माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस पर वह बोला कि क्या प्रभु यीशु मसीह हम लोगों जैसा मनुष्य था या उसने केवल मनुष्य का वेषमात्र धारण कर लिया था? मसीही मत के अनुसार प्रभु यीशु मनुष्य रूप धारण कर इस पृथ्वी पर आया और उसने दुख क्लेश भी उठाये, पर वह सर्वथा निष्पाप तथा सब तरह परिपूर्ण था, इसके सिवाय अधिकांश ईसाई उसके ईश्वर होने तथा त्रित्ववादी सिद्धान्त विश्वास रखते हैं। जब मनुष्य का शरीर धारण किया मसीह ईश्वरस्वरूप भी था अथवा केवल एक नर था? मसीह के ईश होने का तो क्या कहना! वह तो केवल नबी, ना ही पूरा नबी वरन परमेश्वर का सन्तान था। जैसा कि इंजील मत्ती १३:५५ में लिखा है, कि जब ईसा नासरत में गया तो लोग कहने लगे कि क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं! इस बात सुनकर वह मसीही रोने लगा, रोते-रोते उसका हिचकी बंध गया और उसके पश्चात उसने कहा कि इन लोगों की आँखें फूट गयीं थीं जिन्होंने मसीह को केवल एक बढ़ई का बेटा जाना था। इंजील में यीशु को ईश्वर का बेटा कहा गया है! मसीह को जो लोग केवल एक साधारण मनुष्य समझते हैं वह इस बात को भी जान लेंवे कि मसीह को मरियम कुँवारी का बेटा माना जाता है, इस बात को केवल ईसाई ही नहीं मानते किन्तु कुरआन शरीफ में भी ईसा को मसीह इबने मरियम करके सम्बोधित किया गया है। स्वामी जी ने कहा- हम यह मानते हैं कि ईसा एक पवित्र पुरुष था। वह बड़ा दयालु था, उसने लोगों को अच्छे रास्ते पर चलने का उपदेश दिया। उसने कोई किताब नहीं लिखी, वरन जो कुछ भी लिखा गया वह उसके शिष्यों द्वारा लिखा गया है। इसका भाव यह है कि मसीह, जिसको तुम ईश्वर, नबी, फरिश्ता मानते हो, हम उसे इन तीनों में कुछ भी नहीं मानते। जब ईसा ने यहूदी मत की त्रुटियों को देखा, उसके सुधार का प्रयत्न किया तो वह यहूदी लोग उसके विरोधी हो गये और उस समय के रोमन हाकिम से मिलकर उस बेचारे को सूली पर लटका दिया। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। स्वामी जी की बात का उस पादरी पर कोई प्रभाव न पड़ा। वह हठधर्मी करता रहा कि ईसा ईश्वर का बेटा था। स्वामी जी ने समझाया कि यहूदी मत के अनुसार जो व्यक्ति व्यभिचार करता था उसे पत्थरों से मारा जाता था। क्या ईसा के पास कोई ऐसा प्रमाण था कि वह ईश्वर का बेटा था। यदि मरियम के चरित्र पर कोई सन्देह करता तो उस समय के कानून के अनुसार उसे पत्थरों से मार दिया जाता। तब ईसा ने अपने को ईश्वर का बेटा कहा? यदि ईसा ईश्वर का बेटा था तो केवल उसी पर ईश्वर का क्या ठेका था? क्या और मनुष्य उसके बेटे नहीं थे? क्या हम लोग उसके बेटे नहीं हैं? यदि तुम ईश्वर को एकदेशी और शरीरी मानते हो तो उसका बेटा भी सिद्ध कर सकते हो। यदि उसे सर्वव्यापक मानते हो तो सब जीव उसी के बेटे हैं। ईसा ईश्वर का कोई खास बेटा नहीं था। पादरी कुछ देर तक तो चुप रहा--तत्पश्चात्, वह बोला, हम मानते हैं, या स्वीकारते हैं कि जीव सब प्रभु द्वारा पैदा-किये गये हैं। किन्तु ईसा मसीह में कुछ विशेषता थी। स्वामी जी ने कहा, विशेषता कैसी? क्या वह कुछ खा-पी नहीं सकता था, या कोई और बात थी? जब उसने कोई बात ऐसी नहीं कही जो संसार के कल्याण के लिये उपयोगी नहीं थी। उसने अपने को यहूदी धर्म की त्रुटियों को दूर करने के लिये अपने विचार प्रकट किये। ईसा ने अपने समय में यहूदी धर्म की बुराइयों को दूर करने के लिये ही विचार प्रकट किये और वह उसी कारण यहूदी लोगों द्वारा मार डाला गया। जब वह जाने लगा तो उसने स्वामी जी से पूछा कि यदि संसार में महापुरुषों का आना बन्द हो जाए और वेद ही केवल सब कुछ माना जाए तो संसार का कल्याण कैसे हो सकता है? स्वामी जी ने कहा, हे पादरी! क्या वेद केवल किसी एक देश के लिये हैं? नहीं, वेद तो संसार के कल्याण के लिये हैं; किसी देश विशेष के लिये नहीं; वेद केवल किसी जाति विशेष के लिये नहीं हैं। वे तो केवल संसार के कल्याण के लिये हैं। इस पर पादरी बहुत लज्जित हुआ। स्वामी जी ने कहा, सत्य को ग्रहण करो और असत्य को छोड़ो। संसार के सब मत-मतान्तरों में कुछ न कुछ सत्य तो है ही, परन्तु साथ ही असत्य भी बहुत है। इसलिये सत्य को ग्रहण करना और असत्य को छोड़ना ही चाहिये। यदि तुम सत्य को ग्रहण नहीं करोगे तो तुम्हारा जीवन व्यर्थ हो जायेगा। स्वामी जी की बातों का पादरी पर गहरा प्रभाव पड़ा। उसने कहा, मैं आपकी बातों पर अवश्य विचार करूँगा। स्वामी जी ने कहा, यदि आप ऐसा करेंगे तो आपका कल्याण होगा। स्वामी जी के विचार इतने सुन्दर और युक्तिसंगत होते थे कि सुनने वाले दंग रह जाते थे। अनेक विद्वान लोग स्वामी जी के व्याख्यानों को सुनकर अपने मत की त्रुटियों को समझ लेते थे। पादरी जब जाने लगा तो हाथ जोड़कर बोला, स्वामी जी! आप का ज्ञान अथाह है। मैं आप से बहुत प्रभावित हुआ हूँ। स्वामी जी ने कहा, हम तो केवल सत्य का प्रचार करते हैं। सत्य ही संसार का कल्याण कर सकता है। जब तक संसार में अज्ञान और अन्धविश्वास रहेगा तब तक संसार का कल्याण नहीं हो सकता।
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