गया और पशु भी अच्छा प्यारे, जो मालिक जिसने पाला उसको वफादार बन के दिखाता तो इंसानों से तो पशु ही अच्छे जिन्होंने अपने रब को तो पहचाना जिसने जन्म दिया उसको तो पहचाना पर इंसान ने अपने रब को भी नहीं समझा, गिरजाघर मस्जिद बना दी, भगवान नाम दिया तो, अल्लाह नाम रख दिया। किसने हक दिया उसको रब को बांटने का जिसने इंसान को इंसान बनाया? इंसान को हक किसने दिया जिसने परमात्मा नाम रूप दिया? इंसान वो इंसान नहीं जो रब को बांटता इंसान प्यार का रूप होता परमात्मा प्यार का रूप जिसने सबको बनाया इंसान समझ, रब से इंसान प्यार कर सके इसीलिए इंसान बनाया इंसान को पर वो इंसान रब बनकर बैठ गया इंसान इंसानियत भूल, ना ही खुद को पहचाना परमात्मा को क्या समझना इंसान, संत बनने का दिखावा इंसानियत का नाम नहीं! वो कहते संत कहलाने का हक इंसानियत को हक संत होने का पहचान ना दी हक संत कहलाने दिया पर इंसान अहंकार में आ गया इंसान संत इंसान वो ना रहा, जिसने परमात्मा खो दिया आत्मा, परमात्मा का ना रहा विचार ना ही संत बचा जिसने अपने मन को परमात्मा समझ लिया। वो इंसान शैतान ही कहलाने योग्य हुआ जो संत के भेष में ढोंग रचकर बैठा वो शैतान से बढ़कर क्या कहलाए। इंसान आज इंसान जिसने संत रूप को कलंकित कर दिया। परमात्मा की माया अजब निराली उस मालिक की लीला वो परमात्मा जिसको सब कहते जिसने कण-कण में रूप देखा-देखा वो रंग-ढंग पहचान वो कहते जिसने खुद को संत घोषित किया, वो ना तो परमात्मा का रहा उसने इंसानियत छोड़ दी आत्मा छोड़ दिया? इंसान को इंसान का रूप ही दिया परमात्मा ने। इंसान को आज वो दर्जा दिलवाया इंसान रूप तो सब को मिला पर जो परमात्मा रूप को अपना लिया जिसने इंसान को संत, गुरु रूप दिया रब ने। गुरु रूप परमात्मा समान होता जो अपने भक्तों स्वरूप देकर सच्चा ज्ञान देकर प्रभु से जोड़ देता परमात्मा को, संत रूप इंसान का रूप, ज्ञान जिसने आत्मा को दिया, ज्ञान जिसने प्रभु चरणो तक का रास्ता दिया, जो रब कहलाए, वो संत कहलाए, वो गुरु बन गए, वो परमात्मा स्वरूप बन गए। इंसान आज जो अपने आपमें गुरु, संत बनने का ढोंग करता, वो इंसान सिर्फ दिखावा दिखावे का रास्ता ही चुन रहा और जिस इंसान आत्मा परमात्मा के साथ मिलाई वो इंसान परमात्मा का रूप बन गया। इसलिए वो संत, वो जो परमात्मा बन गये जिन्होंने तो परमात्मा देखा। वो लोग संत कहलाए, वो लोग संत कहलाने योग्य रहे जिन्होंने, परमात्मा को देखा जिन्होंने आत्मा को परमात्मा में लीन किया जिन्होंने अपना जीवन समर्पित किया प्रभु के चरणों में। आज का जो संत वो अपने को रब समझने लगता वो रब तो नहीं, ज्ञान क्या दिया? वो परमात्मा के गुण-गान तो करता पर उस रब को नहीं पा सकता जो परमात्मा देखना चाहता वो सब त्याग करके परमात्मा को पहचाने जिसने त्याग किया वो संत बन गया वो रब का रूप बन गया। परमात्मा का रूप बनकर परमात्मा का कार्य कर रहा जिसने परमात्मा को पहचान 99