भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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के भाव से सब को शांत करने वाला जानना योग्य है। जिस तरह सब जीव, अपनी अपनी देह लिए फिर, तो उस देहके साथ सब का वैर छोड़ देवे सो ही श्लोक अर्थांतर से कहते हैं, जन्म-मरण दुःखित को तो यों विचार करे, जन्म-मरण दुःखित तो सब ही हैं। कोई तो नरक में दुःख भोगत हैं। कोई तिर्यंच में तिर्यंच सब दुःखी हैं, देवताओं सहित नर, देवताओं सब दुःखी जहां तहां जीव ही जीवों के संकट को संकट रूप जानके दया प्रवृत्त हो, इस लिये शांत भावक ऐसा जाने कि, जो इस जीव पर दया न करे तो कौन करे। इसमें सब जीवों से समता परिणामी हो तो सब से वैर न रहे। सब कोई जो जैसा है सो सो, सब कर्म उदय करके व्याकुल भया है, सब कर्मवश, सब परवश, सब मिथ्यादर्शनकषाय करी व्याकुल परिणामी सो सब दया योग्य ही जानि शांत भाव धारे। क्रोध न करे। तब सब शांत हो। अध्यात्म में शांत भावक को क्रोध, रागदिक तो उदय प्रमाण ही होगा, सो बहुत मंद होगा; किसी के ऊपर तो दया का परिणाम ही आवेगा कि यह दुःखी ही भया, इसपर से वैर क्या, दया करे; किसी के तो यह जाने कि सदा काल सब जीव ही का स्वभाव तो सब लोका लोक को जानन हार सर्वज्ञ का स्वभाव है? सो स्वभाव तो सब ही का एक ज्ञान ही ज्ञान भाव सो तो समै ही समै ही जानि शांत ही का अभ्यास फिर भावक को शांत प्रभाव का फल, नमस्कार रूप से कहते हैं। कर्म क्षपण [ ] का उपाय तो यही शांत परिणाम ही उपजावे, सो यह जीव ही सब को शांत करि सकै। वा शांत ही को सब पद से श्रेष्ट वा समस्त ही शांत भाव ही नमस्कार वा वंद्य स्वरूप है, तिस को नमस्कार शांत ही का नमने योग्य भाव शांत परिणाम से सब जगत व्यापे का अर्थ, शांत परिणामादिकों से जो सब भाव शांत भया, तिस शांत परिणाम से सब जगत शांत हो, ऐसा भावक नमस्कार करै। 104